कविता



जब तुम मुस्कराते हो

जब तुम मुस्कराते हो तो मुरझाए फूल खिल जाते है हवाएँ ठंडी हो जाती है पर्वत झुक जाते है नदियाँ गीत गाती है चिड़िया नृत्य करती है पगडंडी पर घास फैल जाती है अंधेरा खुद को समेट लेता है सूरज अपनी किरणों को बड़ा देता है सागर लहरों को नीचे कर लेता है दरिया गड्डो को जल से भर देता है तेरे मुस्कुराने से जो नही



हवा को चलने दो

होने दो हवा को चलने दो बारिश को आने दो शेर को खाने दो जो हो रहा होने दो बादल बनेंगे बिगड़ेंगे तूफान आयेगा जाएगा मुझे इससे क्या लेना जो हो रहा होने दो कोई भूख से रोता है तो कोई अन्याय से तो क्या ?इनको रोने दो जो हो रहा है होने दो किसी को वोट की पड़ी है तो किसी को देश भक्ति की बाढ़ से किसी



सुनो मंझिलो दौड़ कर हम नहीं आएँगे खुद को तेरे काबिल हम बनाएँगे तेरे मुसाफिर खुद हमें बुलाने मेरा दरवाज़े खटखटाएंगे

सुनो मंझिलो दौड़ कर हम नहीं आएँगे खुद को तेरे काबिल हम बनाएँगे तेरे मुसाफिर खुद हमें बुलाने मेरा दरवाज़े खटखटाएंगे



समस्या कोई भी हो हमेशा ग़रीब रोता

चारों तरफ लगी है आग अब तो प्यारे तू जाग मज़हब के नाम पर लड़ाते राजनेता जहरील है नाग बचपन से मीठा जहर पिलाते हमको लड़ाते और खुद शांति से शासन करते जाते गरीबो की इनको चिंता नहीं इनकी योजनाएँ कागज़ों में पड़ी है कहीं थोड़ा सा काम क्या कर दे विज्ञापनों में दोहराते है वही इनको मंदिर की पड़ी है इनको मस्जिद



तुम खुशबू हो तो मैं हवा हूँ

तुम खुशबू हो तो मैं हवा हूँ तुम भावना हो तो मैं विश्वास हूँ तुम धड़कन हो तो मैं सांस हूँ तुम ग़ुलाम हो तो मैं दास हूँ तुम आसमान हो तो मैं धरती हूँ तुम कमीज़ हो तो मैं धोती हूँ तुम लहसुन हो तो मैं पोती हूँ तुम धैर्य हो तो मैं शांति हूँ तुम आंदोलन हो तो मैं क्रांति हूँ।



तुम खुशबू हो तो मैं हवा हूँ

तुम खुशबू हो तो मैं हवा हूँ तुम भावना हो तो मैं विश्वास हूँ तुम धड़कन हो तो मैं सांस हूँ तुम ग़ुलाम हो तो मैं दास हूँ तुम आसमान हो तो मैं धरती हूँ तुम कमीज़ हो तो मैं धोती हूँ तुम लहसुन हो तो मैं पोती हूँ तुम धैर्य हो तो मैं शांति हूँ तुम आंदोलन हो तो मैं क्रांति हूँ।



बुढ़ापे के दिन तुझे भी सतायेंगे

उनके भी आयें है तेरे भी आयेंगे बुढ़ापे के दिन तुझे भी सतायेंगे पल पल बदले रहा है समय तेरा यह ना भूल समय ने डाला है घेरा इस जग में ना तेरा,ना है कुछ मेरामृत्यु के काल ने नहीं होने दिया सवेरा



दुनिया से ममता चुरा लाऊंगा

दुनिया से ममता चुरा लाऊंगा प्यार सारे जहाँ का मैं पाउँगा आप नाराज़ हो मेरी नवाज हो मेरी धड़कन आप से ,आप मेरी साज़ हो...



तुझे मंज़िल का होना है

अभी तो तुझे जलना है जलकर ही बनता सोना है खुद से अभी संघर्ष होना है थोड़ा रोना है थोड़ा खोना है टूटना है बिखरना है जुड़ना है जोड़ना है मंज़िल अब दूर नहीं राही तुझे मंज़िल का होना है...



सीताराम

हाथों में फूल, मूड है कूल सोना चाँदी से सजी है मूर्ति सीताराम की और से आप सभी को हैप्पी गणेश चतुर्थी। .



