इबादत

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माफ़ी शब्द नहीं मेरे शब्द कोष में



दिल या दिमाग (भाग-१)

कहते है कि जब दिल और दिमाग के बीच किसी मुद्दे को लेकर जंग चल रही हो तो दिल की बात सुननी चाहिए ना कि दिमाग की. ऐसी ही सोच लोगो को भक्ति की तरफ ले जाती है जहाँ लोग दिमाग से काम लेना बंद कर देते है. भक्ति योग और कर्म योग दोनों ही रास्ते मुक्ति की



इबादत

जलते हुए शोलों से दोस्ती कर ली ! खुद खाक होने की, साज़िश कर ली !! इन सर्द बर्फ़ीली हवाओं में, वो बात कहाँ ! एक धूप की ख्वाहिश में, रोशनी कर ली !! तेरे दामन में, या मेरे आशियाने में ! एक बूँद की चाहत में, बारिश कर ली !! वो तो नहीं हुआ जो, दिल की आरज़ू थी ! हर शाम





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