“दोहा मुक्तक”

“दोहा मुक्तक”यह तो प्रति हुंकार है, नव दिन का संग्राम। रावण को मूर्छा हुई, मेघनाथ सुर धाम। मंदोदरी महान थी, किया अहं आगाह- कुंभकर्ण फिर सो गए, घर विभीषण राम॥-१ यह दिन दश इतिहास में , विजय पर्व के नाम। माँ सीता की वाटिका, लखन पवन श्रीराम। सेतु बंध रामेश्वरम, शिव मय राम मह



दोहा मुक्तक

"दोहा मुक्तक" भर लो चाह बटोर कर, रख अपने भंडार। खड़ी फसल यह प्रेम की, हरियाली परिवार। बिना खाद बिन पान के, निधि अवतरे सकून- मन चित मधुरी भाव भरि, ममता सहज दुलार।।-1 प्रेम खजाना है मनुज, उभराता है कोष। अहंकार करते दनुज, निधि होती निर्दोष। कभी गिला करती नहीं, रखती सबका मान- पाए जो बौरात वह, संचय भार



दोहा मुक्तक

"दोहा मुक्तक" अमिय सुधा पीयूष शिव, अमृत भगवत नाम सोम ब्योम साकार चित, भोले भाव प्रणाम मीठी वाणी मन खुशी, पेय गेय रसपान विष रस मुर्छित छावनी, सबसे रिश्ता राम।।-1 अमृत महिमा जान के, विष क्योकर मन घोल गरल मधुर होता नहीं, सहज नहीं कटु बोल तामस पावक खर मिले, लोहा लिपटे राख उपजाएँ घर घर कलह, निंदा कपट क



“दोहा-मुक्तक”

“दोहा-मुक्तक”नित मायावी खेत में, झूमता अहंकार। पाल पोस हम खुद रहे, मानों है उपहार। पुलकित रहती डालियाँ, लेकर सुंदर फूल- रंग बिरंगे बाग से, कौन करे प्रतिकार॥-१पक्षी भी आ बैठते, तकते हैं अभिमान। चुँगने को दाना मिले, कर घायल सम्मान। स्वर्ण तुला बिच तौल के, खुश होत अहंकार-चमक



"दोहा"

"दोहा" महिमा कर की जानिए, पहले लगा लगान राज प्रथा जबसे गई, तबसे शुल्क विधान।।-1 नए नए प्रतिरूप में, कर लेता अवतार आम जनों पर बोझ है, कर न सकें प्रतिकार।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



“दोहा मुक्तक”

शीर्षक -- फसल/ समानार्थी (एच्छिक मापनी) “दोहा मुक्तक” जब मन में उगती फसल, तब लहराते खेत खाद खपत बीया निरत, भर जाते चित नेत हर ऋतु में पकती फसल, मीठे मीठे स्वाद अपने अपने फल लिए, अपने अपने हेत॥-1 कभी क्रुद्ध होती हवा, कभी फसल बीमार गुर्राता है नभ कभी, कृषक



आंदोलन की आग

कुर्सी गयी धंधा गया ,हो गये जो बेकार ,आग लगाते फिर रहे ,नेता हैं दो चार । इनके घर भी फुकेंगे ,दिन ठहरो दो चार इनको इतनी समझ नहीं, आग न किसी की यार ।



“दोहा”

खड़ा हुआ हूँ भाव ले, बिकने को मजबूर बोलो बाबू कित चलू, दिन भर का मजदूर॥-1 इस नाके पर शोर है, रोजगार भरपूर हर हाथों में फावड़ा, पहली मे मशहूर॥-2 महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



“दोहा”

आज जगत आराध्य मेरे प्रभु श्री अंजनी पुत्र केशरी नंदन श्रीराम प्रिय महाबीर हनुमान जी का पावन जन्म दिन है। प्रेम से बोलिए ॐ जय सियाराम, ॐ जय बजरंगबली....... जय माँ सरस्वती। “दोहा” जन्म दिवस है आप का, आज बीर हनुमान चरण पवन सुत मैं पड़ूँ , ज्ञानी गुण बलवान॥ शुभकामना बध



दोहा

दोहा, मातु शीतला अब बहे, शीतल नीम बयार निर्मल हो आबो हवा, मिटे मलीन विचार।। डोला मैया आप का, बगिया का रखवार माली हूँ अर्पण करूँ, नीम पुष्प जलधार।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



"दोहा"

