कविता



मौन के रुप अनेक

एक ही मौन के देखो कितने रूप.कभी ध्यान है,कभी निद्रा है मौन,कभी उपासना है मौन,कभी भोरतो कभी रात का काला सन्नाटा है मौन,ना पूरा "हां" ना पूरा "ना"है मौन.ना पूरा है ना अधूरा हैसचमुच एक रहस्य ही है मौन.शिल्पा रोंघे



मृत्यु

वज्रपात सी घात लगी है..साँसों के इस बंधन को..मृत्यु खड़ी बाँट जोह रही...बेबस तन आलिंगन को..खिले नयन यम दर्श को..अधरों पर बिखरी मुस्कान..लेकर गठरी कर्मों की..तन छोड़ रहा ये पहचान..कुंठित,कुत्सित तन ये..हो जाएगा पल में खाक..गंगा दर्शन को तरसेगा..बंद मटकी में बन राख..हृदय विदिर्ण हो उठेगा..देखकर सब ये हा



ना कोई अपना हुआ

यूं तो दीवाने कई पर ना कोई अपना हुआ सोचते ही रह गए बस पूरा ना सपना हुआ ढूंढते ही रह गए हैं ना खुदा मुझको मिला उम्र गुज़री जाए है बेकार जप जपना हुआ कोई पढता भी नहीं चाहे रहूं मैं सामने बेवजह अखबार में देख लो छपना हुआ अजनबी सा अब वो पेश आ रहा है दोस्तों बेकार ही अपना तो उसके साथ में खपना हुआ सोचते थे



असली लगाव

असली लगाव हो तो रस्ते बन ही जाते हैं मिट्टी से मिल मुरझाए पौधे तन ही जाते हैं सब दूर हमसे हो रहे फिर भी ना सोच क्या हम उनको समझ अपना लगाए मन ही जाते है किसको कहां परवाह कि वो दिल में बसाएगा अब तो अच्छे लगे हैं जो लुटाए धन ही जाते हैं सही क्या है गलत क्या है यहां जो भी बताएंगे सयाने स्वार्थी लोगों मे



उलझनों में

त्तुम्हारे पास जीने के सुनो कितने सहारे हैं मैंने तो उलझनों में बिन तेरे लम्हें गुजारे हैंकोई भी दर नहीं ऐसा जहां पे चैन जा मांगूतेरे आगे तब ही तो हाथ ये दोनों पसारे हैंदर्द सहता रहा हूं मैं दवा मिलती नहीं कोईछुपे शायद इसी में जिंदगी के कुछ इशारे हैंभले ही तुम जमाने के लिए सच से मुकर जाओमेरी धड़कन क



अर्थ.....

सारे अर्थ,निरर्थक हो गए।निकाले जो,तुमने मेरे इरादों के।खेल गया स्वार्थ,अपना खेल पहले ही।लगा दी बोली,भरे बाजार में,मेरे नादान जज्बातों की।बांधे रखी थी अब तक,डोर जो एक विश्वास की,पलभर में ही टूट गई,हर छड़ी वो आस की।खड़े रहे हम मौन,उन वीरान सड़कों पर।लहरा जाते समंदर,इन निर्दोष पलकों पर।समझ लिया होता गर,अर



रश्मि

नैराश्य को भेदती..नवप्रभाती रश्मि..विराम देती.. चिर चिंतन को..खिलाती सरोज आशा केमन सरोवर में..बन उत्साह..करती नव संचार..निराश मन में..करती शांत..उद्वेलित मन को..नवप्रभाती रश्मि..रत्नमणि सी दमकती..बूंद भी शबनमी..पाकर सँग..नवप्रभाती रश्मि का..क्षण भर ही सही..जी लेती हसीं जिंदगी..कली-कली मुस्काती..खिलख



आजादी

💐💐💐💐💐💐💐💐💐चित्तौड़ का राणा प्रताप कहाँ है? झाँसी की लक्ष्मी बाई कहाँ है??क्षत्रपति शिवाजी की तलवार कहाँ है? असली आजादी का जुनून गया कहाँ है?? शहिद दिवस पर श्रद्धांजलि मिल कर देते रहना! 'राजनीतिक आजादी' को झंडा फहराते रहना!!"सहोदर भाई" की प्रीत नहीं जब जानी! भूखे-नंगे की नम आँखें भी न पहचान



फूल का सा मन

तुमको तलाशते रहे तुम ना मिले मुझे हरदम रहेंगे जान लो कुछ तो गिले मुझे सब कुछ लुटा दिया फकत इक बोल पे तेरे मिल जाते काश इसके एवज कुछ तो सिले मुझे इक प्यार तेरा गर यहां मुझको नसीब हो मिट्टी लगेंगे जान लो ये सब किले मुझे है फूल का सा मन मेरा फिर भी उदास हूं मुद्दत हुई है देख लो कितनी खिले मुझे मधुकर ने



