सुविचार

मनुष्य के कथनी और करनी में अन्तर नही होना चाहिए



धरती का दोहन ' विश्व जल दिवस '

धरती का दोहन ‘विश्व जल दिवस ‘डॉ शोभा भारद्वाज शीतल निर्मल मीठा जल मन एवं आत्मा दोनों को तृप्त कर देता है चार दिन तक पूर्वी दिल्ली ने पानी की भयंकर किल्लत देखी कारण अंडर ग्राउंड पाईप में लीकेज था आस पास के घरों के अंडरग्राउंड में सीलन आने लगी पाईप की मरम्मत का काम तेजी से चला इस बीच पानी का हा-ह



रूठना और मनाना

रूठना मनाना तो जीवन का दस्तूर है, वैसे हम तो बेकसूर हैं,मानो तो पास नहीं तो दूर हैं- #अतुलदूबेसूर्य



विश्व गुर्दा दिवस पर विशेष

कल विश्व गुर्दा दिवस है।इसका उद्देश्य है लोगों में गुर्दे और गुर्दे से संबंधित बीमारियों को लेकर जागरूकता पैदा करना। ईश्वर न करे कभी किसी को गुर्दे से संबंधित बीमारियों का सामना करना पड़े और यदि ऐसा हो जाए तो अपनों के जीवन को बचाने के लिए हमें गुर्दा प्रत्यारोपण से पीछे नहीं हटना चाहिए।आज के इस युग



ईश्वर समदर्शी है :--आचार्य अरविंद तिवारी

*परमात्मा की इच्छा से ब्रह्मा जी ने सुंदर सृष्टि की रचना की , अनेक प्रकार के जीन बनाए | पर्वत , नदियां , पेड़-पौधे सब ईश्वर की कृपा से इस धरा धाम पर प्रकट हुये | ईश्वर समदर्शी है ! वह कभी भी किसी से भेदभाव नहीं करता है | ईश्वर की प्रतिनिधि है प्रकृति और प्रकृति सबको बराबर बांटने का प्रयास करती है |



संदेह घातक होता है :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन विचित्रताओं से भरा पड़ा है ! अपने जीवन काल में मनुष्य अनेक प्रकार के अनुभव करता हुआ उसी के अनुसार क्रियाकलाप करता रहता है | मानव जीवन को संवारने में सकारात्मकता का जितना हाथ है उसे बिगाड़ने में नकारात्मकता उससे कहीं अधिक सहयोग करती है | इन्हीं नकारात्मकता का ही स्वरूप है संदेह या शंका | क



धैर्य है दुख में मनुष्य का साथी :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में सुख एवं दुख आते रहते हैं इससे न तो कोई बचा है ना ही कोई बच पाएगा | सुख में अति प्रसन्न होकर मनुष्य दुख पड़ने पर व्याकुल हो जाता है | दुख के समय को जीवन का सबसे कुसमय माना जाता है | कभी-कभी मनुष्य दुख में इतना किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है कि उसे यह नहीं समझ में आता तो क्या करना चाहिए क्



सबसे कठिन है सरल बनना :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*यह मानव जीवन बहुत ही दुष्ष्कर है , इस मानव जीवन में मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार कठिन से कठिन लक्ष्य प्राप्त कर लेता है क्योंकि यह संसार कर्म प्रधान है यहां कर्म योगी के लिए कुछ भी कठिन नहीं है | मनुष्य अपने जीवन में यद्यपि कठिन से कठिन लक्ष्य प्राप्त कर लेता है , जो चाहता है वह बन भी जाता है परंत



राग - अनुराग एवं वैराग्य :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर का बनाया हुआ यह संसार प्रेममय है | परमात्मा प्रेम के बिना नहीं मिल सकता , परमात्मा ही नहीं इस संसार में बिना प्रेम के कुछ भी नहीं प्राप्त हो सकता है | आप किसी से लड़ाई करके वह नहीं प्राप्त कर सकते जो प्रेम से प्राप्त हो सकता है | प्रेम को कई रूप में देखा जाता है मोह एवं आसक्ति इसी का दूसरा रू



पाप एवं पुण्य :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर आने के बाद मनुष्य अनेकों प्रकार के कर्म करता रहता है क्योंकि ईश्वर ने उसे कर्म करने का अधिकार प्रदान कर रखा है | कर्म करना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है परंतु यहां एक प्रश्न मस्तिष्क में उठता है कि जब कर्म करना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है और मनुष्य उसे कर भी रहा है तो पाप कर्म एवं पुण्य



दुख ही सच्चा मित्र है :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन बड़ा ही विचित्र है यहां समय-समय पर मनुष्य को सुख एवं दुख प्राप्त होते रहते हैं | किसी - किसी को ऐसा प्रतीत होता है कि जब से उसका जन्म हुआ तब से लेकर आज तक उसको दुख ही प्राप्त हुआ है ! ऐसा हो भी सकता है क्योंकि मनुष्य का इस संसार में यदि कोई सच्चा मित्र है तो वह दुख ही है क्योंकि यह दुख स



