अनुशासन :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन ही नहीं सृष्टि के सभी अंग - उपांगों मे अनुशासन का विशेष महत्व है | समस्त प्रकृति एक अनुशासन में बंधकर चलती है इसलिए उसके किसी भी क्रियाकलापों में बाधा नहीं आती है | दिन – रात नियमित रूप से आते रहते हैं इससे स्पष्ट है कि अनुशासन के द्वारा ही जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है | विचार कीजिए कि



पिंजरे का पंछी

मैं जीना चाहूं बचपन अपना,पर कैसे उसको फिर जी पाऊं!मैं उड़ना चाहूं ऊंचे आकाश,पर कैसे उड़ान मैं भर पाऊं!मैं चाहूं दिल से हंसना,पर जख्म न दिल के छिपा पाऊं।मैं चाहूं सबको खुश रखना,पर खुद को खुश न रख पाऊं।न जाने कैसी प्यास है जीवन में,कोशिश करके भी न बुझा पाऊं।इस चक्रव्यूह से जीवन में,मैं उलझी और उलझती ह



समय को पहचानें :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरती पर मनुष्य को अनेक मूल्यवान संपदायें प्राप्त हुई हैं | किसी को पैतृक तो किसी ने अपने बाहुबल से यह अमूल्य संपदायें अपने नाम की हैं | संसार में एक से बढ़कर एक मूल्यवान वस्तुएं विद्यमान हैं परंतु इन सबसे ऊपर यदि देखा जाए तो सबसे मूल्यवान समय ही होता है | समय ही मानव जीवन का पर्याय है , मनुष्य क



समय की प्रबलता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस सृष्टि में ईश्वर का विधान इतना सुंदर एवं निर्णायक है कि यहां हर चीज का समय निश्चित होता है | इस धरा धाम पर सृष्टि के आदिकाल से लेकर के अब तक अनेकों बलवान , धनवान तथा सम्पत्तिवान हुए परंतु इन सब से भी अधिक बलवान यदि किसी को माना जाता है तो वह है इस समय | समय के आगे किसी की नहीं चलती है | इस सृष्ट



अधम शरीरा :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस समस्त सृष्टि में जहां अनेकों प्रकार के जीव भ्रमण करते हैं जलचर , थलचर , नभचर मिला करके चौरासी लाख योनियाँ बनती है | इन चौरासी लाख योनियों में मानव योनि को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए हमारे धर्मग्रंथ इस पर अनेकों अध्यात्म वर्णन करते हुए दृष्टिगत होते हैं | प्रायः सभी धर्मग्रंथों में इस मानव शरीर को द



नर समान नहिं कवनिउ देही :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*यह संसार बड़ा ही विचित्र है | इस पृथ्वी पर रहने वाले अनेक जीव है जो कि एक से बढ़कर एक विचित्रताओं से भरे हुए हैं | इन सभी जीवों में सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य सबसे ज्यादा विचित्र है | मनुष्य की विचित्रता का आंकलन इसी से किया जा सकता है कि यदि मनुष्य से यह प्रश्न कर दिया जाय कि इस संसार में सबसे दुर



साधना एक संग्राम है :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में आध्यात्म का बहुत बड़ा महत्व है | अध्यात्म की पहली सीढ़ी साधना को बताया गया है | किसी भी लक्ष्य की साधना करना बहुत ही दुष्कर कार्य है , जिस प्रकार कोई पर्वतारोही नीचे से ऊपर की ओर चढ़ने का प्रयास करता है उसी प्रकार साधना आध्यात्मिक सुमेरु की ओर चढ़ने का प्रयास है | साधना करना सरल नही



मृगतृष्णा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस सृष्टि में जीव चौरासी लाख योनियों की यात्रा किया करता है | इन चौरासी लाख योनियों के चक्रानुक्रम में समस्त कलुषित कषाय को धोने के उद्देश्य जीव को मानव योनि प्राप्त होती है | इसी योनि में पहुंचकर जीव पूर्व जन्मों के किए गए कर्म - अकर्म को अपने सत्कर्म के द्वारा धोने का प्रयास करता है | मानव योनि म



माँ के दूध का महत्त्व :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में वैसे तो मनुष्य से भी अधिक बलवान जीव पाये जाते हैं परंतु मनुष्य ने अपने बुद्धि - विवेक , बल - कौशल से सब पर ही विजय प्राप्त की है | मनुष्य जन्म लेने के बाद इस धराधाम पर जो पहला आहार लेता है वह है "माँ का दूध" | जिस प्रकार संसार में जल के अनेक स्रोत होने के बाद भी गंगाजल को ही सर्वश्रेष्



