कविता



समय की पुकार

🙏🙏 समय की पुकार🙏🙏निरीह पशु-पँछियों को अपनीक्षुधा का समान मत बनाओइनमें जीवन है, इनको अपनोंसे वंचित कर रे नहीं तड़पाओखाद्यान्न प्रचूर है, और उगाओ"अहिंसा" का सुमार्ग अपनाओ🌳🌲🌼🌺🌷🌺🌼🌲🌳सौन्दर्य वर्धन हो धरा काशुन्य पर मत सब जाओपशु-पादप-वृक्ष-ताल-तलैया के



स्वार्थ

अँधेरे में तो परछाई भी साथ छोड़ देती है जनाब हम तो फिर भी इंसान है औरों की किसी को फिकर नहीं बस खुद पर सब कुर्बान है ।



कोरोना का कहर और सृजन

कोरोना का कहर और सृजनसम्मेलनों और कवि -गोष्ठियों की चहुँदिसि मची धूम हैहर ओर शंखनाद् गुँजायमान्,कीर्तन का शोर हैनगमों-नज़्मों में अगन,टपका कलमों से ओज हैमन की जमी हुई भडास सारी है आज निकस रहीगुर्गों की नजर शर्म से उफ़!कत्तई झुक नहीं रहीवख्त है, चेत जा; आ रही कोरोना की बौछार हैनफरत नहीं किसी से,विश्व ब



बहन

दिखती है जिसमें मां की प्रतिच्छवि वह कोई और नहीं होती है बान्धवि जानती है पढ़ना भ्राता का अंतर्मन अंतर्यामी होती है ममतामयी बहन है जीवन धरा पर जब तक है वेगिनी उत्सवों में उल्लास भर देती है भगिनी :- आलोक कौशिक संक्षिप्त परिचय:-नाम- आलोक कौशिकशिक्षा- स्नातकोत्तर (अंग्रेजी साहित्य)पेशा- पत्रकारिता एवं



कृष्ण लीला

🐚🐚 कहानी कृष्ण की 🐚🐚 🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️"कृष्ण जन्माष्टमी" हम हर्षित हो मनाते हैं।"कृष्ण लीला" आज हम सबको सुनाते हैं।।कारागृह में ''महासंभूति'' का अवतरण हुआ।दुष्ट कंस का कहर, जन जन का दमन हुआ।।जमुना पार बासु यशोधा के घर कृष्ण को पहुँचाये।''पालक माँ'' को ब्रह्माण्ड मुख गुहा में प्



बस इतनी सी चाह .....

मुमकिन नहीं ये मेरे लिए कि मैं तुझको भूल जाऊँ भूल जाऊँ 'गर जो तू मेरा नाम बदल देना ........ इतनी सी चाह है तुझसे हर शक्ल में नज़र मैं आऊं .... जो नज़र न आयी तुझको तो तू शीशा बदल देना ........



ऊँचे सपने

उँचे सपने बिखर जाते हैं-बालू के टिब्बे की तरह!संतोष के गहने-चमक जाते हैं सोने की तरह!!DrKavi Kumar Nirmal



तुम

मैं अब भी तुम्हारे बारे मे लिखती हूँहाँ, मैं अब भी तुम्हारे बारे मे लिखती हूँ। एक अरसे से साथ हैं हम, और इस साथ के बारे मे लिखती हूँ। मैं अब भी तुम्हारे बारे मे लिखती हूँ। जानती हूँ कभी कहोगे नहीं तुम, परये बात बहुत खुशी देती है तुम्हे, किमैं अब भी तुम्हारे बारे मे लिखती हूँ। वो अहसास जो कुछ 18 साल



पानी

मछली जिसमे रहती है , जिसे अपना घर कहती है, जल ही है वो जीवनधारा ,जो हर नदी में बहती है । कभी बारिश की बुँदे बनकर पौधों की प्यास बुझती है इठलाती और बलखाती फिर वसुधा की गोद में समा जाती है ।शक्ति जिसकी अपार है ,समुद्री जीवों का जो



कवि सम्मेलन

स्वार्थपरायण होते आयोजक संग प्रचारप्रिय प्रायोजक भव्य मंच हो या कोई कक्ष उपस्थित होते सभी चक्ष सम्मुख रखकर अणुभाष करते केवल द्विअर्थी संभाष करता आरंभ उत्साही उद्घोषक समापन हेतु होता परितोषक करते केवल शब्दों का शोर चाहे वृद्ध हो या हो किशोर काव्य जिसकी प्रज्ञा से परे होता आनन्दित दिखते वही श्रोता करत



