कविता



💐💐💐2️⃣0️⃣2️⃣0️⃣💐💐💐

लो बिन कहे मैं चुपके से आ गया हूँख़्वाबों को सबके- सजाने आ गया हूँतिलस्म नहीं, "सच" बन आ गया हूँ"चार" का मेरा यह आकड़ा नायाब हूँशुन्य से निकसा हुआ स्वर्णिम प्रभात हूँहर दिल की तमन्ना बन छा गया हूँ२०२० सतयुग लिए मैं आ गया हूँविश्व के नैतिकवादियों को समेट लाया हूँजाती-शरहदों को मिटाने आ गया हूँलबों की म



प्रेम दिवस

चक्षुओं में मदिरा सी मदहोशीमुख पर कुसुम सी कोमलतातरूणाई जैसे उफनती तरंगिणीउर में मिलन की व्याकुलताजवां जिस्म की भीनी खुशबूकमरे का एकांत वातावरणप्रेम-पुलक होने लगा अंगों मेंजब हुआ परस्पर प्रेमालिंगनडूब गया तन प्रेम-पयोधि मेंतीव्र हो उठा हृदय स्पंदनअंकित है स्मृति पटल परप्रेम दिवस पर प्रथम मिलन



कवि हो तुम

गौर से देखा उसने मुझे और कहालगता है कवि हो तुम नश्तर सी चुभती हैं तुम्हारी बातें लेकिन सही हो तुम कहते हो कि सुकून है मुझे पर रुह लगती तुम्हारी प्यासी है तेरी मुस्कुराहटों में भी छिपी हुई एक गहरी उदासी है तुम्हारी खामोशी में भी सुनाई देता है एक अंजाना शोर एक तलाश दिखत



कविता

*कुछ ऐसा करो इस नूतन वर्ष* शिक्षा से रहे ना कोई वंचित संग सभी के व्यवहार उचित रहे ना किसी से कोई कर्ष कुछ ऐसा करो इस नूतन वर्ष भले भरत को दिलवा दो सिंहासन किंतु राम भी वन ना जायें सीता संग सबको समान समझो सहर्ष कुछ ऐसा करो इस नूतन वर्ष मिलें पुत्रियों को उनके अधिकार पर न



वर्ष की अंतिम बेला

अंतिम संध्या, अंतिम बेला,अंतिम किरणों का अन्त्य गीत,अंतिम पल का यह अंतर्मनअंतिम पुकार देता, हे मीत !अंतिम धारा, अंतिम प्रवाहअंतिम कलरव, अंतिम है कूकअंतिम बंधन में बाँध रखोधडकन की अंतिम ह्रदय-हूक.अंतिम है दृश्य-पटल, यह नाट्यअंतिम दर्शक, अंतिम समूह,अंतिम का अंत न कर देनाअंकित कर लो यह छवि दुरूह.अंतिम



वेश्या का जीवन

इक बार एक आदमी जो आत्माओं या यूं कहो कि कल्पनाओ से बात करता रहता था, एक बार कब्रिस्तान के रास्ते जा रहा था जिस वजह इक औरत ( वैश्या ) का शव देख कर कुछ कल्पना रूपी बातें करता है जिसका जवाब वो कल्पना रूपी औरत ( वैश्या ) देती है जो नीचे कविता के माध्यम से वर्णित है... क्यों मौन है तुम्हारा मुख हे देवी



'अभि'की कुण्डलियाँ

टूटा कुनबा देख के, मुखिया हुआ निराश।तिनके जैसा उड़ गया,जीवन से विश्वास।जीवन से विश्वास,प्रेम जब उसका हारा।जीत गया है स्वार्थ,कहाँ अब रहा सहारा।कहती 'अभि' निज बात,पटाखा जैसे फूटा।उड़ी घृणा की धुंध,और फिर कुनबा टूटा।प्यारी पीहर की लगे ,मुझको सारी बात।पक्षी जैसी मैं उड़ी, छूटे भगिनी-भ्रात।छूटे भगिनी-भ्



प्रेम समीकरण.

अत्यन्त सरल होता हैप्रेम का समीकरण,द्विघातीय व्यंजक की भांति।जिसमें केवल दो चर ही होते हैं।एक आश्रित चर,जो सदैव स्त्री होती है।एक स्वतंत्र चर,जो पुरुष होता है।समय परिवर्तन के साथदोनों चर स्वतंत्र हो सकते हैं। क्योकिं आश्रित होने पर समीकरण का हल नहीं निकलता, शिवम...



अलविदा 2019

झड़ने दो पुराने पत्तों को.🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂गिरने दो फूलों को जमीं पर.🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼कि नए पत्ते फिर आएंगे शाखों पर.🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿कि नए फूल फिर उगेंगे डाली पर.🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹ताकेंगे आसमान की ओर.🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴गिरने से मत डरो, झड़ने से ना डरो.बीज भी जमीन में गिरकर ही पौधे



पहले वाली तुम..