बचपन में रोते और रुलाते हम हंसते और मुस्कुराते।

ना तुमसे हमें मिलते ना हमसे तुम दिल लगाते ना हम हैरान होतेतेरे छोड़ जाने पर ना हम रोते इस दुनिया के नियम खास तुम्हें पता होते तो हमसे दिल ना लगाते ना हम तुम पर मेहरबान होते ना तुमसे दिल लगाते ना तुम हमें याद यू आते तेरी यादों में ना खुद को यू रुलाते ना कविता लिखते ना कलम चलाते ना खिलें फूलों को स



जिंदगी पल दो पल की ना कल थी ना कल की पल में जिंदगी खिलती और आज में जिंदगी मिलती

जिंदगी पल दो पल की ना कल थी ना कल की पल में जिंदगी खिलती और आज में जिंदगी मिलती..



जो खुद से प्रेम नहीं करता वो दूसरों से क्या प्रेम करेगा ?

सारा जहाँ प्रेम का भूखा है जहां मिला वहां झुका है जो खुद से प्रेम नहीं करता वो दूसरों से क्या प्रेम करेगा ?जो खुद का ज़ख्म नहीं भरसकता वो दूसरों का क्या भरेगा ?जो खुद खुश नहीं रह सकतावो दूसरों को खुश रखने का वादा करेगा खुशी खुद में है यह ढूढ़ने का ना इरादा करेगाजो खुद से प्रेम नहीं करता वो दूसरों से क



क्यों नहीं रब आता है

हवा की लहर ने पत्ते को कली से अलग किया सच्चा प्रेम था ,सच्चे प्रेम को एक लहर ने दर्द दिया। ... कली रोती हुई कहती है मुझे में शक्ति थी की मैं चाहती तो अलग ना होती लेकिन पेड़ के प्रति जिम्मेदारियों ने मुझसे मेरा प्रेमी छिन लिया लोग कहते है प्रेम में शक्ति होती है तो कहा गई वो शक्ति क्या प्यार इतना



जब हम मिले तो

जब हम मिले तो चाहे कम ही मिले लेकिन जब भी मिले सतरंगी फूल हो खिले सूरज हो लाल मुस्कुरा रहे हो गाल मोरनी सी हो चाल खेतो में पकी हो दाल चिडियाए हमें देख रही हो बैठी डाल - डाल मेरी आँखे तेरी आँखो में तेरी आँखे मेरी आँखो में आँखो आँखो में यू ही गुजर जाए सालो साल...



नाम आप ही देना

नाम आप ही देना स्वर्ग में कन्हैया से राधा कहती जीवन भर मैं तेरे इंतजार में रोती रहती कन्हैया नाम रात दिन रटती रहती लौट आएगा मेरा कन्हैयाखुद को यह झूठा दिलासा देती तू राजा बनकर अंहकारी हो गया तभी से मेरा कन्हैया संसार से खो गया कन्हैया बिना राधा नहीं उस दिन के बाद मैने एक दिन भी निकाला नहीं तू राजा



प्रकृति का कर्ज है

क्या हो रहा है चित्त कहा खो रहा है खिले हुए फूल मुझे बुलाते है यह पेड़ पौध कुछ कहना चाहते है हवाए मुझे कुछ सुना रही है कानो के पास आकर गुन गुना रही है यह पक्षी ,यह अंबर ,यह जल की बुँदे चीटियों के झुंड रात में चमकते तारे बारिश में चलती बहारेयह पठार यह मिट्टी ,छिपकली मछर मक्खी मोबाइल मोमबत्ती जैसे मे



राखी हूँ

थोड़ी सी डरती हूँ थोड़ी झगड़ती हूँ प्यार बहुत सारा भाई से करती हूँ। ... मै मेरे भाई की परी हूँ जब भी साथ वो होते किसी से नहीं डरी हूँ सारी दुनिया में एक भाई तो है जिस पर विश्वास करी हूँ एक अच्छा भाई सुलभ प्राप्त नहीं होता वो तो लाखो में एक होता है भाई को जो बहन रक्षा ब



हिंदुस्तान के युव हिंदी अब कहते भी शर्माते हैं

हिंदी दिवस पर विशेष___ *प्रतियोगिता हेतु* *मातृभाषा,हिन्दी* *हास्य,कविता* 🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦 देश हमारा उन्नति पर है, सब अंग्रेजी बतलाते हैं ।हिंदुस्तान के युवा हिंदी, अब कहते भी शर्माते है ।🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷कविता हो या छन्द-वन्दना,



जीवन

अभी दो तीन पूर्व हमारी एक मित्र के देवर जी का स्वर्गवास हो गया... असमय...शायद कोरोना के कारण... सोचने को विवश हो गए कि एक महामारी ने सभी को हरा दिया...ऐसे में जीवन को क्या समझें...? हम सभी जानते हैं जीवन मरणशील है... जो जन्माहै... एक न एक दिन उसे जाना ही होगा... इसीलिए जीवन सत्य भी है और असत्य भी...



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