दोहा

"दोहा"पूण्य मास सावन सखी, देता बहुत सकून।देखो अपने बाग में, हिल-मिल खिले प्रसून।।-1झूलूँ झूला सजन सह, कजरी गाएँ लोग।ढ़ोल मजीरा हाथ में, कथा श्रवण मनभोग।।-2कदम डाल मिलती कहाँ, कहाँ खिले मधुमास।पवन बतकही में मगन, ऋतु करती आभास।।-3धन्य शिवाला धाम में, फूलों की भरमार।दूध पूत अविरत बहे, पर मनसा बीमार।।-4क



दोहा

तेरे बहिष्कार का आगाज़ भारत की जनता व सरकार दोनों ने कर दिया है रे पापी चीन, अब तेरा क्या होगा कालिया.......धाँय धाँय धाँय......."दोहा" उतर गया तू नजर से, औने बौने चीन।फेंक दिया भारत तुझे, जैसे खाली टीन।।नजर नहीं तेरी सही, घटिया तेरा माल।सुन ले ड्रेगन कान से, बिगड़ी तेरी चाल।।सुन पाक बिलबिला रहा, अब



दोहा गीतिका

"दोहा गीतिका"री बसंत क्यों आ गया लेकर रंग गुलालकैसे खेलूँ फाग रस, बुरा शहर का हालचिता जले बाजार में, धुआँ उड़ा आकाशगाँव घरों की क्या कहें, राजनगर पैमाल।।सड़क घेर बैठा हुआ, लपट मदारी एकमजा ले रही भीड़ है, फुला फुला कर गाल।।कहती है अधिकार से, लड़कर लूँगी राजगलत सही कुछ भी कहो, मैं हूँ मालामाल।। सत्याग्रह



दोहा गीतिका

"दोहा गीतिका"मुट्ठी भर चावल सखी, कर दे जाकर दानगंगा घाट प्रयाग में, कर ले पावन स्नानसुमन भाव पुष्पित करो, माँ गंगा के तीरसंगम की डुबकी मिले, मिलते संत सुजान।।पंडित पंडा हर घड़ी, रहते हैं तैयारहरिकीर्तन हर पल श्रवण, हरि चर्चा चित ध्यान।।कष्ट अनेकों भूलकर, पहुँचें भक्त अपारबैसाखी की क्या कहें, बुढ़ऊ जस



रहिमन धागा प्रेम का

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय टूटे से फिर ना जुड़े जुड़े तो गांठ पड़ जाए



शब्द संपदा -दोहावली

*वक्तवक्त-वक्त की बात है,सबके बदले ढंग।वक्त पड़े ही बदलते,खरबूजे के रंग।*कविताकविता कवि की कल्पना,जन-मन की है आस।समय भले ही हो बुरा,कविता रहती खास।*भावभाव बिना जीवन नहीं,नीरस होते प्राण।ढोते बोझा व्यर्थ का,कैसे हो परित्राण।*प्रेम प्रेम समर्पण माँगता,जैसे चातक चाह।स्वाति बूँद की आस में,कितनी भरता आह



दोहा

जो बबूल के फलों में, होती तनिक मिठास।शूल नही तब तो सदा , यह बम रखता पास । - भास्कर मलिहाबादी



दोहा

दोहा =प्रथम नमन है मंच को , दूजा मंच प्रधान lअग्र नमन कवि गण सखे , छन्दस ज्ञान विधान lपावन प्रेम सनेह में,आनन्दित हरि गेह।चंदन वन सुरभित हुआ,पाया साधु सनेह।भूषण सरिता भुवन तिथि ,कला पुराण बखान lकबिरा तुलसी जायसी , भक्ति प्रबल रसखान llनभ शशि नयना काल युग , कन्या ऋतु स्वर ताल lसिद्धि भक्ति दिगपाल शिव



दोहा

महोदय आपको सादर प्रणाम मैंने कुछ दोहे आपको लिंक में भेंजे है आपको अच्छा लगे तो सूचित करे ...और प्रकाशित कर सके तो बड़ी कृपा होगी बहुत बहुत धन्यबाद रुपेश धनगर मथुरा 9410490520 9760986966



दोहा

"दोहा"चाँद आज का मनचला, करता बहुत किलोल।लुक्का-छुप्पी खेलकर, हो जाता है गोल।।-1साजन करवा चौथ का, है निर्जल उपवास।जल्दी लाना चाँद घर, चिलमन चलनी खास।।-2मुखड़ा तेरा देखकर, बुझ जाएगी प्यास।साजन तुम दीर्घायु हो, यहीं चाँद से आस।।-3रूप निखारूँगी सजन, कर सोलह शृंगार।तेरे खातिर रात-दिन, रहती पिय बेजार।।-4चा



दोहा द्वादसी

विजय दशमी विशेष "दोहा द्वादसी"रावण के खलिहान में, चला राम का तीर।लंका का कुल तर गया, मंदोदरी अधीर।।-1दश दिन के संग्राम में, बीते चौदह साल।मेघनाथ का बल गया, हुआ विभीषण लाल।।-2कुंभकरण सोता रहा, देख भ्रात अनुराग।सीता जी की आरती, हनुमत करते जाग।।-3कैकेई को वर मिला, सीता को वनवास।राम ढूढ़ते जानकी, खग मृग



