जीवन साथी

प्रकृति में भांति-भांति के रंगबिखेरमन को मेरे- छोड़ दिए प्रभुसादामनमोहक संध्या हो या सुहानी भोरप्रिये बिन न रखना कभी मुझे तुम आधाडॉ. कवि कुमार निर्मल©®



मीरा के वचन मोहन के लिए

भेजा था विष का प्याला अमृत बन गया। भेजा था विषैला सांपफूलों का हार बन गया। तेरी ही करामात है ये मोहनकि कलियुग में भी जी रही हूं। बिना डरे तेरी भक्ति के गीतगा रही हूं। शिल्पा रोंघे



जीने की कला

हां दर्द सहना भी एक कला है। गम बर्दाश्त कर लेना भी एक कला है। खुद नाखुशी के दौर में रहकरदूसरों से ना जलना भी एक कला है। छिपकर रोना भी एक कला है । अंधेरे में भी जुगनू बनकर जीनाएक कला है। कहती है अगर खुदगर्ज़ दुनिया तोकहने तो कहने दो। क



मधुधवर्षण

*मधुवर्षण* अंबर में मेघों को देखो लिए हाथ में प्याले हैं। रवि,शशि दोनों दिखते छिपते सब पी कर मतवाले हैं। सभी देव पीकर लड़खाते देखो कैसी गर्जन हो रही। देखो सखी मधुवर्षण हो रही। अंबर में ज्यों लुढ़का प्याला तरु पतिका से मदिरा टपके। वर्षों से आश लगाऐ बैठा प्यासा चातक रस को झपके। उसी रसो में डूबी लतिक



प्याज में लगी आग

"प्याज में लगी आग"सात्विक हो आहारतनिक लो फलाहारठप भले हो व्यापारसुस्वागत् है सरकारसफैद या काली टोपीसरकार होती है मोटीतामसिकों की किस्मत खोटीराजसिक भी खाए दाल रोटीदो रुपये चावल किलोएक रुपया आंटा जीलोआलु राजा- "सदाबहार"थूको प्याज नहीं आहारऋषियों से करलो प्यारभगवान् खड़ा तेरे द्वारडॉ. कवि कुमार नि



आहत मानवता

"आहत मानवता"यह सदी भी यूँ हींव्यतीत हो आदतन चिढ़ायेगी।माँ क गोद सूनी कीसूनी हीं रह जीभ बिलाएगी॥सपूतहीन बंजर हींभूमि यह रे रह जाएगी।अहिंसा के नावेंबली रोज चढ़ाई जायेगी॥सत्यवादिता पर मिथ्या कीहवि आहुति बन राख बनेगी।सदाचारियों पर चापलूसी कीसरकार कल थी, आज चलेगी॥हाहाकार चहुदिसि व्याप्त,"त्राहिमाम्" गुँजा



नौ रसों की गाथा

बिना मिठास के फल ही क्या ?बिना रस के काव्य की रचना ही कैसे हो भला.चलो रस भरते है जीवन में, काव्य रचते है रंग बिरंगे से हम.प्रेम रस के रूप अनेकश्रृंगार, वात्सल्य, भक्ति का का होता संचार.कभी मिलन है तो कभी विरह है, श्रृंगार रस.कभी कृष्ण तो कभी राधा है इसका दूसरा नाम.कभी ममत



सिड्रेंला और लैला जब मिली

सिड्रेंला और लैलामें बहस एक दिनजमकर हुई। लैला सिड्रेंलाकी किस्मत कोबेहतर बता गईसिड्रेंला को लैलाने कहा देखोफर्श से तू अर्शपर पहुंचगई। मैं महलों की रानीहोकर अकेली ही रह गई। कुछ इस तरह वो फ़कीरीको वो अमीरी से बेहतरबता गईऔर कह गई प्यार मेंउंच और नीचकी बात गलती से भी ना कर



नफ़रत और मोहब्बत

💕 💕💕💕💕💕💕💕 💕💓 नफ़रत करने वालों को 💓💓💓गले मैं लागाता हूँ।💓💓 💓💓रक़ीब गर हो,💓💓अहबाब समझ सर झुकाता हूँ।।💕💕💕💕💕💕💕💕💕💕💕 💕 निर्मल 💕 💕💕💕💕💕💕💕💕💕💕💕💕💕💕



सच

सच मिठा होता गर तो-हलाहल तक पी जाता।खारे शब्द सारे मगर-समन्दर में बहा आता।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



सच - दो लफ़्जों की कहानी

सच को कड़वा ही रहने दो दोस्तो.गर वो मीठा होता तो तिजारत ही बन जाता.शिल्पा रोंघे



चाटुकारिता

ना कोई फ़ीस लगती है ना कोईसिफारिश लगती है.चाटुकारिता की शिक्षा बिल्कुल मुफ़्त में मिलती है.शिल्पा रोंघे



गुरूर

गुरूर



सोशल प्राणी का सच

खुश है कुछ लोगइंस्टाग्राम, फ़ेसबुक, और ट्विटरपर अपनी फ़ैन फॉलोइंग को गिनकर.अपनी निज़ी जिंदगी को सार्वजनिककर.मगर भूल जाते है इस वर्चुअल दुनियामें खोकर उस पड़ोस को जो सबसेपहले पूछते है उनका हाल चाल.वो स्कूल कॉलेज और दफ़्तर केदोस्त जो बिना बताएं ही जान लेते हैदिल की बात.उंगल



काश

काश कोई आईना ऐसा भी होता.क्या मंजूर है दुनिया बनाने वाले को,पहले से ही बता देता, दिल की उलझन को चुटकियों में ही सुलझा देता.शिल्पा रोंघे



सुतहीन करो इस धरती को

सुतहीन करो इस धरती को.. दग्ध देह, धर्षित शरीर,जलता चमड़ा, वह मूक चीख,मानव कितना कायर है रे !पुरुषत्व, नपुंसक का प्रतीक..जो पुरुष नृशंस हुआ कामीअब शब्द नहीं उसका निदान,अब तर्क-वितर्क नहीं कोईहे भीड़ ! हरो सत्वर वो प्राण...अब नष्ट करो वह पापात्माजो मानव को ना पहचाने,अधिका



'कविता' का जीवन..

कवि, कभी नहीं चाहता कोई देखे, उसकी कविता के प्रसव काल को, प्रसव की इस अप्रतिम वेदना को मैं स्वयं में संकुचित करना चाहता हूँ.। घुटनों के माध्यम से उठती अपनी तनया को आलिंगन कर, भम्रण-गीतों के माध्यम से साहित्यगत इहलोक में प्रख्यात कराना चाहता हूँ



अब नारी सम्मान की बात कहां करे ?

क्या अब नारी सिर्फ देव लोक में हीसम्मानित रह गई है ?मां की कोख में होतब भ्रूणहत्या की बात सोचकर सहम जाती है.गर दुनिया में आने का सौभाग्य पा जाए तोतब अस्मत को लेकर जाती है सहम.चढ़ती है डोली तबदहेज जैसे दानव को देखकर जाती है सहम.दुनिया मे



कलम की कहानी

कलम की कहानीडॉ. कवि कुमार निर्मल



सुधार की कैसी चाह ?

है जुटे हुए कुछ लोगसुधार में.है जुटे कुछ लोग आधुनिकताकी दुहाई देकर पंरपराओं कोप्राचीन बताने में.तो कुछ पंरपराओं की आड़ लेकरबदलाव को ठुकराने में.है जुटे हुए कुछ लोगअपनी ही बात सही मनवाने में.उनकी इच्छाओं का नहीं कोईअंत, सिर्फ इसलिए जुटे है व



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