मूर्ख दिवस की जय हो........ "दोहा" समझदार भी जब कभी, बन जाते चालाक कर बैठते मूर्खता , हो जाते हालाक॥-1 यूँ तो करते मूर्ख मजा, होकर के अपवाद मस्ती में रहते सदा, सबको दें अवसाद।।-2 नाहक मूर्खा न बने, करें न भव बेकार मजा मस्करी जोर से, बोलो जी केदार।।-3 मूर्ख बना के स



“दोहा”

“दोहा” आया मनवा झूमते, अपने अपने धाम गंगा जल यमुना जहाँ, वहीं सत्य श्रीराम॥-1 कोई उड़ता ही रहा, ले विमान आकाश कोई कहे उचित नहीं, बादल बदले प्रकाश॥-2 अपनी अपनी व्यथा है, अपने अपने राग कहीं प्रेम परिहास है, कहीं पथ्य अनुराग॥-3 मंशा कौशल मानकी, नेकी नियती त्याग कर्म फलित होत



"दोहा"

भक्तिमय दोहे..... बाबा भोलेनाथ की, महिमा अपरम्पार भंग भष्म की आरती, शक्ति सत्य आपार।।-1 डम डम डमरू बज रहा, आदि कलश कैलाश अर्ध चन्द्रमा खिल गया, गंगा धवल प्रकाश।।-2 जय गणेश जय कार्तिके, जय नंदी महराज जय जय मातु पार्वती, मातु शीतला राज।।-3 डोला माँ का सज गया, जय चैत्



"दोहा"

बुरा न मानों होली है.....रंग गुलाल रंगोली है....... होली होली सब कहें, होली किसके साथ हाथी चली न सायकल, रास न आया हाथ।।-1 कमल खिला बेपात का, चारो ओर विकास केशरिया मन भा गया, चौथेपन सन्यास।।-2 जनता कबतक देखती, तेरा मेरा खेल मान लिया धन एक है, नौ नौ गिनती फेल।।-3 सम्प्रदाय किसको कहें, किसको कहें



“दोहा-मुक्तक”

“दोहा-मुक्तक” घिरी हुई है कालिमा, अमावसी यह रात क्षीण हुई है चाँदनी, उम्मीदी सौगातहाथ उठाकर दौड़ता, देख लिया मन चाँद आशा में जीवन पला, पल दो पल की बात॥ महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



“फागुनी दोहा”

“फागुनी दोहा” रंग भरी पिचकारियाँ, लिपटे अधर अबीर गोरी गाए फागुनी, गलियाँ क़हत कबीर॥ फागुन आई हर्षिता, मद भरि गई समीर नैना मतवाले हुए, छैला हुए अधीर॥ नाचे गाए लखि सखी, वन में ढ़ेल मयूर लाली परसा की खिली, मीठी हुई खजूर॥ फगुनाई गाओं सखी, मीठे मदन नजीर आज चली र



“दोहा मुक्तक”

“दोहा मुक्तक” माँ माँ कहते सीखता, बच्चा ज्ञान अपार माँ की अंगुली पावनी, बचपन का आधार आँचल माँ का सर्वदा, छाया जस आकाश माँ की ममता सादगी, पोषक उच्च बिचार॥-1 माँ बिन सूना सा लगे, हर रिश्तों का प्यार थपकी में उल्लासिता, गुस्सा करे दुलार करुणा की देवी जयी, चाहत सुत



"दोहा"

"दोहा" अपनापन मन का मिलन, दिल तिल रसना चाह मीठा गुड़ मीठे वचन, मीठी लगती वाह ।।-1 मकर खिचड़िया चित बसी, सादी दही मिलाय अमृत पावन संक्रांति, हर हर गंग नहाय।।-2 ख़ुशी ख़ुशी आशीष दें, शुभकामना अनेक यज्ञोपवीत पिताम्बरी, धारण करें विवेक।।-3 जय हो जय हो जायका, दान मान सम्मा



“दोहा”

“दोहा” भौंरा घूमे बाग में, खिलते डाली फूल कुदरत की ये वानगी, माली के अनुकूल॥ उड़ने दो इनको सखे, पलती भीतर चाह पंखुड़ियों में कैद ये, इनके मुँह कब आह॥ महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



दोहा”

दोहा” कल चुनाव आयोग ने, कही न्याय की बात दो हजार तक ही रहे, चंदे की औकात॥-1 इस पर चर्चा कीजिये, मंशा रखिए साफ आम जनों की यातना, कौन करेगा माफ॥-2 संविधान देता नहीं, कभी अनैतिक छूट चंदा रहम गरीब को, यह कैसी है लूट॥-3 किसी बहाने ले लिया, जनता का ही नोट भरी तिजोरी खुल गई, फिर जनता से



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