मैं चाहता हूँ ; तुम पैरों में पायल की बजाय बैजंती की लड़ी पहनों, अधरों एवम मुख के बजाय अपने हृदय से बोलो, केशों को हाथों के बजाय वायु के झोंकों से सवारों, सड़कों, मॉलों और बिग बाज़ारों



जय हिंद, जय हिंदी

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मेरा गाँव, मेरा देश

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सर्द रात के ढलते ढलते

सर्द रात के ढलतेढलतेमाघ पूस की सर्द रात के ढलते ढलते कोहरे की चादर में लिपटी धरती / लगती है ऐसीजैसेछिपी हो कोई दुल्हनिया परदे में / लजाती, शरमातीहरीतिमा का वस्त्र धारण कियेमानों प्रतीक्षा कर रही हो / प्रियतम भास्कर के आगमन कीकि सूर्यदेव आते ही समा लेंगे अपनी इस दुल्हनिया कोबाँहों के घेरे मेंशर्मीली



घर संसार

घर संसार बनाने में जीवन सारा बीताआगे - आगे राम पीछे चल रहीं सीतामहाभारत युद्ध नहीं- है सास्वत गीता'सद्गुरु' बिन जीवन रह जाता रीतानव - चक्र जागृत कर हीं कोई जीताघर - संसार बनाने में जीवन सारा बीताआगे - आगे राम पीछे चल रहीं सीताडॉ. कवि कुमार निर्मलhttps://hindi.pratilipi.com/story/qnbzgcm2iwvw?utm



येसु फिर आओ

येसु फिर आओ ★★मसीहा फिर आओ★★येसु! बार - बार आ कर आलोक फैलाओअँधेरा छाया- फिर से ज्योत बिखराओतुमने सदा प्यार बाँट शुभ संदेश दिया हैहमने बँट कर नफ़रतभरा अंजाम दिया हैचमत्कार फिर दिखला कर होश में लाओप्रायश्चित और प्रार्थना का मार्ग बताओयेसु! बार - बार आ कर आलोक फैलाओअँधेरा छाया- फिर से ज्योत बिखराओडॉ.



येसु फिर आओ

★★मसीहा फिर आओ★★येसु! बार - बार आ कर आलोक फैलाओअँधेरा छाया- फिर से ज्योत बिखराओतुमने सदा प्यार बाँट शुभ संदेश दिया हैहमने बँट कर नफ़रतभरा अंजाम दिया हैचमत्कार फिर दिखला कर होश में लाओप्रायश्चित और प्रार्थना का मार्ग बताओयेसु! बार - बार आ कर आलोक फैलाओअँधेरा छाया- फिर से ज्योत बिखराओडॉ. कवि कुमार निर



दिन सर्दी के

दिन सर्दी के भीने भीने भोर सुहानी रेशम जैसे।माँ की ममता जेसे मीठी सर्दी के दिन भी हैं वैसे। धूप सुहानी सर्दी की यह थिरक रही आँगन में ऐसे। फूल-फूल पर मंडराती है नन्हीं मुन्नी तितली जैसे। इसकी छुअन बड़ी अलबेली छू लेती है मन को ऐसे।गंगा-जल



नेह

नेहरंग-कद-नाम-जुबान-जात-देश मत तूं देखछलकते हुनर को, रुहानी ओज को रे परखबहाया नेकी का उछलता जहाँ में दरियाबदी को मैंने कबका कह दिया अलविदाहौसला है चाँद-सितारों के पार जाने काबेवफाई को नज़र-अंदाज़ करते रहानेह का फ़कीर मैं, सिद्दतें करता हीं रहाडॉ. कवि कुमार निर्मल



नारायणी

स्वीकृति / अस्वीकृति के बीचकेवलएक 'अ' का नहीं,अपितुअसमान विचार-धाराओं का,सोच का,भावनाओं का गहन अंतर होता है। इन दोनों के बीच,पैंडुलम सा झूलता मनव्यक्तिगत संस्कारोंऔर धारणाओं के आधार पर हीनिजी फ़ैसले करता है। आज,भ्रमित-मानसिकता के कारणभयमिष्रित ऊहापोह में भटकते हुएहमभ्र



माँ की वेदना

आज एक गर्भवती महिला मेरे क्लीनिक में आई और गर्भ परीक्षण के लिए मुझ पर दबाव बनाई , मैंने बोला गर्भ परीक्षण कानूनन जुर्म है अगर तुम्हें लड़की होगी तो शायद तुम गिरा दोगी बेटा ही घर का नाम रोशन करें यह जरूरी तो नहीं बेटियां भी घर का नाम रोशन करती हैंतो वह बिफर गयी और चिल्लाते हुए बोली हे अंधे इंसाफ और ब



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