कविता



आ गयी है ज़िंदगी

आ गयी है ज़िंदगीआ गयी है ज़िंदगी ऐसे पड़ाव पर कहना है अलविदा अपने आप से रिश्तों के तानेबानेलगने लगे हैं बेज़ार से मिलना है जिनसे आख़िरी बार हैं कुछ पास तो कुछ हैं, दूर होगी उनसे बातया मुलाक़ात मालूम नहीं थमने को हैं साँसेबस इंतेज़ार में आ गयी है ज़िंदगी ऐसे पड़ाव पर २८ नवंबर २०२०दिल्ली



काश तुम होते पास

काश तुम होते पास काश तुम होते पास पहलू में रख कर सिरदिल का ग़ुबारहल्का कर लेते काश तुम पास होते पहलू में रख कर सिर आँखों के सैलाब में मन के मलाल को बहा देतेकाश तुम पास होते पहलू में रख कर सिर इजहार दिल का हाल कररंजीदगी, कुछ कम कर लेते काश तुम होते पास १ दिसंबर २०२०दिल्ली



पालक झपकते ही

पलक झपकते ही पलक झपकते ही ओझल हो गया था जो हक़ीक़त अब सपना बन गया रहता था साथ जोअब याद बन गया होती थी रोज़ गुफ़्तगू अब ख़्याल बन गया था हो बशरअब रूह बन गया पलक झपकते ही ओझल हो गया १ दिसंबर २०२०दिल्ली



दिल में अपने

दिल में अपने झाँक कर देखा तो तेरा चेहरा नज़र आता हैनिगाहों में मेरी तेरा ही अक्स उभर आता है बातों में मेरी तेरा ही ज़िक्र सुनाई आता है अजनबी है तूफिर भी ना जाने क्यों जाना पहचाना सा नज़र आता है ३ दिसंबर २०२०दिल्ली



नज़र आया

नज़र आया इश्क़ के आइने में देखा चेहरा तेरा नज़र आया दिल के दर्पण में देखा अक्स तेरा नज़र आया नज़रों के झरोख़े में देखा रूप तेरा नज़र आया बस गए हो तुम इस तरह ज़ेहन में खुद में भी बस तसव्वुर तेरा नज़र आया ५ दिसंबर २०२०दिल्ली



जानता हूँ मैं

जानता हूँ मैं चिल्ला देता हूँ तुम पर कभी जानता हूँ कि तुम समझ जाओगी मेरी दशा और नहीं करोगी मुझे खुद से दूर रो लेता हूँ तुम्हारे सामने जानता हूँ कि तुम दोगी मुझे तसल्ली नहीं समझोगी कमजोरहँस लेता हूँ तुम्हारे साथ जानता हूँ कि तुम बाँटोगी मेरी ख़ुशी नहीं करोगी रश्क़दर्द अपना कर लेता हूँ तुम से साँझाजान



अनकही बातों को

अनकही बातों को अनकही रहने दो जीने दो इसी भ्रम मेंप्यार ना किया ज़ाहिर तुमने भी और मैंने भी के तेरे भी वो ही हालात हैं जो मेरे हैंअनकही बातों कोअनकही ही रहने दो जीने दो इसी भ्रम मेंधड़क रहा है मेरा दिल तेरे सीने मेंतेरा दिल मेरे पास है अनकही बातों को अनकही ही रहने दो र



तू मिल कर भी ना मिला मुझसे

तू मिल कर भी ना मिला मुझे मैं मिले बिना भी तेरा हो गया तू ना समझा कोई बात मेरी मैं तेरे एक इशारे को दिल से लगा बैठा तू दिल्लगी करता रहा मैं दिल लगा बैठा तुझसे तू अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ गया मैं उसी राह मेंतेरे इंतज़ार में बैठा रहा तू मिल कर भी ना मिला मुझसे २२ दिसंबर २०२०दिल्ली



कोशिशें

कोशिशें हज़ार क़ींदर्द अपना छुपाने कीज़ख़्म इतना गहरा थाकि, मुस्कुराहट के पीछे भीरंजीदगी छुप ना सकी कोशिशें हज़ार क़ींआंसुओं के सैलाब को रोकने कीभरा था दिल इतना मगर आँखों के बाँध भी उसे बहने से रोक ना सके कोशिशें हज़ार क़ींयादों को दफ़नाने की प्यार बेंतिहा था मगर कब्र से भी लौट आयी यादें मुझे सताने



चक्रव्यूह

सवालों और जवाबों के चक्रव्यूह में फँस गयी है ज़िंदगी कल क्या हुआ कल क्या होगा यह मेरा है, वो तेरा इन्ही, सवालों और जवाबों के चक्रव्यूह में फँस गयी है ज़िंदगी दुनिया क्या कहेगी यह सही वो ग़लत यह अच्छा वो बुरा इन्ही, सवालों और जवाबों के चक्रव्यूह में फँस गयी है ज़िंदगी २३ जनवरी २०२१जिनेवा



