तदपि विरोध माने जहँ कोई :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में अनेक प्रकार के क्रियाकलाप ऐसे होते हैं जिसके कारण मनुष्य के चारों ओर उसके जाने अनजाने अनेकों समर्थक एवं विरोधी तथा पैदा हो जाते हैं | कभी-कभी तो मनुष्य जान भी नहीं पाता है कि आखिर मेरा विरोध क्यों हो रहा है , और वह व्यक्ति अनजाने में विरोधियों के कुचक्र का शिकार हो जाता है | मनुष्य का



लक्ष्मण चरित्र भाग - २१ :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

🌺🌲🌺🌲🌺🌲🌺🌲🌺🌲🌺 ‼️ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼️ 🐍🏹 *लक्ष्मण* 🏹🐍 🌹 *भाग - २१* 🌹🩸🍏🩸🍏🩸🍏🩸🍏🩸🍏🩸*➖➖➖ गतांक से आगे ➖➖➖**लक्ष्मण जी* ज्ञानवान होकर भी आज एक साधारण मनुष्य की भाँति अपने बल का बखान करने लगे | अपने बल का बखान करने पर जो परशुराम जी क



अवलोकन

तुम दूर होते हो तो सब कुछ खोया खोया सा लगता है, खुश रहते हैं हम पर बीता पल रोया रोया सा लगता है. अगले पल फिर से तरोताजा होने की कोशिश करते हैं, हर कुछ तुम्हारी खुशबू में पिरोया पिरोया सा लगता है. रात को नींद आती नहीं,यादें आकर वापस जाती नही, इंतज़ार करते करते दिन पूरा



ईश्वरीय अनुदान को समझें :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार का सृजन करने वाले परमपिता परमात्मा ने मनुष्य को सब कुछ दिया है , ईश्वर समदर्शी है उसने न किसी को कम दिया है और न किसी को ज्यादा | इस सृष्टि में मनुष्य के पास जो भी है ईश्वर का ही प्रदान किया हुआ है , भले ही लोग यह कहते हो कि हमारे पास जो संपत्ति है उसका हमने अपने श्रम और बुद्धि से प्राप्त



प्रदर्शनकारियों एवं उनके नेताओं के अटपटे बोल

प्रदर्शन कारियों के अटपटे बोल डॉ शोभा भारद्वाजवारिस पठान का भाषण सुन कर हैरानी हुई .वह कुछ भी बोल सकते हैं धमका सकते हैंइनके अनुसार संविधान अभिव्यक्ति की आजादी देता है परन्



बोलने की कला :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*चौरासी लाख योनियों में मानव जीवन को दुर्लभ कहां गया है क्योंकि यह मानव शरीर अनेक जन्मों तक कठोर तपस्या करने के बाद प्राप्त होता है | इस शरीर को पा करके मनुष्य अपने क्रियाकलाप एवं व्यवहार के द्वारा लोगों में प्रिय तो बनता ही है साथ ही मोक्ष भी प्राप्त कर सकता है | अपने संपूर्ण जीवन काल में प्रत्येक



विचारों की शक्ति असीम है :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में विचारों का बड़ा महत्व है | विचारों की शक्ति असीम होती है | यहां व्यक्ति जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है क्योंकि उसके द्वारा हृदय में जैसे विचार किए जाते हैं उसी प्रकार कर्म भी संपादित होने लगते हैं क्योंकि विचार ही कर्म के बीज हैं , व्यवहार के प्रेरक हैं | जब मनुष्य व्यस्त होता है तो



मौनी अमावस्या :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव शरीर ईश्वर की विचित्र रचना है , इस शरीर को पा करके भी जो इसके महत्व को न जान पाये उसका जीवन निरर्थक ही है | मानव शरीर में वैसे तो प्रत्येक अंग - उपांग महत्वपूर्ण हैं परंतु सबसे महत्वपूर्ण है मनुष्य की वाणी | वाणी के विषय में जानना बहुत ही आवश्यक है , प्राय: लोग बोले जाने वाली भाषा को ही वाणी म



जीवन के प्रगति का आधार है आध्यात्म :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मनुष्य का निर्माण प्रकृति के कई तत्वों से मिलकर हुआ है | मानव जीवन में मुख्य रूप से दो ही चीजें क्रियान्वित होती है एक तो मनुष्य का शरीर दूसरी मनुष्य की आत्मा | जहां शरीर भौतिकता का वाहक होता है वही आत्मा आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर रहती है | मनुष्य भौतिक उन्नति के लिए तो सतत प्रयत्नशील रहता है परंतु



