कविता

प्यार ही डसने लगा

प्यार ही डंसने लगाविजय कुमार तिवारीतुम चले गये,जिन्दगी में क्या रहा?हो गये अपने पराये,आईना छलने लगा। तुम चले गये,जिन्दगी में क्या रहा?हर हवा तूफान सी,झकझोर देती जिन्दगी,धुंध में खोया रहा,पतवार भी डुबने लगा। तुम चले गये,जिन्दगी में क्या रहा?चाँद तारे छुप गये हैं,दर्द के शैलाब में,ढल गया दिल का उजाला,



लफ्ज का मरहम

मन की हर बात करने का मेरा मन तुझसे करता हैतेरे हर लफ्ज का मरहम मेरी पीड़ा को हरता हैमेरी झोली किसी के प्यार से महरूम थी अब तकतू दोनों हाथों से इसको सदा हँस हँस के भरता हैतू मेरे साथ है जब से मुझ को चिंता नहीं रहतीतन्हा इंसान ही बस हर समय गैरों से डरता हैअलग इंसान होते हैं फ़कत कातिल ज़माने मेंये जज्बा



आब के जैसा

तू जब भी पास होता है समय ये थम सा जा हैतेरी बातों में मेरा मन अचानक रम सा जाता हैदर्द मेरे भी दिल में था सुकूँ पर ना दिया रब ने मिला है तू मगर जब से हुआ ये कम सा जाता हैमिला जो तू मुकद्दर से खुशी इतनी मिली मुझकोये आंसू आँख को मेरी करे अब नम सा जाता हैमुहब्बत में लहू बन के तू जो नस नस में आ बैठा



मेरा सहारा

तेरी आवाज़ ही अब तो बनी मेरा सहारा हैहजारों फूल खिलते हैं तूने जब भी पुकारा हैतू मेरी सांस बनके इस तरह जीवन में छाया है तेरे बिन ज़िन्दगी का अब नहीं होता गुजारा हैमुझे कड़वे सचों ने ज़िन्दगी के तोड़ डाला था मेरी उजड़ी सी हस्ती को फ़कत तूने निखारा हैबसी हूँ जब से पलकों में वहीं महफूज़ हूँ हरदम



उसूल

सोचा किए जो वो ना हुआ कुछ तो बात हैदिन का समय भी आएगा गर आज रात हैआज वो ऊँचा भी है और डालियां हैं संग पर जमीं पे एक दिन गिरता ये पात हैकोशिशें करता है जो वो जीत जाएगा वक्त से हर शै को तो मिलती ही मात हैअब क्या करें शिकायतें उस इंसान से यहाँजिसके लहू में बह रहा बस एक घात हैज़िन्दगी मधुकर चले बस निज उ



मेरी फितरत

मुझे तू प्यार करता है तो मैं सिमटी सी जाती हूँखुशी से झूम उठती हूँ लाज संग मुस्कुराती हूँमेरे मन में उमंगों का बड़ा सा ज्वार उठता हैमगर मैं हाले दिल तुमको नहीं खुलकर बताती हूँमेरे हर क़तरे क़तरे में तेरी छवियां समाई हैमगर न जाने क्यों मैं प्यार अपना न जताती हूँनज़र लग जाए न अपनी मुहब्बत को कभी जग की



नाव

जिसे तुम ज़िन्दगी में सबसे ज्यादा प्यार करते होझिझक को छोड़ कर पीछे उसे बाँहों में भरते होज़मीं का साथ पाकर ही शज़र पे रंग आता हैचुकाने को कर्ज थोड़ा फूल तुम उस पे झरते होतेरे सीने से लगने की तमन्ना दिल में रहती हैमेरी हर एक पीड़ा तुम बड़ी शिद्दत से हरते होमुझे उन राहों पे चलने से हरदम मान मिलता है



लाचारी

मिलन की आरजू पे डर ज़माने का जो भारी हैतेरी मेरी मुहब्बत में अजब सी कुछ लाचारी हैदोस्तों दोस्ती मुझको तो बस टुकडों में मिल पाईबड़ी तन्हा सी मैंने ज़िन्दगी अब तक गुज़ारी हैभले तुम अजनबी से अब तो मुझसे पेश आते होतेरी सूरत ही मैंने देख ले दिल में उतारी हैभुलाना भी तुम्हें अब तो कभी आसां नहीं लगता मेरे



कयास

कोई रिश्ता फ़कत इक नाम से ना खास होता हैमुहब्बत जो भी बांटेगा वो दिल के पास होता हैपरेशां मन जो रहता है गैर दोषी नहीँ इसके मेरे घर में ही कुछ खामी है ये एहसास होता हैबात कितनी करे कोई अगर उल्फ़त नहीं दिल मेंदूरियों का हर समय बीच में आभास होता है कोई गैरों की पूजा में ही



