बचपन कितना अच्छा था।

बचपन कितना अच्छा था।जब दांत हमारे कच्चे थे।कमर करधनी, पैर पैजनिया,चल बईयन, सरक घुटवन खड़े हो गए।पकड़ उंगली दादा दादी की,सैर गाँव की कर आते थे।ले चटुवा, गाँव की दुकान से,लार होठो से, दाड़ी तक टपकते थे।धो मुँह माँ हमारी, काजल आँख धराती थी।कर मीठी मीठी बातें बकरी का दूध पिलाती थी।उतार हमारे गर्दीले कपड़ो क



10 अप्रैल 2021

बचपन

स्कूल न जाने के लिए पेट का गड़बड़ हो जाना टीचरों की डाँट पर आँखों से टेसुओं का बह जाना पेंसिल को दोनों तरफ से छीलना, रबड़ को गोदना दोस्तों के साथ मौज मस्ती में स्कूल टाइम का बीतना वो २६ जनवरी का स्कूल में खाना और पद संचलन याद आता है मुझे मेरा वो बचपन विष-अमृत हो या हो छुप्पन-छुपाई सिथोलिया हो या



04 फरवरी 2021

रील लाइफ VS रियल लाइफ_3

रील लाइफ में एक सीरियल आता है छोटी सरदारनी जिसमें एक लड़की की शादी ऐसे लड़के से होती है जिसके एक बेटा होता है परम , वो लड़की उसकी सौतेली माँ होते हुए भी उसे सगी माँ सा प्यार और दुलार देती है , उस बच्चे को अपना समझती है और अपने बच्चे और सौतेले बच्चे में कोई फर्क नहीं करती हैं अब बात



पेड़ ही सहते है।

पेड़ ही है, जो अपने ऊपर फल आने के इंतजार में आँधी, बारिश, तूफान सभी को झेलते है। उन्हें यह नही मालूम था कि, फल कोई और तोड़ ले जाएगा। सब कुछ लूट जाने के बाद पत्ते भी साथ छोड़ देते है। वह तो शाख है, जो साथ नही छोड़ती बस कोई कटे और तोड़े न। जमी के अंदर तो जड़े भी महफ़ूज रहती है। पेड़ किसी से कहते नही, बचपन के



जिंदगी धूल हो गई

छोटे तो सब अच्छा था बड़े होकर जैसे भूल हो गईपहले खेलते थे मिट्टी से जनाब लेकिन अब तो जिंदगी ही धूल हो गई कोई डांट देता था तो झट से रो जाया करते थे फिर पापा मम्मी के सहला देने से तो आराम से सो जाया करते थे अब कोई डांट दे तो रोते नहीं अब आराम से सोते नहीं दोस्तों अब तो



बचपन के दिन.....

वो भी क्या उमर थी,जब मस्ती अपने संग थी ,सारी फिकर और जिम्मेदारियाँ, किसी ताले मे बंद थी,वो गलियाँ जिसमे खेलते थे क्रिकेट,पतंग उड़ाते कभी थे,कभी तोड़ते थे कांच तो कभी पेंच लड़ाते वो हम थे,क्या सच में वो दिन थे बचपन के ?बारिश मे भीगना ,क्लासेस बँक करना ,कीचड़ के पानी मे खुद को भिगोना,छत पे खड़े होके सीटी ब



वक्त करवट ले गया।

वक्त करवट ले गया।गाँव से भागे, शहर में कमाया मौज मनाया।गाँव की गलियाँ सूनी, शहर की गलियों में रंगरलियाँ।गाँव बड़े , घर मन न भए, शहरों में झुग्गी बस्ती बनाए।जीकर नरक भरी जिंदगी शहर में, गाँवों में नाम कमाए।छोड़ छाड़ माँ बाप की ममता, शहर में प्यार प्रेम कमाए।सुबह नहाए कम्पनी को जाए, कर याद गाँव को पछताए।



Hindi poetry on childhood life - अजूबी  बचपन ; अर्चना की रचना

बचपन की यादों आधारित हिंदी कविता अजूबी बचपन आज दिल फिर बच्चा होना चाहता है बचपन की अजूबी कहानियों में खोना चाहता है जीनी जो अलादिन की हर ख्वाहिश मिनटों में पूरी कर देता था,उसे फिर क्या हुक्म मेरे आका कहते देखना चाहता है आज दिल फिर बच्चा होना चाहता हैमोगली जो जंगल में बघ



बचपन की कुछ यादें

कोई लौटा दो मुझे वो दोस्त सारे जो खेले थे साथ हमारे लड़ते झगड़ते भी थे एक दूसरे से फिर भी खुश थे सारेकहा चले गये वो दिन हमारे अब गाँव वीरान सा



तैयार होता रहा

बचपन मे स्कूल जाने के लिए, किशोरा अवस्था मे एक मुकाम हासिल करने के लिए। परिवार को चलाने के लिए, ताउम्र घर संभालते रहे, खुद को घुलाते रहे साबुन की तरह।साफ हो गए मृत सैय्या के लिए। आखरी समय मे , खुद को तैयार करते रहे शमशान में जलाने के लिए।<!--/data/user/0/com.samsung.android.app.notes/files/clipdata/



