कविता

धरती का फेरा ( बिना रदीफ की ग़ज़ल )

मुहब्बत, तूने दी मुझको, तभी मैं, हो गया तेरातू आई, मेरी बाहों में, मिटा है, कुछ तो अँधेराजब से, सूरज हुआ मद्धिम, बशर देखा, नहीं कोईमगर, उम्मीद थी दिल में, कभी फिर होगा, सवेराबहारें, जब भी आती हैं, शाख पे पात, उगते हैंचहकते, पंछियों का, फिर वहाँ, होता है बसेरादिल की, दुनिया में मैंने, अब तलक बस, हार



वादा

आज, मेरी मुहब्बत की, तुम्हें ना कद्र, ज्यादा हैलगे, सब कुछ, भुलाने का, फ़कत, तेरा इरादा है अगर है, चाह इस मन में,, राह तो, बन ही जाएगी फिर तू, मजबूरियों का, क्यों यहाँ, ओढे लबादा हैबोझ, तन्हाइयों का, लो मैं फिर से, सर पे ले लूँगामैंने ग़म,



राख...

राख... कैसे रिश्ते ये... कैसे ये नाते है... अपना ही खून हमे कहा अपनाते है... प्यार कहो या कहो वफ़ा... सबकुछ तो सिर्फ बातें है... रिशतें कहो या कहो अपने... सबकुछ तो सिर्फ नाते है... बातें लोग भूल जाते है... नाते है टूट जाते है... कोनसी कसमें कोनसे वादें... यहां अपने पीछे छूट जाते है... कितना भी कहलो



नेह की धारा (बिना रदीफ जी ग़ज़ल )

मुहब्बत हो गई तुमसे, करे क्या, दिल ये बेचारातन्हा बैठा है यादों में, मगर हिम्मत, नहीं हाराआस तो अब भी, जिंदा है, इस जीवन के, मेले मेंमिलन होगा यहाँ, अपना भी देखो, फिर से दोबारानहीं है भूख, इस तन की, तड़प है, मेरे सीने मेंमैं तो असली, पुजारी हूँ, नहीं हूँ , कोई आवारानिक



बेहिसाब

तुझको ख़बर, ए गुल नहीं, तुझ पर शबाब हैऐसा लगे, ज्यों इस पेड़ पर , लटकी शराब है नज़रों से मेरी, देख ले तू, खुद को, एक बार तुझको लगेगा, तुझ पे ये रूप , बेहिसाब हैमुझको थी तेरी जुस्तजू, पर, तू, गैर को मिलादोष दें, किसको यहाँ, मेरी किस्मत



प्यार के बहुतेरे रंग

कविताप्यार के बहुतेरे रंगविजय कुमार तिवारीयाद करो मैंने पूछा था-तुम्हारी कुड़माई हो गयी?यह एक स्वाभाविक प्रश्न था,तुमने बुरा मान लिया, मिटा डाली जुड़ने की सारी सम्भावनायेंऔर तोड़ डाले सारे सम्बन्ध। प्यार की पनपती भावनायें वासना की ओर ही नहीं जाती,वे जाती हैं-भाईयों की सुरक्षा में,पिता के दुलार में,व



धुप

दौड़ भागकर सारा दिन थकी उचक्की धुपआँगन में आ पसर गई कच्ची पक्की धुप सारा दिन ना काम किया रही बजती झांझ लेने दिन भर का हिसाब आती होगी साँझ याद दिलाया तो रह गई हक्की-बक्की धुपआँगन में आ, पसर गई कच्ची पक्की धुप अम्मा ले के आ गई पापड़, बड़ी, अचार ले ना आये खिचड़ी, समझ के



करार

सुन ले मैं, थक चुका हूँ, तेरे इंतज़ार मेंदूरी ये अच्छी नहीं, इतनी भी, प्यार मेंदुश्वारियां कबूल थी, जब साथ में, चलेखामोशी मगर, थी नहीं, अपने करार मेंमुझको, ख़बर हुई नहीं, तेरे मिजाज कीलेकिन, कमी ना है कोई, मेरे खुमार मेंजब से गए हो, तुम वहाँ, देता रहा सदाक्या तुमको, दर्द ना दिखा, मेरी पुकार मेंसहरा म



बाबा तेरी चिरैया...

