हिंदी …. हमारा स्वाभिमान!

हिंदी …. हमारा स्वाभिमान!हिंदी , हमारी भाषा है , मात्र एक भाषा नहीं ,आधुनिकता के बहाव में हम आगे बढे जाते हैं ,अपनी ही भाषा के लिए हम ,आज भी एक दिन मनाते हैं। यह माँ है , बहुत उदार है , सबको अपनाती है ,फिर , आज अपने ही बच्चों से क्यों छली जाती है ?हिंदी केवल हिंदी शिक्षकों की ही भाषा नहीं है ,यह सबक



चकाचौंध

“चकाचौंध” पत्रिका अपने प्रकाशन के चार साल पूरेकर चुकी थी, किसी को उम्मीद भी नहीं थी कि इस पत्रिका की बिक्री इतनी बढ़ जाएगी,अब ऐसे में सभी सदस्यों को मीटिंग में बुलाया गया और उनके योगदान के लिए बधाई दीगई। तभी मीटिंग में एक व्यक्ति ने पत्रिका



स्वंयवर

सीता स्वंयवर पर .....कैसे मैं पहचानू उन्हें.कैसे मैं जानूं के वो बनें हैै वो मेरे लिए.होगी सैकड़ों की भीड़ वहां.तेजस्वी और वैभवशाली तो होंगेवहां कई और भी.लेकिन सुना है मैंनें शिव का धनुषउठा सकेंगे कुछ ऐसे प्र



वक्त वक्त की बात

कहते है जो ये कि वक्त के पंजों से बचालेंगे तुम्हेंवहीं सबसे बड़ेशिकारी होते हैं.शिल्पा रोंघे



सच और झूठ

हर बार सच्चाई की सफाई देना जरुरी नहीं.कभी कभी सही वक्त सब कुछसाफ कर देता हैअपने आप ही.सूरज को ढकनेकी कोशिश करता हैबादल हर कभी, लेकिन उसे रोशनी देनेसे रोक सका हैक्या वो कभी.शिल्पा रोंघे



जनसंख्या विस्फोट

बढ़ती जनसंख्या परस्वास्थ्य सुविधाएं पड़ रही कम.महंगी हुई शिक्षा और अच्छे स्कूल हुए कम.ट्रेनों में बैठने को हुई जगह कम.महानगरों में रहने को मकान पड़ रहे कम.पेड़ और पौधे हुए कम.पीने का पानी हुआ कम.सिकुड़ रहे खेत खलिहान, अनाज हुआ कम.बढ़ रही गरीबी और महंगाई.किसी ने धर्म को तो किसी ने जातिको देश की बदहाल



जोगी बनना कहां आसान है ?

आसान नहीं है ज़िंदगीजीने का तरीका सीखलाना.आसान नहीं किसी कोसही राह दिखाना.आसान नहीं है खुद को भी बदलना, कुछ ख़्वाहिशोंको छोड़ना, कुछ सुविधाओं को त्यागना.त्याग की अग्नी में तपना औरउम्मीद के दीपक जलाना.धूप, बारिश, और ठंडको सहना.होंठो पर शिकायत कम और समाधाननिकालना.हां सचम



भारत में “मी टू” आंदोलन की प्रासंगिकता

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मीरा के वचन मोहन के लिए

भेजा था विष का प्याला अमृत बन गया। भेजा था विषैला सांपफूलों का हार बन गया। तेरी ही करामात है ये मोहनकि कलियुग में भी जी रही हूं। बिना डरे तेरी भक्ति के गीतगा रही हूं। शिल्पा रोंघे



जीने की कला

हां दर्द सहना भी एक कला है। गम बर्दाश्त कर लेना भी एक कला है। खुद नाखुशी के दौर में रहकरदूसरों से ना जलना भी एक कला है। छिपकर रोना भी एक कला है । अंधेरे में भी जुगनू बनकर जीनाएक कला है। कहती है अगर खुदगर्ज़ दुनिया तोकहने तो कहने दो। क



नौ रसों की गाथा

बिना मिठास के फल ही क्या ?बिना रस के काव्य की रचना ही कैसे हो भला.चलो रस भरते है जीवन में, काव्य रचते है रंग बिरंगे से हम.प्रेम रस के रूप अनेकश्रृंगार, वात्सल्य, भक्ति का का होता संचार.कभी मिलन है तो कभी विरह है, श्रृंगार रस.कभी कृष्ण तो कभी राधा है इसका दूसरा नाम.कभी ममत



सिड्रेंला और लैला जब मिली

सिड्रेंला और लैलामें बहस एक दिनजमकर हुई। लैला सिड्रेंलाकी किस्मत कोबेहतर बता गईसिड्रेंला को लैलाने कहा देखोफर्श से तू अर्शपर पहुंचगई। मैं महलों की रानीहोकर अकेली ही रह गई। कुछ इस तरह वो फ़कीरीको वो अमीरी से बेहतरबता गईऔर कह गई प्यार मेंउंच और नीचकी बात गलती से भी ना कर



सच - दो लफ़्जों की कहानी

सच को कड़वा ही रहने दो दोस्तो.गर वो मीठा होता तो तिजारत ही बन जाता.शिल्पा रोंघे



सोशल प्राणी का सच

खुश है कुछ लोगइंस्टाग्राम, फ़ेसबुक, और ट्विटरपर अपनी फ़ैन फॉलोइंग को गिनकर.अपनी निज़ी जिंदगी को सार्वजनिककर.मगर भूल जाते है इस वर्चुअल दुनियामें खोकर उस पड़ोस को जो सबसेपहले पूछते है उनका हाल चाल.वो स्कूल कॉलेज और दफ़्तर केदोस्त जो बिना बताएं ही जान लेते हैदिल की बात.उंगल



काश

काश कोई आईना ऐसा भी होता.क्या मंजूर है दुनिया बनाने वाले को,पहले से ही बता देता, दिल की उलझन को चुटकियों में ही सुलझा देता.शिल्पा रोंघे



अब नारी सम्मान की बात कहां करे ?

क्या अब नारी सिर्फ देव लोक में हीसम्मानित रह गई है ?मां की कोख में होतब भ्रूणहत्या की बात सोचकर सहम जाती है.गर दुनिया में आने का सौभाग्य पा जाए तोतब अस्मत को लेकर जाती है सहम.चढ़ती है डोली तबदहेज जैसे दानव को देखकर जाती है सहम.दुनिया मे



क्या आप भी है ओल्ड स्कूल लवर.....

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सुधार की कैसी चाह ?

है जुटे हुए कुछ लोगसुधार में.है जुटे कुछ लोग आधुनिकताकी दुहाई देकर पंरपराओं कोप्राचीन बताने में.तो कुछ पंरपराओं की आड़ लेकरबदलाव को ठुकराने में.है जुटे हुए कुछ लोगअपनी ही बात सही मनवाने में.उनकी इच्छाओं का नहीं कोईअंत, सिर्फ इसलिए जुटे है व



क्या सचमुच जो काम आप कर रहे है वो आपके स्वास्थ्य लिए सही है ?

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धरती करे पुकार - अब मुझे यूं ना सताओ

कहीं कांप रही धरती. कहीं बेमौसम बारिश से बह रही धरती. कहीं ठंड के मौसम में बुखार से तप रही धरती. कभी जल से, तो कभी वायु प्रदूषण से ज़हरीली हो रही प्रकृति. विकास के नाम पर विनाश का दर्द झेलती प्रकृति अपनी ही संतति से अवहेलना प्



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