कविता



कोरोना की राजनीति

कोरोना की राजनीतियह सोसल डिस्टेंसिंग महज़अगले चुनाव का एक बुलंद नारा हैसड़क जाम, सट कर चलना- ई. भी. एम. ने हीं देश को तारा हैसाठ साल के उपर नेता-डॉक्टर रहें घरों में सुरक्षितसविनय निवेदन हमारा हैनोक - झोक से रहे परहेज़, आत्म निर्भर हो देश, लिखना नायाब फ़साना हैकब्र खुदीं चार लाख पार,अंकुश अब पुरजोर हरओ



इश्क का चाँद निकला

इश्क का निकल आया चाँदइश्क का निकल आया चाँदडुबो दिया रे! जग को बुहानले डूबा संग सोने की खान'माया द्विप' हो गया परेशानकोरिया छेड़े न दे धमासानपौने तीन लाख! बचालें प्राण'सात्विक' बन, बात यह मानस्वाद त्याग- बचा पहले प्राणइश्क का निकल आया चाँदडूबा दिया रे! जग को बुहानडॉ. कवि कुमार निर्मल



कितनी ही तानें सजाती बहारें

हीरों के हारोंसी चमकें फुहारें, और वीणा के तारों सी झनकें फुहारें |धवल मोतियों सी जो झरती हैं बूँदें, तो पाँवों में पायल सी खनकें फुहारें ||कोयल की पंचम में मस्ती लुटातीं, तो पपिहे की पीहू में देतीं पुकारें |कली अनछुई को रिझाने को देखो षडज में येभँवरे की देतीं गुंजारें ||(पूरा सुनने केलिए नीचे दिए ल



मानवता शर्मसार करने वाली घटना

केरल में गर्भवती हथिनी की मृत्यु से,आज मानवता कराह रही है |मनुष्य होकर दानवों-सी हरकते,मनुष्यता किस ओर जा रही ?हे मानव ! ऐसी क्या विपदा आन पड़ी,जो तुम इतने हृदयहीन हुए,दो -दो निरीह प्राणियों की हत्या करजरा भी ना गमग़ीन हुए |एक बेजुबान पर , तुमने कैसी करामात की ?दोनो में से जानवर कौन थे,ये सोचने की ब



🌲🌳🌴विश्व पर्यावरण दिवस🌴🌳🌲

🌲🌳🌴🌾🌾🌴🌳🌲🌲विश्व पर्यावरणदिवस🌲🌲🌳🌴🌾🌾🌴🌳🌲हिमगिरि से झर-झर्र बह झरना नद-ताल-तिलैया का आप्लावन करता है।बसुंधरा पर सर्वत्र हरितिमा फैला महासागर में अन्ततः नीर मिल जाता है।।शितल जल छारीय बन कर भी भास्कर की असह्य उष्णता झेल जाता है।वाष्पित - धनीभूत हो काले बादल बन उमड़-धुमड़ कर छा जाते हैं।



विश्व पर्यावरण दिवस

हरे भरे पेड़ों पर ही तो पंछी गाते गान सुरीला जी हाँ,मिल जुलकर यदि वृक्षारोपण करते रहे तो पर्यावरण प्रदूषण की समस्या कोई समस्या नहींरह जाएगी... आइये मिलकर संकल्प लें कि हर वर्ष कम से कम एक वृक्ष अवश्य आरोपितकरेंगे और अकारण ही वृक्षों की कटाई न स्वयं करेंगे न किसी को करने देंगे... पर्यावरणदिवस सभी को व



फेक दुनिया

💐💐💐💐💐💐💐💐💐कोई है आगे, कोई चल रहा पीछेआओ सूखे पौधों को हम सींचेसोए खाट पर आँख दोनों मींचेकाव्य चक्र को तनिक तो खींचे💐💐💐💐💐💐💐💐दो दाना मात्र चने का खा कर,करे वह शुक्र को संतोषि माँ व्रत।सात समन्दर पार जा बस गए,लिखा नहीं आया एक भी पत्र।।🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇दीये और बाती अँधेरी रात जगमगाना



रिश्ते

जानता हूँ,उड़ नहीं सकते।बेवफ़ा हो,वफ़ाई के किरदार-बन नहीं सकते।।★★★★★★★★"रिश्ता" बनाया है तोन उसे तूं 'तोड़' देना।प्यार किया,नफ़रत की चादरन ओढ़ तूं लेना।।★★के• के•★★



सूर्योदय

सूर्योदयसमस्याएँजीवन का एक अभिन्न अंग जिनसेनहीं है कोई अछूता इस जगत में किन्तुसमस्याओं पर विजय प्राप्त करके जो बढ़ता है आगे नहींरोक सकती उसे फिर कोई बाधा हर सन्ध्याअस्त होता है सूर्य पुनःउदित होने को अगली भोर में जोदिलाता है विश्वास हमें किनहीं है जैसा मेरा उदय और अवसान स्थाई उसी प्रकारनहीं है कोई



गीत

गीत मानवताबेहोश पड़ी है , सच्चाई की बुरी घड़ी है , हिंसा नफरत ओढ़ रही हर बस्ती बस्ती इन्सानकी , ये कैसी तस्वीर बन गयी मेरे हिंदुस्तानकी | पहले तो था एक दशानन , अब हर गली गली मिलते हैं | कोई राम नहीं रक