ठिठुराती भीषण ठण्ड में

ठिठुराती भीषणठण्ड में जब प्रकृति नटी नेछिपा लिया हो स्वयं को चमकीली बर्फ कीघनी चादर में छाई हो चारों ओरघरों की छत पर और आँगन में खामोशी के साथ “टपटप” बरसती धुँध नहीं दीख पड़ता किचादर के उस पार दूसरा कौन है और फिर इसीद्विविधा को दूर करने धीरे धीरे मीठीमुस्कान के सूर्यदेव का ऊपर उठना जो कर देता हैखिलखि



जात आदमी के

आसाँ नहीं समझना हर बात आदमी के,कि हँसने पे हो जाते वारदात आदमी के।सीने में जल रहे है अगन दफ़न दफ़न से ,बुझे हैं ना कफ़न से अलात आदमी के?ईमां नहीं है जग पे ना खुद पे है भरोसा,रुके कहाँ रुके हैं सवालात आदमी के?दिन में हैं बेचैनी और रातों को उलझन,संभले नहीं संभलते हयात आदमी के।दो गज



नयी उम्मीदें

खुद ही से मैं नज़रें चुराने लगी हूं,उन यादों से दामन छुड़ाने लगी हूँ ।खुद ही से खुद ही का पता पूछती हूँ,न जाने कहाँ मैं विलीन हो चुकी हूँ ।अरमानों को अपने दबाने लगी हूँ,पहचान अपनी भुलाने लगी हूँ ।भटकने लगी राह मंज़िल की अपनी,कहूँ क्या किधर थी, किधर को चली हूँ । ....और पढ़ें



शब्दों की माला

शब्दों की मालाशब्दजब तक मुझको न था उचित ज्ञान,शब्दों के प्रयोग से थी मैं अनजान,न था इन पर मेरा तनिक ध्यान,न ही थी इनकी मैं कद्रदान।मंडराते थे ये मेरे आसपास,छोड़ते न थे कभी मेरा ये साथ,इनको मुझसे थी यही एक आस,कभी तो इनका मुझे होगा एहसास।धीरे से मुझे इनसे प्यार हुआ,इन शब्दों



मुक्तक

सुलगते आग को मै इश्क़ बता देता हूँइस तरह लफ्ज़ों का मै जाल बना देता हूँजो मेरे इश्क में पतंगों से जल गये यारोंउन्ही को आज से आशिक करार देता हूँ ©®डॉ नरेन्द्र कुमार पटेल



जिंदगी की बही

★☆जिंदगी की बही☆★जिंदगी की- ना बांचे बहीआज करदे- उसे तूं सहीआँसुओं की- नदी बह रहीलबों पे- खुशी छा रहीजिंदगी की- बांचे ना बहीआज करदे- उसे तूं सहीजोश की किरणें- छा रहींगर अँगुलियाँ- हरकत ना करीपन्ना पलट- देखा ना कभीआगे की फिक्र- करो अब सभीकिश्ती साहिल की ओर- चलीमंझधार में- थी वो फंसीजिंदगी की- पूरी ब



नया साल 2021

अंधकार का जो साया था, तिमिर घनेरा जो छाया था,निज निलयों में बंद पड़े थे,रोशन दीपक मंद पड़े थे।निज श्वांस पे पहरा जारी, अंदर हीं रहना लाचारी ,साल विगत था अत्याचारी,दुख के हीं तो थे अधिकारी।निराशा के बादल फल कर,रखते सबको घर के अंदर,जाने कौन लोक से आए, घन घ



नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ

सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें, कोरोना जैसी किसी भी महामारी सब मुक्तहों... सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े…भारतीय जीवन दर्शन की इसी उदात्त भावना के साथ पूर्ण हर्ष और उल्लास से वर्ष 2020 को विदा करते हुए आइये स्वागत करें वर्ष 2021 का… सभी को नववर्ष की हर्ष भरी



अभिलाष

जीवन के मधु प्यास हमारे, छिपे किधर प्रभु पास हमारे?सब कहते तुम व्याप्त मही हो,पर मुझको क्यों प्राप्त नहीं हो?नाना शोध करता रहता हूँ, फिर भी विस्मय में रहता हूँ,इस जीवन को तुम धरते हो, इस सृष्टि को तुम रचते हो।कहते कण कण में बसते हो,फिर क्यों मन बुद्धि हरते हो ?सक्त हुआ मन निरासक्त पे,अभिव



तुम शेर बन अड़े रहो....

तुम शेर बन अड़े रहो....कोरोना अभी गया नहीं...शेर बन अड़े रहो, घर में ही डटे रहोशेरनी भी साथ हो, शावक भी पास होबाहर हवा ठीक नहीं, निकलना उचित नहींशेर बन अड़े रहो, घर में ही डटे रहो...।दूध की मांग हो या सब्जी की पुकार होभले राशन की कमी हो, तुम फिकर करो नहींतुम निडर खड़े रहो, बिल्कुल डरो नहींशेर बन अड़े रहो



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