कविता

ऐतराज़...

ऐतराज़...एक दौर है ये जहाँ तन्हां रात में वक़्त कट्टा नही... वो भी एक दौर था जहाँ वक़्त की सुईयों को पकड़ू तो वक़्त ठहरता नही... एक दौर है ये जहाँ नजर अंदाज शौक से कर दिए जाते है... वो भी एक दौर था... जहाँ चुपके चुपके आँखों मैं मीचे जाते थे



उल्टा सीधा

शीर्षक - उल्टा सीधा प्रस्तुत है उल्टा पर सीधा करके। जीवन में पूरी पूरी स्वतंत्रता है;जीवन में पूरी पूरी छूट है।हम स्वयं की ऐसी तैसी करते रहें; स्वयं की ऐसी की तैसी करते रहें;स्वयं की पूरी दुर्दशा करते रहें;इसकी भी पूरी पूरी छूट है;हम इसका उल्टा भी कर सकते हैं, यहां इ



मैं कट्टर नहीं हूं

मैं कट्टर नहीं हूं स्वयं को भारतीय कहना, मानव कहना कट्टरता नहीं है; अपनी जड़ों से जुड़े रहना; जो समूचे विश्व को एक माने, एक कुटम्ब माने, ऐसी जड़ों से जुड़े रहना कट्टरता नहीं है।



प्रेम है शब्द ऐसा

हज़ारो दीप भी कम है अंधेरो को मिटाने के लियेहो संकल्प मन में अगर तो एक दीप काफी है उजाले के लिये प्रेम है शब्द ऐसा किभेद आपस के मिटाता मगरएक कटु वचन ही काफी है दोस्ती मिटाने के लियेअगर भूल जाये रास्ता कोईअगरतो दिया झोपड़ी का ही काफी है रास्ता दिखाने के लिएजीवन में लग



जीवन और परम्परा

जीवन और परम्परा परम्परा होती है परम्परा, जीवन नहीं; परम्परा होती है जीवन केलिए, परम्परा केलिए जीवन नहीं; जीवन प्रथम है परम्परा नहीं; जो परम्परा जीवन विरोधी हो जाए उसको कभी मानना नहीं; समय में पीछे झांक



प्रकृति और हम ( बच्चों केलिए )

((( बच्चों केलिए, जो दिल और दिमाग से बच्चे हैं उनके लिए, जिन्होंने स्वयं के अंदर स्वयं का बचपन जीवित रखा है ))) *प्रकृति और हम*प्रकृति का साथ देने का वादा करें;हम सब मिलकर, प्रकृति का साथ देने का वादा करें। सब में ऊर्जा भरने को, सूरज नित काम करता;हमारे जीवन हेतु,



बचपन के दिन

कल याद आ गया मुझको भी अपना बचपनखुश हुई बहुत पर आँख तनिक सी भर आयीगांवों की पगडण्डी पर दिन भर दौड़ा करतीकुछ बच्चों की दीदी थी, दादी की थी राजदुलारीरोज़ सुनती छत पर दादाजी से



बादल ने पूछा धरती से

बादल ने पूछा धरती से तुंम इतनी सहनशील कैसे रहती होमें बदली बरसा दूँ तो तुममिटटी की सुगंध बिखेर देती होझूम झूम कर बरसूं तो जल समेट लेती होबरसा दूँ ओले तो दर्द सहकर भी कुछ नही कहती होधरती मुस्काई, बोली तुंम भी पिता की तरहबच्चों के



एक अधूरी कहानी लिखकर, एक शायरा गुमनाम हो जाएगी

जो दिल में है वो मेरी जिंदगी नहीं ,जो जिंदगी हैवो मेरे दिल में नहीं ,हाथ पकड़ चल रहा है कोई ,डोर मन का खींचता है कोई,आज और कल में उलझकर , खुद से ही बगाबत कर रही हूँ मैं ,आगोश में पल रही हूँ किसी के ,आँखों में है छवि किसी और की ा जो दर्द मेरे दिल में ऊपजा है ,न



एक दर्शन

कविताएक दर्शनविजय कुमार तिवारीप्रीति को लग गया है पंख,देख तेरा सुन्दर,सुकोमल,कमनीय छंद। खुल रहे लाख बंध,अन्तर में जल गया,दीपक प्यार भरा। प्रकटन की वेला में,उड़ चली मादक गंध,मन की इस चादर पर,फैल रहा सम्मोहन,मदहोश हवा,विकल प्राण,एक स्वप्न-मधुर मिलन। भिन्न-भिन्न एक हुए,उपजी सुरम्य कान्ति,डोल रही जीवन म



