फटी जींस फैशन या बाजारवाद की देन

फटी जींस फैशन या बाजारवाद की देन डॉ शोभा भारद्वाज मेरा लड़का बड़ी पोस्ट पर समझ लीजिये बॉस था रोज फार्मल पहनताथा शुक्र वार को पहनने के लिए इकलोती जींस थी रगड़- रगड़ कर धोने से रंग भी उड़ गयाघिस भी गयी इसके अंडर में काम करने वाली लड़कियों में चर्चा चली सर की जींस बहुतसैक्सी हैं उसके सहायक ने कहा अरे कहा शुक



ईश्वर समदर्शी है :--आचार्य अरविंद तिवारी

*परमात्मा की इच्छा से ब्रह्मा जी ने सुंदर सृष्टि की रचना की , अनेक प्रकार के जीन बनाए | पर्वत , नदियां , पेड़-पौधे सब ईश्वर की कृपा से इस धरा धाम पर प्रकट हुये | ईश्वर समदर्शी है ! वह कभी भी किसी से भेदभाव नहीं करता है | ईश्वर की प्रतिनिधि है प्रकृति और प्रकृति सबको बराबर बांटने का प्रयास करती है |



संदेह घातक होता है :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन विचित्रताओं से भरा पड़ा है ! अपने जीवन काल में मनुष्य अनेक प्रकार के अनुभव करता हुआ उसी के अनुसार क्रियाकलाप करता रहता है | मानव जीवन को संवारने में सकारात्मकता का जितना हाथ है उसे बिगाड़ने में नकारात्मकता उससे कहीं अधिक सहयोग करती है | इन्हीं नकारात्मकता का ही स्वरूप है संदेह या शंका | क



धैर्य है दुख में मनुष्य का साथी :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में सुख एवं दुख आते रहते हैं इससे न तो कोई बचा है ना ही कोई बच पाएगा | सुख में अति प्रसन्न होकर मनुष्य दुख पड़ने पर व्याकुल हो जाता है | दुख के समय को जीवन का सबसे कुसमय माना जाता है | कभी-कभी मनुष्य दुख में इतना किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है कि उसे यह नहीं समझ में आता तो क्या करना चाहिए क्



सबसे कठिन है सरल बनना :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*यह मानव जीवन बहुत ही दुष्ष्कर है , इस मानव जीवन में मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार कठिन से कठिन लक्ष्य प्राप्त कर लेता है क्योंकि यह संसार कर्म प्रधान है यहां कर्म योगी के लिए कुछ भी कठिन नहीं है | मनुष्य अपने जीवन में यद्यपि कठिन से कठिन लक्ष्य प्राप्त कर लेता है , जो चाहता है वह बन भी जाता है परंत



राग - अनुराग एवं वैराग्य :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर का बनाया हुआ यह संसार प्रेममय है | परमात्मा प्रेम के बिना नहीं मिल सकता , परमात्मा ही नहीं इस संसार में बिना प्रेम के कुछ भी नहीं प्राप्त हो सकता है | आप किसी से लड़ाई करके वह नहीं प्राप्त कर सकते जो प्रेम से प्राप्त हो सकता है | प्रेम को कई रूप में देखा जाता है मोह एवं आसक्ति इसी का दूसरा रू



पाप एवं पुण्य :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर आने के बाद मनुष्य अनेकों प्रकार के कर्म करता रहता है क्योंकि ईश्वर ने उसे कर्म करने का अधिकार प्रदान कर रखा है | कर्म करना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है परंतु यहां एक प्रश्न मस्तिष्क में उठता है कि जब कर्म करना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है और मनुष्य उसे कर भी रहा है तो पाप कर्म एवं पुण्य



आत्मनिरीक्षण :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर हमें सर्वश्रेष्ठ मानवयोनि प्राप्त हुई है | हम इस जीवन में जो कुछ भी करना चाहें कर सकते हैं | परंतु किसी भी कार्य में सफल होने के लिए आवश्यक है आत्मनिरीक्षण करना | इस जीवन में भौतिक , शारीरिक , बौद्धिक या आर्थिक किसी भी दृष्टि से विकास के लिए आत्मनिरीक्षण करना अनिवार्य प्रक्रिया है , ज



चरित्रनिष्ठा :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में आने के बाद मनुष्य जीवन भर विभिन्न प्रकार की संपदाओं का संचय किया करता है | यह भौतिक संपदायें मनुष्य को भौतिक सुख तो प्रदान कर सकती हैं परंतु शायद वह सम्मान ना दिला पायें जो कि इस संसार से जामे के बाद भी मिलता रहता है | यह चमत्कार तभी हो सकता है जब मनुष्य का चरित्र श्रेष्ठ होता है , क्



आत्म मूल्यांकन करना आवश्यक है :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम में आने के बाद मनुष्य स्वयं को समाज में प्रतिष्ठित करने के लिए अपने व्यक्तित्व का विकास करना प्रारंभ करता है , परंतु कभी-कभी वह दूसरों के व्यक्तित्व को देखकर उसका मूल्यांकन करने लगता है | यहीं पर वह छला जाता है | ऐसा मनुष्य इसलिए करता है क्योंकि दूसरों के जीवन में तांक - छांक करने की मनु



