कविता

आतंक

कविता(मौलिक)आतंकविजय कुमार तिवारीचलो, मुझे उस मोड़ तक छोड़ दो,सांझ होने को है,अंधियारे जाया नहीं जायेगा। न हो तो बीच वाले मन्दिर से लौट आना,या उस मस्जिद से,जहाँ सड़क पार चर्च है।अस्पताल तक तो पहुँचा ही देनाचला जाऊँगा उससे आगे। ऐसा नहीं कि हिन्दुओं से डरता हूँ,मुसलमानों से भी नहीं डरता,सिखों या किसी



फरेब

अब तुझको मेरे साथ की कोई ना आस हैतेरा काम तो निकल गया शक्ति भी पास हैतेरे आँसुओं के फेर में मैं फिर से लुट गया इक ये अदा तो हुस्न की सदियों से खास है उल्फ़त की राह में मिला मुझको फ़कत फरेबइसकी डगर न जाने क्यों आती ना रास हैमुझको सफ़र में ना



दूर वो सहर गई

बस तड़प तड़प में ही ये ज़िंदगी गुज़र गईदेने का वादा करा किस्मत मगर मुकर गईएक नशे में रह रहा था मैं तो पाल के स्वप्न असलियत से पर मेरी सारी चढ़ी उतर गईकोशिशें कितनी करीं हार तो ना बन सकामोतियों की माल हरदम टूट के बिखर गईज़िन्दगी की शाम में अब उम्मीदें क्या करेंकलियाँ खिलाती जो यहाँ दूर वो सहर



मुहब्ब्त की प्यास

मिलन की चाह की देखो फ़कत बातें वो करता हैकभी कोशिश करे ना कुछ पास आने से डरता हैकोई सच्ची मुहब्बत अब न उसके पास है देखो मुझे भी इल्म है इसका मैंने कितनों को बरता हैमन की बगिया के सारे फूल अब मुरझा गए मेरीना वो आँखों में आँखें डाल अब बाँहों में भरता है वार मौसम भी करता है दोष उसका नहीं केवलहवाएं गर्म



मजबूरियां

बड़े नज़दीक जीवन में अगर कोई भी आता हैसामने वो अगर आए तो मन थोड़ा लजाता हैसांस जोरों से चलती है नज़र उठती नहीं ऊपरहाल कुछ और होता है ना जो चेहरा दिखाता हैआज वो दूर है मुझसे मैं भी मशगूल हूँ खुद में मगर गुजरे हुए पल तो ये मनवा ना भूलाता हैमेरी मजबूरियां समझो और इस सच को पहचानोविछोह तुझसे मुझे अब भी अके



दर्द का बंधन

अब रिश्तों की बात न कर हर इक रिश्ता झूटा हैप्रेम का धागा सब रिश्तों में देखो लगभग टूटा है दर्द का बंधन ढूंढे से भी ना मिलता है अब जग में अपनों ने भी भेष बदलकर मुझको जमकर लूटा हैएक ममता ही सच्ची थी बाकी तो बस धोखा थाऐसी माँ का साथ भी तो आखिर में देखो छूटा हैखूब बजाकर देख लिया आवाज़



चाँद हंसिया रे !

चाँद हंसिया रे ! सुन जरा !ये कैसी लगन जगाई तूने ? कब के जिसे भूले बैठे थे -फिर उसकी याद दिलाई तूने !!गगन में अकेला बेबस सा - तारों से बतियाता तू नीरवता के सागर में - पल - पल गोते खाता तू ;कौन खोट करनी में आया ? \ये बात न



स्त्री हठ कि धनी हो

छोड़ दो जिद अपनी बन जाएगी बात अपनी मानता हु कि तुम स्त्री हठ कि धनी हो मगर पत्थर कि तो नहीं बनी हो ममता और वात्सल्य तुम्हारे गहने है इनको पहन के हि तो तुम



हिन्दी कविता- हिन्दी प्रसिद्ध कविताएं

हिन्दी साहित्य में कई ऐसे लेखक हुए हैं जिन्होंने वक़्त, जिंदगी , इश्क़ और न जाने कितनों विषयों को अपनी कलम से परिभाषित किया है। इन लेखकों की सोच प्रकाश गति से भी तेज है । आज हम ऐसे ही लेखकों की प्रसिद्ध कविताएं आपके लिए लाए है



कहानी दिवस और निशा की

कहानी दिवस और निशा की हर भोरउषा की किरणों के साथ शुरूहोती है कोई एक नवीन कहानी…हरनवीन दिवस के गर्भ में छिपेहोते हैं न जाने कितने अनोखे रहस्य जोअनावृत होने लगते हैं चढ़ने के साथ दिन के… दिवसआता है अपने पूर्ण उठान पर तबहोता है भान दिवसके अप्रतिम दिव्य सौन्दर्य का… सौन्दर्यऐसा, जोकरता है नृत्य / रविकरो



