शहीदों के प्रति

शहीदों के प्रतिशहीदों की कुर्बानी,हर साल याद कर लेते हैं हम।शहादत का कलाम पढ़,मंचों पे वाह-वाही सुनते हैं हम।।जंजीरों के रिसते धाव,नजरअंदाज करते हैं हम।जश्न आजादी का मनाते-हर बार सँवरते-सजते हैं हम।।बेेबस- लाचार- गरीब कोनसिहत-दिलासा बेहिसाब देते हैं हम।हाय-तौबा कर चिल्लाते तोसलाखों के पीछे किए जाते



इंद्रधनुष और स्वप्न विज्ञान

🌈🌈🌈इंद्रधनुष एवं स्‍वप्‍न विज्ञान🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈लता-गुल्म-पुष्प वन्यजीवअगर दिख जाये।हमारी मन:स्थितिभावी सु:ख-दु:ख बतायें।इंद्रधनुष जीवन में सुख-समृद्धि के संकेत देती है।ये स्वप्न व्‍यक्ति की प्रतिष्ठाप्रसिद्धि में वृद्धिकरक है। नौकरी-व्‍यवसाय में सफलता काप्रतीक माना जाता है।न‍िवेश कर



मुठ्ठी भर रौशनी

मुठ्ठी भर रौशनीबंगाल प्रवास (१९९१-'०४) में एकमनभावन नृत्य नाटिका देखा १९९४ ई.मकरसंक्रांति (कपिलमुनि गुहा, झालिदा)के दिन।दो पंक्तियाँ याद हैं-सबारे कोरी आह्वान,सबाइ आमार प्राणचाँद सूर्य की रौशनी से चमकता है, हम हमारी यह दुनिया चमकती है, सूर्य भी किसी अन्य ग्रह नक्षत्रकी रौशनी से हीं चमकता है, उसकी अप



प्रभुकृपा कवि हूँ

प्रभुकृपा कवि हूँउभयहस्‍तकुशल, सव्यसाची हूँ मैं,प्रभुकृपा हूँ एक अकिंचन कवि।कटु हो या मृदु भाव- लकिरेंउकेर लिखता सत्य कवि।हिन्दू हिन्दुस्तान तुम्हारा है१९५७ में लिखा यह कवि। संविधान कहता देशद्रोही-क्रांति दूत बना था कवि।नेता जाते लुकछुपमंदीर-मस्जिद-चर्च सभी।ईद में गले मिल सेवई खाने जाता म कवि।होली-द



जेठ की चिलचिलाती धूप

कुछ देर से ही सही, आषाढ़ की बारिश आरम्भ तो होगई है – आषाढ़ – जो अभी और दस बारह दिनों में समाप्त हो जाएगा और श्रावण माह काआरम्भ हो जाएगा झमाझम बारिश के साथ... पेड़ पौधों से झरती बरखा की बूँदें सुरीलाराग छेड़ती तन मन को गुदगुदाने लगेंगी... अभी तक तो जब चिलचिलाती धूप ने सबको बेहालकिया हुआ था तब हर कोई आषाढ़



तपस्वी समाधि तोड़ो

तपस्वी समाधि तोड़ोओ' मूक तपस्वी ध्यान किसका? नित करते हो।नवचक्रों का शोधन कर 'मंत्राधात्' कर थकते हो।वृत्तियों पर नियंत्रण कर समाधिस्थ हो जाते हो।सिद्धियों के स्वामि बन शक्तिसंपात तक करते हो।व्यर्थ सारा तेरा यह अध्यात्मिक महाप्रपंच,अगर जग का हित तुम नहीं कर थकते हो।सुवासित पुष्प चुन उद्यान से माला नि



चैनल ही बदल दीजिए

जी लीजिये अपनी जिंदगी न किसी की परवाह कीजिएउसूल है जिंदगी का एक हाथ लीजिए एक हाथ दीजिए सनसनी खबर सी चल रही हो गर जिंदगी लेकर उसूलों का रिमोट चैनल ही बदल लीजिएठीक है तुम जीत गए हम हार मान गएजानते नहीं थे ज्यादा तुम्हें पर अब तो पहचान गएन अब हमें इस तरह सार्वजनिक ताना दीजिएलेकर उसूलों का रिमोट चैनल ही



दाग

बादल का एक टुकड़ा तोड़ा मैने और माटी की कोख़ में दबा दिया एक उम्र से हर उमर तक इंतज़ार करती रही यह सोचती रही कि एक रोज़ बादल फटेगाऔर माटी के कोख से एक दरख्त उगेगालेकिन जो हुआ वह मेरी कल्पना में कभी घटित नहीं हुआ थाएक सुबह माटी की



जब से घर से दूर रहने लगें है

जब से घर से दूर अकेले रहने लगें है मुश्किलों को भी हँसकर सहने लगें हैखुद से ही ढूंढ़ लेते अब तो जवाब हम सवाल भी कुछ अहमियत खोने लगें है कोई मनाता ही नहीं अब हमें खाने को न ही आवाज़ लगाता सुबह जगाने को खुद से ही खुद को सुला देते है रात में खुद से ही खुद को सुबह जगाने लगें है एक मज़बूत सा ताला इंतज़ार में



नदी मेरी प्यारी सखी

नदी मेरी प्यारीसखीघूम रही थी नदी किनारे / पथरीले पथ परसाथ साथ अपनी प्यारी सखी के...नीचे देखा / नदी में तैर गया मेरा चेहरा /अनायास हीमन हुआ प्रफुल्लित देखकर... https://youtu.be/LmbiQxSJcagहर दिशा हो रही थी रक्ताभ / भोर की अरुणिमकिरणों से नदी ले आई थी नीचे अम्बर को / बाँधकर अपनेमोहजाल में मानों बना रह



