हिंदी_कविता

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विशुद्ध किसान गुदड़ी के लाल

विशुद्ध किसान गुदड़ी के लालहम किसान हमें खेती प्याराहम कुछ भी उगा सकते हैंइस जग में दूजा काम नहीं जो मेरे मन को भा सकते हैं।हम उस किसान के बेटे हैंसंभव है तुझको याद नहींजय जवान जय किसान का नाराबिल्कुल तुझको है याद नहीं।ईमानदारी जिसके रग-रग में समायाबेमिसाल ऐसा इनसान कहाँसादा जीवन और उच्च विचार होमिलत



हे कवि मन हिंदी की जय बोल

हे कवि मन, हिंदी की जय बोलजिसने निजभाषा का मान बढ़ायाहिंदी को जन - जन तक पहुँचायाराजभाषा का दर्जा भी दिलवायाहे कवि मन, हिंदी की जय बोल।जो घर-घर में बोली जाती हैजो सबके मन को हरसाती हैसभी जाति धरम को भाती हैहे कवि मन हिंदी की जय बोल।जिसके बावन अक्षर होते हमारेकवि जिससे प्रकृति को चितारेजो जनमानस के भा



कविता---बिन साजन के सावन कैसा

बारिश की बूंदों से जलतीहीय में मेरे आज सुलगतीपीपल के पत्तो की फडफडजैसे दिल की धडकन धडधडचूल्हे पर चढ़ गयी कढाई दूरहुई दिल की तन्हाईलेकिन सबकुछ लागे ऐसा बिनसाजन के सावन कैसा. चलती है सौंधी पुरबाई हुएइकट्ठे लोग लुगाईउनके वो और वो हैं उनकी





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