आरे में आरी

हमें काटते जा रहे ,पारा हुआ पचास।नित्य नई परियोजना, क्यों भोगें हम त्रास।।धरती बंजर हो रही ,बचा न खग का ठौर।बढ़ा प्रदूषण रोग दे ,करिये इस पर गौर ।।भोजन का निर्माण कर ,हम करते उपकार।स्वच्छ प्राण वायु दिये , जो जीवन आधार ।।देव रुप में पूज्य हम ,धरती का सिंगार ।है गुण का भंडार ले औषध की भरमार ।।संतति



शरद ऋतु

🌹सिंहावलोकनी दोहा मुक्तक🌹"""""""""""""""""""""""दस्तक देती शरद ऋतु , मन मुखरित उल्लास ।जूही की खुशबू उड़े, पिया मिलन की आस।।आस किसी की मैं करूँ , जो ना आएं पास ।बाट निहारें दृग विकल टूट रहा विश्वास ।।🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹व्यंजना आनंद ✍



शरद ऋतु

🌹सिंहावलोकनी दोहा मुक्तक🌹"""""""""""""""""""""""शरद ऋतु करे आगमन, मन होए उल्लास ।जूही की खुशबू उड़े, पिया मिलन की आस।।आस किसी की मैं करूँ , जो ना आएं पास ।नित देखू राह उसकी, जाता अब विश्वास ।।🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹व्यंजना आनंद ✍



दोहावली

शिक्षक दिन पर व मंच व मित्रों को हार्दिक बधाई, गुरुजनों को नमन! ॐ जय माँ शारदा!"दोहा"शिक्षक दिन पर आप को, बहुत बधाई मीत।मिला ज्ञान इनसे सुखद, गौतम गाए गीत।।बहुत धीर गंभीर हैं, लिए ज्ञान का बोधनमन करूँ शारद पुता, नित नव नूतन शोध।।माँ शारद संचित करो, मेरे अंदर ज्ञान।नमन करूँ आराध्य को, जय गणेश भगवान।।



दोहा

"दोहा"कश्मीर संग देखिए, सगर हिन्द के घाट।भेद-भावना मिट गई, खुली प्यार की हाट।।-1जन-जीवन हर्षित हुआ, सुधरी भारी भूल।घाटी की रौनक बढ़ी, खिले प्यार के फूल।।-2बड़े शान से आ मिले, गले हजारों हाथ।न्याय मिला इंसान को, झंडा डंडा साथ।।-3लहराते हैं तरु सभी, देवदार कचनार।फहर रहा झंडा लहर, अरु भारती विचार।।-4बड़े



दोहा

कुछ दोहेदिया हाथ में हाथ है, दिल भी इसके साथ।करना दिल से जतन तुम, मेरे कोमल हाथ।।-1दिल की गागर कोमली, रखना अपने पास।छूट न जाये हाथ से, अति सुन्दर अहसास।।-2कभी छोड़ जाना नहीं, मर्म मुलायम साथ।मिलते हैं दिल खोलकर, मतलब के भी हाथ।।-3कर जाती हैं आँख यह, हाथों के भी काम।दिल की नगरी कब बसी, चाहत राहत आम।



दोहा

"दोहा"व्यंग बुझौनी बतकही, कर देती लाचारसमझ गए तो जीत है, बरना दिल बेजार।।हँस के मत विसराइये, कड़वी होती बात।व्यंग वाण बिन तीर के, भर देता आघात।।सहज भाव मृदुभासिनी, करती है जब व्यंग।घायल हो जाता चमन, लेकर सातों रंग।।व्यंग बिना बहती नहीं, महफ़िल में रसधार।इक दूजे को नोचकर, देते हैं उपहार।।बड़े-बड़े घंटाल



"दोहावली" नमन शहीदों को नमन, नमन हिंद के वीर। हर हालत से निपटते, आप कुशल रणधीर।।

"दोहावली"नमन शहीदों को नमन, नमन हिंद के वीर।हर हालत से निपटते, आप कुशल रणधीर।।-1नतमस्तक यह देश है, आप दिए बलिदान।गर्व युगों से आप पर, करता भारत मान।।-2रुदन करे मेरी कलम, नयन हो रहे लाल।शब्द नहीं निःशब्द हूँ, कौन वीर का काल।।-3राजनयिक जी सभा में, करते हो संग्राम।जाओ सीमा पर लड़ो, खुश होगी आवाम।।-4वोट



"सिंहावलोकनी दोहा"

विधान- 13-11 की यति, चौपाई की अर्धाली व दोहा का सम चरण, सम चरण का अंतिम शब्द विषम चरण का पहला शब्द हो, यही इस दोहा की विशेषता है"सिंहावलोकनी दोहा" परम मित्र नाराज है, कहो न मेरा दोष।दोष दाग अच्छे नही, मन में भरते रोष।।-1रोष विनाशक चीज है, भरे कलेश विशेष।विशेष मित्र



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