बच्चा बनने का मन है

खेलने का मन है, कूदने का मन हैआज फिर बच्चा बनने का मन हैदौड़ने का मन है चिखने चिल्लाने का मन हैबिना डरे जिंदगी जीने का मन हैक्योंकि आज मुझे जीने का मन है आज मुझे बच्चा बनने का मन हैये जीना भी क्या जीना था जिसमें ना भविष्य कि चिंता थीना भूतकाल के दुखो का रोना थाबस आज था और



पिता के अश्रु

बहने लगे जब चक्षुओं से किसी पिता के अश्रु अकारण समझ लो शैल संतापों का बना है नयननीर करके रूपांतरण पुकार रहे व्याकुल होकर रो रहा तात का अंतःकरण सुन सकोगे ना श्रुतिपटों से हिय से तुम करो श्रवण अंधियारा कर रहे जीवन में जिनको समझा था किरण स्पर्श करते नहीं हृदय कभी छू रहे वो केवल चरण :- आलोक कौशिक संक्षि



कागज की कहानी

🙏लधु कथा कागज की "काव्यात्मक"🙏रद्दी बही और अखबारों को कूट -काटबनी लुगदी से चमक- उभर मैं आता हूँचाहने वालों के रंग में सहज मैं रंग जाता हूँ'उकेरी लकिरों' से कवियों का मन पढ़ पाता हूँशास्त्र कहें या किताब, पुस्तकालयों में सज जाता हूँ'भोज पत्र' अब दुर्लभ, मैं हीं सबका म



Hindi poetry on life - मैं कुछ भूलता नहीं ; अर्चना की रचना

जीवन पर आधारित हिंदी कविता मैं कुछ भूलता नहीं मैं कुछ भूलता नहीं ,मुझे सब याद रहता है अजी, अपनों से मिला गम, कहाँ भरता हैसुना है, वख्त हर ज़ख़्म का इलाज है पर कभी-२ कम्बख्त वख्त भी कहाँ गुज़रता है मैं अब बेख़ौफ़ गैरों पे भरोसा कर लेता हूँ जिसने सहा हो अपनों का वार सीने पे , वो



आज का हाल

आज का हालआमरण हड़ताल, मांगों की बौछारनिर्जला व्रतों का गगनचुंबी पहाड़वृद्धों का अनादर एवम् तिरस्कारउदारता से नहीं है तनिक सरोकारबंद कमरे से चलती रही आज की सरकारईर्श्या-द्वेष-ध्रिणा मात्र- नहीं तनिक रे प्याररिस्तों का झूठला कर, गैरों से पनपा प्यारपरिवार यत्र-तत्र टूट



झारण्डी

ओ' मेरे रंगरेज़ बता कैसे- तेरे रंगों से मैं भर जाऊँ?विधा न आवे, राग नहीं; कैसे गीत गा तुझे रिझाऊँ??निर्मल



नारी आदिशक्ति

हम लाए नए जीवन को और कराए स्तनपानहम हैं नारी शक्ति और हम चाहे हक समानहम किसी आदमी से अब डरना नहीं चाहतेहम अपनी मां के गर्भ में अब मरना नहीं चाहतेहम भी करना चाहेंगे अपने खर्चों का भुगतानहम हैं नारी शक्ति और हम चाहे हक समानहम भी आगे बढ़ेंगे तो काम आगे बढ़ेगाहम आपके साथ मिल जाए तो देश का नाम आगे बढ़ेगा



क्योंकि मैं सत्य हूं

मैं कल भी अकेला थाआज भी अकेला हूं और संघर्ष पथ पर हमेशा अकेला ही रहूंगा मैं किसी धर्म का नहीं मैं किसी दल का नहीं सम्मुख आने से मेरे भयभीत होते सभी जानते हैं सब मुझको परंतु स्वीकार करना चाहते नहीं मैं तो सबका हूं किंतु कोई मेरा नहीं फिर



सपने

सपनेसुहावने सपनों के बाद सुहानी भोर आएगीफिर वहीं शाम आ कर सपने नए सजाएगीकौन जानता है (?) कल दस्तख़ दे उठाएगीदिन में शौहरत पाँव चूम कर गले लगाएगीकर दिया है जब खुद को- हवाले मालिक कोबिधना अपनी जादुगरी क्याकर (?)दिखाएगीडॉ. कवि कुमार निर्मल



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