कविता



लोट आओ है गाँधी

लोट आओ है गाँधी तेरा भारत तुझे पुकारे स्वराज का सपना अधूरा स्वराज के दुलारे।



सोने से पहले कुछ गा दो

स्नेह बिना जीवन वास्तव में सूना है...स्नेह चाहे मित्र का हो... जीवन साथी का हो... ईश्वर के प्रति हो... स्नेहदान सेही जीवन ज्योति प्रज्वलित रहती है... तथा जीवन का पथ प्रकाशमान बना रहता है... कुछइसी प्रकार के उलझे सुलझे से भावों के साथ प्रस्तुत है हमारी आज की रचना,,, सोने से पहले कुछ गा दो...कात्यायनी



सर्वदा नमन है माँ तुमको

जीवन मेंअनगिनती पल ऐसे आते हैं जब माता पिता की याद अनायास ही मुस्कुराने को विवश कर देतीहै | ऐसा ही कुछ कभी कभी हमारे साथ भी होता है | माँ क्या होती है – इसके लिए तोवास्तव में शब्द ही नहीं मिल पाते | माँ की जब याद आती है तो बस इतना ही मन करताहै: माँ तेरी गोदीमें सर रख सो जाऊँ मैं पल भर को, तो लोरी तू



चले आना प्रभुजी चले आना....

"चले आना प्रभुजी चले आना..."कभी परशुराम बन केकभी बलराम बन केअहंकार मिटाने चले आनाचले आना प्रभुजी चले आना...कभी घनश्याम बन केकभी श्यामघन बन केधरती को भिगाने चले आनाचले आना प्रभुजी चले आना....कभी राम बन केकभी श्याम बन केपाप मिटाने चले आनाचले आना प्रभुजी चले आना....कभी किसान बन केकभी नौजवान बन केअमन चै



फौजी

नशा है हमें तिरंगे में लिपटकर घर आने का अपने खून से तिरंगा सजाने का अपने देश के लिए अपनी जान गवाने का भारत माँ कि आन बान शान के लिए किसी से भी लड़ जाने का नशा है हमें तिरंगे में लिपटकर घर आने का।



षड़्जान्तर

सप्तक के स्वरों की स्थापना सर्वप्रथम महर्षि भरत के द्वारा मानीजाती है | वे अपने सप्त स्वरों को षड़्ज ग्रामिक स्वर कहते थे | षड़्ज ग्राम सेमध्यम ग्राम और मध्यम ग्राम से पुनः षड़्ज ग्राम में आने के लिये उन्हें दो स्वरस्थानों को और मान्यता देनी पड़ी, जिन्हें ‘अंतर गांधार’ और ‘काकली निषाद’ कहा गया| महर्



अभिनव मिश्र



प्रश्न नहीं ,अब परिभाषा बदलनी होगी !

चाहतीहूँ ,उकेरना ,औरत के समग्र रूपको, इस असीमित आकाश में !जिसके विशालहृदय में जज़्बातों का अथाह सागर,जैसे संपूर्ण सृष्टि कीभावनाओं का प्रतिबिंब !उसकेव्यक्तित्व कीगहराई में कुछ रंग बिखर गए हैं । कहींव्यथा है ,कहीं मानसिक यंत्रणा तो कहींआत्म हीनता की टीस लिए!सदियोंसे आज



प्रेम बन जाएगा ध्यान

प्रेमबन जाएगाध्यानप्रेम, एकऐसा अनूठा भाव जिसका न कोई रूप न रंग... जो स्वतः ही आ जाता है मन के भीतर...कैसे... कब... कहाँ... कुछ नहीं रहता भान... हाँ, करने लगे यदिमोल भाव... तो रह जाना होता है रिक्त हस्त... इसी प्रकार के कुछ उलझे सुलझे से भावहैं हमारी आज की रचना में... जो प्रस्तुत है सुधी पाठकों के लि



लिखूँगा

उठाया है क़लम तो इतिहास लिखूँगामाँ के दिए हर शब्द का ऐहशास लिखूँगाकृष्ण जन्म लिए एक से पाला है दूसरे ने उसका भी आज राज लिखूँगापिता की आश माँ का ऊल्हाश लिखूँगा जो बहनो ने किए है त्पय मेरे लिए वो हर साँस लिखूँगाक़लम की निशानी बन जाए वो अन्दाज़ लिखूँगाकाव्य कविता रचना कर



बहुत याद आता है.. वो गुजरा जमाना

बहुत याद आता है..वो गुजरा जमाना...बहुत याद आता है, वो गुजरा जमानावो बीता बचपन, हरकतें बचकानाआपस में लड़ना, फिर रूठना-मनानाचंदा मामा का आना, खाना खिलानासुबह का कलेवा, वो बासी खानाजिसके बिना दिन, लागे सूना-सूना।दादा-दादी के पास, नित होता था सोनानीदिया रानी का आना, चुपके से सुलानापरियों की कहानी का, नित



अंत जिंदगी का आरंभ ?

