अक्सर

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कसैले पन का कसाव

(कसैलेपन का कसाव) मेड़मफोटो खीचेंगी यह लाईन अभद्रता भरी लाईन या अभद्रता की प्रतीक थी। एक चाटा भरी आवाजके साथ प्रतीक वर्दियों से घिर गया। किसी के कमर मे काली बेल्ट पैरो मे काले जूतेजिसमे चेरी की पोलिस ही चमक रही थी। किसी के कमर मे बंधी लाल बेल्ट पैरो मे लालजूता वह दरोगा या कह लो सब इंस्पेक्टर यह ला



दोस्त इतने जरुरी क्यों होते हैं |

इंसान इस दुनिया में ईश्वर का बनाया बहुत खूबसूरत तोहफा हैं जो की अपने माता पिता की बदौलत इस दुनिया में कदम रखता हैं | माता पिता अपनी ख़ुशियों को भूला कर अपनी औलाद को सब खुशियाँ प्रदान करता हैं | लेकिन इतना करने के बाद भी उस इंसान को कोई ऐसा चाहिये होता हैं इस से वह इंसान वो हर बात बता सके जो



देवल आशीष की जीवनपर्यन्त याद की जाने वाली रचना इस प्रेम दिवस पर ...... !

प्रिये तुम्हारी सुधि को मैंने यूँ भी अक्सर चूम लियातुम पर गीत लिखा फिर उसका अक्षर-अक्षर चूम लियामैं क्या जानूँ मंदिर-मस्जिद, गिरिजा या गुरुद्वाराजिन पर पहली बार दिखा था अल्हड़ रूप तुम्हारामैंने उन पावन राहों का पत्थर-पत्थर चूम लियातुम पर गीत लिखा फिर उसका अक्षर-अक्षर चूम लियाहम-तुम उतनी दूर- धरा से



ग़ज़ल गंगा: ( ग़ज़ल ) हर पल याद रहती है निगाहों में बसी सूरत

( ग़ज़ल ) हर पल याद रहती है निगाहों में बसी सूरतसजा  क्या खूब मिलती है किसी   से   दिल  लगाने  की तन्हाई  की  महफ़िल  में  आदत  हो  गयी   गाने  की  हर  पल  याद  रहती  है  निगाहों  में  बसी  सूरत  तमन्ना  अपनी  रहती  है  खुद  को  भूल  जाने  की  उम्मीदों   का  काजल   



मेरी प्रकाशित गज़लें और रचनाएँ : मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -२ , अंक ११ ,अगस्त २०१६ में प्रकाशित

मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -२ , अंक ११ ,अगस्त २०१६ में प्रकाशितग़ज़ल  (बचपन यार अच्छा था)जब हाथों हाथ लेते थे अपने भी पराये भीबचपन यार अच्छा था हँसता मुस्कराता थाबारीकी जमाने की, समझने में उम्र गुज़रीभोले भाले चेहरे में सयानापन समाता थामिलते हाथ हैं लेकिन दिल मिलते नहीं यारों





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