श्री गुरु गोविन्द सिंह जी प्रकाश पर्व

श्री गुरु गोविन्द सिंह जी प्रकाश पर्व डॉ शोभा भारद्वाज पहले मरन कबूल कर जीवनदी छड़ आस श्री गुरु गोविंद सिंह जी का मूल मंत्र था यह तरक्की का मूल मंत्र हैउन्होंने वीरों की वीरता का आह्वान करते हुए निराश देश में ऐसी हुंकार भरी हर बाजूफड़क उठीचिड़ियाँ तो मैं बाज लड़ाऊँ ,सवा लख से एक लड़ाऊँ ,ताँ गोविन्दसिं



आत्मनिरीक्षण :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर हमें सर्वश्रेष्ठ मानवयोनि प्राप्त हुई है | हम इस जीवन में जो कुछ भी करना चाहें कर सकते हैं | परंतु किसी भी कार्य में सफल होने के लिए आवश्यक है आत्मनिरीक्षण करना | इस जीवन में भौतिक , शारीरिक , बौद्धिक या आर्थिक किसी भी दृष्टि से विकास के लिए आत्मनिरीक्षण करना अनिवार्य प्रक्रिया है , ज



चरित्रनिष्ठा :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में आने के बाद मनुष्य जीवन भर विभिन्न प्रकार की संपदाओं का संचय किया करता है | यह भौतिक संपदायें मनुष्य को भौतिक सुख तो प्रदान कर सकती हैं परंतु शायद वह सम्मान ना दिला पायें जो कि इस संसार से जामे के बाद भी मिलता रहता है | यह चमत्कार तभी हो सकता है जब मनुष्य का चरित्र श्रेष्ठ होता है , क्



आत्म मूल्यांकन करना आवश्यक है :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम में आने के बाद मनुष्य स्वयं को समाज में प्रतिष्ठित करने के लिए अपने व्यक्तित्व का विकास करना प्रारंभ करता है , परंतु कभी-कभी वह दूसरों के व्यक्तित्व को देखकर उसका मूल्यांकन करने लगता है | यहीं पर वह छला जाता है | ऐसा मनुष्य इसलिए करता है क्योंकि दूसरों के जीवन में तांक - छांक करने की मनु



निर्भयता :-- आचार्य अर्जुन तिवारी :-

*मानव जीवन बहुत ही दुर्लभ है , यह जीवन जितना ही सुखी एवं संपन्न दिखाई पड़ता है उससे कहीं अधिक इस जीवन में मनुष्य अनेक प्रकार के भय एवं चिंताओं से घिरा रहता है | जैसे :- स्वास्थ्य हानि की चिंता व भय , धन समाप्ति का भय , प्रिय जनों के वियोग का भय आदि | यह सब भय मनुष्य के मस्तिष्क में नकारात्मक भाव प्र



अशान्तस्य कुतो सुखम् :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर द्वारा बनाया गया यह संसार बहुत की रहस्यमय है ` इस संसार को अनेक उपमा दी गई हैं | किसी ने इसे पुष्प के समान माना है तो किसी ने संसार को ही स्वर्ग मान लिया है | वेदांत दर्शन में संसार को स्वप्नवत् कहा गया है तो गोस्वामी तुलसीदास जी इस संसार को एक प्रपंच मानते हैं | गौतम बुद्ध जी के दृष्टिकोण से



विद्वता या अहंकार :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*जब से इस धरा धाम पर मनुष्य का सृजन हुआ है तब से लेकर आज तक अनेकों प्रकार के मनुष्य इस धरती पर आये और चले गये | वैसे तो ईश्वर ने मानव मात्र को एक जैसा शरीर दिया है परंतु मनुष्य अपनी बुद्धि विवेक के अनुसार जीवन यापन करता है | ईश्वर का बनाया हुआ यह संसार बड़ा ही अद्भुत एवं रहस्यम है | यहाँ मनुष्य के म



वैक्सीन पर सियासत क्यों ?

वैक्सीनपर सियासत क्यों?डॉशोभा भारद्वाज ईरानमें चाय पीने का अलग ढंग है घर में हर वक्त चाय हाजिर रहती है .वहाँ की चाय औरकहवा खाने मशहूर हैं शाम को कहवा खानों में किस्सा गोई चलती है घरों में भी ठंड केदिनों में अलादीन मिट्टी के तेल का स्टॉप जलता रहता है घर भी गर्म करता है उस परउबलने के लिए पानी रख देते



कार्य में ढूँढ़ें आनन्द :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में मनुष्य एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता है क्योंकि यह सृष्टि ही कर्म प्रधान है | मनुष्य को जीवन में सफलता एवं असफलता प्राप्त होती रहती है जहां सफलता में लोग प्रसन्नता व्यक्त करते हैं वही असफलता मिलने पर दुखी हो जाया करते हैं और वह कार्य पुनः करने के लिए जल्दी तैयार नहीं होते | जी



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