निर्भयता :-- आचार्य अर्जुन तिवारी :-

*मानव जीवन बहुत ही दुर्लभ है , यह जीवन जितना ही सुखी एवं संपन्न दिखाई पड़ता है उससे कहीं अधिक इस जीवन में मनुष्य अनेक प्रकार के भय एवं चिंताओं से घिरा रहता है | जैसे :- स्वास्थ्य हानि की चिंता व भय , धन समाप्ति का भय , प्रिय जनों के वियोग का भय आदि | यह सब भय मनुष्य के मस्तिष्क में नकारात्मक भाव प्र



अशान्तस्य कुतो सुखम् :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर द्वारा बनाया गया यह संसार बहुत की रहस्यमय है ` इस संसार को अनेक उपमा दी गई हैं | किसी ने इसे पुष्प के समान माना है तो किसी ने संसार को ही स्वर्ग मान लिया है | वेदांत दर्शन में संसार को स्वप्नवत् कहा गया है तो गोस्वामी तुलसीदास जी इस संसार को एक प्रपंच मानते हैं | गौतम बुद्ध जी के दृष्टिकोण से



विद्वता या अहंकार :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*जब से इस धरा धाम पर मनुष्य का सृजन हुआ है तब से लेकर आज तक अनेकों प्रकार के मनुष्य इस धरती पर आये और चले गये | वैसे तो ईश्वर ने मानव मात्र को एक जैसा शरीर दिया है परंतु मनुष्य अपनी बुद्धि विवेक के अनुसार जीवन यापन करता है | ईश्वर का बनाया हुआ यह संसार बड़ा ही अद्भुत एवं रहस्यम है | यहाँ मनुष्य के म



अभिलाष

जीवन के मधु प्यास हमारे, छिपे किधर प्रभु पास हमारे?सब कहते तुम व्याप्त मही हो,पर मुझको क्यों प्राप्त नहीं हो?नाना शोध करता रहता हूँ, फिर भी विस्मय में रहता हूँ,इस जीवन को तुम धरते हो, इस सृष्टि को तुम रचते हो।कहते कण कण में बसते हो,फिर क्यों मन बुद्धि हरते हो ?सक्त हुआ मन निरासक्त पे,अभिव



आत्मविश्वास :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन बहुत ही दुर्लभ है इसे पा करके सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है | किसी भी इच्छित फल को प्राप्त करने के लिए श्रद्धा एवं विश्वास होना आवश्यक है इससे कहीं अधिक किसी भी कार्य में सफल होने के लिए आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है | यदि मनुष्य का आत्मविश्वास प्रबल होता है तो उसे एक ना एक दिन सफलता



जीवन को उत्कृष्ट करता है ज्ञान :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य अनेक प्रकार से ज्ञानार्जन करने का प्रयास करता है | जब से मनुष्य का इस धरा धाम पर विकास हुआ तब से ही ज्ञान की महिमा किसी न किसी ढंग से , किसी न किसी रूप में मनुष्य के साथ जुड़ी रही है | मनुष्य की सभ्यता - संस्कृति , मनुष्य का जीवन सब कुछ ज्ञान की ही देन है | मनु



बुद्ध की बात मानों और अपना दीपक स्वयं बनों....

अपना दीपक स्वयं बनोअपना दीपक स्वयं बनों…. कथन तो एकदम सरल है। पर सारगर्भित है। सोचिए जरा 'अपना दीपक स्वयं बनों ' कहने का तात्पर्य क्या है..? इस बात को अच्छी तरह से समझने के लिए चिंतन व मनन की आवश्यकता है। दीपक से रोशनी मिलती है, दीपक से अँधेरे का नाश होता है, दीपक से हमारा जीवन पथ प्रकाशित होता है,



गीता और देहान्तरप्राप्ति

गीता औरदेहान्तरप्राप्तिश्राद्ध पक्ष में श्रद्धा के प्रतीक श्राद्ध पर्व काआयोजन प्रायः हर हिन्दू परिवार में होता है | पितृविसर्जनीअमावस्या के साथ इसका समापन होता है और तभी से माँ दुर्गा की उपासना के साथ त्यौहारोंकी श्रृंखला आरम्भ हो जाती है – नवरात्र पर्व, विजयादशमी,शरद पूर्णिमा आदि करते करते माँ लक्



किरायेदार

लघुकथाकिरायेदार" भैया ये छह पाईप हैं जो पास की दूकान पर ले चलने हैं , ले चलोगे ? " मैंने ई - रिक्शे वाले को रोककर कहा ।" जी, ले चलेंगे । "" बताओ किराया क्या लोगे ? " " सत्तर रुपए लगेंगे ।"" भैया , पचास लो । सत्तर का काम तो नहीं है । "" ठीक है , पचास दे दीजिएगा ।"" तो फिर लाद लो । "वो अपने काम पर



जिंदगी को जिओ पर संजीदगी से....

जिंदगी जिओ पर संजीदगी से…….आजकल हम सब देखते हैं कि ज्यादातर लोगों में उत्साह और जोश की कमी दिखाई देती है। जिंदगी को लेकर काफी चिंतित, हताश, निराश और नकारात्मकता से भरे हुए होते हैं। ऐसे लोंगों में जीवन इच्छा की कमी सिर्फ जीवन में एक दो बार मिली असफलता के कारण आ जाती है। फिर ये हाथ पर हाथ रखकर बैठ जा



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