कविता



आधुनिकरण

आधुनिकरण (Modernisation)स्नान घर के दरवाजे,अब,स्विमिंगपूल पर जाकर ,खुलते हैं !मारे शर्म के घुघट ,उतर गई है ------स्विमिंग ड्रेस के सामने !अब उन्हें इतना पर्याप्त ,नहीं लगा !!!स्नान के लिए अब पहनना ..कुछ भी जरूरी नहीं ,मीटिंग में .मांग रखा गया !!शायद वे ठीक हैं !कपडे के नी



गोप और राधा भाव

बाल गीत कान्हा का आज मैं गाऊँ। प्रियतम् गोप उनका बन मैं जाऊँ।।🙏🙏🌸🌸🌹🌸🌸🙏🙏🙏 🙏 "नंद गोपाला" 🙏 🙏हर कवि कृष्ण भक्त होता है'नंद' वही जो आनंद देता हैनंदन तो आनंद पाता - देता है'गोप् सदा हीं आनंद देता हैगोपालक कृष्ण कहलाते हैसूर के कृष्ण ग्वाले कहलाते हैंरागानूगा भक्ति कही गई हैप्रथम चरण रागा



मुक्तक

मुक्तक भाग्य में अपने क्या बस काली रात है , नयन ने पाई आंसू की सौगात है |बस ऊंचे पेड़ों तक आता उजियारा , गाँव में अपने उगता अजब प्रभात है



माँ मैं फिर

*माँ मैं फिर**माँ मैं फिर जीना चाहता हूँ, तुम्हारा प्यारा बच्चा बनकर**माँ मैं फिर सोना चाहता हूँ, तुम्हारी लोरी सुनकर,* *माँ मैं फिर दुनिया की तपिश का सामना करना चाहता हूँ, तुम्हारे आँचल की छाया पाकर**माँ मैं फिर अपनी सारी चिंताएँ भूल जाना चाहता हूँ, तुम्हारी गोद में सिर रखकर,* *माँ मैं फिर अपनी भूख



धैर्य की परीक्षा

धैर्य की परीक्षा संत एकनाथ को अपने उत्तराधिकारी की तलाश थी वे किसी योग्य शिष्य को यह दायित्व सौंपना चाहते थे। उन्होने शिष्यों की परीक्षा लेनी चाही ।एक दिन उन्होंने सभी शिष्यों को बुलाया ओर एक दीवार बनाने का निर्देश दिया ।शिष्य इस काम में जुट गए ।दीवार बन कर तैयार भी हो गई ।लेकिन तभी एकनाथ ने उसे तो



कमलपत्र पर गिरी हुई जल की कुछ बूँदें

कमलपत्र पर गिरी हुई जल की कुछ बूँदें...गर्मी के बाद आरम्भिक वर्षा में जल की अमृत बूँदें धरा सोख लेती है... परिणामतःचारों ओर हरीतिमा फैल जाती है... लेकिन धरा को देखिये, मेघों से अमृतजल का दान लेती है... साराउपवन हरा भरा हो जाता है... पर पतझड़ के आते ही धरा उसकी ओर झुक जाती है और उपवन कीहरियाली सूख जात



यु ही हॅसी से

यह अनमोल पल है संसार तो एक छल है सब आज है कुछ नहीं कल है जीवन तो कर्मो का फल है || साथ बितलो खुशी से जिससे प्रेम हैं उसी सेन आएगा ये पल यु ही हॅसी से .....



नाकामी



हारा नही हु मैं



चल रे मन एक बार तो साथ चल

चल रे मन एक बार तो साथ चल बहुत बदला सा लगता है तु बहुत सहमा सा लगता है तु मेरा होकर भी क्यू पराये सा लगता है तु कल पर मत छोड़ तु आज चल चल रे मन एक बार तो साथ चल बहुत भागा तु मुझे छोड़कर सीमाओ की सारी दीवारे तोड़कर अब न भाग मेरे साथ रह कहता हु तुझसे म



कोई साथ ना दे मेरा



मैं बदल जाऊंगा



कृष्ण सुदामा मिलन

आरोहण- अवरोहण अति दूभर,जल-थल-नभ है ओत-प्रोत,समय की यह विहंगम,दहकती ज्वाला हैअंध- कूप सेखींचनिकालोहे प्रभु शीध्र,अकिंचन मित्र आया है!कृष्ण! तेरा बालसखा आया हैधटा-टोप अंधेरा, सन्नाटा छाया हैअन्धकार चहुदिस, मन में तम् छाया हैगोधुली बेला की रुन- झुन रुन- झुन,मनोहर रंगोली, दीपों की माला हैदीर्ध रात्रि का



कई राज ऐसे कई जख्म ऐसे

कई राज ऐसे कई जख्म ऐसे जीवन की एक कहानी प्रकाशित न हो जैसे कई दर्द ऐसे कई ख्वाब ऐसे अपने ही उजाड़े हो एक बाग जैसे कई भोर पर एक रात भाड़ी है ऐसे प्रियतम रात गुजारे गैरों की बाँहों में जैसे सारा जहाँ मुझको ढूँढे ,हम तुमको ढूँढे ऐसे कृष्णा को ढूँढे विकल राधा जै



सावन आएगा झूम के

☁🌧️☁🌧️⛈️🌧️☁️⛈️☁️☆☆☆★12/07/202★☆☆☆🌧️सावन आएगा झूम के🌨️🌧️⛈️ सावन झूम के आया ⛈️🌧️⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡भादो भी मन की तिश्नगी मिटाएगा।नयन मटक्का करती चपला बाला काझूला ऊँची-ऊँची पेंगें अब लगाएगा।।युवाओं का चंचल मन यहाँ- वहाँ लखजाल फेंक डोर खींच पास ले आएगा।बरसाने का कान्हा प्यारा हर बार कुँज-गलियन में रास र



तुम मिलना मुझे

★☆तुम मिलना मुझे☆★ ★☆★☆★☆★☆★☆★आँखों में जब भी डूबना चाहाझट पलकें झुका ली आपनेछूना लबों को जब भी चाहाहाथ आगे कर दिया आपनेसरगोशी कर रुझाना चाहाअनसुना कर दिया आपनेगुफ़्तगू की ख़्वाहिश जगी पुरजोरतन्हा



पावस

पावस की सुषमा है छाई ||सजे कसुम्भी साड़ी सर पर, इन्द्रधनुष पर शर साधे थिरक रही है घटा साँवरी बिजली की पायल बाँधे |घन का मन्द्र मृदंग गरजता, रिमझिम रिमझिम की शहनाई ||पूरा सुनने के लिए क्लिककरें...https://youtu.be/zRVx57amQzs



शाश्वत थकन - दिनेश डाक्टर

क्यों रहता हैबिना बात व्यथितऔर मानता हैखुद को अभिशप्त- बाधितसुख गर सुख दे पातेतो तू सही में सुखी होतापर यहाँ तो मूक वेदना की धार बहती है अनवरत निरन्तर तेरे भाल पर पता नही अंदर से बाहर को या बाहर से अंदर कोक्षरित देह क्षरित मनदिनोंदिन बुढाता तन चल शून्य होया खो जा शून्



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