कविता



मेरी डायरी

क्या लिखा होता है मेरी डायरी में यही कुछ नज्में कुछ शायरी कुछ गजलें और कुछ आधी अधूरी सी कविताएँ और इन्ही कविताओं में कुछ रोता बिलखता ,कुछ टुटा फूटा कुछ ख्यालों में खोया ,और कुछ खुद में ही बातें करता हुआ शब्द कुछ पन्नों पर स्याही पि



कंदराओं में पनपती सभ्यताओं

कंदराओं में पनपती सभ्यताओं✒️हैं सुखी संपन्न जग में जीवगण, फिर काव्य की संवेदनाएँ कौन हैं?कंदराओं में पनपती सभ्यताओं, क्या तुम्हारी भावनायें मौन हैं?आयु पूरी हो चुकी है आदमी की,साँस, या अब भी ज़रा बाकी रही है?मर चुकी इंसानियत का ढेर है यह,या दलीलें बाँचनी बाकी रही हैं?हैं मगन इस सृष्टि के वासी सभी गर,



पर्यावरण अधिकारी

प्रकृति की, स्तब्धकारी ख़ामोशी की, गहन व्याख्या करते-करते, पुरखा-पुरखिन भी निढाल हो गये, सागर, नदियाँ, झरने, पर्वत-पहाड़, पोखर-ताल, जीवधारी, हरियाली, झाड़-झँखाड़,क्या मानव के मातहत निहाल हो गये?नहीं!... कदापि नहीं!!औद्योगिक क्राँति, पूँजी का ध्रुवीकरण, बेचारा सहमा सकुचाया मा



दुःख से साक्षात्कार

बहुत दिन हो गए दुःख को यहाँ आये,जमाना बीत गया यहाँ पैर फैलाये,सोचा आज कर ही लेते है दुःख से साक्षात्कार,पूछ लेते है क्या है इसके आगे के विचार,हमने पूछा दुःख से थोडा घबरा कर,वो भी सहम गया हमे अपने पास पाकर,आजकल काफी पहचाने जा रहे हो,महंगाई ,गरीबी, गैंगरेप आदि विषयो से चर्चा में आ रहे हो...दुःख चोंका,



तस्वीर

एक तस्वीर है मेरी आँखों में , मैं नहीं जानती यह तस्वीर किसका है ,शायद ये किसी जनम का एक ख्याली सच है ,जो हमेशा मेरी तस्वुर में बहता है ,मैं खुद में रहूँ या न रहूँ ,मगर यह तस्वीर मुझमें हमेशा रहता है ,यह तस्वीर भी बेरंग है ,बिलकुल म



नियम प्रकृति का

नियम प्रकृति का सरल नहीं पकड़ना / पुष्पों के गिर्द इठलाती तितलीको |हर वृक्ष पर पुष्पित हर पुष्प उसका है तभी तो इतराती फिरती है कभी यहाँ कभी वहाँ /निर्बाध गति से…बाँध सकोगे मुक्त आकाश में ऊँची उड़ान भरतेपक्षियों को ?समस्त आकाश है क्रीड़ास्थली उनकी हाथ फैलाओगे कहाँ तक ?कितने बाँध बना दो कल कल छल छल करती



ये आसमान मेरा गला सुख रहा है

तप-तप कर यह जल रही है , देखो तेरी धरा मर रही है ,ऐ आसमा मेरा गला सुख रहा है ,तेरी बेरुखी से मेरा दिल दुःख रहा है ,मैं प्यासी हूँ , जग प्यासा है ,देखो इस धरा का कण कण प्यासा है ,विकल पंछी चोंच खोलकर तुम्हारी तरफ देख रहा है ,है तुम्



हौसला



इन्तज़ार करता रहा

मै बिना टिकट के सफर करता रहा स्टेशन पर टीटी मेरा इन्तज़ार करता रहा आसमान से गिरा हू तो ख़जूर में क्यू अटकू मै गिरा आम के बगीचे में , ख़जूर मेरा इन्तज़ार करता रहा दिले इश्क़ का मरीज़ हू तो आऊँगा जरूर , ये सो



आत्मा

मंज़िल का भान हो न हो / पथ का भी ज्ञान हो न हो आत्मा – हमारी अपनी चेतना / नित नवीन पंख लगाए सदा उड़ती ही जाती है / सतत / निरन्तर / अविरत...क्योंकि मैं “वही” हूँ / मेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं “अहम् ब्रह्मास्मि” या कह लीजिये “सोSहमस्मि”तभी तो, कभी इस तन, कभी उस तनकभी तेरे तन तो कभी मेरे तन | न इसके पंख