तुम भी बदल गए

कैसे दर्द ना हो मुझे तुम भी बदल गए अरमान मेरे कदमों तले सारे कुचल गए यूं तो है भीड़ हर तरफ तुझ सी ना बात है देखा है तुझको जिस घड़ी आशिक मचल गए अब वो कभी ना आएगा मुझसे है कह रहा बिजली गिराओ ना सुनो दिलबर दहल गए अच्छी नहीं ये बात सनम सब कुछ भुला दिया उनकी भी कुछ तो सोच जो करते पहल गए भूलो ना प्यार से



सुरक्षा कवच

बचपन में खेलते, दौड़ते ठोकर लग कर गिर जाने पर भैया का मुझे हाथ पकड़ कर उठाना,भीड़ भरे रास्तों पर, फूल-सा सहेज कर अँगुली पकड़ स्कूल तक ले जाना,और आधी छुट्टी में माँ का दिया खानामिल-बाँट कर खाना, याद आता है। बहुत-बहुत याद आता है। सर्कस और सिनेमा देखते समय हँसना - खिलखिलाना,बे-बात रूठना-मनाना,फिर देर रात त



सर्द का दर्द

काँपती रूहें..शहरी फुटपाथों पर..जूँ तक न रेंगती..सियासत के कानों पर..थरथराता पारा..धड़ धड़ाती ठिठुरन..सर्द हवा के थपेड़े..जूझते रहते..दीन मौन साधकर..दर्द की हद इतनी..कि जाँ तक निकलती..चिथड़े लिपटे तन से..जाने कब व्यथा ये..मिटेगी वतन से..खाने खसोटने में लगा है..हर रसूखदार यहाँ..क्यों मुकर जाता है..हर जिम



शंखनाद्

शंखनाद्शुभदिन आज भी आह्लादित कर जाएगापरम अराध्य का सामिप्य मन पा जाएगाप्रचण्ठ तृष्णा- सानिध्य की एषणा गहराई,सद्गुरु कृपा से सांजुज्य पा यह भक्त तर जाएगामैली चादर मन की धुल, आभा से भर जाएगाडॉ. कवि कुमार निर्मल



कविता

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कविता

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💐💐💐2️⃣0️⃣2️⃣0️⃣💐💐💐

लो बिन कहे मैं चुपके से आ गया हूँख़्वाबों को सबके- सजाने आ गया हूँतिलस्म नहीं, "सच" बन आ गया हूँ"चार" का मेरा यह आकड़ा नायाब हूँशुन्य से निकसा हुआ स्वर्णिम प्रभात हूँहर दिल की तमन्ना बन छा गया हूँ२०२० सतयुग लिए मैं आ गया हूँविश्व के नैतिकवादियों को समेट लाया हूँजाती-शरहदों को मिटाने आ गया हूँलबों की म



प्रेम दिवस

चक्षुओं में मदिरा सी मदहोशीमुख पर कुसुम सी कोमलतातरूणाई जैसे उफनती तरंगिणीउर में मिलन की व्याकुलताजवां जिस्म की भीनी खुशबूकमरे का एकांत वातावरणप्रेम-पुलक होने लगा अंगों मेंजब हुआ परस्पर प्रेमालिंगनडूब गया तन प्रेम-पयोधि मेंतीव्र हो उठा हृदय स्पंदनअंकित है स्मृति पटल परप्रेम दिवस पर प्रथम मिलन



कवि हो तुम

गौर से देखा उसने मुझे और कहालगता है कवि हो तुम नश्तर सी चुभती हैं तुम्हारी बातें लेकिन सही हो तुम कहते हो कि सुकून है मुझे पर रुह लगती तुम्हारी प्यासी है तेरी मुस्कुराहटों में भी छिपी हुई एक गहरी उदासी है तुम्हारी खामोशी में भी सुनाई देता है एक अंजाना शोर एक तलाश दिखत



कविता

*कुछ ऐसा करो इस नूतन वर्ष* शिक्षा से रहे ना कोई वंचित संग सभी के व्यवहार उचित रहे ना किसी से कोई कर्ष कुछ ऐसा करो इस नूतन वर्ष भले भरत को दिलवा दो सिंहासन किंतु राम भी वन ना जायें सीता संग सबको समान समझो सहर्ष कुछ ऐसा करो इस नूतन वर्ष मिलें पुत्रियों को उनके अधिकार पर न



वर्ष की अंतिम बेला

अंतिम संध्या, अंतिम बेला,अंतिम किरणों का अन्त्य गीत,अंतिम पल का यह अंतर्मनअंतिम पुकार देता, हे मीत !अंतिम धारा, अंतिम प्रवाहअंतिम कलरव, अंतिम है कूकअंतिम बंधन में बाँध रखोधडकन की अंतिम ह्रदय-हूक.अंतिम है दृश्य-पटल, यह नाट्यअंतिम दर्शक, अंतिम समूह,अंतिम का अंत न कर देनाअंकित कर लो यह छवि दुरूह.अंतिम



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