अविराम युद्ध

७४ साल व्यतीत हुए- कहते परतंत्र नहीं हैंस्वतंत्रता महोत्सव मनाते पर स्वतंत्र कहाँ हैं🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳राजनीतिक आजादी मानते हमने पाई हैआर्थिक स्वतंत्रता लाने की सपथ खाई है🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳☆★★☆☆★★☆☆★★☆☆★★☆अब हम सब भारत के वासी जाग चुके हैंकोरोना ऐ



योग और अध्यात्म

योग और अध्यात्मधारण करना है धर्म- शास्त्र यह बतलाताभगवत् धर्म है श्रेष्ठ- योग मार्ग पर ले जाताविस्तार- रस- सेवा- तद्स्थिति हैं धर्मांशधर्म अनुशीलन हीं अध्यात्मवाद दिव्यांशतद्स्थिति प्रतिसंचर धाराभवसागर पार है ले जाताजीवात्मा परमात्मा मिलन-मुक्ति मोक्ष मानव पातामहामिलन का योगीअभ्यास नियम से ध्यान में



वृत्तियों से मुक्ति

🕸️🕸️🕸️वृत्तियों से मुक्ति🕸️🕸️🕸️मानव के अंदर पनपता पाप,अमन चैन मानव समाज से जाता है।जीवन बालक का हीं अच्छा,छल, कपट, द्वेष भावना से मुक्त रहता है।बाल सुलभ मन- दिल का सच्चा,तृष्णा, दंभ और लालच से दूर रहता है।तरुणाई संग जुटता चिट्ठा कच्चा,घृणा, दुश्मनी एवं प्रतिशोध सर चढ़ता है।मानव विकारयुक्त हो पश



चराग़ जले

चराग़ जलेएक पीली शाम नईआज चराग़ जलाएगी।बुझ जाएगा वो मगरसुहानी भोर तो आएगी।क़ायानात दहल जाती है,फ़कीरों के अश्क देख कर।ख़ुदा भी पिघल जाता है,रहमत का करिश्मा खेल कर।नेह का करिश्मा ओ' जलवा,देखा है जिस दीवाने ने।हैवान की क्या? वक़त, मिटा के दिखा-तूफ़ान झेले बहुतनेह करने वालों ने।गुनाह कर दोज़ख का शहर,ग़रचे म



हर घर में खटते बच्चे

■★हर घर में बच्चे खटते★■कुटीर-उद्योग के नाँवे,गाँव-शहर में बच्चें खटते यहाँ।बड़े-बुड़ों से अधिक काम करते,छुटभैये बच्चे यहाँ।।बाल अपराध न्यायाधीशमौज-मस्ती करते हैं यहाँ।श्रम मंत्रि की कोठी परनाबालिक बच्चे खटते यहाँ।।बच्चे बंधुआ मजदूर बनदिन-रात काम करते यहाँ।ठकुराईन स्लेट की जगह-जूठे बर्तन थमाती यहाँ।।



शर्मनाक! क्यों सुरक्षित नहीं बेटियां ??

शर्मनाक! क्यों सुरक्षित नहीं बेटियां ??मूर्ख! पत्थर की मूरत की रोज उतारते हो आरती पर देश में अपनी बेटी की हालत देख रो रही माँ भारती!!रोज कोई न कोई देवी स्वरूपा जंग जिंदगी की हारती...द्रौपदी की खिंच रही है अब भी साड़ी वो कृष्ण को पुकारती.



कुछ तो कहती हैं आंखे..

देखती, समझती, परखती और खामोश होने पर बहुत कुछ कहती हैं ये आंखेलेकिन जब बर्दाश्त के बाहर होता है दुख तो कभी-कभी जी भर के सैलाब सा बहती हैं ये आंखे....हर किसी को कुछ बताने, जताने को उत्सुक रहती हैं ये आंखे..इंतेजार में किसी की हर रात सुबह देखने को बन्द होती हैं ये आंखेहर किसी को सब कह देने का मौका भी



पर्यावरण

🌱🌱पर्यावरण पर एक रचना🌱🌱🌲🌳🌴☘️🌿🍃🌿☘️🌴🌳🌲ब्रह्म पुष्प मानिंद हर मानवसर्वदा खिला रहे।कटहली चंपा जैसा महके-हरकोई मस्त रहे।।काँटों से बच हट हरपलअग्रसारित होता रहे।सतायु बन हरकोई नेह कीडगर पर चलता रहे।।कमल पंक में खिलता-इंसान हर बाधा से लड़ता रहे।गुलाब की पँखुड़ियाँ जैसाइंसान - इत्र बन गमकाता रहे।



अलमारी में रखे पुराने खत

"कहानी पुराने खतों की"अलमारी में रखे पुराने खत कीबात आज सुधिजनों को बतानी थी।कुछ लिखते खत में मन बाहर की,मिलने पर बातें होती जुवान थी।।अब है चैटिंग की सुविधा अनंत,तब 'श्याही' होती भरवानी थी।अनलिमिटेड डाटा है आज,तब कागज पर कलम चलानी थी।।खत की बात निराली,लिख कर पत्र-मंजुषा में डाली जाती थी।कोने में स



गीत

🎶🎶🎶गीत🎶 🎶🎶गीत आज एक मनहर लिखा जाये।सस्वर साज बजा के सब मिल गायें।।राधाभाव में खो हम धुल मिल जायें।आओ मधुबन में रास रचाया जाये।।गीत आज एक मनहर लिखा जाये-१वृंदावन की गलियों में विचरा जाये।मन भर माखन- दधि खाया जाये।।गोपियन के मन की भी सुना जाये।दुख-सुख मिलजुल बाँटा जाये।।गीत आज एक मनहर लिखा जाये



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