कविता



नन्नी सी जान देश की शान by neetesh Shakya

अग्नि मे तपकर, सोने की पहिचान होती है।नन्नी सी जान, देश की शान होती है।यही ज्योति सबके घर की उजाला होती है।नन्नी सी गुड़िया दिल की तारा होती है।।यही सम्मान यही दिल की जान होती है।नन्नी सी जान देश की शान होती है।।1।।ये ना समझ नादान, इनक



कलिका अवतार

अवतारअवतार यहीं है।अवतार यहीं है।।मन की परतों को खोल,छुप बैठा वहीं कहीं है।एषणा बुरी नहीं है।बुरी नहीं है।।अनाधिकृत घनसंचय है अपराध,विवेकपूर्ण वितरणसही है।सत्य जहाँ अढिग है,धर्म वहीं है।।साधना सेवा त्याग कासुपथ सही है।।अवतार यहीं है।अवतार यहीं है।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



अवतार



रात अलबेली

स्वप्न सहेली,ये रात अलबेली।सँग तारों के,करती अठखेली।शबनम जैसे,मोती बरसाती।भोर होते जो,लगते पहेली।स्याह कभी,कभी चाँदनी।खिले गगन ताल,बनकर कुमुदिनी।नवयौवना सी,नटखट चंचल।मृगनयनी सी,सहज सुंदर।हरती क्लांत हर तन के,करती शांत ज्वार मन के।ये रात अलबेली,स्वप्न सहेली।स्वरचित :- राठौड़ मुकेश



जग

लद्द-फद्द हो,जग को देते हीं रहते हैं!क्या जग भीइनको भी उतना हीं देता है?जड़ से पत्तों तकऔषधीय गुण रहता है!हम मृदु वाणी त्याग कटु वचन का संबल लेते हैं!!फलों का स्वाद तुष्ट करता है!हम जीवन को ध्रिणा से भरते हैं!!लद्द-फद्द हो,जग को देते हीं रहते हैं!क्या जग भीइनको भी उतना हीं देता है?डॉ. कवि कुमार नि



रॉक गार्डन पर कविता

रॉक गार्डन पर कविता- फ़र्क बस नज़रिये का था.टूटी हुई चीज़ समझकर बेज़ान मान लिया गया.इक शख़्स ने जोड़ जोड़कर मुझे खूबसूरत बागीचा बना लिया.शिल्पा रोंघे



अराध्य

"इति" और "अंत"समाहृत जीवन पर्यंतमैं कोई हूँ नहीं- संतहै यही-"वाक्य आप्त"सद् गति करुँगा प्राप्तयह है मेरे ''मन की बात''चक्र 'नौ' है, नहीं हैं 'सात'दिन हो या फिर हो- रातकरना उसी एक बस बात"मानव" मेरी एक है जातसत्-संग यही, आज बाँटडॉ. कवि कुमार निर्मल



जीवन यात्रा

ललचाती,सकुचाती,सीखाती,भरमाती,इठलाती,अंततः,सुस्ताती चीर निंद्रा!!जीवन यात्रा।अंदाज अलग,भागमभाग,चैन औ सुकूं की,अंततः,नींद उड़ाती!!जीवन यात्रा।अनुभव बांटे,भविष्य को बांचती,वर्तमान भुलाती,अंततः,मन भटकाती!!जीवन यात्रा।कहकहे लगाती कभी,मन कचोटती कभी,हंसाती कभी, रुलाती,अंततः,मिट्टी मिश्रित होती!!जीवन यात्रा।



मेरा अपना

सुबह हो या फिर शाम होलबों पे बस तेरा नाम होहर काम में हम साथ होसपनों के तुम राजदार होलोगबाग तुझे भले महाकौल कहें,तुम बस एक मेरे श्याम होडॉ. कवि कुमार निर्मल



मौन के रुप अनेक

एक ही मौन के देखो कितने रूप.कभी ध्यान है,कभी निद्रा है मौन,कभी उपासना है मौन,कभी भोरतो कभी रात का काला सन्नाटा है मौन,ना पूरा "हां" ना पूरा "ना"है मौन.ना पूरा है ना अधूरा हैसचमुच एक रहस्य ही है मौन.शिल्पा रोंघे



मृत्यु

वज्रपात सी घात लगी है..साँसों के इस बंधन को..मृत्यु खड़ी बाँट जोह रही...बेबस तन आलिंगन को..खिले नयन यम दर्श को..अधरों पर बिखरी मुस्कान..लेकर गठरी कर्मों की..तन छोड़ रहा ये पहचान..कुंठित,कुत्सित तन ये..हो जाएगा पल में खाक..गंगा दर्शन को तरसेगा..बंद मटकी में बन राख..हृदय विदिर्ण हो उठेगा..देखकर सब ये हा