पहली मुलाक़ात

कवितापहली मुलाकातविजय कुमार तिवारीयह हठ था या जीवन का कोई विराट दर्शन,या मुकुलित मन की चंचल हलचल?रवि की सुनहरी किरणें जागी,बहा मलय का मधुर मस्त सा झोंका,हुई सुवासित डाली डाली, जागी कोई मधुर कल्पना।शशि लौट चुका थानिज चन्द्रिका-पंख समेटे। उमग रहे थे भौरे फूलों कलियों में,मधुर सुनहले आलिंगन की चाह संजो



वीरों का बसंत

वीरों का कैसा हो बसंत, कभी किसी ने बतलाया था।पर ऐसा भी बसंत क्या कभी सामने आया था?फूली सरसों मुरझाई है, मौन हुआ हिमाचल है।धरा-व्योम सब पूछ रहे, ये कैसी हलचल है?माँ भारती हुई आतंकित, कुत्सित कुटिल प्रहारो से।स्वर्ग भूमि है नर्क बनी अब, विस्फोटों से अंगारों से।।युद्ध भूमि में नहीं थे वे, जब मौत सामने



मुझसे ही मुझको ढूँढ़कर मुझसे मिला रहा है वो

स्याही में कोई बेजुवान साया घुला है जैसे , एक मासूम चेहरा अक्षरों से तक रहा है मुझको ,मेरे बंद मुट्ठी में तस्वीर जिसका भी हो ,अपने नाम में मेरा नाम ढूँढ रहा है वो ा इश्क का हमसफ़र कभी बदलता नहीं ,धडकनों पर लिखा चेहरा कभी मिटता नहीं ,



सुगंध

मुहब्बत जिससे होती है सुगंध एक उसमें आती हैउसे पाने की चाहत फिर जो बस मन में जगाती हैये चेहरा कुछ नहीं दिल से जुड़ा एक आईना समझोजो मन में चल रहा है बस वो ही सूरत दिखाती हैचाह जिसकी करी वो ही तो देखो ना मिला मुझकोज़िन्दगी की ये सच्चाई तन्हा मेरे दिल को दुखाती हैछवि महबूब की जिसने बसाई हो फ़कत दिल में



लौटा माटी का लाल

गूंजी मातमी धुन लुटा यौवन तन सजा तिरंगा लौटा माटी का लाल माटी में मिल जाने को ! इतराया था एक दिन तन पहन के खाकी चला वतन की राह ना कोई चाह थी बाकी चुकाने दूध का कर्ज़ पिताका मान बढाने को ! लौटा माटी का लाल माटी में मिल जाने को !!रचा चक्रव्यूह शिखंडी शत्रु ने छुपके घात लगाई कु



कन्धों पर सरहद के जाँबाज़ प्रहरी आ गये

मातम का माहौल है कन्धों पर सरहद केजाँबाज़ प्रहरी आ गये देश में शब्दाडम्बर के उन्मादी बादल छा गये रणबाँकुरों का रक्त सड़कों पर बहा भारत ने आतंक का ख़ूनी ज़ख़्म सहा बदला! बदला!!आज पुकारे देश हमारागूँज रहा है गली-चौराहे पर बस यही नारा बदला हम लेंगे फिर वे लेंगे.... बदला हम लेंगे फिर वे लेंगे....हम.... फिर



पीड़ा की लहरें

शहीदों की चिताओं पर उठी पीड़ा के लहरें हैं मगर सोचो ज़रा हम ही तो असली अंधे बहरे हैसोचते रहते हैं एक दिन शेर भी घास खाएगाजेहादी बुद्ध बन सबके दिलों के पास आएगाअरे कश्मीर में गर तुमने बाकी देश ना भेजाकभी भूभाग तुमसे जाएगा न ये फिर तो सहेजाकत्ल तुम लाखों द्रोहियों का यूँ ही कर नहीं सकतेये अलगाव के नारे



वीर सिपाही

हो वीरता का संचार तुम , इस मातृभूमि का लाल तुम ,तुम गूंजते हो खुले आसमान में ,तुम दहाड़ते हो युद्ध के मैदान में ,कभी रुकते नहीं कदम तुम्हारे ,थकते नहीं बदन तुम्हारे ,हो क्रांति का एक मिशाल तुम ,शेरनी माँ का शेर औलाद तुम ,जो सर कटाए दे



दर्द

दर्द जाने क्या दर्द से मेरा रिश्ता है!?!जब भी मिलता है बड़ी फ़ुर्सत से मिलता है||



दूसरा तो दूसरा ही होता है

।। दूसरा तो दूसरा ही होता है।। संबंध तो वही है;जिसमें तोड़ने का विकल्प होता ही नहीं। रिश्ता तो वही है; जिसमें छोड़ने का विकल्प होता ही नहीं।।चलो बात करें, चलो कुछ बात करें;एकदम ही निजी रिश्ते की;एकदम ही अंतरंग रिश्ते की;एकदम ही पूरे पूरे व्यक्तिगत संबंध कीचलो बात करें, चलो कुछ बात करें।।( दूसरा से य



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