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चौपाई मुक्तक

गणतंत्र दिवस पर वीर सपूतों को सादर नमन, जय हिंद, जय माँ भारती......! "चौपाई मुक्तक "उड़ता हुआ भारती झंडा, भागा चीन देखकर डंडा। बहुत दिनों के बाद मिले तुम, सुन ले घटिया तेरा पंडा। वीर हमारे कुल के थाती, बच के रहना री उतपाती-मारेंगे रोने ना देंगे, फूटा चीन तुम्हारा भंडा।। महातम मिश्र 'गौतम' गोरखपुरी



छंद ॒ चौपाई

सहज वचन बोली कर जोरी।चञ्चल चितवन चन्द्र चकोरी।मन अनंग रति प्रेम पियासा।भाव विभाव सहज दुर्वासा।चन्द्र योग द्वय लखि विज्ञानी।पूर्वोत्तर साहित्य भवानी।।अकथनीय गुण बरनि न जाई ।शब्द विशेष समय प्रभुताई।अवसर परम पुनीत सुहावन lशब्द विशेष शेष मनभावन llपावन दिवस सुहावन कैसे ?प्रेम सुमित्र चित्र लखि जैसे ।lशंख



श्री राम चरित मानस

रघुपति राघव राजाराम।पतित पावन सीता राम।।



"चौपाई मुक्तक" वन-वन घूमे थे रघुराई, जब रावण ने सिया चुराई। रावण वधकर कोशल राई, जहँ मंदिर तहँ मस्जिद पाई।

"चौपाई मुक्तक"वन-वन घूमे थे रघुराई, जब रावण ने सिया चुराई।रावण वधकर कोशल राई, जहँ मंदिर तहँ मस्जिद पाई।आज न्याय माँगत रघुवीरा, सुनो लखन वन वृक्ष अधिरा-कैकेई ममता विसराई, अवध नगर हति कागा जाई।।-1अग्नि परीक्षा सिया हजारों, मड़ई वन श्रीराम सहारो।सुनो सपूतों राम सहारो, जस



चौपाई

चौपाई, शांत रससुनहु सखा तुम भ्राता बाली महाबली था हुआ कुचालीनजर धरी परतिया मवाली चहत वरण अनुजा बलशाली।सखा सहज कहती यह नीती पापी हने न पाप अनिती राखहु मन सुग्रीव कस भीती समय सहज धारहु परितीती।।करम धरम की गति बड़ न्यारी जो जस करे सो तस अधिकारीविधि के हाथ न धरी कुठारी क



"चौपाई"भयानक रस

"चौपाई"ऋतु वर्षा की रुख पुरुवाई बहुत जोर बरसी असमाईकहीं गरजी कतहुँ बरसाई कहीं उफन कर नाव डुबाई।।हा हा कार मचाई बदरी भिगा डुबा गइ ऊँच निच बखरी मानों छलकी माथे गगरी तहस नहस भय डूबी नगरी।।आफत आई बैठ बिठाए पानी पोखर ताल भराएरात दिवस अरु साँझ डराए कहाँ भवन कहँ रैन बिताए।



गीतिका चौपाई हास्य रस

गीतिका चौपाई हास्य रसराधा मधुबन तेरा आना रोज रोज का नया बहानाबोल सखी कैसा याराना बैरी मुरली राग बजाना।।बस कर अब नहि ढ़ोल बजाना मोहन गोकुल गाँव पुरानाबहती यमुना चित हरषाना यशुदा नंदन ग्वाल सयाना।।सुंदर है तू ऊंचा घराना काहें न लाज शरम जी जानासुध बुध खोकर ई गति पाना लौ



" चौपाई श्रृंगार रस"

