सखी री मोरे पिया कौन विरमाये?- एस. कमलवंशी

सखी री मोरे पिया कौन विरमाये? कर कर सबहिं जतन मैं हारी, अँखियन दीप जलाये, सखी री मोरे पिया कौन विरमाये... अब की कह कें बीतीं अरसें, केहिं कों जे लागी बरसें, मो सों कहते संग न छुरियो, आप ही भये पराये, सखी री मोरे पिया कौन विरमाये... गाँव की



मिलिए कमली से जो ख़ुद पति की लाश को ले गई श्मशान

कफन खरीदने के लिए पैसे मांगे. फिर पति की लाश को श्मशान ले गई. खुद से अपना सिंदूर धोया और अपने पति को मुखाग्मी दी। पटना: आम तौर पर जब किसी महिला के पति की मौत हो जाती है तो वो टूट जाती है. लेकिन आर्थिक तंगी और खुद की औलाद से मिले धोखे ने उसे एक मिनट के लिए भी पति के मरने पर टूटने नहीं दिया. उसने पहले



फूल बनकर खिलो

फूल बनकर खिलोएक कमल की तरह ।कर दो शीतल सभी को विधु की तरह ।आरजू है हमारी मेरे भाइयों ।जब मिलो तो मिलो दोस्तों की तरह ।। था अभी पंक में एक पंकज खिला ।पंक बोला कि इससे हमें क्या मिला ।बोला पंकज कि तुझमें मेरी जान है ।दोस्त तुझसे ही मेरी ये पहचान है ।नाम तेरा बढ़े इस गगन की तरह ।फूल बनकर खिलो एक कमल की



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