मोरे पिया की चिट्ठी आई है

हट री सखी, न कुछ बोल अभी, सुन तो सही वह टेर भली,कर जोड़ तोसे विनती करूँ, तोहे तनिक देर की मनाही है,तू ठहर यहीं, कहीं जा नहीं, झटपट फिर मैं आ रही यहीं,न चली जाए वह डाक कहीं, मोरे पिया की चिट्ठी आई है।चिठिया पाते ही अपने सजन की, उसे हृदय से लगाऊँगी,धक-धक करेगो जियरा ऐसे



कृष्ण सुदामा मिलन

आरोहण- अवरोहण अति दूभर,जल-थल-नभ है ओत-प्रोत,समय की यह विहंगम,दहकती ज्वाला हैअंध- कूप सेखींचनिकालोहे प्रभु शीध्र,अकिंचन मित्र आया है!कृष्ण! तेरा बालसखा आया हैधटा-टोप अंधेरा, सन्नाटा छाया हैअन्धकार चहुदिस, मन में तम् छाया हैगोधुली बेला की रुन- झुन रुन- झुन,मनोहर रंगोली, दीपों की माला हैदीर्ध रात्रि का



कई राज ऐसे कई जख्म ऐसे

कई राज ऐसे कई जख्म ऐसे जीवन की एक कहानी प्रकाशित न हो जैसे कई दर्द ऐसे कई ख्वाब ऐसे अपने ही उजाड़े हो एक बाग जैसे कई भोर पर एक रात भाड़ी है ऐसे प्रियतम रात गुजारे गैरों की बाँहों में जैसे सारा जहाँ मुझको ढूँढे ,हम तुमको ढूँढे ऐसे कृष्णा को ढूँढे विकल राधा जै



सावन आएगा झूम के

☁🌧️☁🌧️⛈️🌧️☁️⛈️☁️☆☆☆★12/07/202★☆☆☆🌧️सावन आएगा झूम के🌨️🌧️⛈️ सावन झूम के आया ⛈️🌧️⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡भादो भी मन की तिश्नगी मिटाएगा।नयन मटक्का करती चपला बाला काझूला ऊँची-ऊँची पेंगें अब लगाएगा।।युवाओं का चंचल मन यहाँ- वहाँ लखजाल फेंक डोर खींच पास ले आएगा।बरसाने का कान्हा प्यारा हर बार कुँज-गलियन में रास र



तुम मिलना मुझे

★☆तुम मिलना मुझे☆★ ★☆★☆★☆★☆★☆★आँखों में जब भी डूबना चाहाझट पलकें झुका ली आपनेछूना लबों को जब भी चाहाहाथ आगे कर दिया आपनेसरगोशी कर रुझाना चाहाअनसुना कर दिया आपनेगुफ़्तगू की ख़्वाहिश जगी पुरजोरतन्हा



पावस

पावस की सुषमा है छाई ||सजे कसुम्भी साड़ी सर पर, इन्द्रधनुष पर शर साधे थिरक रही है घटा साँवरी बिजली की पायल बाँधे |घन का मन्द्र मृदंग गरजता, रिमझिम रिमझिम की शहनाई ||पूरा सुनने के लिए क्लिककरें...https://youtu.be/zRVx57amQzs



शाश्वत थकन - दिनेश डाक्टर

क्यों रहता हैबिना बात व्यथितऔर मानता हैखुद को अभिशप्त- बाधितसुख गर सुख दे पातेतो तू सही में सुखी होतापर यहाँ तो मूक वेदना की धार बहती है अनवरत निरन्तर तेरे भाल पर पता नही अंदर से बाहर को या बाहर से अंदर कोक्षरित देह क्षरित मनदिनोंदिन बुढाता तन चल शून्य होया खो जा शून्



धरा कुपित

💮🌍🌎🌎धरा विचलित🌏🌎🌍💮धरती माँ की पीड़ा- अकथनीय- अतिरेक,दिवनिशि धरती माँ रे! अश्रुपूरित रहती है,मन हुआ क्लांत - म्लान - अतिविक्षिप्त है।व्यथा-वेदना सर्प फणदंश सम- असह्य है।।जागृति की एषणा प्रचण्ड- अति तीव्र है।शंख-प्रत्यंचा सुषुप्त- रणभूमि रिक्त है।।पौरुषत्व व्यस्त स्वप्नलोक में-चिर निंद्रा में



शिवभक्त

शिवत्वचित्त कभी शुष्क नहीं होशिवत्व हेतु उद्यत सब होआप्लावन हेतु जल नहींपूर्ण समर्पण भाव प्रचण्डशिव जल तत्व- चंद्रधारी-जल-दुग्ध एवं विल्वपत्र नहींनवचक्रों का जागरण चाहिएछाले नहीं पड़े पैरों में भक्त के,तर्पण, अर्पण एवं भाव समर्पणप्रसन्न हों शिव, मन उनका दर्पणनहीं अन्य कोई वरदान चाहिए☆डॉ. कवि कुमार नि



गुरु वन्दना

मेरे समस्त स्नेही पाठकवृन्द को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं --- तुम कृपासिन्धु विशाल , गुरुवर ! मैं अज्ञानी , मूढ़ , वाचाल गुरूवर ! पाकर आत्मज्ञान बिसराया .छल गयी मुझको जग की माया ;मिथ्यासक्ति में डूब -डूब हुआ अंतर्मन बेहाल , गुरुवर ! तुम्हारी कृपा का अवलंबन , पाया अ



