कविता

मानस गीत मंजरी

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देश बचाना

कवितादेश बचानाविजय कुमार तिवारीस्वीकार करुँ वह आमन्त्रणऔर बसा लूँ किसी की मधुर छबि,डोलता फिरुँ, गिरि-कानन,जन-जंगल, रात-रातभर जागूँ,छेडूँ विरह-तानरचूँ कुछ प्रेम-गीत,बसन्त के राग। या अपनी तरुणाई करुँ समर्पित,लगा दूँ देश-हित अपना सर्वस्व,उठा लूँ लड़ने के औजारचल पड़ूँ बचाने देश,बढ़ाने तिरंगें की शान। कु



आसान नहीं था वो दिन मेरे लिए

उस दिन चूड़ियों से मैंअपने हाथ की नब्ज नहीं काटी , और न ही स्लीपिंग पिल्स का एक्स्ट्रा डोज लेकर , गहरी नींद में हमेशा के लिए सो गयी थी ,जैसा की फिल्मों में अक्सर नायिका करती है ा आसान नहीं था वो दिन मेरे लिए ,टूटे दिल के तमाम टुकड़े को समेटकर ,बनावटी मुस्कुराहट के पू



चुनावी समर

इस चुनावी समर का हथियार नया है। खत्म करना था मगर विस्तार किया है। जिन्न आरक्षण का एक दिन जाएगा निगल, फिलहाल इसने सबपे जादू झार दिया है। अब लगा सवर्ण को भी तुष्ट होना चाहिए। न्याय की सद्भावना को पुष्ट होना चाहिए। घूम फिर कर हम वहीं आते हैं बार बार, सँख्यानुसार पदों को संतु



गरीबों की बस्ती

कहते है कि.... गरीबों की बस्ती मे... भूक और प्यास बस्ती है... आँखों में नींद मगर आँखें सोने को तरसती है... गरीबों की बस्ती मे... बीमारी पलती है... बीमारी से कम यहा भूक से ज्यादा जान जलती है... गरीबों की बस्ती मे... लाचारी बस्ती है... पैसे की लेनदेन मे ही जिंदगी यहा कटती है... गरीबों की बस्ती मे... श



नगीने

मुहब्बत खुद उमड़ती है कभी हम तुम जो मिलते हैंमहकते फूल देखो कितने फिर बगिया में खिलते हैं भले आवाज़ ना आए पर हम सब कुछ समझ लेंगेतेरे लब क्या बताने को इतने धीमे से हिलते हैंकठिन राहों पे उल्फ़त की सभी तो चल नहीं पाते डटे रहते हैं जो इन पे बदन उनके ही छिलते हैंये क्या दुनिया बन



खजाना

मैं तो तेरी दीवानी हूँ तू भी मेरा दीवाना हैंहर हाल में हमको तो ये रिश्ता निभाना हैतलाशा उम्र भर जिसको उसे मैं छोड़ दूँ कैसेमुहब्बत से भरा ए मीत तू ऐसा खजाना हैसुकूँ मिलता है मेरी रूह को जो गुनगुनाने सेओ मेरे साथियां तू ही तो वो मीठा तराना हैमुझे एहसास है देखो नहीं अब दूर तू मुझसेतभी तो बन गया ये आलम



अभिमान

देखती हूँ तुझे तो मुझको ये अभिमान होता है सिमट के बाहों में तेरी कितना सम्मान होता है अपनी आँखों से तूने मुझपे जैसी प्रीत बरसाईवही पाने का बस मनमीत का अरमान होता हैदीवानापन ना हो दिल में तो संग कैसे रहे कोईमहल भी ऐसे लोगों का फ़कत वीरान



प्यासा

सुकूँ पाना ज़माने में कभी होता ना आंसा हैकमी जल की नहीँ है पर समुन्दर देख प्यासा हैराह मंज़िल की पाने को चला हूँ मैं तो मुद्दत सेमगर ना रोशनी बिखरी ना ही हटता कुहासा हैबड़ा मजबूत हूँ मैं तो दिखावा सबसे करता हूँ मेरे अशआर में पर हाल ए दिल का सब खुलासा हैगैर तो गैर थे पर चोटें तो अपनों ने दीं मुझकोमगर त



बूढ़ा आदमी

कविता(मौलिक)बूढ़ा आदमीविजय कुमार तिवारीथक कर हार जाता है,बेबस हो जाता है,लाचारजबकि जबान चलती रहती है,मन भागता रहता है,कटु हो उठता है वह,और जब हर पकड़ ढ़ीली पड़ जाती है,कुछ न कर पाने पर तड़पता है बूढ़ा आदमी। कितना भयानक है बूढ़ा हो जाना,बूढ़ा होने के पहले,क्या तुमने देखा है कभी-तीस साल की उम्र को बूढ