"बाबा तेरी चिरैया मै....मैं तो ना जाऊ परदेश रे....बाबा तेरी चिरैया मै....मैं तो ना जाऊ परदेश रे....तेरा हाथ छोड़कर, तेरा हाथ छोड़कर ना थामु मैं दूजा हाथ रे....बाबा ओ... बाबा....काहे भेजे मुझे दूर तू... मै चिरैया तेरे आंगण की...न बना मुझे तुलसी किसके आंगण की...मै तेरी बि



ग़मगीन

निभाना ही नहीं तुमको, तो क्यों, रिश्ता बनाते होइतने नज़दीक आ कर के, कहो क्यों, दूर जाते हो ज़माने से डरे हो तुम, हर इक शमा, बुझा डालीअँधेरों में तन्हा कर के, मुझे, हर पल सताते होएक तेरा साथ क्या छूटा, मैं तो, ग़मगीन बैठा हूँकुछ अपनी कहो, दिन रात



मधुर रिश्ता

तुम्हारे प्यार का, मुझको सदा, एहसास होता हैमुहब्बत का, मधुर रिश्ता, बड़ा ही खास होता है सुकूँ पाने की चाहत में, जतन कितने, किए मैंने मुझे तो, ज़िन्दगी मिलती है, जब तू पास होता हैकिसी को जीतना है तो, उसे बस, प्रेम से जीतोमुहब



मुकद्दर का सिकंदर

जो तेरे हुस्न का, बस एक यहाँ, दीदार हो जाएहर एक इंसान को, केवल तुझी से, प्यार हो जाए मुकद्दर का सिकंदर, दिल की दुनिया, में बनेगा वोजिसका सजदा, तेरे दरबार में, स्वीकार हो जाएअगर तू मुस्कुरा कर के, निशानी कोई, मुझे दे दे तेरी हर चीज़ पे, मेर



दिसम्बर

दिसम्बर ;१द्ध गुनगुनी किरणों का बिछाकर जाल उतार कुहरीले रजत धुँध के पाश चम्पई पुष्पों की ओढ़ चुनर दिसम्बर मुस्कुराया शीत बयार सिहराये पोर.पोर धरती को छू.छूकर जगाये कलियों में खुमार बेचैन भँवरों की फरियाद सुन दिसम्बर मुस्कुराया चाँदनी शबनमी निशा आँचल में झरती बर्फीला चाँद पूछे रेशमी प्रीत की कहा



जुदाई तुमको भाती है

ये कैसा प्रेम है, मुझको नहीं तुम, याद करते होमैं कैसे मान लूँ, तुम मेरी छवि, सीने में धरते होदर्द तुमको अगर होता, तो चेहरे से, बयां होताजुदाई तुमको भाती है, तुम तो ऐसे, संवरते होबस एक सूरत है पहचानी, नहीं है, कोई भी नाता मेरे नज़दीक से, तुम तो फ़कत, ऐसे गुजरते होमुझे भी वो हुनर दे दो, फ़कत है पास, जो



फनी इमेजेज

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सुन ! ओ वेदना-- कविता --

सुन ! ओ वेदना जीवन में -लौट कभी ना आना तुम !घनीभूत पीड़ा -घन बन -ना पलकों पर छा जाना तुम !!हूँ आलिंगनबद्ध - सुखद पलों से -कर ना देना दूर तुम , दिव्य आभा से घिरी मैं -ना हर लेना ये नूर तुम ,सोई हूँ ले सपने सुहाने - ना मीठी नी



रात तन्हाई की

चाह फूलों की थी मुझको, मगर कांटों ने घेरा हैनज़ारा कौन सा कुदरत ने देखो, पर उकेरा है मुहब्बत की चाह रखना, गुनाह कोई नहीं होतामगर इस वक्त ने देखो, हर एक, सपना बिखेरा हैरात तन्हाई की देखो, अब तो इतनी हुई लम्बीना ही तो नींद आती है, ना ही, होता सवेरा हैखुशी की चाह में मैंने, कभी अपनों की ना मानीमेरे दिल



तेरे सपने

ढूँढते हैं तुम्हें जब भी, किसी महफिल में जाते हैंसिवा तेरे हाल ए दिल औरों को, हम ना बताते हैं ढूँढ़ने का सबब तुमको, जो कोई पूछे यहाँ हमसेकई बरसों की शनासाई है, फ़कत हम ये जताते हैंप्यार नज़रों से मिलता है, जुबां से फूल झरते हैंबोल मीठे तेरे दिल को हमारे, कुछ ऐसे सुहाते हैं



ये बारिश प्रेम की

छवि एक दूजे की दिल में, जहाँ में जब समाती है तभी बदनॉ को आपस में, महक फूलों की आती है अगर है मैल इस दिल में, हर इक रिश्ता हैं बेमानीना जाने क्यों मगर दुनिया यहाँ, इनको निभाती हैएक उल्फ़त के प्यासे को, जहाँ मिलती है ये दौलतदरो दीवार उस घर की, उसे हर पल बुलाती हैबड़ा



रंग

रंगों का भी क्या मिजाज है....हर पल यह बदल जाता है....कुछ पल सुनहरा दर्शाता है...तो कुछ पल फीका कर जाता है....कुछ गाड़े रंग है, जिंदगी जिससे खोना नही चाहती...कुछ ऐसी ही फीकी उमंग है जो जिंदगी मैं चाहकर भी होना नही चाहती...कुछ अनदेखे रंग ह,ै जो आंखों से ओझल रहते है....कुछ जाने पचाने रंग है ,जो हरपल आँख



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