मेरे जनक तुम्हारी स्मृति

मित्रों, आजअपने जन्मदिन के अवसर पर अत्यन्त स्नेहशील और पूरी तरह से केयर करने वाले पति डॉ.दिनेश शर्मा, प्यारी बिटिया स्वस्ति श्री और उसके पति जीत के साथ साथ ढेर सारेमित्रों ने भी हार्दिक शुभकामनाएँ दीं | सभी का बहुत बहुत धन्यवाद | पर इतने लोगोंका प्यार और साथ मिलने के बाद भी न जाने क्यों पिताजी का अभ



इन्द्रधनुष ऐसा लगता है

रात दिन चौबीस घंटे बरखा रानी अपनी सखी दमयन्तीदेवी की स्वर्णिम पायल झंकारती सखा मेघराज के मृदंग की थाप पर रिमझिम का गानसुनाती मस्त पवन के साथ मादक नृत्य दिखाती हो – लेकिन इसी बीच शाम को उनकी सखी धवलधूप इन्द्रधनुष का बाण चढ़ाए कुछ पलों के लिए उपस्थित हो जाएँ – और अपनी सखी बरखासे मिलकर वापस लौट जाएँ बरख



कहानी कागज की

📖 कहानी कागज की 📖📰📰📰📰📰📰📰📰रद्दी बही - मैगजीन - अखबारों को कूट - काटबनी 'लुगदी' से चमक- दमक उभर मैं आता हूँचाहने वालों के रंग में सहज हीं रंग जाता हूँ'उकेरी लकिरों' से कवियों का मन पढ़ पाता हूँशास्त्र कहें या पुस्तक,पुस्तकालयों में सज जाता हूँ'भोज पत्र' अब दुर्लभ,मैं हीं सबका मन बहलाता हूँन



इस बिछड़न हम कोई गीत लिख दे

इस बिछडन हम कोई गीत लिख दे या लिख दे हम अपनी दुःख भरी कहानी दिन बीते नहीं रतियन कटे नहीं एक अखियन से दूजे अखियन में बहे पानी भूल भुलाने को दिल को बहलाने कोयहाँ कितने खिलौने है दिल को हरसाने को पर तोहरे बिना न जियरा हमरा लागीइन पलकों पर अब कोई ख्वाब नहीं



चीन मरेगा तूं अपने मरण

चीन तूं मरेगा अपनी मरण★★☆★★☆★★☆★★☆★★ खुदा का वज़ूद तुम सरयाम नकारते हो!ज़हर इज़ाद कर सबको तुम मारते हो!!हवस इतनी की पैसा अब उछालते हो!दोज़ख़ की राह पे अपनों को डालते हो!!तुम्हारा मुक़ाम जा तुझे आज पुकारता है!दुनिया का हर इंसान तुझे ललकारता है!!नाम तेरा जेहादियों के साथ मिट जाएगा!हर सख़्स कहर बन तुझे निग



चीन तूं मरेगा अपनी मरण

चीन तूं मरेगा अपनी मरण★★☆★★☆★★☆★★☆★★ खुदा का वज़ूद तुम सरयाम नकारते हो!ज़हर इज़ाद कर सबको तुम मारते हो!!हवस इतनी की पैसा अब उछालते हो!दोज़ख़ की राह पे अपनों को डालते हो!!तुम्हारा मुक़ाम जा तुझे आज पुकारता है!दुनिया का हर इंसान तुझे ललकारता है!!नाम तेरा जेहादियों के साथ मिट जाएगा!हर सख़्स कहर बन तुझे निग



राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस

💐💐राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस💐💐भारत का डॉक्टर हार रहा-हुआ हताशकवि अश्रु बहा थकित-हो रहा निराश''कोभिड'' फटेहाल देख डॉक्टर कोआगोश में समेट कहीं छुप जाता हैघर में बने 'मास्क' पहन क्या (?) कोईकोभिड संक्रमण से क्या बच पाता हैपैदल चल कर आखीर कैसे डॉक्टर५लाख पार खाने वाले को-मार भगा पाएगापहुँच रहा आँकड़



माँ का आँचल

जीवन मेंअनगिनती पल ऐसे आते हैं जब माता पिता की याद अनायास ही मुस्कुराने को विवश कर देतीहै | ऐसा ही कुछ कभी कभी हमारे साथ भी होता है | माँ क्या होती है – इसके लिए तोवास्तव में शब्द ही नहीं मिल पाते | माँ की जब याद आती है तो बस इतना ही मन करताहै: माँ तेरी गोदीमें सर रख सो जाऊँ मैं पल भर को, तो लोरी तू



मिथिला

मिश्री जैसी मधुर है हमारी बोली हम प्रेमी पान मखान और आम के भगवती भी जहाँ अवतरित हुईं हम वासी हैं उस मिथिला धाम के संतानों को जगाने मिथिला की माएँ सूर्योदय से पूर्व गाती हैं प्रभाती सुनाकर कहानियाँ ज्ञानवर्धक मिथिला की दादी बच्चों को सुलाती प्रतिभा जन्म लेती है यहाँ पर कला और सौंदर्य का संसार है दिखत



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