ये उन दिनों की बात है: नैना को मिली पहली नौकरी | आई डब्लयू एम बज

सोनी टीवी के लोकप्रिय शो ये अन दिनो की बात है में शशि सुमीत प्रोडक्शन ने दर्शकों को लुभावने नाटक से प्रभावित करने की कोशिश की है। हमने सुना है कि आने वाले एपिसोड में एक बहुत ही दिलचस्प ट्रैक सामने आने वाला है। साजिश के अनुसार, समीर (रणदीप राय), नैना (आशी सिंह), प्रीति सोस



ये उन दिनों की बात है ने 400 एपिसोड पूरे किए

सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविज़न के शो ये उन दिनों की बात है ने एक मिलियन दिलों को छूने में कामयाबी हासिल की।90 के दशक का प्रेम सरल, शुद्ध और निर्दोष था, जिसके प्रमुख युगल नैना (आशी सिंह) और समीर (रणदीप राय) अपनी सभी ईमानदारी के साथ परदे पर दिखाई देते हैं। शो में उनके किरदा



ये उन दिनों की बात है: समीर और नैना के बीच बड़ी लड़ाई

सोनी टीवी के ये उन दिनों की बात है में समीर और नैना के बीच हनीमून के बाद एक बड़ी लड़ाई हुईसोनी एंटरटेनमेंट टेलीविज़न के ये उन दीनों की बात है (शशि सुमीत प्रोडक्शन) लगातार दिलचस्प मोड़ लेकर आ रही है और दर्शकों को एपिसोड्स से जोड़े रखती है।दर्शकों ने समीर (रणदीप राय) और नैना (आशी सिंह) को अपने हनीमून



सोनी टीवी के ये अन अननोन की बात है में शादी से पहले नैना पर गुस्सा करेंगें समीर

शशि सुमीत प्रोडक्शन द्वारा निर्मित सोनी टीवी के बेहद लोकप्रिय शो ये उन दिनों की बात है के वफादार दर्शक, समीर (रणदीप राय) और नैना (आशी सिंह) की शादी के लिए पूरी तरह तैयार हैं।हालांकि, शादी से पहले शो में दर्शकों के लिए बहुत सारा ड्रामा होगा।हमने पहले नैना और समीर दोनों के



हर बात मेरी एक प्रश्न बन गई l

हर बात मेरी एक प्रश्न बन गई lश्वेत चादर मेरी कृष्ण बन गई llहर बात मेरी एक प्रश्न बन गई lअश्रुओं ने कही जिंदगी की कहानी,शत्रु बन गए चक्षु और पानी,जिंदगी से लड़ता रहा मौत से ना हार मानी,त्रासदी भी मुझे छूकर एक जश्न बन गई lहर बात मेरी एक प्रश्न बन गई lश्वेत चादर मेरी कृष्ण बन गई llअधरों की मूक स्वीकृति



बिखरो मेरे ज़ज़्बातों

बिखरो मेरे ज़ज़्बातों✒️बिखरो मेरे ज़ज़्बातोंतुम तो धीरे-धीरे,करुण स्वरों को मेरे अब तकहर जीवित ठुकराया है।रखा सुरक्षित जिन्हें जन्म से, हीरे-मोती से शृंगारितचक्षु तले निशि-दिन, संध्या को, रखा सवेरे भी सम्मानित;स्वर्ण सलाखों के पिंजर में, मुझे छोड़कर क्यों जाते हो?मुड़कर देखो रंज-रुदन को, उपहासों से क्या प



"पद" उद्धव मानों बात हमारी

"पद" वियोग श्रृंगार रस ऊधौ मानों बात हमारीहम कान्हा की राह निहारे, तुमने बात बिगारी।आय गयौ लै अपनी लकुटी, पढ़ते निर्गुन चारी।।जा कहना बंसी वाले से, यमुना जल बीमारी।हे साँवरिया कृष्ण मुरारी, पनघट पड़ी उघारी।।ज्ञान सिखाकर अयन चुराते, कैसे



प्रधानमंत्री आज करेंगे मन की बात

देश के प्रधानमंत्री श्री मोदी जी आज 49 वीं बार आज मन की बात में रेडियो प्रसारण से देश को संबोधित करेंगे और इस कार्यक्रम का प्रसारण आकाशवाणी और देश के एनी रेडियो चैनलों से से किया जाएगा. पिछली बार अपने संबोधन में वायु सेना के शौर्य को याद किया था इस प्रोग्राम की खास बात ये है की इसमें वो देश के आमजनो



गुजरा हुआ ज़माना आता नहीं दुबारा, हाफ़िज़ खुदा तुम्हारा

गुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दुबारा , हाफ़िज़ खुदा तुम्हारा********************************आज रविवार का दिन मेरे आत्ममंथन का होता है। बंद कमरे में, इस तन्हाई में उजाला तलाश रहा हूँ। सोच रहा हूँ कि यह मन भी कैसा है , जख्मी हो हो कर भी गैरों से स्नेह करते रहा है।*************



ओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ लेले रे

ओ दूर के मुसाफ़िर हम को भी साथ ले ले रे******************** मैं छोटी- छोटी उन खुशियों का जिक्र ब्लॉग पर करना चाहता हूँ, उन संघर्षों को लिखना चाहता हूँ, उन सम्वेदनाओं को उठाना चाहता हूँ, उन भावनाओं को जगाना चाहता हूँ, जिससे हमारा परिवार और हमारा समाज खुशहाली की ओर बढ़े । बिना धागा, बिना माला इन बिख



