कविता



काँटे

तेरी हीं अद्भुत रचना मैं हूँखुशबू फैला कर मुरझा जाता हूँसिंचित करते वन माली को भीअनजाने में चुभ, पीड़ा पहुँचाता हूँचाह मगर, काँटों को छुपा नहीं पाता हूँडॉ. कवि कुमार निर्मल



साथी

साथी उसे बनाओं जो सुख दुख में साथ दे.ना कि उसे जो सिर्फ तस्वीरों में आपकी शोभा बढ़ाएं.शिल्पा रोंघे



प्रकृति की प्रगति यात्रा

प्रकृति कीप्रगति यात्राठिठुराती भीषण ठण्ड में जब प्रकृति नटी ने छिपा लिया हो स्वयं को चमकीली बर्फ की घनी चादर में… छाई हो चारों ओर घरों की छत पर और आँगन में खामोशी के साथ बरसती धुँध नहीं दीख पड़ता कि चादर के उस पार दूसरा कौन है...और फिर इसी द्विविधा को दूर करने धीरे



स्वंयवर

सीता स्वंयवर पर .....कैसे मैं पहचानू उन्हें.कैसे मैं जानूं के वो बनें हैै वो मेरे लिए.होगी सैकड़ों की भीड़ वहां.तेजस्वी और वैभवशाली तो होंगेवहां कई और भी.लेकिन सुना है मैंनें शिव का धनुषउठा सकेंगे कुछ ऐसे प्र



मैं और मेरा प्रियतम

दूर कहीं अम्बर के नीचे,गहरा बिखरा झुटपुट हो। वहीं सलोनी नदिया-झरना झिलमिल जल का सम्पुट हो। नीरव का स्पंदन हो केवल छितराता सा बादल हो। तरुवर की छाया सा फैला सहज निशा का काजल हो। दूर दिशा से कर्ण - उतरती बंसी की मीठी धुन हो। प्राणों में



स्वतंत्रता

बंद पिंजड़े से निकल जब पँक्षिआजाद हो गगन पार जाता है।मन की समस्त 'कुण्ठाओं' कोपिंजड़े में छोड़ वह आह्लादितहो गुनगुनाते उड़ता जाता है।।बँधनों से मुक्त हो- घुटन से निकस वहमुक्त प्राणी बन अराध्य तक जाता है।।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



वक्त वक्त की बात

कहते है जो ये कि वक्त के पंजों से बचालेंगे तुम्हेंवहीं सबसे बड़ेशिकारी होते हैं.शिल्पा रोंघे



आसपास

जब वे न पास हों, तुम आते हो!जब वे पास हों, चले जाते हो!!शर्म इतनी कि शर्म भी शर्माए,अपने साये से भी शर्माते हो!!!पास नहीं- छटक दूर जाते हो तुम,इशारों-इशारों से मुझे भगाते हो!रक़ीब नहीं, पर मेहरबां हो कर,क्यों (?) बिना बात यूँ जलाते हो!!मैं जब मुख़ातिब तो चुप होते,मैं सो जाऊँ तब बात करते हो!!!डॉ. कवि



वह लड़की

जूठे बर्तन साफ़ करती वह,दूध के बर्तन की चिकनाई चेहरे पर मलतीहै।कपड़ों के मैले बचे सर्फ़ में पैर डालउन्हें रगड़ती है, धोती है।झाड़ू लगाते समयआईने में स्वयं को निहारतीचुपके सेमुँह पर क्रीम या पाऊडर लगामंद मंद मु



साहस और धीरता

(साहस और धीरता)16,16 सममात्रिकजो अटल खंभ-सा खड़ा रहे,विपदा के झंझावातों में।मन में साहस की ज्योति लिए,जगता संकट की रातों में।वो ही पाता है लक्ष्य सदा,जीवन को सफल बनाता है।उसने जितने सिद्धांत दिए,जग उसको ही अपनाता है।गिरि के मस्तक पर गिरती ह



सच और झूठ

हर बार सच्चाई की सफाई देना जरुरी नहीं.कभी कभी सही वक्त सब कुछसाफ कर देता हैअपने आप ही.सूरज को ढकनेकी कोशिश करता हैबादल हर कभी, लेकिन उसे रोशनी देनेसे रोक सका हैक्या वो कभी.शिल्पा रोंघे