सम्बन्धों को सहेजना भी एक कला है :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है , किसी परिवार में जन्म लेकर मनुष्य समाज में स्थापित होता है | इस जीवन क्रम में परिवार से लेकर समाज तक मनुष्य अनेको संबंध स्थापित करता है इन संबंधों का पालन बहुत ही कुशलता पूर्वक करना चाहिए | जिस प्रकार किसी भी विषय में सफलता के उच्च शिखर को प्राप्त कर लेने की अपेक्षा उस



जिज्ञासा :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर मनुष्य मनुष्य कहे जाने के योग्य तब होता है जब हमें मनुष्यता होती है | मनुष्य में मनुष्यता का जागरण तब होता है जब वह स्वयं के विषय में संसार के विषय में जानने लगता है | मनुष्य किसी भी विषय में तब कुछ जान पाता है जब उसमें जिज्ञासा होती है | मानव जीवन जिज्ञासा का होना बहुत आवश्यक है क्य



परिवर्तन को स्वीकारें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि परिवर्तनशील है या यूँ कहें कि परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है | यहां एक जैसा कभी कुछ नहीं रह पाता है | सुबह सूर्य निकलता है शाम को ढल जाता है , सृष्टि के जितने भी सहयोगी हैं निरंतर गतिशील है | यदि गतिशीलता को जीवन एवं विराम को मृत्यु कहा जाय तो गलत नहीं है | जो रुक गया समझ ल



संस्कृति एवं सभ्यता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस जीवन में हम प्राय: संस्कृति एवं सभ्यता की बात किया करते हैं | इतिहास पढ़ने से यह पता चलता है कि हमारी भारतीय संस्कृति और सभ्यता बहुत ही दिव्य रही है | भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्धि संस्कृति है , जहां अन्य देशों की संस्कृतियां समय-समय पर नष्ट होती रही है वहीं भारतीय संस्कृ



अहंकार से बचने का उपाय :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य के अनेकों मित्र एवं शत्रु बनते देखे गए हैं , परंतु मनुष्य अपने सबसे बड़े शत्रु को पहचान नहीं पाता है | मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कहीं बाहर नहीं बल्कि उसके स्वयं के भीतर उत्पन्न होने वाला अहंकार है | इसी अहंकार के कारण मनुष्य जीवन भर अनेक सुविधाएं होने के बाद भी



जीवन का अद्भुत सत्य :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म के धर्म ग्रंथों में वर्णित एक एक शब्द मानव मात्र को दिव्य संदेश देता है | कोई भी साहित्य उठा कर देख लिया जाय तो उसने मानव मात्र के कल्याण की भावना निहित है | आदिभाषा संस्कृत में ऐसे - ऐसे दिव्य श्लोक प्राप्त होते हैं जिनके गूढ़ार्थ बहुत ही दिव्य होते हैं | ऐसा ही एक श्लोक देखते हैं कि ई



मर्यादा का रखें ध्यान :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संपूर्ण सृष्टि में परमात्मा ने एक से बढ़कर एक सुंदर रचनाएं की हैं | प्रकृति की छटा देखते ही बनती है , ऊंचे - ऊंचे पहाड़ , गहरे - गहरे समुद्र , अनेकों प्रकार की औषधियां , फूल - पौधे एवं अनेक प्रकार के रंग बिरंगी जीवो की रचना परमात्मा ने किया है जिन्हें देखकर बरबस ही मन मुग्ध हो जाता है और मन यही



मनुष्य के वास्तविक बंधु - बांधव :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर मनुष्य माता के गर्भ से जन्म लेता है उसके बाद वह सबसे पहले अपने माता के द्वारा अपने पिता को जानता है , फिर धीरे-धीरे वह बड़ा होता है अपने भाई बंधुओं को जानता है | जब वह बाहर निकलता है तो उसके अनेकों मित्र बनते हैं , फिर एक समय ऐसा आता है जब उसका विवाह हो जाता है और वह अपने पत्नी से पर



लोहड़ी :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*संपूर्ण विश्व में यदि अनेकता में एकता का दर्शन करना है तो वह हमारे देश भारत में ही मिलता है | यहां राष्ट्रीय एवं धार्मिक त्योहारों के साथ-साथ आंचलिक त्योहारों की भी धूम वर्ष भर मची रहती है | समय-समय पर अनेक त्यौहार हमारे देश भारत में मनाए जाते हैं और इन त्योहारों की विशेषता यह है कि इन सभी त्योहार



संकष्टी गणेश चतुर्थी :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारा देश भारत कला , संस्कृति के साथ-साथ अनेकों रंग बिरंगे त्योहारों एवं मान्यताओं की परंपरा को स्वयं मैं समेटे हुए है | यहां प्रतिदिन कोई न कोई व्रत मानव मात्र के कल्याण के लिए मनाया जाता रहता है | इन्हीं व्रतों की श्रृंखला में माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को "संकष्टी गणेश चतुर्थी" का व्रत ब



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