मन का पंछी

- कफ़स में कैद।मेरे आंगन में, कराहता रहा वो पंछी।हाँ,करता भी क्या?तोड़ डाले थे उसने पंख,उड़ने की चाहत में।सुन पाता हूँ साफ साफ,उसके कलरव में उठते दर्द को।अक्सर महसूस करता हूँ,उसके चीत्कार को अपने भीतर।एक पिंजरा और भी है,तुम्हारी यादों का।उसी के मानिंद कैद है एक पंछी यहां भी।तोड़ लिए हैं उड़ने की चाहत



यादों का पागलखाना

जब भी तेरी वफाओं का वह ज़माना याद आता है,सच कहूं तो तेरी यादों का पागलखाना याद आता है।कसमों की जंजीर जहां पर, वादों से बनी दीवारें हैंझूठ किया है खंज़र से तेरे नाम की उन पर दरारें है।टूट चुका सपनों का बिस्तर, अफ़सोसों की चादर हैतकियों को गीला करती अश्क़ों की जहां फुहारें हैं।जलती शमा में कैद वहां, परवान



ठिठुराती भीषण ठण्ड में

ठिठुराती भीषण ठण्ड में जब प्रकृति नटी ने छिपा लिया हो स्वयं को चमकीली बर्फ की घनी चादर में छाई हो चारों ओर घरों की छत पर और आँगन में खामोशी के साथ “टप टप” बरसती धुँध नहीं दीख पड़ता कि चादर के उस पार दूसरा कौन है और फिर इसी द्विविधा को दूर करने धीरे धीरे मीठी मुस्कान के सूर्यदेव का ऊपरउठाना जो कर दे



पर अब है,इतना वक़्त कहाँ...

पर अब है,इतना वक़्त कहाँ...फिर लौट चलूं मैं,”बचपन” मे,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…खेलूँ फिर से,उस “आँगन” मे,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…क्या दिन थें वो,ख्वाबों जैसे,क्या ठाट थें वो,नवाबों जैसे…फिर लौट चलूं,उस “भोलेपन” मे,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…



बसंत का मौसम

है महका हुआ गुलाब खिला हुआ कंवल है,हर दिल मे है उमंगेहर लब पे ग़ज़ल है,ठंडी-शीतल बहे ब्यार मौसम गया बदल है,हर डाल ओढ़ा नई चादर हर कली गई मचल है,प्रकृति भी हर्षित हुआ जो हुआ बसंत का आगमन है,चूजों ने भरी उड़ान जो गये पर नये निकल है,है हर गाँव



सूर्योदय

सूर्योदयसमस्याएँजीवन का एक अभिन्न अंग जिनसेनहीं है कोई अछूता इस जगत में किन्तुसमस्याओं पर विजय प्राप्त करके जो बढ़ता है आगे नहींरोक सकती उसे फिर कोई बाधा हर सन्ध्याअस्त होता है सूर्य पुनःउदित होने को अगली भोर में जोदिलाता है विश्वास हमें किनहीं है जैसा मेरा उदय और अवसान स्थाई उसी प्रकारनहीं है कोई



वही अपने सारे हैं......!!

चाँद भी वही तारे भी वही..!वही आसमाँ के नज़ारे हैं...!!बस नही तो वो "ज़िंदगी"..!जो "बचपन" मे जिया करते थे...!!वही सडकें वही गलियाँ..!वही मकान सारे हैं.......!!खेत वही खलिहान वही..!बागीचों के वही नज़ारे हैं...!!बस नही तो वो "ज़िंदगी"..!जो "बचपन" मे जिया करते थे...!!#मेरे_अल



नया साल

दोस्तों ये नया साल है भूल जाओ आपने गये काल को । नया सवेरा नयी धूप और नऐ ऊर्जा के साथ नऐ विश्वास का दिया जलायें उस विश्वास के पथ पर चलकर अपने सपनों को साकार बनायें । दोस्तों ये नया साल है भूल जाओ आपने गये काल को । आओ अपने नन्हे हाथों से नऐ भारत की गाथा लिखें जहां युवाओं को रोज़गार मिले और महिलओं का ह



सड़क पर प्रसव

वक़्त का विप्लव सड़क पर प्रसव राजधानी में पथरीला ज़मीर कराहती बेघर नारी झेलती जनवरी की ठण्ड और प्रसव-पीर प्रसवोपराँत जच्चा-बच्चा 18 घँटे तड़पे सड़क पर ज़माने से लड़ने पहुँचाये गये अस्पताल के बिस्तर परहालात प्रतिकूल फिर भी नहीं टूटी साँसेंकरतीं वक़्त से दो-दो हाथ जिजीविषा की फाँसें जब एनजीओ उठाते हैं दीन



विम्ब का ये प्यार

गीत(09/05/1978)विम्ब का ये प्यारविजय कुमार तिवारीकौन दूर से रहा निहार?दिल ने कहा-खोलता हूँ द्वार, विम्ब का ये प्यार। पोखरी से फिसल चले हैं पाँव ये,जिन्दगी की कैसी है ढलाँव ये। आज हाथ केवल है हार,दिल ने कहा-खोलता हूँ द्वार,विम्ब का ये प्यार। धड़कने सिसकाव का सहारा ले,मिट रही बढ़त यहाँ किनारा ले। अदाय



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