acharya_arjun_tiwari

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कुसंगति का प्रभाव :-- आचार्य श्री अर्जुन तिवारी जी

*मनुष्य अपने जीवनकाल में सदैव उन्नति ही करना चाहता है परंतु सभी इसमें सफल नहीं हो पाते हैं | मनुष्य के किसी भी क्षेत्र में सफल या असफल होने में उसकी संगति महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है | इस संसार में भिन्न - भिन्न प्रकार के लोग रहते हैं इसमें से कुछ सद्प्रवृत्ति के होते हैं तो कुछ दुष्प्रवृत्ति के | जह



सनातन धर्म की विशालता :--- आचार्य श्री अर्जुन तिवारी जी

*सनातन धर्म में चौरासी लाख योनियों का वर्णन मिलता है | देव , दानव , मानव , प्रेत , पितर , गन्धर्व , यक्ष , किन्नर , नाग आदि के अतिरिक्त भी जलचर , थलचर , नभचर आदि का वर्णन मिलता है | हमारे इतिहास - पुराणों में स्थान - स्थान पर इनका विस्तृत वर्णन भी है | आदिकाल से ही सनातन के अनुयायिओं के साथ ही सनातन



भूत और प्रेत : आचार्य श्री अर्जुन तिवारी जी

*सनातन धर्म में चौरासी लाख योनियों का वर्णन मिलता है | देव , दानव , मानव , प्रेत , पितर , गन्धर्व , यक्ष , किन्नर , नाग आदि के अतिरिक्त भी जलचर , थलचर , नभचर आदि का वर्णन मिलता है | हमारे इतिहास - पुराणों में स्थान - स्थान पर इनका विस्तृत वर्णन भी है | आदिकाल से ही सनातन के अनुयायिओं के साथ ही सनातन



नश्वर और अनश्वर :--- आचार्य श्री अर्जुन तिवारी जी

नश्वर और अनश्वर *सृष्टि के आदिकाल से लेकर आज तक अनेकानेक जीव इस पृथ्वी पर अपने कर्मानुसार आये विकास किये और एक निश्चित अवधि के बाद इस धराधाम से चले भी गये | श्री राम , श्रीकृष्ण , हों या बुद्ध एवं महावीर जैसे महापुरुष इस विकास एवं विनाश (मृत्यु) से कोई भी नहीं बच पाया है | इसका मूल कारण यह है कि





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