कविता

यादों का पागलखाना

जब भी तेरी वफाओं का वह ज़माना याद आता है,सच कहूं तो तेरी यादों का पागलखाना याद आता है।कसमों की जंजीर जहां पर, वादों से बनी दीवारें हैंझूठ किया है खंज़र से तेरे नाम की उन पर दरारें है।टूट चुका सपनों का बिस्तर, अफ़सोसों की चादर हैतकियों को गीला करती अश्क़ों की जहां फुहारें हैं।जलती शमा में कैद वहां, परवान



ठिठुराती भीषण ठण्ड में

ठिठुराती भीषण ठण्ड में जब प्रकृति नटी ने छिपा लिया हो स्वयं को चमकीली बर्फ की घनी चादर में छाई हो चारों ओर घरों की छत पर और आँगन में खामोशी के साथ “टप टप” बरसती धुँध नहीं दीख पड़ता कि चादर के उस पार दूसरा कौन है और फिर इसी द्विविधा को दूर करने धीरे धीरे मीठी मुस्कान के सूर्यदेव का ऊपरउठाना जो कर दे



पर अब है,इतना वक़्त कहाँ...

पर अब है,इतना वक़्त कहाँ...फिर लौट चलूं मैं,”बचपन” मे,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…खेलूँ फिर से,उस “आँगन” मे,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…क्या दिन थें वो,ख्वाबों जैसे,क्या ठाट थें वो,नवाबों जैसे…फिर लौट चलूं,उस “भोलेपन” मे,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…



बसंत का मौसम

है महका हुआ गुलाब खिला हुआ कंवल है,हर दिल मे है उमंगेहर लब पे ग़ज़ल है,ठंडी-शीतल बहे ब्यार मौसम गया बदल है,हर डाल ओढ़ा नई चादर हर कली गई मचल है,प्रकृति भी हर्षित हुआ जो हुआ बसंत का आगमन है,चूजों ने भरी उड़ान जो गये पर नये निकल है,है हर गाँव



सूर्योदय

सूर्योदयसमस्याएँजीवन का एक अभिन्न अंग जिनसेनहीं है कोई अछूता इस जगत में किन्तुसमस्याओं पर विजय प्राप्त करके जो बढ़ता है आगे नहींरोक सकती उसे फिर कोई बाधा हर सन्ध्याअस्त होता है सूर्य पुनःउदित होने को अगली भोर में जोदिलाता है विश्वास हमें किनहीं है जैसा मेरा उदय और अवसान स्थाई उसी प्रकारनहीं है कोई



वही अपने सारे हैं......!!

चाँद भी वही तारे भी वही..!वही आसमाँ के नज़ारे हैं...!!बस नही तो वो "ज़िंदगी"..!जो "बचपन" मे जिया करते थे...!!वही सडकें वही गलियाँ..!वही मकान सारे हैं.......!!खेत वही खलिहान वही..!बागीचों के वही नज़ारे हैं...!!बस नही तो वो "ज़िंदगी"..!जो "बचपन" मे जिया करते थे...!!#मेरे_अल



नया साल

दोस्तों ये नया साल है भूल जाओ आपने गये काल को । नया सवेरा नयी धूप और नऐ ऊर्जा के साथ नऐ विश्वास का दिया जलायें उस विश्वास के पथ पर चलकर अपने सपनों को साकार बनायें । दोस्तों ये नया साल है भूल जाओ आपने गये काल को । आओ अपने नन्हे हाथों से नऐ भारत की गाथा लिखें जहां युवाओं को रोज़गार मिले और महिलओं का ह



सड़क पर प्रसव

वक़्त का विप्लव सड़क पर प्रसव राजधानी में पथरीला ज़मीर कराहती बेघर नारी झेलती जनवरी की ठण्ड और प्रसव-पीर प्रसवोपराँत जच्चा-बच्चा 18 घँटे तड़पे सड़क पर ज़माने से लड़ने पहुँचाये गये अस्पताल के बिस्तर परहालात प्रतिकूल फिर भी नहीं टूटी साँसेंकरतीं वक़्त से दो-दो हाथ जिजीविषा की फाँसें जब एनजीओ उठाते हैं दीन



विम्ब का ये प्यार

गीत(09/05/1978)विम्ब का ये प्यारविजय कुमार तिवारीकौन दूर से रहा निहार?दिल ने कहा-खोलता हूँ द्वार, विम्ब का ये प्यार। पोखरी से फिसल चले हैं पाँव ये,जिन्दगी की कैसी है ढलाँव ये। आज हाथ केवल है हार,दिल ने कहा-खोलता हूँ द्वार,विम्ब का ये प्यार। धड़कने सिसकाव का सहारा ले,मिट रही बढ़त यहाँ किनारा ले। अदाय



