कविता



सिंदूर

"सिंदुर''ब्रह्मरंध नियंत्रण सिंदूर कापारा करता है।सुहागन का जीवनतनाव मुक्त करता है।।अनिद्रा मुक्त कर श्नायु तंत्र कोचैतन्य रखता है।।🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩परंपरा, धर्म जब ताखे पर रख डालाब्रह्मरंध्र का क्या दे फिर मित्र हवालानींद गई-सुख-चैन गया- झेलें तुर्राचित्त चंचल- स्वप्नों की हलचल 🌊🌊🌊🌊🌊🌊



"सोमनाथ मंदिर "

"सोमनाथ मंदिर "सोमनाथ मंदिर पे महमूद गजनवी का ,आक्रमण समझाने आया !सं १०२६ ई.के उस पुराना काले दिवस का इतिहास बताने आया | वैभवशाली ज्योतिर्लिंग की कीर्ति का सोमनाथ वारहवां प्रतीक | ईसा पूर्व अस्तित्व में आया जिसे सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रेय बनवाया | बार बार आक्रमण सहकर सन्देश दे जाता धैर्य और



खुदको बदल पाओगी

मै जानता हूँ सब बदल जायेगा। आज जान हो कल अंजान हो जाओगी। मेरे घर के हर कमरे की मान थी, अब मेहमान कहलाओगी। मै जानता हूँ सब बदल जायेगा, क्या खुद को बदल पाओगी। आज अम्बर धरती झील नदिया सब पूछते है जहाँ कल तक दोनो का नाम दिखाया करती थी, क्या अब उनकी भी खबर रख पाओगी। मै जानता हूँ सब बदल जायेगा, क्या रिश्त



हिंदी दिवस पर बाल गीत

🌹"बाल गीत हिंदी दिवस पर"🌹🌹👯👯👯👯👯👯👯👯👯👯आज "हिंदी दिवस" सप्ताह में ''बाल गीत'' हम गायेंगेअपने बच्चों को हिंदी से प्यार करना आज सिखायेंगेनन्हे-मुन्हें बच्चों बहुत लाढ लढाया, मेधावान् बनायेंगेअपनी भाषा हिंदी के गुण-सभी बच्चों को बतलायेंगेहिंदी में पढ़ना-लिखना और बातें करना- सिखलायेंगेअकाडमी मे



हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

अभी 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस था और आज हिन्दी दिवस है... हमने अपने सदस्यों सेआग्रह किया क्यों न इस अवसर पर एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया जाए... तो आज उसीगोष्ठी के साथ आपके सामने उपस्थित हैं... यदि हम ज़ूम पर या किसी भी तरह से ऑनलाइनगोष्ठी करते हैं तो वहाँ कुछ समस्याओं का हमने अनुभव किया है... जिनमें स



व्यंग्य की धार

एक :सुनो !!व्यंग्य के धागे मेंमत लपेटना काँच का पाउडरतेज़ माँझा झटके में काट देगा गरदनसमझने से पहले ही प्राण त्याग देगा लक्ष्यधागे को रखो मोटामध्य में बाँधो तमाम गाँठेगाँठों से छिली त्वचा पर अंकित संकेततमाम उम्र रहेंगे प्रासंगिकरगड़ की जलन अधिक स्थायी होती है अचानक आई मृत्यु की पीड़ा से दो :पतंग के साथ



कोई रोता है।

( 1)क्यों? मुझको ऐसा लगता है। दूर कहीं कोई रोता है।कौन है वो? मैं नही जानता। पर,मानो अपना लगता है।कहीं दूर कोई रोता है। मुझसे मेरा मन कहता है। ( 2)अक्सर अपनी तन्हाई में, ध्



कोई रोता है।

क्यों मुझको ऐसा लगता है?, दूर कहीं कोई रोता है।कौन है वो? ,मैं नही जानता, पर मुझको ऐसा लगता है,दूर कोई अपना रोता है। क्योंमुझको ऐसा लगता है?दूर कहीं कोई रोता है। 2पर्वत की हरी-भरी वादियाँ



जीवन क्या है

जीवन क्या है मात्र चित्रों की एक अदला बदली...किसी अनदेखे चित्रकार द्वारा बनाया गया एक अद्भुत चित्र...जिसे देकर एक रूप / उकेर दी हैं हाव भाव और मुद्राएँ और भर दिए हैं विविध रंग / उमंगों और उत्साहों के सुखों और दुखों के / रागों और विरागों के कर्तव्य और अकर्तव्य के / प्रेम और घृणा के अनेकों पूर्ण अपूर्



टपकी बुँद पसिने की

टपकी बुँद पसीने कीमाथे पर आई पसिने की बुँदे कुछ कह रही हैंटपक - टपक पलकों को जब - तब छू रही हैंतपिश है उमस भरी- ठंढ़ी छाँव ढ़ूंढ़ वे रहीं हैंअपनी हीं तश्वीरों को देख मदहोश हो रही हैमाथे पर आई पसिने की बुँदे कुछ कह रही हैंटपक - टपक पलकों को जब - तब छू रही हैंडॉ. कवि कुमार निर्मलDrKavi Kumar Nirmal



