कविता



अभिव्यक्ति-दंश

मेरी चित्रलेखा की खिलखिलाहट मुझे निमंत्रण कर रही हैअज्ञात प्यास-कुण्ड में निमग्न हो जाने के लिए।सम्मोहक शक्ति के संस्पर्श और संघर्षण मेरी देह के आचरण की पट-कथा लिख रहे हैं और मैं सूत्रधार के रूप मेंअपनी ही पराजय की पृष्ठभूमि सुना रहा हूँ। --- डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ०पृथ्वीनाथ



एक अभिव्यक्ति

जुल्म करके भी तुम मुकर जाते हो,ऐसी फ़ित्रत कहाँ से तुम लाते हो?दर्द का एहसास अब भी होता मुझे,जब मुश्किलात में ख़ुद को पाते हो।मेरा रहगुज़र अब कहीं दिखता नहीं,बूढ़े ज़ख़्म को अब क्यों दिखाते हो?उसकी कैफ़ीयत अब सवाल करती,उस शख़्स को भला क्यों सताते हो?कुछ लोग रस्सी को साँप बनाते यों ही,अपनी बातों में भला क्यो



दुर्गा ! तेरे रूप अनेक. .

दुर्गा! तेरे रूप अनेक - माँ दुर्गा, भिक्षा लेकर केलौटी माटी के प्रांगण में,आधे से ज़्यादा शेष हुएचावल उसके, ऋण-शोधन में…बाक़ी जो बचे हुए उससेकैसे पूरा होगा, गणेश !कार्तिकेय भूख से बिलख रहागांजा पीकर बैठे महेश…इतने अभाव की सीमा मेंलक्ष्मी, सरस्वती भी पलती है,दुर्गा आँसू



बह गए बाढ़ में जो. .

बह गए बाढ़ में जो. . कुछ दिन तो ठहरो प्रियतम! मत आना मेरे सपनों में, मैं ढूँढ़ रहा हूँ तुमको ही, 'दरभंगा' के डूबे अपनों में.. '' कोसी' में डूबे कुछ अपने, कुछ 'ब्रह्मपुत्र' की भंवरों में,कुछ 'बागमती' से दरकिनार, कुछ 'घाघरा' की लहरों में..मैं यह कह कर के आया था, लौटूं



इस्तीफा

कांग्रेस में बढ़ते इस्तीफे का चलन देखकर मेरी पत्नी का शौक चर्राया.. और उसने कुछ लिख कर एक कागज़ का टुकड़ा मेरी तरफ बढ़ाया .."चालीस साल तक तुम्हारे साथ रहने के बाद तुम्हारी जवानी खो जाने की ज़िम्मेदारी ले रही हूँ,और इसीलिए "गृहणी " के पद से इस्तीफा दे रही हूँ."बेबस कांग्रेस की तरह मैंने भी चारो तरफ नज़र



तुमसे हे पिता

पिता पर लिखी अपनी एक बहुत पुरानी रचना याद आ गयी..कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ.."तुमसे हे पिता !"कितनी मन्नत कितनी पूजा,कितनी कामना किया होगा,पुत्रों का पथ हो निष्कंटक पल पल आशीष दिया होगा...मेरे लिए कभी तुमने रूखी सूखी रोटी खायी ,दरदर भटके मेरी खातिर संचित की पाई-पाई .



बंधे बंधे से साथ चलें

बंधे बंधे से साथ चलें ...मैं अक्षर बन चिर युवा रहूं, मन्त्रों का द्वार बना लो तुम,हम बंधे बंधे से साथ चलें, मुझे भागीदार बना लो तुम.जीवन की सारी उपलब्धि, कैसे रखोगे एकाकी? तुमको संभाल कर मैं रखूँ, मेरे मन में जगह बना लो तुम.कोई मुक्त नहीं है दुनिया में, ईश्वर, भोगी या संन्यासी,प्रिय! कैसे मुक्



तू कविता हैं मुझ बंजारे की

तू कविता हैं मुझ बंजारे की, सुबह की लाली, शाम के अँधियारे की, वक्त के कोल्हू पे रखी, ईख के गठियारे की, हर पल में बनी स्थिर, नदियों के किनारे की, सूरज की, धरती की, टमटमाते चाँद सितारे की, हान तू कविता है मुझ बंजारे की। तू कविता हैं मुझ बंजारे की, रुके हुए साज पर, चुप्पी के इशारे की, इस रंगीन समा में



चटकांगनाएँ

सज सवंरके आती हैं जब वो सखियों के संग में लजाती लुभाती स्वयं में सकुचाती हर क़दम हर आहट पे रखती हैं ध्यान कहीं कोई अनजाना रस्ता न रोक ले कोई छू न ले उन अनछुई कोमल कलियों को



"मंगल गीत "

"मंगल गीत "-------------जालिम सर चढ़ बोल रहा है, बंदूकों के साये में वन्देमातरम में कब तक हम, कौम को जगायेंगे | नरमुण्ड माला वाली माँ, कितना उसे दिखाएँगेखून के प्यासे कातिल भरमाते आएंगे- भरमाएंगे ||तीर -त्रिशूल पे कहाँ तक, विषधर का थूक लगाएंगे जावाज़ खड़ा भारत मेरा कब हम जय हिंद गाएंगे | माना युद्ध