मोटा चूहा

मोटा चूहा



ठहरज मन के आँसू

ठहरे मन के आँसूमन चंचल,आलोढ़ित चितवन,मन तो आखिर है मन-डोलेगामन आह्लादित-मन अश्रुप्लावितएक को ठहरा कर हीं-कुछ बोलेगाप्रसव-पीड़ा के आँसूजन्म के आँसू सुख के आँसूदुख के आँसूप्रतारणा पठन-पाठन के आँसूधुयें के आँसूंप्रेम के आँसूभक्ति के आँसूआसक्ति के आँसूविरक्ति के आँसूमरण के आँसूमन ठहर सकता नहींब



मैं तो हूँ शाश्वत सत्य सदा

मैं आदिहीन, मैं अन्त हीन, मैं जन्म मरण सेरहित सदा |मुझमेंना बन्धन माया का, मैं तो हूँ शाश्वत सत्य सदा ||जिसदिवस मृत्यु के घर में यह आत्मा थक कर सो जाएगी तन लपटों का भोजन होगा, बन राख़ धरा पर बिखरेगा |उस दिन तन के पिंजरे को तज स्वच्छन्द विचरने जाऊँगी मेरी आत्मा मानव स्वरूप, फिर भी मैं शाश्वत सत्य सदा



क़ुरबानी तो लगती है रोज़ अरमानो की,...

क़ुरबानी तो लगती है रोज़ अरमानो की,...क़ुरबानी तो लगती है रोज़ अरमानो की,सफ़र का क़ाफ़िला, कम या ज़्यादा,एहसासों का भी होता है बलिदान,सब काल्पनिक, रहती नहीं कोई मर्यादा,उसी दौर से, गुज़र रहें हैं सब हम,गुनाहों का कारवाँ, होता है मुकर्रम,रंग भी यहाँ, बेरंग भी यहाँ,चुनना है हमें, किसे भरें हम, कब और क



तेरा जाना

।। कविता ।। ## तेरा जाना ##अब न आओगे कभी तुम लौट करके फिर कभी । चाहने वाले तुम्हारे लौट कर अा जाएंगे ।। याद तेरी तिफ्ल तेरी मौज तेरी तिस्नगी । भस्म कर तेरी चिता पर फूल यों बरसाएंगे ।। चाह कर भी वक़्त गुजरा लौट न पाएगा फिर । अब तुम्हारी इस कमी को खाक क्या भर पाएंगे ।।भूल भी जाएं कभी जो रात कातिल ब



विरह वेदना

.💞 💞💞रात्रि गायन💞 💞💞विरह के अगन अब बुझ नहींपाएगी।नींद उड़ किसी विराने में खोजाएगीअश्रुधारा बहाकर कहीँ और ले जाएगी।बिसरे स्वप्न की याद प्रतिपल दिलाएगी॥चुभती सेज का दर्द, वह सह नहीं पाएगी।विरह के गीत हर शाम वह गुनगुनाएगी॥याद तेरी जब-तब आकर बहुत सताएगी।अँधेरों में सुगंध उनकी जब-तब आएगी॥हृद-गति



ईश्वर की बेटी का आँचल (संशोधित)

प्रतियोगिता हेतु चयनित एवम्पुरुस्कृत रचनाविषय:"ईश्वर की बेटी का आँचल"प्रतियोगिता आयोजक:साहित्यिक मित्र मण्डल,जबलपुर, मध्य प्रदेशफेस बुक एवम् व्हाट्स एप्प (१-८ भाग)चयनकर्ताओं और मण्डलके सुधिजनों को सहृदय साधुवाद्★★★★★★★★★★★★🏵️🏵️ईश्वर की बेटी का आँचल🏵️🏵️ईश्वर की बेटी का गुणगानआज हम करते हैंउसे हीं



अनन्त के साथ मिलन की यात्रा

प्रस्तुत है एक रचना - अनन्त की यात्रा | योग और ध्यान के अभ्यास में हम बात करते हैं सात चक्रों की... कोषो की...उन्हीं सबसे प्रेरित होकर कुछ लिखा गया, जो प्रस्तुत है सुधीश्रोताओं और पाठकों के लिए...https://youtu.be/Am8VnQlAElM



ईश्वर की बेटी का आँचल

🏵️ईश्वर की बेटी का आँचल🏵️ईश्वर की बेटी का गुणगान आज हम सब करते हैंउसे हम माँ, बेटी, बहन एवं अर्धांगिनी भी कहते हैंशिव ने किया प्रथम विवाह, यही शास्त्रों में पाते हैंतिरिस्कार-आत्मदाह लख अश्रुप्लावित होते हैंचीर हरण शर्मनाक, भहाभारत कृष्ण रचते हैंमीरा की भक्ति नमन्य है- हम सब भजन उचरते हैंजातिमुक्त



दलहीज

"छल कपट प्रपंच की दलहीज""जीवन का जटिल समीकरण"आज हल करने कामन मैंने बनाया है!माँ की कोख के ९ महिनों का,मोटा-मोटी हिसाब लगाया है!!जन्म के समय की चिल्लाहट,पॉटी- सुसू की यादें- मजा बहुत आया है!माँ की गोद जाते हीं चुप होने का,होठों पे स्वाद ताजा हो आया है!!बहुत खुश हुआ जब पहली बार,सहारा दे कर माँ ने चलाय



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