जैसे सब कुछ भूल रहा था

नेत्र प्रवाहित नदिया अविरल,नेह हृदय कुछ बोल रहा था।तिनका-तिनका दुख में मेरे,जैसे सबकुछ भूल रहा था।अम्बर पर बदरी छाई थी,दुख की गठरी लादे भागे।नयनों से सावन बरसे थाप्यासा मन क्यों तरस रहा था।खोया-खोया जीवन मेराचातक बन कर तड़प रहा था।तिनका-तिनका दुख में मेरेजैसे सब कुछ भ



गीतिका

आधार- छंद द्विमनोरम, मापनी- 2122, 2122, 2122, 2122"गीतिका" अब पिघलनी चाहिए पाषाण पथ का अनुकरण हो।मातु सीता के चमन में कनक सा फिर क्यों हिरण हो।।जो हुए बदनाम उनकी नीति को भी देखिए तोजानते हैं यातना को फिर दनुज घर क्यों शरण हो।।पाँव फँसते जा रहे हों दलदले खलिहान में जबक्यों बनाए जा रहे घर जब किनारे प



गीतिका

गीतिका, समांत- आन, पदांत- बना लेंचलो तराशें पत्थर को, भगवान बना लेंउठा उठा कर ले आएं, इंसान बना लेंनित्य करें पूजा इनकी, दिल जान लगाकरतिनका तिनका जोड़ें और मकान बना लें।।जितना निकले राठ भाठ, सब करें इकट्ठाईंटों का सौदा कर कर, पहचान बना लें।।सिर फूटा किसका किसकी शामत आईरगड़ें पत्थर इससे बड़ी मचान बना ल



यशोधरा वियोग से by नीतेश अजनबी

वन निकले सजन, मेरा सूना अंगन, छोड़ चले गए हमारे सजना| मुझे लगी लगन, मेरा सूना अंगन, न आये मिलने को हमारे सजना|| जब याद सजन की आये, मेरा अंग- अंग दहलाये|ना खबर पिया आये, मिलाने को जिया घबराये||1|| भटके वन-वन, करें कठिन तपन, मोह माया को तजि गए हमारे सजना|जब हमको बताके जात



गीत (मैं तो हूं केवल अक्षर)

*गीत* मैं तो हूं केवल अक्षर तुम चाहो शब्दकोश बना दो लगता वीराना मुझको अब तो ये सारा शहर याद तू आये मुझको हर दिन आठों पहर जब चाहे छू ले साहिल वो लहर सरफ़रोश बना दो अगर दे साथ तू मेरा गाऊं मैं गीत झूम के बुझेगी प्यास तेरी भी प्यासे लबों को चूम के आयते पढ़ूं मैं इश्क़ की इस कदर मदहोश बना दो तेरा



मौन दुआएँ अमर रहेंगी !

श्वासों की आयु है सीमितये नयन भी बुझ ही जाएँगे !उर में संचित मधुबोलों केसंग्रह भी चुक ही जाएँगे !संग्रह भी च



संदेसे आते हैं हमें तड़पाते हैं

संदेसे आते हैं हमें तड़पाते हैं Ke Ghar Kab Aaoge - Sandese Aate Hain LyricsSndese ate hain hamen tadpaate hainJo chitthhi ati hai wo puchhe jaati haiKe ghar kab aoge likho kab aogeKe tum bin ye ghar suna suna haiKisi dilawaali ne, kisi matawaali neHamen khat likha ha



गीत/गीतिका उठती है कुछ बात हृदय में क्योंकर सत्य विसारा जाए

गीत/गीतिकाउठती है कुछ बात हृदय मेंक्योंकर सत्य विसारा जाएजा देखें रावण की बगियासीता समर निहारा जाए।।छुवा नहीं उसने जननी कोजिसने धमकाया अवनी कोपतितों को बतलाया जाएगिन राक्षस को मारा जाएसीता समर निहारा जाए।।संविधान सर्वोत्तम कृति हैजीवन अपनी अपनी वृति हैनैतिक मूल्य सँवारा जाएन कि संपति जारा जाएधर्म कथ



प्रेमगीत

*है मुझे स्मरण... जाने जाना जानेमन !*है मुझे स्मरण... जाने जाना जानेमन !वो पल वो क्षणहमारे नयनों का मिलनजब था मूक मेरा जीवनतब हुआ था तेरा आगमनकलियों में हुआ प्रस्फुटनभंवरों ने किया गुंजनहै मुझे स्मरण... जाने जाना जानेमन !तेरा रूप तेरा यौवनजैसे खिला हुआ चमनचांद सा रौशन आननचांदनी में नहाया बदनझूम के ब



अलविदा 2019

झड़ने दो पुराने पत्तों को.🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂गिरने दो फूलों को जमीं पर.🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼कि नए पत्ते फिर आएंगे शाखों पर.🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿कि नए फूल फिर उगेंगे डाली पर.🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹ताकेंगे आसमान की ओर.🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴गिरने से मत डरो, झड़ने से ना डरो.बीज भी जमीन में गिरकर ही पौधे