मानस गीत मंजरी

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देश बचाना

कवितादेश बचानाविजय कुमार तिवारीस्वीकार करुँ वह आमन्त्रणऔर बसा लूँ किसी की मधुर छबि,डोलता फिरुँ, गिरि-कानन,जन-जंगल, रात-रातभर जागूँ,छेडूँ विरह-तानरचूँ कुछ प्रेम-गीत,बसन्त के राग। या अपनी तरुणाई करुँ समर्पित,लगा दूँ देश-हित अपना सर्वस्व,उठा लूँ लड़ने के औजारचल पड़ूँ बचाने देश,बढ़ाने तिरंगें की शान। कु



आसान नहीं था वो दिन मेरे लिए

उस दिन चूड़ियों से मैंअपने हाथ की नब्ज नहीं काटी , और न ही स्लीपिंग पिल्स का एक्स्ट्रा डोज लेकर , गहरी नींद में हमेशा के लिए सो गयी थी ,जैसा की फिल्मों में अक्सर नायिका करती है ा आसान नहीं था वो दिन मेरे लिए ,टूटे दिल के तमाम टुकड़े को समेटकर ,बनावटी मुस्कुराहट के पू



चुनावी समर

इस चुनावी समर का हथियार नया है। खत्म करना था मगर विस्तार किया है। जिन्न आरक्षण का एक दिन जाएगा निगल, फिलहाल इसने सबपे जादू झार दिया है। अब लगा सवर्ण को भी तुष्ट होना चाहिए। न्याय की सद्भावना को पुष्ट होना चाहिए। घूम फिर कर हम वहीं आते हैं बार बार, सँख्यानुसार पदों को संतु



गरीबों की बस्ती

कहते है कि.... गरीबों की बस्ती मे... भूक और प्यास बस्ती है... आँखों में नींद मगर आँखें सोने को तरसती है... गरीबों की बस्ती मे... बीमारी पलती है... बीमारी से कम यहा भूक से ज्यादा जान जलती है... गरीबों की बस्ती मे... लाचारी बस्ती है... पैसे की लेनदेन मे ही जिंदगी यहा कटती है... गरीबों की बस्ती मे... श



नगीने

मुहब्बत खुद उमड़ती है कभी हम तुम जो मिलते हैंमहकते फूल देखो कितने फिर बगिया में खिलते हैं भले आवाज़ ना आए पर हम सब कुछ समझ लेंगेतेरे लब क्या बताने को इतने धीमे से हिलते हैंकठिन राहों पे उल्फ़त की सभी तो चल नहीं पाते डटे रहते हैं जो इन पे बदन उनके ही छिलते हैंये क्या दुनिया बन



खजाना

मैं तो तेरी दीवानी हूँ तू भी मेरा दीवाना हैंहर हाल में हमको तो ये रिश्ता निभाना हैतलाशा उम्र भर जिसको उसे मैं छोड़ दूँ कैसेमुहब्बत से भरा ए मीत तू ऐसा खजाना हैसुकूँ मिलता है मेरी रूह को जो गुनगुनाने सेओ मेरे साथियां तू ही तो वो मीठा तराना हैमुझे एहसास है देखो नहीं अब दूर तू मुझसेतभी तो बन गया ये आलम



अभिमान

देखती हूँ तुझे तो मुझको ये अभिमान होता है सिमट के बाहों में तेरी कितना सम्मान होता है अपनी आँखों से तूने मुझपे जैसी प्रीत बरसाईवही पाने का बस मनमीत का अरमान होता हैदीवानापन ना हो दिल में तो संग कैसे रहे कोईमहल भी ऐसे लोगों का फ़कत वीरान



प्यासा

सुकूँ पाना ज़माने में कभी होता ना आंसा हैकमी जल की नहीँ है पर समुन्दर देख प्यासा हैराह मंज़िल की पाने को चला हूँ मैं तो मुद्दत सेमगर ना रोशनी बिखरी ना ही हटता कुहासा हैबड़ा मजबूत हूँ मैं तो दिखावा सबसे करता हूँ मेरे अशआर में पर हाल ए दिल का सब खुलासा हैगैर तो गैर थे पर चोटें तो अपनों ने दीं मुझकोमगर त



बूढ़ा आदमी

कविता(मौलिक)बूढ़ा आदमीविजय कुमार तिवारीथक कर हार जाता है,बेबस हो जाता है,लाचारजबकि जबान चलती रहती है,मन भागता रहता है,कटु हो उठता है वह,और जब हर पकड़ ढ़ीली पड़ जाती है,कुछ न कर पाने पर तड़पता है बूढ़ा आदमी। कितना भयानक है बूढ़ा हो जाना,बूढ़ा होने के पहले,क्या तुमने देखा है कभी-तीस साल की उम्र को बूढ



स्नेह निर्झर

कवितास्नेह निर्झरविजय कुमार तिवारीऔर ठहरें,चाहता हूँ, चाँदनी रात में,नदी की रेत पर।कसमसाकर उमड़ पड़ती है नदी,उमड़ता है गगन मेरे साथ-साथ। पूर्णिमा की रात का है शुभारम्भ,हवा शीतल,सुगन्धित।निकल आया चाँद नभ में,पसर रही है चाँदनी मेरे आसपास,सिमट रही है पहलू में।धूमिल छवि ले रही आकर,सहमी,संकुचित लिये वयभा



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