व्याकुल पथिकः

आपके कर्मों की ज्योति अब राह हमें दिखलायेगी-----------------------------------------कुछ यादें कुछ बातें, जिनकी पाठशाला में मैं बना पत्रकार***************************एक श्रद्धांजलि श्रद्धेय राजीव अरोड़ा जी को***********************किया था वादा आपने कभी हार न मानेंगे ,बनके अर्जुन जीवन रण में जीतेंगे हा



आओ अब कुछ बात करे

आओ अब कुछ बात करे,कदम कुछ अब साथ भरे।भुला के सारे गिले शिकवे,नये रिश्ते की शुरुआत करे।पहले ही बहुत कम है जिंदगी,फिर रुठ के क्यो वक्त बरबाद करे।बंजर हो गया था जो पतझड़ के आने से,उस गुलशन को प्यार से फिर आबाद करे।भुल गया हूं मै तुम भी भुला दो,बीती जिंदगी को क्यों हम याद करे।आओ अब कुछ बात करे,कदम अब कु



आँखो से बात करे

कभी आता है ख्याल तुम्हारा,दिल करता है तुमसे बात करे,इतनी तो दुश्मनी नहीं हैचलो एक मुलाकात करे।मै तुमसे तुम मुझसे हो,खफा किस बात पर मालूम नहीं ,इश्क पर किसी का जोर चलता नहीं,जब इश्क का फैसला दो दिल साथ करे।कहाँ से इब्तिदा करिये अब,कि दीदार हुआ है तुम्हारा हमको,दिल फिर भी कह रहा है जानम,लबो को बंद रहन



ऐसा सुंदर सपना अपना जीवन होगा ...

ऐसा सुंदर सपना अपना जीवन होगा *************************** मैं तो बस इतना कहूँगा कि यदि पत्नी का हृदय जीतना है , तो कभी- कभी घर के भोजन कक्ष में चले जाया करें बंधुओं , पर याद रखें कि गृह मंत्रालय पर आपका नहीं आपकी श्रीमती जी का अधिकार है। रसोईघर से उठा सुगंध आपके दाम्पत्य जीवन को निश्चित अनुराग से भ



अपने पे भरोसा है तो एक दाँव लगा ले..

अपने पे भरोसा है तो एक दाँव लगा ले...***********************पशुता के इस भाव से आहत गुलाब पंखुड़ियों में बदल चुका था और गृह से अन्दर बाहर करने वालों के पांव तल कुचला जा रहा था। काश ! यह जानवर न आया होता, तो उसका उसके इष्ट के मस्तक पर चढ़ना तय था। पर, नियति को मैंने इतना अधिकार नहीं दिया है कि वह मु



दिल चाहे - शिखा

Dil chahe yu hi teri baaho mai rahena ,Dhadkan ki tarah dil mai basa lu tujko.Dil chahe yu hi teri palko pe rahena,Khwab ki tarah palko pe saja lu tujko.Dil chahe yu hi teri saanso mai rahena,Phoolo ki tarah saanso mai mila lu tujko.Dil chahe yu hi teri bagiya mai rahena,Khushbu ki tarah muj mai mi



किसी का दर्द मिल सके , तो ले उधार ...

किसीका दर्द मिल सके तो ले उधार ****************************** अब देखें न हमारे शहर के पोस्टग्रेजुएट कालेज के दो गुरुदेव कुछ वर्ष पूर्व रिटायर्ड हुये। तो इनमें से एक गुरु जी ने शुद्ध घी बेचने की दुकान खोल ली थी,तो दूसरे अपने जनरल स्टोर की दुकान पर बैठ टाइम पास करते दिखें । हम कभी तो स्वयं से पूछे क



मेरा प्यार कह रहा है,मैं तुझे खुदा बना दूँ

मेरा प्यार कह रहा है, मैं तुझे खुदा बना दूँ ***************************************** विडंबना यह है कि मन के सौंदर्य में नहीं बाह्य आकर्षक में अकसर ही पुरुष समाज खो जाता है। पत्नी की सरलता एवं वाणी की मधुरता से कहीं अधिक वह उसके रंगरूप को प्राथमिकता देता है ****************************************



विलायती बोली-बनावटी लोग

विलायती बोलीः बनावटी लोग ****************************************** हमारे संस्कार से जुड़े दो सम्बोधन शब्द जो हम सभी को बचपन में ही दिये जाते थें , " प्रणाम " एवं " नमस्ते " बोलने का , वह भी अब किसमें बदल गया है, इस आधुनिक भद्रजनों के समाज में... *******************************************



मेरे खुदा कहाँ है तू ,कोई आसरा तो दे

मेरे खुदा कहाँ है तू , कोई आसरा तो दे ****************************** साहब ! यह जोकर का तमाशा नहीं , नियति का खेल है। हममें से अनेक को मृत्यु पूर्व इसी स्थिति से गुजरना है । जब चेतना विलुप्त हो जाएगी , अपनी ही पीएचडी की डिग्री पहचान न आएँगी और उस अंतिम दस्तक पर दरवाजा खोलने की तमन्ना अधूरी रह जाएगी।



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