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क़लम

वो क़लम नहीं हो सकती है जो बिकती हो बाज़ारों में ! क़लम वही है जिसकी स्याही, ना फीकी पड़े नादिया की धारों में !! क़लम वो है जो बनती है, संघर्ष के तूफान से ! लिखती है तो बस सिर्फ़ मानवता क़ी ज़ुबान से !! क़लम चाकू नहीं खंज़र नहीं, क़लम तलवार है ! सत्यमेव ज्यते ही इस



बोल क़लम...

महानिर्वाण...! एक शरीर का, बेबसी-लाचारी या मानवता का, या जिसने तिल-तिल रोज़ मरते देखा उसे ! किसका ? वहशीपन के मारे ऐसे ही कितने लोग चले जाते हैं दुनिया से दानव है कि अमरत्व है उसे ! मरता ही नहीं। समय के प्रश्न हैं ये हम सबसे...! बोल क़लम... सच लिखेगी ? जवाब देगी ?





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