नौ रसों की गाथा

बिना मिठास के फल ही क्या ?बिना रस के काव्य की रचना ही कैसे हो भला.चलो रस भरते है जीवन में, काव्य रचते है रंग बिरंगे से हम.प्रेम रस के रूप अनेकश्रृंगार, वात्सल्य, भक्ति का का होता संचार.कभी मिलन है तो कभी विरह है, श्रृंगार रस.कभी कृष्ण तो कभी राधा है इसका दूसरा नाम.कभी ममत



सिड्रेंला और लैला जब मिली

सिड्रेंला और लैलामें बहस एक दिनजमकर हुई। लैला सिड्रेंलाकी किस्मत कोबेहतर बता गईसिड्रेंला को लैलाने कहा देखोफर्श से तू अर्शपर पहुंचगई। मैं महलों की रानीहोकर अकेली ही रह गई। कुछ इस तरह वो फ़कीरीको वो अमीरी से बेहतरबता गईऔर कह गई प्यार मेंउंच और नीचकी बात गलती से भी ना कर



सच - दो लफ़्जों की कहानी

सच को कड़वा ही रहने दो दोस्तो.गर वो मीठा होता तो तिजारत ही बन जाता.शिल्पा रोंघे



सोशल प्राणी का सच

खुश है कुछ लोगइंस्टाग्राम, फ़ेसबुक, और ट्विटरपर अपनी फ़ैन फॉलोइंग को गिनकर.अपनी निज़ी जिंदगी को सार्वजनिककर.मगर भूल जाते है इस वर्चुअल दुनियामें खोकर उस पड़ोस को जो सबसेपहले पूछते है उनका हाल चाल.वो स्कूल कॉलेज और दफ़्तर केदोस्त जो बिना बताएं ही जान लेते हैदिल की बात.उंगल



काश

काश कोई आईना ऐसा भी होता.क्या मंजूर है दुनिया बनाने वाले को,पहले से ही बता देता, दिल की उलझन को चुटकियों में ही सुलझा देता.शिल्पा रोंघे



अब नारी सम्मान की बात कहां करे ?

क्या अब नारी सिर्फ देव लोक में हीसम्मानित रह गई है ?मां की कोख में होतब भ्रूणहत्या की बात सोचकर सहम जाती है.गर दुनिया में आने का सौभाग्य पा जाए तोतब अस्मत को लेकर जाती है सहम.चढ़ती है डोली तबदहेज जैसे दानव को देखकर जाती है सहम.दुनिया मे



क्या आप भी है ओल्ड स्कूल लवर.....

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सुधार की कैसी चाह ?

है जुटे हुए कुछ लोगसुधार में.है जुटे कुछ लोग आधुनिकताकी दुहाई देकर पंरपराओं कोप्राचीन बताने में.तो कुछ पंरपराओं की आड़ लेकरबदलाव को ठुकराने में.है जुटे हुए कुछ लोगअपनी ही बात सही मनवाने में.उनकी इच्छाओं का नहीं कोईअंत, सिर्फ इसलिए जुटे है व



क्या सचमुच जो काम आप कर रहे है वो आपके स्वास्थ्य लिए सही है ?

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धरती करे पुकार - अब मुझे यूं ना सताओ

कहीं कांप रही धरती. कहीं बेमौसम बारिश से बह रही धरती. कहीं ठंड के मौसम में बुखार से तप रही धरती. कभी जल से, तो कभी वायु प्रदूषण से ज़हरीली हो रही प्रकृति. विकास के नाम पर विनाश का दर्द झेलती प्रकृति अपनी ही संतति से अवहेलना प्



नशामुक्ति

नशा "नाश" का दूसरा नाम है.ये नाश करता है बुद्धि का.ये नाश करता है धन का.ये नाश करता है संबंधों का.ये नाश करता है नैतिक मूल्यों का.नाश नहीं निर्माण की तरफ बढ़ोयुवाओं तुम नशामुक्त समाज बनानेका संकल्प लो.शिल्पा रोंघे



खिलौनों की सभा- बाल कविता

हुई सभा एक दिन गुड्डे गुड़ियों की.गुड़िया बोली,मैं सुंदरता की पुड़ियामुझसे ना कोई बढ़िया.इतने में आया गुड्डापहन के लाल चोला,कितनों का घमंड है मैंने तोड़ा.बीच में उचका काठी का घोड़ाअरे चुप हो जाओ तुम थोड़ा.मैंने ही हवा का रुख़ है मोड़ा.लट्टू घूमा, कुछ झूमा.बोला लड़ों



बाल कविता - एक अश्व है निकला सागर किनारे

इक अश्व है निकला सागर किनारेपंख लगा के नभ में उड़ता जाए.हरा हरा सा है रुप हरियाली काकुहरा सा छाया है मतवाला सा.पीठ पे बिठा के परियों को स्वर्ग से आया धरती के दर्शन कराने को.अब तक था कहानियों में सिमटामोतियों से लिपटा,सुंदर बच्चों को लगता.सो



सोने की चिड़िया ?

फ्रेंच के साथ फ्रांसीसी जर्मन के साथ जर्मनवासी,जापानी भाषा के साथ जापान निवासी बना गए देश को विकसित और उन्नत.अंग्रेजी सभ्यता के बनकरअनुगामी, विकासशील से विकसित राष्ट्र का सफर अब तक क्या तय कर पाए है हिन्दुस्तानी ?



सफलता का मूलमंत्र

सांप सीढ़ी सिर्फखेल नहीं,जीवन दर्शन भी है.सफलता और विफलता दुश्मन नहीं, एक दूसरे की साथी है.हर रास्ते पर सांप सा रोड़ा, कभी मंजिल के बेहद करीब आकर भी लौटना पड़ता है.कभी सिफ़र से शिखर तो कभी शिखर से सिफ़र का सफ़र तय करना पड़ता है.सफलता का कोई



छोटे शहर की खुशबू

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एक बच्चे के मन की उलझन

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किताबें पढ़ने से होते है ये फ़ायदे

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तो इस मामले में बहनें है मराठी और हिंदी

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भाषाओं का सम्बन्ध और हमारी मानसिकता

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