स्नेह निर्झर

कवितास्नेह निर्झरविजय कुमार तिवारीऔर ठहरें,चाहता हूँ, चाँदनी रात में,नदी की रेत पर।कसमसाकर उमड़ पड़ती है नदी,उमड़ता है गगन मेरे साथ-साथ। पूर्णिमा की रात का है शुभारम्भ,हवा शीतल,सुगन्धित।निकल आया चाँद नभ में,पसर रही है चाँदनी मेरे आसपास,सिमट रही है पहलू में।धूमिल छवि ले रही आकर,सहमी,संकुचित लिये वयभा



परछाई

जब रहता कोई नहीं संग तब भी संग रहती परछाई तन्हा जब सभी छोड़ देते फिर भी साथ रहती परछाई भोर से लेकर साँझ ढले तक साथ में रहती परछाई खुशी में तो साथ रहते सभी ,किन्तु धुप में साथ रहती केवल परछाई



फिर आज तुम्हारी याद आयी

फिर आज तुम्हारी याद आयी,फिर मैंने तुम पर एक गीत लिखावहीं लिखा जो लिखता आया हूँतुमको फिर अपना मीत लिखा।फिर आज तुम्हारी याद आयी...जिन कदमों की आहट भर से,बढ़ जाती है लय इन सांसों कीउन कदमों को लिखा बांसुरीसांसों की लय को संगीत लिखा।फिर आज तुम्हारी याद आयी....मेरी नजरों से तो हो ओझल तुमपर फिर भी हो मेरे



जाग उठो ऐ बेटियों ,अब कोई तेरा रक्षक नहीं

जाग उठो ऐ बेटियों ,अब कोई तेरा रक्षक नहीं , खतरे में है वजूद तेरा,बैठा है घात लगाए तेरा भक्षक कहीं,बहुत बहा लिए आँसू तुम,अब आँखों से बहा अंगार सिर्फ,कि ये क्रूर दुनिया, सिवाय ज्वाला के आंसुओं से पिघलता नहीं ाभ्रम में तुमको रखा गया है



मैं रथ का टूटा हुआ पहिया हूं - डॉ. धर्मवीर भारती | Hindi Poem | Dharmvir Bharti

श्री धर्मवीर भारति हिंदी साहित्य के प्रयोगवादी कवि थे | डॉ. भारति हिंदी की साप्ताहिक पत्रिका 'धर्मयुग' के प्रधान संपादक थे। भारत सरकार द्वारा 1972 में डॉ. धर्मवीर भारती को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। रथ का टूटा हुआ पहिया हूं धर्मवीर भारति की सर्वश्रेस्ट और लोकप्रिय कविताओं में से एक है | महाभारत



भगवान शिव

महादेव को शब्दों में बांधना असंभव है फिर भी मैंने एक प्रयत्न किया है कि मैं जगत के स्वामी देवाधिदेव महादेव को अपनी कविता के माध्यम से आप सबके समझ उनके स्वरूप का वर्णन करने का प्रयत्न करूँ।हर हर महादेव



बातें कुछ अनकही सी...........: शनाख़्त मोहब्बत की

शनाख़्त नहीं हुई मोहब्बत की हमारी जज़्बात थे,सीने में सैलाब था पर गवाह एक भी नहीं लोगों ने जाना भी,बातें भी की पर समझ कोई न सका समझता भी कैसे अनजान तो हम भी थे एक हलचल सी होती थी जब भी वो गुज़रती थी आहिस्ता आहिस्ता साँसें चलती थी एक अलग सी दुनिया थी जो मैं महसूस करता था मेरी



बातें कुछ अनकही सी...........: एक कविता मेरे नाम

बात तब की है जब मैं धरती पर अवतरित हुआ चौकिए मत हमारा नाम ही ऐसा रखा गया युगेश अर्थात युग का ईश्वर अब family ने रख दी हमने seriously ले ली खुद को बाल कृष्ण समझ बैठे खूब मस्ती की पर गोवर्धन उठा नहीं पाए पर पिताजी ने बेंत बराबर उठा ली और कृष्ण को कंस समझ गज़ब धोया मतलब सीधा-



देहरी

तन और मन की देहरी के बीच भावों के उफनते अथाह उद्वेगों के ज्वार सिर पटकते रहते है। देहरी पर खड़ा अपनी मनचाही इच्छाओं को पाने को आतुर चंचल मन, अपनी सहुलियत के हिसाब से तोड़कर देहरी की मर्यादा पर रखी हर ईंट बनाना चाहता है नयी देहरी भूल कर वर्जनाएँ भँवर में उलझ मादक गंध में बौराया अवश छूने को मरीचिका



सबकुछ हो चुका है

सबकुछ हो चुका है: उत्तेजित-से स्वर में उनके सामने पढ़ रहा था मैं अपनी कुछ पसंदीदा कविताएँ,और वह भी उन्हीं की भाषा में लिखी हुई उन्हीं के कवियों की उस वक़्त शायद मेरी आँखें चमक रही थीं एक के बाद एक पंक्तियाँ सामने आ रही थीं एक के बाद एक पन्ने पलट रहा था और उनके सामने रख रहा था कुछ बेजोड़ चीज़ें, जो उन्ही



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