कविता



भैलेंटाइन परचम्

भैलेंटाइन परचम्पता नहीं था, आज भैलेंटाइन डे चल कर है आतादिन में याद दिलाते गर तो गिफ्ट-विफ्ट ले आतासाथ बैठ मोटेल में मटर-पनीर-पुलाव खाताउपर से मिष्टी आदतन रस-मलाई चार गटक जाताचल- रात हुई बहुत अब और जगा नहीं जाताभैलेंटाइन की बची-खुची कसर की पूरी कर पाताडॉ. कवि कुमार निर्मल



सफलता

सफलता..उपहार है श्रम का..स्वेद के कण-कण का..सफलता..परमानंद है..मान है सम्मान है..सफलता..श्रेय है लगन का..वटवृक्ष सी शीतल छाँव है..परिमाप है श्रेष्ठता का..सफलता..बल है संघर्ष का..मार्ग है उत्कर्ष का...है क्षण यही हर्ष का..स्वरचित :- राठौड़ मुकेश



सफलता

सफलता..उपहार है श्रम का..स्वेद के कण-कण का..सफलता..परमानंद है..मान है सम्मान है..सफलता..श्रेय है लगन का..वटवृक्ष सी शीतल छाँव है..परिमाप है श्रेष्ठता का..सफलता..बल है संघर्ष का..मार्ग है उत्कर्ष का...है क्षण यही हर्ष का..स्वरचित :- राठौड़ मुकेश



बचपन की कुछ यादें

कोई लौटा दो मुझे वो दोस्त सारे जो खेले थे साथ हमारे लड़ते झगड़ते भी थे एक दूसरे से फिर भी खुश थे सारेकहा चले गये वो दिन हमारे अब गाँव वीरान सा



मौन दुआएँ अमर रहेंगी !

श्वासों की आयु है सीमितये नयन भी बुझ ही जाएँगे !उर में संचित मधुबोलों केसंग्रह भी चुक ही जाएँगे !संग्रह भी च



सुस्वागत वसंत

"सुस्वागत वंसत"हरित-क्रांति की,प्रज्ज्वलित मशालपिली सरसों दृष्ट सर्वत्र,जिव-जंतु,समस्त विश्व.संपन्न-खुशहाल,प्रलय का भय त्याग,निर्भयता का करो वरण,अशुभ भाव त्याज्य, शुभ हों विचारस्वागत करतें है दृष्ट-अगोचर,सुहावन, 'ॠतु-बसंत बहार'माँ सरस्वती की रहे अहेतुकी कृपा,हो नित्य अद्भुत चमत्कारशुभारम्भ करो,पठन-



मुझको हैं सम्बल दे जातीं

मन भी बड़ी अजीब सी चीज़ है न ? कभी उदासी में भी मुस्काता है, और कभी आनन्द के आवेग में भी आँख भर आती है | और तब अनायास ही माँ बाबा की स्मृतियाँ और गहन होती जाती हैं | ऐसे ही कुछ पलों में लिखी गईं कुछ पंक्तियाँ... मुझको हैं सम्बल दे जातीं मन में छाता जब अँधियारा, या खुशियों की घटा उमड़ती |तब मीठी मुस्कान



पतझड़ से वसंत तक

🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵कभी पतझड़ के थपेड़ों से,मुरझा, झुक तुम जाते हो!🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿कभी वसंत की हवाओं से,मिल-जुल के मुस्कुराते हो!!🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🌞🌝🌞🌝🌞🌝🌝🌞सूरज की तपिश सह कर भी,फल-फूल डाल के लहराते हो!🌸🌷🌹🌻🌺🌻🌹🌸सावन-भादो की बौछारों से,झूम-झूम तुम इतराते हो!!⛅⚡☁☔☁⚡⛅सर्दियों के दस्तक के पहले



वसंत ऋतु की प्रथम कोपल

वसंत ऋतु और प्रथम कोपलनैसर्गिक बीज एक नील गगन से-पहला जब वसुन्धरा पर टपकामाटी की नमी से सिंचित हो वह-ध्रुतगति से निकसा- चमकाप्रकाश की सुक्ष्म उर्जा- उष्णतामाटी से मिला पोषण संचित कर-प्रथम अंकुरण बड़भागी वह पायाअहोभाग्य, पहली कोपल फुटी!लगा खोजने पादप नियंत्रक को--पर वह नहीं कहीं मिल रे पाया--हर पल महस



दुनिया का जादूगर

दुनिया का जादुगरविश्व लीला एवम् विश्व मेलातुम्हारी हीं अद्भुत रचना है।तुम्हारे दर पर इबादतखुद पर जादुगरीहर आदमी करता है।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