"गीतिका"

गीतिका, मात्रा भार-30, समांत- अल, पदांत- आसीकुछ चले गए कुछ गले मिले कुछ हुए मित्र मलमासी कुछ बुझे बुझे से दिखे सखा कुछ बसे शहर चल वासीकुछ चढ़े मिले जी घोड़े पर जिनकी लगाम है ढ़ीलीकुछ तपा रहे हैं गरम तवे कुछ चबा रहे फल बासी।।कुछ फुला फुला थक रहे श्वांस कुछ कमर पकड़ के ऐंठेकुछ घूम रहे हैं मथुरा में कुछ च



गुनगुनाह ट

कविता गुनगुनाहट क्या तुम्हारी रगों में अपने भारत की मिट्टी से सुगंधित रक्त नहीं बहता ,क्या यहां के खेतों में उगा सोना तुम्हारे सौंदर्य में व्रद्धि नहीं करता ,क्या यहां की नदियां , झरने और दूर - दूर तक फैले हरे - भरे मैदान तुम्हारे अन्दर के संगीत का कारण नहीं बनते ,क्या उंचे - उंचे पेड़ों से सज्जित ह



देश भक्ति गीत नीतेश शाक्य अजनबी

एमां मेरी यादों को, दिल में बसा लेना| अब जाता है लड़ने को, ये देश भक्त दीवाना| विजयपाकर के ही आए, बस इतनी दुआ देना| ऐ मां मेरी यादों को दिल में बसा लेना|<!--[if !supportLineBreakNewLine]--><!--[endif]-->हैदिल में मां मेरे, सरहद के बसे छाले| ये जख



धार्मिक विश्वास और त्याग भावना

धार्मिक विश्वास और त्याग भावना हम प्रायः दो शब्द साथ साथ सुनते हैं– संस्कृति और धर्म | संस्कृति अपने सामान्य अर्थ में एक व्यवस्था का मार्ग है, औरधर्म इस मार्ग का पथ प्रदर्शक, प्रकाश नियामक एवं समन्वयकारी सिद्धान्त है | अतःधर्म वह प्रयोग है जिसके द्वारा संस्कृति को जाना जा सकता है | भारत में आदिकाल स



एकाकी मुझ को रहने दो

एकाकी मुझको रहने दो.-----------------------------पलकों के अब तोड़ किनारे,पीड़ा की सरिता बहने दो,विचलित मन है, घायल अंतर,एकाकी मुझको रहने दो।।शांत दिखे ऊपर से सागर,गहराई में कितनी हलचल !मधुर हास्य के पर्दे में है,मेरा हृदय व्यथा से व्याकुलमौन मर्म को छू लेता है,कुछ ना कहकर सब कहने दो !एकाकी मुझको रहने



अध्यात्म

अध्यात्मपरक मन:चिकित्सामनःचिकित्सक अनेक बार अपने रोगियों के साथ सम्मोहन आदि कीक्रिया करते हैं | भगवान को भी अपने एक मरीज़ अर्जुन के मन का विभ्रम दूर करकेउन्हें युद्ध के लिये प्रेरित करना था | अतः जब जब अर्जुन भ्रमित होते – उनके मनमें कोई शंका उत्पन्न होती – भगवान कोई न कोई झटका उन्हें दे देते | यही क



अध्यात्म और मनश्चिकित्सा

अध्यात्म और मनश्चिकित्साअर्जुन ने जब दोनों सेनाओं में अपने ही प्रियजनों को आमनेसामने खड़े देखा तो उनकी मृत्यु से भयाक्रान्त हो श्री कृष्ण की शरण पहुँचे “शिष्यस्तेऽहंशाधि मां त्वां प्रपन्नम् |” तब भगवान ने सर्वप्रथम एक कुशल वैद्य औरमनोवैज्ञानिक की भाँति उनके मन से मृत्यु का भय दूर किया | मृत्यु को अवश



नशामुक्ति

नशा "नाश" का दूसरा नाम है.ये नाश करता है बुद्धि का.ये नाश करता है धन का.ये नाश करता है संबंधों का.ये नाश करता है नैतिक मूल्यों का.नाश नहीं निर्माण की तरफ बढ़ोयुवाओं तुम नशामुक्त समाज बनानेका संकल्प लो.शिल्पा रोंघे



गीत उगाए हैं

मन की बंजर भूमि पर,कुछ बाग लगाए हैं !मैंने दर्द को बोकर,अपने गीत उगाए हैं !!!रिश्ते-नातों का विष पीकर,नीलकंठ से शब्द हुए !स्वार्थ-लोभ इतना चीखे किस्नेह-प्रेम निःशब्द हुए !आँधी से लड़कर प्राणों के,दीप जलाए हैं !!!मैंने दर्द को बोकर अपने....अपनेपन की कीमत देनी,होती है अब अपनों को !नैनों में आने को, रिश



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