ग़ज़ल



ग़ज़ल

गोली नहीं चली है यारों फिर एक बार दिमाग चला है किसी का घूम रहे पत्थर लेकर वो लगता है पेड़ फला है किसी का इरादे नापाक़ हैं उसके और पढ़ रहा वो कुरान की आयतें कोई बताओ उसे नहीं इस तरह से हादसा टला है किसी का टूटेगा ना हौसला दुश्मनों के किसी भी वार से कभी भी हमारा तेज़ाब के असर से क्या कभी जीने का जज़्बा ग



ग़ज़ल

जब शाहीन बाग़ में गुज़ारी हमने रात थी एक अजीब एहसास से हुई मुलाक़ात थी मत पूछ क्या क्या देखा हमारी नज़रों ने बस यूं समझ कि बिन बादल बरसात थी बड़ा ही सुकून मिला जब मिला दिल उनसे दरम्यां हमारे कोई शह न कोई मात थी जीती थी हमने हारी हुई सारी बाज़ी भी तब जब मोहब्बत ही इकलौती मेरी ज़ात थी अब तो कहता है बाग़बा



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आग नहीं हूं मैं कुछ लोग फिर भी जलते हैं मुझको गिराने में वो हर बार फिसलते हैं उनसे भी मिला करो जिनकी ज़ुबां है कड़वी बचो उनसे जो कानों में ज़हर उगलते हैं देती है सुकून आख़िर मेरी ही मोहब्बत आज भी दिल जब हसीनाओं के मचलते हैं अश्कों का सैलाब उमड़ पड़ता है आंखों से जब दर्द देने वाले इस दिल में मिलते हैं



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सारे शहर में चर्चा ये सरेआम हो गया दोस्ती से ऊपर हिंदू इस्लाम हो गया खड़ी कर दी मज़हब की दीवार तो सुन अब भगवान मेरा परशुराम हो गया गिरे हो तुम जबसे मेरी इन नज़रों में तेरी नज़रों में काफ़िर मेरा नाम हो गया कामयाबी मिल सकती थी तुझको लेकिन नापाक था साजिश तेरा जो नाकाम हो गया अजायबघरों में रखा ताज गर ते



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खुद को तुम समझाकर तो देखोदर्द में भी मुस्कुराकर तो देखो जरूरतें हो जाएंगी कम तेरी भी ईमानदारी से कमाकर तो देखो बढ़ जाएगा एक और दुश्मन किसी को आईना दिखाकर तो देखो सीख जाओगे दलाली भी करना तुम पत्रकार बनकर तो देखो हो जाएगी मोहब्बत मिट्टी स



ग़ज़ल

बेबसी की आख़िरी रात कभी तो होगी रहमतों की बरसात कभी तो होगी जो खो गया था कभी राह-ए-सफ़र में उस राही से मुलाक़ात कभी तो होगी हो मुझ पर निगाह-ए-करम तेरी इबादत में ऐसी बात कभी तो होगी आऊंगा तेरी चौखट पे मेरे मालिक मेरे कदमों की बिसात कभी तो होगी लगेगा ना दिल तेरा कहीं मेरे बिना इन आंखों से करामात कभी तो ह



ग़ज़ल

मानव ही मानवता को शर्मसार करता है सांप डसने से क्या कभी इंकार करता है उसको भी सज़ा दो गुनहगार तो वह भी है जो ज़ुबां और आंखों से बलात्कार करता है तू ग़ैर है मत देख मेरी बर्बादी के सपने ऐसा काम सिर्फ़ मेरा रिश्तेदार करता है देखकर जो नज़रें चुराता था कल तलक वो भी छुपकर आज मेरा दीदार करता है दे जाता है दर्द



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ना कोई अपना हुआ

यूं तो दीवाने कई पर ना कोई अपना हुआ सोचते ही रह गए बस पूरा ना सपना हुआ ढूंढते ही रह गए हैं ना खुदा मुझको मिला उम्र गुज़री जाए है बेकार जप जपना हुआ कोई पढता भी नहीं चाहे रहूं मैं सामने बेवजह अखबार में देख लो छपना हुआ अजनबी सा अब वो पेश आ रहा है दोस्तों बेकार ही अपना तो उसके साथ में खपना हुआ सोचते थे



असली लगाव

असली लगाव हो तो रस्ते बन ही जाते हैं मिट्टी से मिल मुरझाए पौधे तन ही जाते हैं सब दूर हमसे हो रहे फिर भी ना सोच क्या हम उनको समझ अपना लगाए मन ही जाते है किसको कहां परवाह कि वो दिल में बसाएगा अब तो अच्छे लगे हैं जो लुटाए धन ही जाते हैं सही क्या है गलत क्या है यहां जो भी बताएंगे सयाने स्वार्थी लोगों मे



उलझनों में

त्तुम्हारे पास जीने के सुनो कितने सहारे हैं मैंने तो उलझनों में बिन तेरे लम्हें गुजारे हैंकोई भी दर नहीं ऐसा जहां पे चैन जा मांगूतेरे आगे तब ही तो हाथ ये दोनों पसारे हैंदर्द सहता रहा हूं मैं दवा मिलती नहीं कोईछुपे शायद इसी में जिंदगी के कुछ इशारे हैंभले ही तुम जमाने के लिए सच से मुकर जाओमेरी धड़कन क