कैसे वक़्त ने पलटा खाया

कैसे वक़्त ने पलटा खायालोगो की नज़र में कल तक जो डॉक्टर भगवान थाआज वो डाकु हो गयाहर नुक्कड़ हर चौराहे पर चर्चा आम हैंडॉक्टर नही शैतान हैंलोगो की लाज हया शर्म सब मर गईकैसे वक़्त ने पलटा खायाजब खुद बीमार ना हुए तब तकडॉक्टर का महत्व ना समझ आयानुक्कड़ छुटा चौराहा छुटाछुटी फोकट की बात अस्पताल में डॉक्टर ही दि



पुष्प का सौरभ ही दे दो

पुष्प बनकर क्या करूँगी, पुष्प का सौरभ ही दे दो |दीप बनकर क्या करूँगी, दीप का आलोक दे दो ||हर नयन में देखना चाहूँ अभय मैं हर भवन में बाँटना चाहूँ हृदय मैं बंध सके ना वृन्त डाल पात से जो थक सके ना धूप वारि वात से जो भ्रमर बनकर क्या करूँगी, भ्रमर का गुंजार दे दो ||रचना सुनने के लिए कृपया वीडियो देखने क



मैं शीश झुकाऊँ मानव को

मैं शीश झुकाऊँ मानव कोइस जीवन को मैं केवल सपना क्यों समझूँ,हरभोर उषा की किरण जगाती है मुझको…हरशाम निशा की बाहों में मुस्काता हैचंदा, मस्ती छाती मुझको||रचना सुनने के लिए देखें वीडियो... कात्यायनी...https://youtu.be/txYk946TuoI



तुझमें और तेरे इश्क़ में अंतर है इतना

कल मिलने आइ वो,मेरा पसंदीदा पकवान लाई वो।हम दोनो बहुत सारी बातें किये,उसकी और मेरे नयन ने भी मुलाक़ातें किए।अचानक से पूछी मुझसे.ये बताओ, मुझमे और इश्क़ में क्या अंतर हैं?मैंने कहाँ, तुझमें और तेरे इश्क़ में अंतर है इतना,तु ख़्वाब है और वो है सपना।अब वो नाराज़ हो गईं,रोते-रोते मेरे हाई कँधो पर सो गईं



तू कोमल कली

तु वो बाग़ की कोमल कली हैतुझे तोड़ा अधर्मी वो बली हैजिसे तूने तन मन से माना हैउसने ही तुझे ये पापी दाग़ में साना हैमैं माली हूँ बाग़ से टूटे कली कातु कर भरोसा मेरे साँस कीतेरा छोड़ अब किसका होने वाली हूँतुझे डर किस बात कीदेख मुझे हज़ारों ग़म है फिर भी मतवाली हूँतु छंद है मेरे पंक्तियों की मैं नशा



स्त्री अभिलाषा

स्त्री अभिलाषा चाह नहीं मैं क्रूर व्यक्ति,अनपढ़ संग थोपी जाऊं । चाह नहीं पौधे की तरह, जब चाहे जहां रोपी जाऊं ।। चाह नहीं शादी की है, जो दहेज प्रथा में मर जाऊं । चाह नहीं अपने अधिकारों, से वंचित रह जाऊं ।। हम अवला को कुछ और नहीं,



शब्द रूचि

मैं शब्द रूचि उन बातों की जो भूले सदा ही मन मोले-2अँगड़ाई हूँ मैं उस पथ का जो चले गए हो पर शोले-2हर बूँदो को हर प्यासे तक पहुँचाने का आधार हूँ मैं-2मैं बड़ी रात उन आँखो का जो जागे हो बिना खोलें-2जो कभी नहीं बोला खुल कर वो आशिक़ की जवानी हूँ।-2मीरा की पीर बिना बाँटे राधा के श्याम सुहाने हैं।-2



गैरों से बातें

जा मिल कर उनसे मोहब्बत की बातेंतु ख़ुश है उसके साथ तो तेरा क्या करे हम बात तुझे ऐहशास क्या होगा मेरे दिल पर जो बिता वो विश्वास क्या होगा किसी को मत तड़पा इतना डर मुझे लगता है कही तुझे हुआ तो वो अवकाश क्या होगा



इश्क़ में बहने लगा

वो मुझे कहने लगातेरे इश्क़ में बहने लगावक़्त की बात है फिर तुझसे हुई मुलाक़ात हैंकर लेंगे हम आहिस्ता आहिस्ता तुझ पर भी भरोसा अब जो उसका आश खोने लगाहम है तेरे लिए बेशक ग़ैर हैमगर हमें तो आज भी भरोसा है जैसे चाँद को तारों से इश्क़ होने लगा



समय की बहती धारा

समय की बहती धारा में कही थम सा गया हूँ मैंअनजानी सी राहों मेंबेचैन ख़यालों में, रुक सा गया हूँ मैंबहती नदी में कही अटक सा गया हूँचलते चलते जो रुक गया हूँ मैं ऐसा लगता है थक गया हूँ मैंकभी सोचता हूँ,यहाँ से निकला तो कहा जाऊंगाशायद डरता हूँ रास्तो के जोखिमों सेजो लहरों स



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