" चौपाई, श्रृंगार रस"मुरली हाथ गले मह माला पितांबर सोहे गोपालामोर पंख मुकुट नंदलाला चैन चुरा जाए बृजबाला।।-१मातु यशोमति भवन अटारी हर्षित हृदय सुखी महतारीगोकुल की सब गैया न्यारी ग्वाल बाल सब हुए सुखारी।।-२लखि राधे की नरम कलाई चुड़िया बेचन चले कन्हाई बरसाने की गली निराई तब म



रौद्र रस (चौपाई)

रौद्र रस (चौपाई)नर नारी चित बचन कठोरा, बिना मान कब गुंजन भौंराकड़ी धूप कब लाए भोरा, रौद्र रूप काहुँ चितचोरा।।-१सकल समाज भिरे जग माँहीं, मर्यादा मन मानत नाहींयह विचार कित घाटे जाहीं, सबकर मंशा वाहे वाही।।-२प्राणी विकल विकल जल जाना, बिना मेह की गरजत बानाअगर रगर चौमुखी विधाना, भृगुटी तनी बैर पहचाना।।



"चौपाई अद्भुत रस"

"चौपाई अद्भुत रस"बाल्मीकि के आश्रम आई, अनुज लखन सिय साथ निभाईमाँ सीता पर आँख उठाई, कोशल की चरचा प्रभुताई ।।-१ऋषी महामुनि अचरज पाए, लखन लला को पास बुलाएकहो भरत हिय रामहि भाए, कौशल्या के नैन थिराए।।-२कहो तात कोशल पुर कैसा, राज पाट सरयू पय जैसाकैसी प्रजा मनहुँ सुख वैसा, कैकेयी वर माँगति तैसा।।-३गति पति



चौपाई छंद मापनी पर "गीतिका"

पावन जन्माष्टमी और स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई,ॐ जय कन्हाई, जय हिंद, वंदेमातरम.......चौपाई छंद मापनी पर "गीतिका"बोलो सब जय हिंद शान से, शुभ गले लगाओ गैया रेवंदे मातरम जिह्वा बोल, मन हाथ मिलाओ भैया रेभारत माँ के घर आँगन में, नित तुलसी की पूजा होतीपहली रोटी गाय बछरुआ,



"चौपाई"

"दोहा" मुरलीधर मनमोहना, आओ मेरे गाँव झूला झूले गोरियाँ, डाल कदम की छाँव।। "चौपाई" श्याम सखा मधुबन चित पाँती, चातक चाह नैन छलकाती विरह वदन हिय नाहि सुहाती, कत धुन मुरली मन मलकाती।। गोकुल गैया श्याम चकोरी, कह पति राधा कस गति गोरी कह हठ ग्वालन की बरजोरी, कह मुख माखन ल



“चौपाई छंद”

“चौपाई छंद” विनय करूँ कर जोरि मुरारी, पाँव पखारो जमुन कछारी नैना तरसे दरस तिहारी, गोकुल आय फिरो बनवारी॥-1 ग्वाल बाल सब नगर नगारी, सूनी यह यशुमती अटारी गिरिवर गोवर्धन हितकारी, जल दूषित पथ विकल करारी॥-2 कलश किलोल न जुगत कुम्हारी, नहि विसरत छवि मोहक न्यारी नहि कान



चौपाई आधारित गीत......

चौपाई आधारित गीत...... पथ गरल धरे लिपटे भुजंग, खिले वादियों में नए रंग फुफकार रहे खुद को मतंग, मतिमंद चंद बिगड़े मलंग...... प्रीति प्रकृति से यूं नहि होती झरता झरनों से रस मोती शनै शनै ऋतु शहद बनाए कण पराग मधुमखी सजोती॥ नए तरुन तके तिरछे ढंग, मानों घाँटी में उगी भ



"चौपाई"

"चौपाई" चिड़िया चहके अपनी डाली, कोयल बोली गीत निराली बगुला भगत करे रखवाली, आ री मछली अपनी थाली भर चुनाव में गगरी खाली, खोट न जाए अबकी आली घर से बोल रही घरवाली, फेंको पैसा ठोको ताली।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी





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