कविता



बातचीत की खिड़की

एक दिन जी मेल पर…अवसर मिला लॉग इन करने का.…सोचा सब दोस्तों से कर लूँगा बातचीत…जान लूँगा हाल उनके …और बता दूंगा अपने भी.…एक दोस्त को क्लिक किया …. चैटिंग लिस्ट में से ढूंढ कर…चेट विंडो में उसकी … लाल बत्ती जल रही थी.…जो एक चेतावनी दे रही थी.…दोस्त इज बिजी, यू मे इन्टरुप्टिंग.…हमे आया गुस्सा … बोले चे



हिंदी भाषा

कई दशको पहले, यदि भारत में कुछ ऐसा घट जाता,जिस से ये देश धन सम्पन्न और विकसित बन जाता, चहुँमुखी विकास के साथ साथ,अन्तराष्ट्रीय व्यापर भी शशक्त हो जाता, और शशक्त हो जाती हिंदी भाषा, भारत में तो चारो और हिंदी बोली जाती ही ,और विदेशी भी हिंदी बोलते हुए आता,लड़खड़ाती हुई हिंदी बोलते हुए जब विदेशी आता,तो म



मैं भी देख दीवानी बन गई हूं

ए हमदम मेरे और दीवाने मेरे मैं भी देख दीवानी बन गई हूं मुहब्बत का तेरी ऐसा असर है हरी बेल सी आज मैं तन गई हूं मेरा मोल समझा ना पहले किसी ने मुझको फकत एक नाचीज समझा तूने मोल मेरा है जब से बताया अब तो मैं अनमोल बन धन गई हूं अकेली थी जब तो हिम्मत नहीं थी चारो तरफ नाग लहरा रहे थे जब से मिला है तेरा साथ



झंकार

अगर प्यार होता नहीं मेरे मन में तो कैसे मैं इसका इकरार करती कितना भी चाहे तू मुझको लुभाता इसका ना हरगिज मैं इजहार करती औरत के मन में बसे गर ना कोई उससे वो फिर दूरियां है बनाती फिर भी अगर कोई पीछा करे तो ऊंची मैं छिपने को दीवार करती राहों में तेरी पलके बिछा कर बैठी हूँ कब से तुझे देखने को अगर मेरे दि



जादू

वो जादू है मुहब्बत में जवां जो मन को करता है ना जाने फिर भी क्यों इंसान प्रीति धन को करता है बोल वो प्यार के तेरे समां जाते हैं नस नस में लहू सा बन के फिर ये प्रेम शीतल तन को करता है मुहब्बत की आस पाले नाचते मोर को देखो मोरनी से मिलन को प्यार वो इस घन को करता है मुहब्बत के वार से ही उसने दुनिया हरा



खबर लो

मधुर मिलन की है आस मन में कोशिश जरा तो कर लो मुझको लगाओ सीने से अपने बाहों के बीच भर लो ये जिंदगी है कुछ पल का मेला सोचो ना हद से ज्यादा औरों की सुन के देखो ना हरदम सूनी कोई डगर लो दिल में छुपा के कब तक रखोगे मन जो भी कह रहा है अधरों के बीच तुम भी सनम ए मेरी ही सांस धर लो इंसान हो तो इंसा रहो ना भगव



निःस्तब्धता

टूटी है वो निस्तब्धता,निर्लिप्त जहाँ, सदियों ये मन था!खामोश शिलाओं की, टूट चुकी है निन्द्रा,डोल उठे हैं वो, कुछ बोल चुके हैं वो,जिस पर्वत पर थे, उसको तोल चुके हैं वो,निःस्तब्ध पड़े थे, वहाँ वो वर्षों खड़े थे, शिखर पर उनकी, मोतियों से जड़े थे, उनमें ही निर्लिप्त, स्वयं में संतृप्त, प्यास जगी थी, या



एक जीवन

गुड़िया रानी गुड़िया रानी क्या हाल है , ये देखो ना माँ ने अभी दूध पिलाया है । गुड़िया रानी गुड़िया रानी क्या हाल है , ये देखो ना कैसे मैंने बैठना सीखा है । गुड़िया रानी गुड़िया रानी क्या हाल है , ये देखो ना कैसे मैंने चलना सीखा है । गुड़िया रानी गुड़िया रानी क्या हाल है , ये देखो



पूरक एक दूसरे के

मूक बधिर सत्य, स्थिर खड़ा एक कोने में, बड़े ध्यान से देख रहा है, सामने चल रही सभा को, झूठ, अपराध, भ्रष्टाचार इत्यादि, व्यस्त है अपने कर्मो के बखानो में, सब एक से बढ़ कर एक, आंकड़े दर्शा रहे है, सहसा दृष्टि गयी सामने सत्य की, सिर झुकाये सोफे पर बैठा, आत्मसम्मान, सब कुछ देख



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