ग़ज़ल

यह दावा है मेरा मैं तुझे याद आता रहूंगा हवा बनकर सांसों में तेरी समाता रहूंगा तेरी रूह भी हो जाये बेचैन सुनकर जिसे लिखकर ग़ज़लें ऐसी मैं अब गाता रहूंगा सो भी ना सकोगे सुकूं से बिछड़कर मुझसे यादों से अपनी ऐसे मैं तुझे जगाता रहूंगा ख़ैरियत तक पूछेंगे लोग मेरी तुझसे ही एक सवाल बनकर तुझे सताता रहूंगा तुम बु



फूल का सा मन

तुमको तलाशते रहे तुम ना मिले मुझे हरदम रहेंगे जान लो कुछ तो गिले मुझे सब कुछ लुटा दिया फकत इक बोल पे तेरे मिल जाते काश इसके एवज कुछ तो सिले मुझे इक प्यार तेरा गर यहां मुझको नसीब हो मिट्टी लगेंगे जान लो ये सब किले मुझे है फूल का सा मन मेरा फिर भी उदास हूं मुद्दत हुई है देख लो कितनी खिले मुझे मधुकर ने



तुम भी बदल गए

कैसे दर्द ना हो मुझे तुम भी बदल गए अरमान मेरे कदमों तले सारे कुचल गए यूं तो है भीड़ हर तरफ तुझ सी ना बात है देखा है तुझको जिस घड़ी आशिक मचल गए अब वो कभी ना आएगा मुझसे है कह रहा बिजली गिराओ ना सुनो दिलबर दहल गए अच्छी नहीं ये बात सनम सब कुछ भुला दिया उनकी भी कुछ तो सोच जो करते पहल गए भूलो ना प्यार से



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ज़िंदगी ने इस क़दर रूलाया है सारे ख्वाबों को हमने जलाया है ऐसा था हमारी बेबसी का आलम पतझड़ में भी शाख़ों को हिलाया है देखो सुक़ून से सोया है वो बच्चा लगता है उसकी मां ने सुलाया है ना जाने क्यों रो रही है ये बुढ़िया मैंने जबसे इसे खाना खिलाया है मुसलमान महफूज़ नहीं यहां गद्दार ने यह भ्रम फैलाया है उसका ही स



ग़ज़ल

हर दिन होली और हर रात दिवाली है जब बिहारी की महबूबा होती नेपाली है ग़र यकीं ना आये तो इश्क़ करके देखो फिर समझ जाओगे क्या होती कंगाली है जिसकी खातिर लड़ता रहा वो ज़माने से आज उसी ने कह दिया उसे तू मवाली है जरूर इज्ज़त करता होगा वो उसकी जो ज़ली



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वो जो कहते थे कि तुम ना मिले तो ज़हर मुझे पीना होगा खुश हैं वो कहीं और अब तो उनके बगैर ही जीना होगा चोट नहीं लगी है दिल पे चीरा लग गया है मेरे दोस्त सह लूंगा दर्द मगर इस दिल को उनको ही सीना होगा इश्क़ बहुत था उनको हमसे लेकिन मजबूर थे वो लगता है शादियों के संग ही बेवफ़ाई का महीना होगा संभाल कर रखा था हम



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तुम मुझे लगती बहुत ही प्यारी हो सच-सच बताओ क्या तुम बिहारी हो अब तो होने लगा है प्यार भी तुमसे लगता है फ़नां होने की बारी हमारी हो जो भी आया खुरच कर घायल कर गया जैसे हमारा दिल इमारत सरकारी होभर जाते पेट नेताओं के भाषण से ही जब महंगाई के साथ बेरोजगारी हो लिखेंगे ग़ज़ल हम अपनी मर्ज़ी से ही दुश्मन तुम या स



ग़ज़ल

तन्हाई किसी की मुस्तकबिल न होखुशियां इतनी भी मुश्किल न होऔर पाने की आशा होअंतिम लक्ष्य हासिल न होप्यार तो सच्चा होलेकिन उसकी मंजिल न होप्रेम में डूबा होस्नेह-सरिता का साहिल न होमन में समर्पण होमहबूबा संगदिल न होज्ञान का भंडार होपर मानव जाहिल न होउससे भी प्यार होजो उसके काबिल न हो .................



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शेरनी भी पीछे हट गयीबछड़े की मां जब डट गयीहमारी कलम वो खरीद न सकेलेकिन स्याही उनसे पट गयीहमारे मुंह खोलने से पहलेदांतों से जीभ ही कट गयीसच बोलने लगा है अब वोसमझो उमर उसकी घट गयीगौर से देखो मेरे माथे कोबदनसीबी कैसे सट गयीकमीज तो सिला ली हमनेलेकिन अब पतलून फट गयीउसने गले से लगाया ही थाकमबख़्त नींद ही उच



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