वसंत ऋतु आगमन्

🍀🎄🍃🌿🌴🌴🌿🍃🎄वंसंत ऋतु के अद्भुत सौन्दर्य ने,मेरे हृदय में पुरजोर अगन है लगाई!🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥 🔥 🔥तुझे पाने की चाहत ने मेरे हिया में,अश्कों की नदियाँ कई बहवाई!!💦💦💦💦💦💦💦 💦 💦 प्रगाड़ नींद्रा से झकझोर मुझे तुमने जगाया!तन्द्रा को रक्तिम-तिव्र किरणों से दूर भगाया!!☀☀☀☀☀☀☀☀☀ ☀ ☀अहिर्निष तुम्ह



वसंतोत्सव

वसंत ऋतु का यह धराधाम भारत भूखण्ड स्वागत् करता हैशिव भार्या प्रीये गंगा जटा से बह निकली- सारा जग कहता हैझरनों की वक्र धारा बन इठला कर गंगा चलती हैंपठारों पर दुस्तर पथ गह लम्बी यात्रा करती हैगंगा-सागर से मिल कपिल मुनि आश्रम तक जाती हैउत्तरांचल से चल पश्चिम तक भूमि सिं



Motivational Hindi Poetry on life - वख्त की आज़मायिश ; अर्चना की रचना

जीवन पर आधारित हिंदी कविता वख्त की आज़मायिशये जो मेरा कल आज धुंधला सा है सिर्फ कुछ देर की बात है अभी ज़रा देर का कोहरा सा हैधुंध जब ये झट जाएगी एक उजली सुबह नज़र आएगी बिखरेगी सूरज की किरण फिर से ये ग्रहण सिर्फ कुछ देर का है अभी जो अँधेरा ढीठ बना फैला हुआ है तुम्हें नहीं पता,



विद्यार्थियों के लिये

ओ' मेरे मेधावी- सात वर्षिय कलाविद्,हुनर के सागर-कला के प्रेमी,विज्ञान के शोधकर्ता,प्यार के मसिहा- निपुण सुक्ष्म विश्लेषक,मर्यादाओं की अनन्त सीमा,अपनी मन पसंद-दुनिया के मालिक,ब्रह्माण्ड के विश्व कोष,विज्ञानं, खगोल, इतिहास,और आप द्वारा प्रदत्त ज्ञान,तुम्हारा मनपसंद रंग



कहानी दिवस और निशा की

कहानीदिवस और निशा कीहर भोर उषा की किरणों के साथशुरू होती है कोई एक नवीन कहानी…हर नवीन दिवस के गर्भ मेंछिपे होते हैं न जाने कितने अनोखे रहस्यजो अनावृत होने लगते हैं चढ़ने के साथ दिन के…दिवस आता है अपने पूर्ण उठान परतब होता है भान दिवस के अप्रतिम दिव्यसौन्दर्य का…सौन्दर्य ऐसा, जोकरता है नृत्य / रविकरों



फुरकत का रंग



फुरकत का रंग

शायरी



कृष्ण

कृष्णमहाभारत का पार्थ-सारथी नहीं,हमें तो ब्रज का कृष्ण चाहिए।राधा भाव से आह्लादित मित्रों का,साथ, चिर-परिचित लय-धुन-ताल चाहिए।।प्रेम की डोर तन कर,टूटी नहीं है कभी।अंत युद्ध का,हमें दीर्ध विश्राम चाहिए।।।प्रेम सरिता में आप्लावन,अतिरेक प्यार चाहिए।दानवों का अट्टाहस नहीं



आजादी

राजनीतिक आजादी का कोई मोल है।आर्थिक आजादी अब तक रे गोल है।।खाली खजाना भर चलवाया जिनने,उनकी हीं होती सुहावनी हर भोर है।फूटपाथ से चुन खाये- जिनने तिनके,उनकी चौलों की छतों में कई होल हैं।।'आइ. पी. सी.' रट उतार लिया बचके,"अथर्व वेद" की ऋचाएँ सारी गोल हैं।अमीरों की उठ रही नित अट्टालिकायें,साधु चले



अंतिम दिन

सफर का पयाम होगा,अंतिम वो विराम होगा।श्वांस भी होगी मद्धिम,जब महाप्रयाण होगा।वो दिन आखिरी होगा.....!!!लिखती कलम शब्द जो,वो पृष्ठ भी अंतिम होगा।भाव,कल्पना मर्म सब,सदृश्य जब प्रतीत होगा।वो दिन आखिरी होगा.....!!!देह थामेगी निष्क्रियता,होगी धड़कन निस्तारित।दृश्य सब होंगे गमगीन,द्रुतयान होगा संचालित।वो दि



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