कविता



क्या-क्या नहीं करता है पेड़ दिनभर...

दिनकर की धूप पाकर भोजन बनाता है पेड़ दिनभर,लक्ष्यहीन अतरंगित असम्पृक्त को भटकन से उबारता है पेड़ दिनभर। चतुर्दिक फैली ज़हरीली हवा निगलता है पेड़ दिनभर, मुफ़्त मयस्सर प्राणवायु उगलता है पेड़ दिनभर। नीले शून्य में बादलों को दिलभर रिझाता है पेड़ दिनभर, आते-जाते थके-हारे परि



तुम्हारी आँखें--

तुम्हारी आँखें-- (यदि दान करो तो !)किसी ने देखा माधुर्य तुम्हारी आँखों में, कोई बोला झरनों का स्रोत तुम्हारी आँखों में..कोई अपलक निहारता रहा अनंत आकाशतुम्हारी आँखों में,कोई खोजता रहा सम्पूर्ण प्रकाश तुम्हारी आँखों में...कोई बिसरा गया तुम्हारी आँखों में कोई भरमा गया तुम्हारी आँखों में...किसी के लिए



इंद्रधनुष / धनक

एक रोज़ चले आए थे तुम चुपके से ख़्वाब में मेरे मेरे हाथों को थामे हुए दूर फ़लक पर सजे उस धनक के शामियाने तक हमसफ़र बनाया था मुझे सुनोअपनी ज़िन्दगी के सियाह रंग छोड़ आई थी मैं उसी धनक के आख़िरी सिरे पर जो ज़मीन में जज़्ब होने को थे उसी धनक के रंगों से ख़ूबसूरत रंग मेरे दामन में जो तुमने भर दिए थे वो रंगों में



कविता खुशबू का झोंका

कविता खुशबू का झोंका, कविता है रिमझिम सावनकविता है प्रेम की खुशबू, कविता है रण में गर्जनकविता श्वासों की गति है, कविता है दिल की धड़कनहॅंसना रोना मुस्काना, कवितामय सबका जीवनकविता प्रेयसी से मिलन है, कविता अधरों पर चुंबनकविता महकाती सबको, कव



सीढियों पर किस्मत बैठी थी

सीढियों पर किस्मत बैठी थी...ना जाने किसकी प्रतीक्षा कर रहा थी...उससे देख एक पल मैं खुश हुआ..और पास जाकर पूछा..क्या मेरी प्रतीक्षा कर रही हो...उसने बिना कुछ बोले मुहँ फेर लिया..दो तीन बार मैंने और प्रयास किया..पर वो मुझसे कुछ ना बोली...मैं समझ गया ये किसी और के लिए यहाँ बैठी है..इस बार मैंने कोशिश क



जिंदगी सिगरेट-सी

धीमे-धीमे सुलगती,जिंदगी सिगरेट-सी।तनाव से जल रही,हो रही धुआं-धुआं।जिंदगी सिगरेट-सी,दुख की लगी तीली !भभक कर जल उठी,घुलने लगा जहर फिर!सांस-सांस घुट उठी,जिंदगी सिगरेट- सी ।रोग दोस्त बन गए,फिज़ा में जहर मिल गए।ग़म ने जब जकड़ लिया,खाट को पकड़ लिया।मति भ्रष्ट हो चली,जिंदगी सिगरेट- सी।धीमे-धीमे जल उठी,फूंक



मेघा

रात के बाद फिर रात हुई... ना बादल गरजे न बरसात हुई.. बंजर भूमि फिर हताश हुई.. शिकायत करती हुई आसमान को.. संवेग के साथ फिर निराश हुई.. कितनी रात बीत गयी.. पर सुबह ना हुई.. कितनी आस टूट गयी.. पर सुबह ना हुई.. ना जला चूल्हा, ना रोटी बनी.. प्यास भी थक कर चुपचाप हुई.. निराशा के धरातल पर ही थी आशा.. की एक



कारगिल शहीद के माँ कीअंतर्वेदना

कारगिल शहीद के माँ की अंतर्वेदना :-यह कविता एक शहीद के माँ का, टीवी में साक्षात्कार देख कर १९९९ में लिखा था ...२० वर्ष बाद आप के साथ साझा कर रहा हूँ:हुआ होगा धमाका,निकली होंगी चिनगारियाँ बर्फ की चट्टानों पर फिसले होंगे पैर बिंधा होगा शरीर गोलियों की बौछार से ...अभी भ



काव्यों की महान रचनाकार श्री महादेवी वर्मा जी | Mahadevi Verma

काव्य रचनाओं में निपुण महान रचनाकार श्री महादेवी वर्मा जी |Mahadevi Verma:-काव्यों रचनाओं में निपुण महान श्री महादेवी वर्मा जी का जन्म सन् 26 मार्च 1907 को उत्तरप्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद नामक क्षेत्र में हुआ था। वर्मा जी के जन्म के संबंध में सबसे विशेष बात यह थी कि



कविताओं की नक्काशी से

कविताओं की नक्काशी से✒️कर बैठा प्रेम दुबारा मैं, कविताओं की नक्काशी सेचिड़ियों की आहट में लिपटी, फूलों की मधुर उबासी से।संयम से बात बनी किसकी,किसकी नीयत स्वच्छंद हुई?दुनियादारी में डूब मराचर्चा उसकी भी चंद हुई।कौतुक दिखलाने आया है, बस एक मदारी काशी सेचिड़ियों की आहट में लिपटी, फूलों की मधुर उबासी से।ज