बचपन

साथ घूमते थे नंगे पांव दूर तक बाग में खेत मेंऔर सड़क परकभी नहर के किनारेपूरे एक-एक प्रहर तकनहाते थे डुबकियां लगातेधूल फेंकते दोस्तों परगम ना था फिक्र न थीमां से पिटने कीन था पिता से डांट खाने का डरमगर फिर भी एक भय व्याप्त थाबड़े भाई केहाँथ उठ जाने परगम न था फिक्र न थीसूखी रोटी भीभर पेट खाते थेकभी अपन



बचपन

कुछ फ़र्ज थे, तो थी कुछ जिम्मेदारीयाकुछ हालात थे, तो थी कुछ मजबूरीयाथा तो वो हमारा बचपन का ही समयमगर वक़्त से पहले ही हमें बड़ा बना दिया गया



कल,आज और कल

तीक्ष्ण वाणी के प्रहार,झेलता वह मासूम।सुबकता,सिसकता,आंसू पौंछता।खोजता अपने अपराध,शनै-शनै मरता बचपन!आक्रोश का ज्वालामुखी,उसके अंदर लेता आकार।शरीर पर चोटों की मार,बनाती उसे पत्थर!पनपता एक विष-वृक्षजलती प्रतिशोध की ज्वाला!पी जाती उसकी मासूमियत।वक्त से पहले ही होता बड़ा,समझता शत्रु समाज को,चल पड़ता पाप



पिंजरे का पंछी

मैं जीना चाहूं बचपन अपना,पर कैसे उसको फिर जी पाऊं!मैं उड़ना चाहूं ऊंचे आकाश,पर कैसे उड़ान मैं भर पाऊं!मैं चाहूं दिल से हंसना,पर जख्म न दिल के छिपा पाऊं।मैं चाहूं सबको खुश रखना,पर खुद को खुश न रख पाऊं।न जाने कैसी प्यास है जीवन में,कोशिश करके भी न बुझा पाऊं।इस चक्रव्यूह से जीवन में,मैं उलझी और उलझती ह



वो यादें बचपन की

कितने खेले खेल बचपन में , याद आएंगे वो उम्र पचपन में। गिल्ली डंडा, लट्टू को घुमाना, गिलहरी में फिर साथी को सताना। खो खो बड़ा पसन्दीदा लगता, अंटी तो माँ को ही अच्छा न लगता। जमा करते बड़े भैया जब अंटी, माँ डाँट कर घर से बाहर फेंक देती। सांप सीडी में साँप से काटे जाते, लूडो में तो हम कभी न हारते। गुड़िया



"याद आते हैं वो बचपन के दिन "

बचपन के दिन - कल याद आ गया मुझको भी अपना बचपनखुश हुई बहुत पर आँख तनिक सी भर आयी गांवों की पगडण्डी पर दिन भर दौड़ा करती कुछ बच्चों की दीदी थी। दादी की थी राजदुलारी रोज़ सुनती छत पर दादाजी से परियो की कहानी झलते रहते वो पंखा पर थक कर मैंसो जाती घर कच्चे थे चाची लीपा



स्वास्थय

ना मीठा खाने के पहले सोचा करते थेना मीठा खाने के बाद....वो बचपन भी क्या बचपन थाना डायबिटिक की चिंता ना कॉलेस्ट्रॉल था...दो समोसे के बाद भीएक प्याज़ की कचोरी खा लेते थे..अब आधे समोसे में भी तेल ज्यादा लगता है...मिठाई भी ऐसी लेते है जिसमे मीठा कम होऔर कम नमक वाली नमकीन ढूंढते रहते है...खूब दौड़ते भागते



बातें कुछ अनकही सी...........: अवसाद

"अवसाद" एक ऐसा शब्द जिससे हम सब वाकिफ़ हैं।बस वाकिफ़ नहीं है तो उसके होने से।एक बच्चा जब अपनी माँ-बाप की इच्छाओं के तले दबता है तो न ही इच्छाएँ रह जाती हैं ना ही बचपना।क्योंकि बचपना दुबक जाता है इन बड़ी मंज़िलों के भार तले जो उसे कुछ खास रास नहीं आते।मंज़िल उसे भी पसंद है पर र



यादें

"बहुत खूबसूरत होती है ये यादों की दुनियाँ , हमारे बीते हुये कल के छोटे छोटे टुकड़े हमारी यादों में हमेशा महफूज रहते हैं,



तीर्थ राज प्रयाग राज में महापर्व अर्द्ध कुम्भ स्नान

तीर्थ राज प्रयाग राज में महा पर्व अर्द्ध कुम्भ स्नान डॉ शोभा भारद्वाज पुराणों में वर्णित पोराणिक कथाओं के अनुसार देवताओं एवं दानवों ने मिल के समुद्र मंथन किया था तय था समुद्र मंथन से जो रत्न निकलेंगे दोनों पक्ष मिल कर बाँट लेंगे मन्दराचल पर्वत को मथनी बनाया भगवान विष्णु ने कच्छप अवतार धारण कर समुद्र



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