तुम्हें नहीं लगता हम यूँ ही दुःखी है सब ठीक होने पर भी जिंदगी रुखी है मैं कौन हूँ ?,मैं क्या हूँ? ,कहाँ जाना है? ,मेरा लक्ष्य क्या है ?यह सवाल मैं खुद से करता था लेकिन आज वक्त बदल गया है आज खुद के लिए वक्त नहीं है हाथ में घड़ी है लेकिन खुद के हाथ में एक घड़ी पल नहीं है क्यों क्या हम यहां सुविधा भ



अपना क्या है

अपना क्या है कभीकभी यों ही दार्शनिक सा बना मन सोचने लगता है कि इस असत् जगत में उसका है क्या...?जो कुछ है वो सब उसी का तो दिया हुआ है... कुछ इसी तरह के उलझे सुलझे से विचारोंके साथ प्रस्तुत है हमारी आज की रचना... अपना क्या है... सुनने के लिए कृपयावीडियो पर जाएँ... धन्यवाद... कात्यायनी... https://youtu



वो एकतरफा प्यार

वो एकतरफा प्यार ,जिसके लिये हुआ दिल बेक़रार मैं ढूंढता रहा उसे ,होकर बेक़रार उसका मुस्कुराना देखकर आँखों का झुकना देखकर उसके आगे लगने लगे महखाने सारे बेअसर वो जाते जिधर जिधर मैं पहुंचता उधर उधर जैसे मृग कस्तूरी के लिए ,भटके इधर उधर अब तो दिन कटता था ,रस्ता उनका देखकर उनसे मिलने का मौका ढूंढता था ,दिल



विशुद्ध किसान गुदड़ी के लाल

विशुद्ध किसान गुदड़ी के लालहम किसान हमें खेती प्याराहम कुछ भी उगा सकते हैंइस जग में दूजा काम नहीं जो मेरे मन को भा सकते हैं।हम उस किसान के बेटे हैंसंभव है तुझको याद नहींजय जवान जय किसान का नाराबिल्कुल तुझको है याद नहीं।ईमानदारी जिसके रग-रग में समायाबेमिसाल ऐसा इनसान कहाँसादा जीवन और उच्च विचार होमिलत



मुकाबला

गर्दन को पकड़ कर जल में कोई डुबो रहा है और मैं छटपटा रहा हूँ छोड़ दो मुझे प्लीज़ - चिल्ला रहा हूँ। . करियर का दबाव जवानी का दबाव फैमिली का दबाव यह तीनों दबाव मुझे जल में डुबो रह है और में करा रहा हूँ कैसे करूँ में तीनों का मुकाबला।।



मेरा अन्तर

मेरा अन्तर इतना विशाल समुद्र से गहरा / आकाश से ऊँचा /धरती सा विस्तृत जितना चाहे भर लो इसको / रहता हैफिर भी रिक्त ही अनगिन भावों का घर है ये मेराअन्तर कभी बस जाती हैं इसमें आकर अनगिनतीआकाँक्षाएँ और आशाएँजिनसे मिलता है मुझे विश्वास औरसाहस / आगे बढ़ने का क्योंकि नहीं है कोई सीमा इस मन की...पूरी रचना सुन



मां को आमंत्रण

एक सहमी हुई, सिमटी हुई कालों मेंधूल धूसरित लालों मेंखुद कंटकों पर चलती थी।एक ऐसी देवी जो कठिनाइयों का सामना करते हुएउसे गले लगाती रही।घर वाले कुछ भी कहते थेबिना क्रोध किए सुन लेती थी।सत्य की पराकाष्ठा पर सदा अडिग रही,वह मां जो मुझे थपकी देती थीवह मांजो मुझे मार जता कर सुपथ पर लाती रही,वह मांजिसके जा



एक विचार से

दुनिया ना दबाव से जीती जाती है ना तलवार से दुनिया को बदलना काफ़ी है एक विचार सेजिसके पास धन है दौलत है शोहरत वह अमीर नहीं जिसके पास मुस्कुराने के दो पल है अमीर वहीं। ..



उठो नारी प्रहार करो

है कँहा लिखा काजल भर नेत्रों में श्रृंगार करो फूलो से महकते गजरे में लिपटी कोई नार बनो भुजा में जोर तुम्हारे भी कभी तो स्वीकार करो नरभक्षी पिशाचों की गर्दन पर तुम तलवार धरो है कँहा लिखा काजल भर नेत्रों में श्रृंगार करो फूलो से महकते गजरे में लिपटी कोई नार बनो गुड़ियों के ब्याह में यूँ



आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x