एक ग़ज़ल --बेवफाई

एक ग़ज़ल: बेवफाई मैंने भी इक गुनाह, यहाँ आज कर लिया,बाहों में भर के उनको, तुम्हे याद कर लिया..फिर से हुयी है दस्तक, कहीं पर ख़याल की,जाकर के दिल ने दूर से, फिर दर्द भर लिया..माजी की खाहिशें हैं, ये भूलती नहीं,गुज़रा हुआ था वक़्त, गले फिर से मिल लिया...शायद खड़े थे तुम वहां



जेल

शुक्र हैं खुदा का ये रात आ ही गयीथा मुझे इसका सालो से इंतजारहोंगे आप जानने के लिए बेताबकी क्यों था मुझे इसका सालो से इंतज़ारकाट रहा हु सज़ा पिछले तीन सालों सेएक खून के इलज़ाम मेंउस शैतान के खून के इल्ज़ाम मेंजिसका मुझे मरते दम तक कोई अफसोस नहीवो शैतान और कोई नही हैं मेरी माँ का पति जिसे मैं अपना बाप मान



सुनो चाँद !

अब नहीं हो! दुनिया के लिए, तुम तनिक भी अंजाने, चाँद! सब जान गए राज तुम्हारा तुम इतने भी नहीं सुहाने, चाँद! बहुत भरमाया सदियों तुमने , गढ़ी एक झूठी कहानी थी; वो थी तस्वीर एक धुंधली ,नहीं सूत कातती नानी थी; युग - युग से बच्चों के मामा - क्या कभी आये लाड़ जताने?चाँद ! खोज - खबर लेने तु



फिर भी आश्वस्त था

मैं अतिउत्साहित गंतव्य से कुछ ही दूर था, वहां पहुचने की ख़ुशी और जीत की कल्पना में मग्न था, सहस्त्र योजनाए और अनगिनत इच्छाओ की एक लम्बी सूची का निर्माण कर चुका था, सीमित गति और असीमित आकांक्षाओं के साथ निरंतर चल रहा था, इतने में समय आया किन्तु उसने गलत समय बताया, बंद हो गया अचानक सब कुछ जो कुछ समय पह



हे आकाश

मैं भी छूना चाहता हूँ उस नीले आकाश को.… जो मुझे ऊपर से देख रहा है, अपनी और आकर्षित कर रहा है, मानों मुझे चिढ़ा रहा हो, और मैं यहाँ खड़ा होकर… उसके हर रंग निहार रहा हूँ, ईर्ष्या भाव से नज़रें टिका कर, उसके सारे रंग देख रहा हूँ, अनेक द्वंद मेरे मन में..... कैसे पहुँचु मैं उसके पास एक बार, वो भी इठला कर,



याद

आज चांदनी दरीचे से छनती हुईहलकी सी मेरे चेहरे पर पड़ने लगीमैं अपने कमरे में बैठीदूर से दालान में झाँकने लगीजहाँ मैं तुम्हारे इंतज़ार मेंचाय की दो कप लिए बैठा करती थीआज हवाओं मेंबिलकुल वही आहट थीजैसे तुम अक्सर शाम मेंचुपके से आ करमेरी आँखों को अपने हाथों सेबंद कर दिया करते थेऔर मैं तुम्हारे एहसास सेहर



बाज़ार ए इश्क़ की सैर ...

बाज़ार ए इश्क़ की सैर कर आए वफ़ा ओ बेवफ़ाओं से मिल आए बहुत हुजूम ए साहूकार था वहाँ हर एक इंसां ख़रीदार था वहाँ दिलों के ढ़ेर चंद रुपियों में सरे आम बिक रहे थे ख़ुशी ओ मायूसी का मुज़ाहरा हो रहा था वहाँ कोई अपना दिल ख़ुशी से फ़रोख़्त करता कोई मायूस हो के बेचता कोई कच्ची उम्र वाला कोई अधेड़ उम्र वाला कही नक़द सौदा



मसाले का डब्बा

आज अनायस ही रसोईघर में रखे मसाले के डब्बे पर दृष्टी चली गयीजिसे देख मन में जीवन और मसालों के बीच तुलनात्मक विवेचना स्वतः ही आरम्भ हो गयी.... सर्वप्रथम हल्दी के पीत वर्ण रंग देख मन प्रफुल्लित हुआ जिस तरह एक चुटकी भर हल्दी अपने रंग में रंग देती है उसी समान अपने प्यार और सोहार्द्य से दुसरो को अपने रंग



मातृभाषा एवम विदेशी भाषा

बच्चे की भाषा को माँ औरमाँ की भाषा को बच्चा कब से समझता है ?आपको पता है न ?जन्म से...शायद जन्म से भी पहले से ?..तब से ...जब बच्चा बोल भी नहीं पाता ।किंतु वह समझता है माँ की भाषा माँ समझती है बच्चे की भाषा । वह भाषा कौन सी होती है ?वह भाषा जो भी होती है,बच्चे का माँ से संवाद उसी भाषामें होता है ।



स्वास्थय

ना मीठा खाने के पहले सोचा करते थेना मीठा खाने के बाद....वो बचपन भी क्या बचपन थाना डायबिटिक की चिंता ना कॉलेस्ट्रॉल था...दो समोसे के बाद भीएक प्याज़ की कचोरी खा लेते थे..अब आधे समोसे में भी तेल ज्यादा लगता है...मिठाई भी ऐसी लेते है जिसमे मीठा कम होऔर कम नमक वाली नमकीन ढूंढते रहते है...खूब दौड़ते भागते



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