कल्पनाशक्ति :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में एक से बढ़कर एक बलवान होते रहे हैं जिनकी तुलना नहीं की जा सकती है | यदि कोई भी बलवान हुआ है तो उसका आधार उस मनुष्य का मन ही कहा जा सकता है , क्योंकि संसार में सबसे बलवान मनुष्य का मन की कहा जाता है | सबसे बड़ी शक्ति कल्पना शक्ति के बल पर मनुष्य पृथ्वी पर रहते हुए तीनों लोगों का भ्रमण कि



जगायें आत्मविश्वास :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर जन्म लेने के बाद मनुष्य को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है | हमारा आत्मविश्वास ही हमारा मार्गदर्शन करते हुए सत्पथ पर चलने की प्रेरणा देता है | जीवन के रहस्य को समझने के लिए मनुष्य को आत्मविश्वास का सहारा लेना ही पड़ता है क्योंकि जी



वैचारिक दरिद्रता :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में राजा - रंक , धनी - निर्धन सब एक साथ रहते हैं | इन सबके बीच दरिद्र व्यक्ति भी जीवन यापन करते हैं | दरिद्र का आशय धनहीन से लगाया जाता है जबकि धन से हीन व्यक्ति को दरिद्र कहा जाना उचित नहीं प्रतीत होता क्योंकि धन से दरिद्र व्यक्ति भी यदि विचारों का धनी होते हुए सकारात्मकता से जीवन यापन कर



सकारात्मक दृष्टिकोण :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में मनुष्य में बुद्धि - विवेक विशेष रूप से परमात्मा द्वारा प्रदान किया गया है | मनुष्य अपने विवेक के द्वारा अनेकों कार्य सम्पन्न करता रहता है | इन सबमें सबसे महत्त्वपूर्ण है मनुष्य का दृष्टिकोण , क्योंकि मनुष्य का दृष्टिकोण ही उसके जीवन की दिशाधारा को तय करता है | एक ही घटना को अनेक मनुष्य



शिक्षा :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में शिक्षा का बहुत बड़ा महत्व है | शिक्षा प्राप्त किए बिना मनुष्य जीवन के अंधेरों में भटकता रहता है | मानव जीवन की नींव विद्यार्थी जीवन को कहा जा सकता है | यदि उचित शिक्षा ना प्राप्त हो तो मनुष्य को समाज में पिछड़ कर रहना और उपहास , तिरस्कार आदि का भाजन बनना पड़ता है | यदि शिक्षा समय रहत



नींव :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस सृष्टि में आदिकाल से सनातन धर्म विद्यमान है | सनातन धर्म से ही निकलकर अनेकों धर्म / सम्प्रदाय एवं पंथ बनते - बिगड़ते रहे परंतु सनातन धर्म आदिकाल से आज तक अडिग है | यदि सनातन धर्म आज तक अडिग है तो इसका मूल कारण है सनातन के सिद्धांत एवं संस्कार , जिसे सनातन की नींव कहा जाता है | इस संसार में नींव



सुख - दु:ख का रहस्य :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में शत्रु - मित्र , दिन - रात , सकारात्मकता - नकारात्मकता की तरह ही सुख एवं दुख भी आते जाते रहते हैं | यह सारे क्रियाकलाप या रिश्ते - नाते मनुष्य की सोच के ऊपर निर्भर होते हैं | यह मनुष्य स्वयं तय करता है कि वह सुखी रहना चाहता है या दुखी ? क्योंकि इसके मूल में मनुष्य की सोच ही होती है |



विचार शक्ति :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमपिता परमात्मा के द्वारा इस समस्त सृष्टि में चौरासी लाख योनियों का सृजन किया गया , जिसमें सर्वश्रेष्ठ बनकर मानव स्थापित हुआ | मनुष्य यदि सभी प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है तो उस का प्रमुख कारण है मनुष्य की बुद्धि , विवेक एवं विचार करने की शक्ति | मनुष्य यदि अपने विचार शक्ति पर समुचित नियंत्रण कर



जाने कब.............

जाने कब नज़र बदल जाए, जो आज अपने हैं वो पराए बन जाएं। आईना भी संभल कर देखना , जाने कब अपनी ही नजर लग जाये। ख्वाबो को दामन मे सहेज कर रखना , जाने कब किस्मत के सितारे बदल जाएं ।दर्द को भी निगाहों मे छिपा कर रखना , जाने कब दर्द ही दवा बन जाये। हवाओं से भी शर्त लगा लेना , जाने कब हम हवाओं से भी आगे निकल



मिलन व वियोग :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस सृष्टि में चौरासी लाख योनियों में सर्वोत्तम योनि मनुष्य की कही गयी है | अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में मनुष्य यत्र - तत्र भ्रमण करता रहता है इस क्रम में मनुष्य को समय समय पर अनेक प्रकार के अनुभव भी होते रहते हैं | परमात्मा की माया इतनी प्रबल है कि मनुष्य उनकी माया के वशीभूत होकर काम , क्रोध , मोह , प



ज़िंदगी ?

अगर जीवन बोझ लगने लगे तो क्या करना चाहिए ?



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