जनसंख्या विस्फोट

बढ़ती जनसंख्या परस्वास्थ्य सुविधाएं पड़ रही कम.महंगी हुई शिक्षा और अच्छे स्कूल हुए कम.ट्रेनों में बैठने को हुई जगह कम.महानगरों में रहने को मकान पड़ रहे कम.पेड़ और पौधे हुए कम.पीने का पानी हुआ कम.सिकुड़ रहे खेत खलिहान, अनाज हुआ कम.बढ़ रही गरीबी और महंगाई.किसी ने धर्म को तो किसी ने जातिको देश की बदहाल



मन

यादों का उँचा पहाड़सिमट कर मन में छुपकर रह जाता है।मन अटके मगर मनचुपके से बोझिल होलुप्त हो जाता है।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



जोगी बनना कहां आसान है ?

आसान नहीं है ज़िंदगीजीने का तरीका सीखलाना.आसान नहीं किसी कोसही राह दिखाना.आसान नहीं है खुद को भी बदलना, कुछ ख़्वाहिशोंको छोड़ना, कुछ सुविधाओं को त्यागना.त्याग की अग्नी में तपना औरउम्मीद के दीपक जलाना.धूप, बारिश, और ठंडको सहना.होंठो पर शिकायत कम और समाधाननिकालना.हां सचम



वो भी क्या बचपन के दिन थे

वो भी बचपन के क्या दिन थेजब हम घूमते थे और खुस होते थेतब हम रोते थे फिर भी चुप होते थेना वादे होते थे ना शिकवे होते थेबस थोड़ा लड़ते थे फिर मिलते थेवो भी क्या बचपन के दिन थेतब सब कुछ अच्छा लगता थाचाहे जो हो सब सच्चा लगता थागांव की गालिया नानी के यहाँ अच्छा लगता थाना झूठ था ना फरेब था एक दूसरे की रोटिय



जीवन साथी

प्रकृति में भांति-भांति के रंगबिखेरमन को मेरे- छोड़ दिए प्रभुसादामनमोहक संध्या हो या सुहानी भोरप्रिये बिन न रखना कभी मुझे तुम आधाडॉ. कवि कुमार निर्मल©®



मीरा के वचन मोहन के लिए

भेजा था विष का प्याला अमृत बन गया। भेजा था विषैला सांपफूलों का हार बन गया। तेरी ही करामात है ये मोहनकि कलियुग में भी जी रही हूं। बिना डरे तेरी भक्ति के गीतगा रही हूं। शिल्पा रोंघे



जीने की कला

हां दर्द सहना भी एक कला है। गम बर्दाश्त कर लेना भी एक कला है। खुद नाखुशी के दौर में रहकरदूसरों से ना जलना भी एक कला है। छिपकर रोना भी एक कला है । अंधेरे में भी जुगनू बनकर जीनाएक कला है। कहती है अगर खुदगर्ज़ दुनिया तोकहने तो कहने दो। क



मधुधवर्षण

*मधुवर्षण* अंबर में मेघों को देखो लिए हाथ में प्याले हैं। रवि,शशि दोनों दिखते छिपते सब पी कर मतवाले हैं। सभी देव पीकर लड़खाते देखो कैसी गर्जन हो रही। देखो सखी मधुवर्षण हो रही। अंबर में ज्यों लुढ़का प्याला तरु पतिका से मदिरा टपके। वर्षों से आश लगाऐ बैठा प्यासा चातक रस को झपके। उसी रसो में डूबी लतिक



प्याज में लगी आग

"प्याज में लगी आग"सात्विक हो आहारतनिक लो फलाहारठप भले हो व्यापारसुस्वागत् है सरकारसफैद या काली टोपीसरकार होती है मोटीतामसिकों की किस्मत खोटीराजसिक भी खाए दाल रोटीदो रुपये चावल किलोएक रुपया आंटा जीलोआलु राजा- "सदाबहार"थूको प्याज नहीं आहारऋषियों से करलो प्यारभगवान् खड़ा तेरे द्वारडॉ. कवि कुमार नि



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