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क्यूँ लगे तू सामने हैं सच तो है की तू जा चुकी है रूह मे अब भी तू बसी है जाने जा Read More Full Lyrics Click Here

वज़्न--212 212 212 212 अर्कान-- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन, बह्रे- मुतदारिक मुसम्मन सालिम, क़ाफ़िया— लुभाते (आते की बंदिश) रदीफ़ --- रहे"गज़ल"छोड़कर जा रहे दिल लुभाते रहेझूठ के सामने सच छुपाते रहे जान लेते हक़ीकत अगर वक्त कीसच कहुँ रूठ जाते ऋतु रिझाते रहे।।ये सहज तो न था खेलना आग सेप्यास को आब जी भर प

"गीतिका" पर्दे में जा छुपे क्यों सुन चाँद कल थी पूनम।कैसे तुझे निकालूँ चिलमन उठाओ पूनम। इक बार तो दरश दो मिरे दूइज की चंदा-जुल्फें हटाओ कर से फिर खिलाओ पूनम।।हर रोज बढ़ते घटते फितरत तुम्हारी कैसीजुगनू चमक रहें हैं बदरी हटाओ पूनम।।फिर घिर घटा न आए निष्तेज हुआ सूरजअब तो गगन

"मुक्तक"पंक्षी अकेला उड़ा जा रहा है।आया अकेला कहाँ जा रहा है।दूरी सुहाती नहीं आँसुओं को-तारा अकेला हुआ जा रहा है।।-१जाओ न राही अभी उस डगर पर।पूछो न चाहत बढ़ी है जिगर पर।वापस न आए गए छोड़कर जो-वादा खिलाफी मिली खुदगरज पर।।-२महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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