निस्वार्थ प्रेम ही है ध्यान

निस्वार्थप्रेम ही है ध्यानसंसार के समस्त वैभव होते हुए भीकँगाल है मनुष्य, रीते हैं हाथ उसके यदि नहीं है प्रेम का धन उसके पास...किया जा सकता है प्रेम समस्त चराचर से क्योंकि नहीं होता कोई कँगाल दान करने से प्रेमकाजितना देते हैं / बढ़ता है उतना ही...नहीं है कोई परिभाषा इसकी / न ही कोई नाम / न रूपबस है



याद तुम्हारी -- नवगीत

मन कंटक वन में-याद तुम्हारी -खिली फूल सीजब -जब महकीहर दुविधा -उड़ चली धूल सी!!रूह से लिपटी जाय-तनिक विलग ना होती,रखूं इसे संभाल -जैसे सीप में मोती ;सिमटी इसके बीच -दर्द हर चली भूल सी !!होऊँ जरा उदासमुझे हँस बहलाएहो जो इसका साथतो कोई साथ न भाये -जाए पल भर ये दूर -हिया में चुभे शूल सी !!तुम नहीं हो जो



लेखनी! उत्सर्ग कर अब

लेखनी! उत्सर्ग कर अब✒️लेखनी! उत्सर्ग कर अब, शांति को कब तक धरेगी?जब अघी भी वंद्य होगा, हाथ को मलती फिरेगी।साथ है इंसान का गर, हैं समर्पित वंदनायें;और कलुषित के हनन को, स्वागतम, अभ्यर्थनायें।लेखनी! संग्राम कर अब, यूँ भला कब तक गलेगी?हों निरंकुश मूढ़ सारे, जब उनींदी साधन



चांडाल

ये एक नकारात्मक व्यक्ति के बारे में एक नकारात्मक कविता है। इस कविता में ये दर्शाया गया है कि कैसे एक व्यक्ति अपनी नकारात्मक प्रवृत्ति के कारण अपने आस पास एक नकारात्मकता का माहौल पैदा कर देते हैं। इस कविता को पढ़ कर यदि एक भी व्यक्ति अपनी नकारात्मकता से बाहर निकलने की कोशिश भी करता है, तो कवि अपने प्



राह प्रभु की

कितना सरल है,सच?कितना कठिन है,सच कहना।कितना सरल है,प्रेम?कितना कठिन है,प्यार करना।कितनी सरल है,दोस्ती,कितना मुश्किल है,दोस्त बने रहना।कितनी मुश्किल है,दुश्मनी?कितना सरल है,दुश्मनी निभाना।कितना कठिन है,पर निंदा,कितना सरल है,औरों पे हँसना।कितना कठिन है,अहम भाव,कितना सरल है,



Maa: Happy Mother’s Day

http://www.kagajkalam.com/maa-happy-mothers-day/यह कविता मातृ दिवस के बारे में लिखी है . कुछ मेरे हास्य रस स्मिर्ति पर आधारित है



रोज आते थे मेरे छत पर सैकड़ों कबूतर

रोज आते थे मेरे छत पर सैकड़ों कबूतर , आस-पास के ही किसी छत से उड़कर ,आल्हा -ताला की कसम मेरे इरादे में कोई बेईमानी नहीं थी ,मैं कोई शिकारी नहीं एक जमीन्दार की लड़की थी ,एक काल से दूसरा काल बिता ,कई अनेक वर्षों तक सबको भरपेट दाना मिला ,ब



तुम मिले कोहिनूर से

भीगे एकांत में बरबस -पुकार लेती हूँ तुम्हे सौंप अपनी वेदना - सब भार दे देती हूँ तुम्हे ! जब -तब हो जाती हूँ विचलित कहीं खो ना दूँ तुम्हेक्या रहेगा जिन्दगी मेंजो हार देती हूँ तुम्हे ! सब से छुपा कर मन में बसाया है तुम्हे जब भी जी चाहे तब निहार लेती हूँ तुम्हे बिखर ना जाए कहीं रखना इस



कितनी बाबरी सी लड़की है वो

कितनी बाबली सी लड़की है वो , उसके दरवज्जे का चिराग हवा बुझा कर चली जाती है ,और वह जुगनू को सीसे में कैद कर देती है ,फूलों का रंग तितलियाँ चुरा ले जाती है ,और वह भँवरे से लड़ बैठती है ,आखिर कौन उसको समझाए



बातें कुछ अनकही सी...........: अवसाद

"अवसाद" एक ऐसा शब्द जिससे हम सब वाकिफ़ हैं।बस वाकिफ़ नहीं है तो उसके होने से।एक बच्चा जब अपनी माँ-बाप की इच्छाओं के तले दबता है तो न ही इच्छाएँ रह जाती हैं ना ही बचपना।क्योंकि बचपना दुबक जाता है इन बड़ी मंज़िलों के भार तले जो उसे कुछ खास रास नहीं आते।मंज़िल उसे भी पसंद है पर र



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