ना कोई अपना हुआ

यूं तो दीवाने कई पर ना कोई अपना हुआ सोचते ही रह गए बस पूरा ना सपना हुआ ढूंढते ही रह गए हैं ना खुदा मुझको मिला उम्र गुज़री जाए है बेकार जप जपना हुआ कोई पढता भी नहीं चाहे रहूं मैं सामने बेवजह अखबार में देख लो छपना हुआ अजनबी सा अब वो पेश आ रहा है दोस्तों बेकार ही अपना तो उसके साथ में खपना हुआ सोचते थे



असली लगाव

असली लगाव हो तो रस्ते बन ही जाते हैं मिट्टी से मिल मुरझाए पौधे तन ही जाते हैं सब दूर हमसे हो रहे फिर भी ना सोच क्या हम उनको समझ अपना लगाए मन ही जाते है किसको कहां परवाह कि वो दिल में बसाएगा अब तो अच्छे लगे हैं जो लुटाए धन ही जाते हैं सही क्या है गलत क्या है यहां जो भी बताएंगे सयाने स्वार्थी लोगों मे



उलझनों में

त्तुम्हारे पास जीने के सुनो कितने सहारे हैं मैंने तो उलझनों में बिन तेरे लम्हें गुजारे हैंकोई भी दर नहीं ऐसा जहां पे चैन जा मांगूतेरे आगे तब ही तो हाथ ये दोनों पसारे हैंदर्द सहता रहा हूं मैं दवा मिलती नहीं कोईछुपे शायद इसी में जिंदगी के कुछ इशारे हैंभले ही तुम जमाने के लिए सच से मुकर जाओमेरी धड़कन क



अर्थ.....

सारे अर्थ,निरर्थक हो गए।निकाले जो,तुमने मेरे इरादों के।खेल गया स्वार्थ,अपना खेल पहले ही।लगा दी बोली,भरे बाजार में,मेरे नादान जज्बातों की।बांधे रखी थी अब तक,डोर जो एक विश्वास की,पलभर में ही टूट गई,हर छड़ी वो आस की।खड़े रहे हम मौन,उन वीरान सड़कों पर।लहरा जाते समंदर,इन निर्दोष पलकों पर।समझ लिया होता गर,अर



रश्मि

नैराश्य को भेदती..नवप्रभाती रश्मि..विराम देती.. चिर चिंतन को..खिलाती सरोज आशा केमन सरोवर में..बन उत्साह..करती नव संचार..निराश मन में..करती शांत..उद्वेलित मन को..नवप्रभाती रश्मि..रत्नमणि सी दमकती..बूंद भी शबनमी..पाकर सँग..नवप्रभाती रश्मि का..क्षण भर ही सही..जी लेती हसीं जिंदगी..कली-कली मुस्काती..खिलख



आजादी

💐💐💐💐💐💐💐💐💐चित्तौड़ का राणा प्रताप कहाँ है? झाँसी की लक्ष्मी बाई कहाँ है??क्षत्रपति शिवाजी की तलवार कहाँ है? असली आजादी का जुनून गया कहाँ है?? शहिद दिवस पर श्रद्धांजलि मिल कर देते रहना! 'राजनीतिक आजादी' को झंडा फहराते रहना!!"सहोदर भाई" की प्रीत नहीं जब जानी! भूखे-नंगे की नम आँखें भी न पहचान



फूल का सा मन

तुमको तलाशते रहे तुम ना मिले मुझे हरदम रहेंगे जान लो कुछ तो गिले मुझे सब कुछ लुटा दिया फकत इक बोल पे तेरे मिल जाते काश इसके एवज कुछ तो सिले मुझे इक प्यार तेरा गर यहां मुझको नसीब हो मिट्टी लगेंगे जान लो ये सब किले मुझे है फूल का सा मन मेरा फिर भी उदास हूं मुद्दत हुई है देख लो कितनी खिले मुझे मधुकर ने



तुम भी बदल गए

कैसे दर्द ना हो मुझे तुम भी बदल गए अरमान मेरे कदमों तले सारे कुचल गए यूं तो है भीड़ हर तरफ तुझ सी ना बात है देखा है तुझको जिस घड़ी आशिक मचल गए अब वो कभी ना आएगा मुझसे है कह रहा बिजली गिराओ ना सुनो दिलबर दहल गए अच्छी नहीं ये बात सनम सब कुछ भुला दिया उनकी भी कुछ तो सोच जो करते पहल गए भूलो ना प्यार से



सुरक्षा कवच

बचपन में खेलते, दौड़ते ठोकर लग कर गिर जाने पर भैया का मुझे हाथ पकड़ कर उठाना,भीड़ भरे रास्तों पर, फूल-सा सहेज कर अँगुली पकड़ स्कूल तक ले जाना,और आधी छुट्टी में माँ का दिया खानामिल-बाँट कर खाना, याद आता है। बहुत-बहुत याद आता है। सर्कस और सिनेमा देखते समय हँसना - खिलखिलाना,बे-बात रूठना-मनाना,फिर देर रात त



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