मुर्ख जनता महामूर्ख प्रतिनिधि

#कंटक लगती है #राजनीति अब हमें एहसास में,कत्थक करती है जनता यहाँ प्रतिनिधि के साथ में,भक्षक लगती है राजनीति अब हमें एहसास में,जनता की सारी नब्ज़ है सियासियो के हाथ में,काली लगती है राजनीति हमे दिन और रातो में,फ़बती दिखती है नेताओ की #इंकलाबी बातो में,वार लगती है राजनीति अब हमें एहसास में,मजबूरी लगती ह



Common Sense

!! Use your common sense to know the truth!!हमे पढाया गया...👇👇“रघुपति राघव राजाराम,ईश्वर अल्लाह तेरो नाम”लेकिन असल मे ऋषियों ने लिखा था की....👇👇 “रघुपति राघव राजाराम पतित पावन सीताराम”लोगों को समझना चाहिए कि,जब ये बोल लिखा गया था,तब ईस्लाम का अस्तित्व ही नहीं था,“



जीत हमारी निश्चित है।

जीत हमारी निश्चित है।बलिदानों की किमत पर,जीत हमारी निश्चित है।किस सोच मे बैठा है तू,राष्ट्र हो गया खंडित है।बहन-बेटियों की लाज रही,किताबों तक ही सीमित है।लड़कर ही बच सकता है,बन रहा क्युँ कश्मीरी पंडित है ?भाई-चारा तेरे काम न आया,कुरान



माँ का दर्द

काश चिड़िया चहचहाती, मेरे आँगन मेंज़िन्दगी फिर मुस्कुराती,मेरे आँगन में ब्याह दी बिटिया सयानी, रच गई घर-बार मेबेटे की वो ही कहानी, हैं बहू के प्यार मेझान्झने कब झन झनझनाती, मेरे आँगन में अख़बार के प़न्ने पलटते, दिन मे वो, सौं स



सच्चा प्रेमी

कवितासच्चा प्रेमीविजय कुमार तिवारीतुमने तोड़ डाले सारे रिश्तेऔर फेंक दिया लावारिश राहों में। तुमने मुझे दोषी कहा,धोखेबाज और ना जाने क्या-क्या?तुम्हारे मधुर शब्द कितने खोखले निकले,दूर तक चलने की कसमें कितनी बेमतलबऔर तुम्हारी कोशिशें किसी मायाजाल सी। मुझे कुछ भी नहीं कहना,कोई शिकवा नहीं,कोई शिकायत नही



आस का नन्हा दीप

दीपों के जगमग त्योहार में नेह लड़ियों के पावन हार में जीवन उजियारा भर जाऊँ मैं आस का नन्हा दीप बनूँ अक्षुण्ण ज्योति बनी रहे मुस्कान अधर पर सजी रहे किसी आँख का आँसू हर पाऊँ मैं आस का नन्हा दीप बनूँ खेतों की माटी उर्वर हो फल-फूलों से नत तरुवर हो समृद्ध धरा को कर पाऊँ मैं आस का नन्हा दीप बनूँ न झोपड़



गीत

मुंडेरी मुंडेरी दिये जगमगाये | कहीं अल्पना हैं , कहींपुष्प लड़ियाँ , ( रंगोली ) नृत्य गान घर घर , भव्यपन्थ गलियाँ | यहीदृश्य होगा उस दिन अवध में , जबराम चौदह बरस बाद आये | मुंडेरी मुंडेरी दिए जगमगाए |



03 नवम्बर 2018

माँ हूँ मैं

गर्व सृजन का पाया बीज प्रेम अंकुराया कर अस्तित्व अनुभूति सुरभित मन मुस्काया स्पंदन स्नेहिल प्यारा प्रथम स्पर्श तुम्हारा माँ हूँ मैं,बिटिया मेरी तूने यह बोध कराया रोम-रोम ममत्व कस्तूरी जीवन की मेरी तुम धुरी चिड़िया आँगन किलकी ऋतु मधुमास घर आया तुतलाती प्रश्नों की लड़ी मधु पराग फूलों की झड़ी "मा



आज सिर्फ राही हूँ मैं ,अब कोई मंजिल नहीं

अतीत से दामन छुड़ाकर ,आज नये सफर का प्रारम्भ करती हूँ मैं , क्या पाया ?क्या खोया ?सब भूलकर ,एक अनजान मुसाफिर बनती हूँ मैं , दुनिया की नजरों में उलझी थी अबतक , आज गुमनामी को स्वीकार करती हूँ मैं ,कल तक भ्रम में मैं जीती रही,आज हकीकत अपनी पहचान कर , वापस जमीं पर चल



ये वक़्त भी गुजर जायेंगे



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