कविता

प्यासा

सुकूँ पाना ज़माने में कभी होता ना आंसा हैकमी जल की नहीँ है पर समुन्दर देख प्यासा हैराह मंज़िल की पाने को चला हूँ मैं तो मुद्दत सेमगर ना रोशनी बिखरी ना ही हटता कुहासा हैबड़ा मजबूत हूँ मैं तो दिखावा सबसे करता हूँ मेरे अशआर में पर हाल ए दिल का सब खुलासा हैगैर तो गैर थे पर चोटें तो अपनों ने दीं मुझकोमगर त



बूढ़ा आदमी

कविता(मौलिक)बूढ़ा आदमीविजय कुमार तिवारीथक कर हार जाता है,बेबस हो जाता है,लाचारजबकि जबान चलती रहती है,मन भागता रहता है,कटु हो उठता है वह,और जब हर पकड़ ढ़ीली पड़ जाती है,कुछ न कर पाने पर तड़पता है बूढ़ा आदमी। कितना भयानक है बूढ़ा हो जाना,बूढ़ा होने के पहले,क्या तुमने देखा है कभी-तीस साल की उम्र को बूढ



स्नेह निर्झर

कवितास्नेह निर्झरविजय कुमार तिवारीऔर ठहरें,चाहता हूँ, चाँदनी रात में,नदी की रेत पर।कसमसाकर उमड़ पड़ती है नदी,उमड़ता है गगन मेरे साथ-साथ। पूर्णिमा की रात का है शुभारम्भ,हवा शीतल,सुगन्धित।निकल आया चाँद नभ में,पसर रही है चाँदनी मेरे आसपास,सिमट रही है पहलू में।धूमिल छवि ले रही आकर,सहमी,संकुचित लिये वयभा



परछाई

जब रहता कोई नहीं संग तब भी संग रहती परछाई तन्हा जब सभी छोड़ देते फिर भी साथ रहती परछाई भोर से लेकर साँझ ढले तक साथ में रहती परछाई खुशी में तो साथ रहते सभी ,किन्तु धुप में साथ रहती केवल परछाई



फिर आज तुम्हारी याद आयी

फिर आज तुम्हारी याद आयी,फिर मैंने तुम पर एक गीत लिखावहीं लिखा जो लिखता आया हूँतुमको फिर अपना मीत लिखा।फिर आज तुम्हारी याद आयी...जिन कदमों की आहट भर से,बढ़ जाती है लय इन सांसों कीउन कदमों को लिखा बांसुरीसांसों की लय को संगीत लिखा।फिर आज तुम्हारी याद आयी....मेरी नजरों से तो हो ओझल तुमपर फिर भी हो मेरे



जाग उठो ऐ बेटियों ,अब कोई तेरा रक्षक नहीं

जाग उठो ऐ बेटियों ,अब कोई तेरा रक्षक नहीं , खतरे में है वजूद तेरा,बैठा है घात लगाए तेरा भक्षक कहीं,बहुत बहा लिए आँसू तुम,अब आँखों से बहा अंगार सिर्फ,कि ये क्रूर दुनिया, सिवाय ज्वाला के आंसुओं से पिघलता नहीं ाभ्रम में तुमको रखा गया है



मैं रथ का टूटा हुआ पहिया हूं - डॉ. धर्मवीर भारती | Hindi Poem | Dharmvir Bharti

श्री धर्मवीर भारति हिंदी साहित्य के प्रयोगवादी कवि थे | डॉ. भारति हिंदी की साप्ताहिक पत्रिका 'धर्मयुग' के प्रधान संपादक थे। भारत सरकार द्वारा 1972 में डॉ. धर्मवीर भारती को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। रथ का टूटा हुआ पहिया हूं धर्मवीर भारति की सर्वश्रेस्ट और लोकप्रिय कविताओं में से एक है | महाभारत



भगवान शिव

महादेव को शब्दों में बांधना असंभव है फिर भी मैंने एक प्रयत्न किया है कि मैं जगत के स्वामी देवाधिदेव महादेव को अपनी कविता के माध्यम से आप सबके समझ उनके स्वरूप का वर्णन करने का प्रयत्न करूँ।हर हर महादेव



बातें कुछ अनकही सी...........: शनाख़्त मोहब्बत की

शनाख़्त नहीं हुई मोहब्बत की हमारी जज़्बात थे,सीने में सैलाब था पर गवाह एक भी नहीं लोगों ने जाना भी,बातें भी की पर समझ कोई न सका समझता भी कैसे अनजान तो हम भी थे एक हलचल सी होती थी जब भी वो गुज़रती थी आहिस्ता आहिस्ता साँसें चलती थी एक अलग सी दुनिया थी जो मैं महसूस करता था मेरी



बातें कुछ अनकही सी...........: एक कविता मेरे नाम

बात तब की है जब मैं धरती पर अवतरित हुआ चौकिए मत हमारा नाम ही ऐसा रखा गया युगेश अर्थात युग का ईश्वर अब family ने रख दी हमने seriously ले ली खुद को बाल कृष्ण समझ बैठे खूब मस्ती की पर गोवर्धन उठा नहीं पाए पर पिताजी ने बेंत बराबर उठा ली और कृष्ण को कंस समझ गज़ब धोया मतलब सीधा-



देहरी

तन और मन की देहरी के बीच भावों के उफनते अथाह उद्वेगों के ज्वार सिर पटकते रहते है। देहरी पर खड़ा अपनी मनचाही इच्छाओं को पाने को आतुर चंचल मन, अपनी सहुलियत के हिसाब से तोड़कर देहरी की मर्यादा पर रखी हर ईंट बनाना चाहता है नयी देहरी भूल कर वर्जनाएँ भँवर में उलझ मादक गंध में बौराया अवश छूने को मरीचिका



सबकुछ हो चुका है

सबकुछ हो चुका है: उत्तेजित-से स्वर में उनके सामने पढ़ रहा था मैं अपनी कुछ पसंदीदा कविताएँ,और वह भी उन्हीं की भाषा में लिखी हुई उन्हीं के कवियों की उस वक़्त शायद मेरी आँखें चमक रही थीं एक के बाद एक पंक्तियाँ सामने आ रही थीं एक के बाद एक पन्ने पलट रहा था और उनके सामने रख रहा था कुछ बेजोड़ चीज़ें, जो उन्ही



धरती का फेरा ( बिना रदीफ की ग़ज़ल )

मुहब्बत, तूने दी मुझको, तभी मैं, हो गया तेरातू आई, मेरी बाहों में, मिटा है, कुछ तो अँधेराजब से, सूरज हुआ मद्धिम, बशर देखा, नहीं कोईमगर, उम्मीद थी दिल में, कभी फिर होगा, सवेराबहारें, जब भी आती हैं, शाख पे पात, उगते हैंचहकते, पंछियों का, फिर वहाँ, होता है बसेरादिल की, दुनिया में मैंने, अब तलक बस, हार



वादा

आज, मेरी मुहब्बत की, तुम्हें ना कद्र, ज्यादा हैलगे, सब कुछ, भुलाने का, फ़कत, तेरा इरादा है अगर है, चाह इस मन में,, राह तो, बन ही जाएगी फिर तू, मजबूरियों का, क्यों यहाँ, ओढे लबादा हैबोझ, तन्हाइयों का, लो मैं फिर से, सर पे ले लूँगामैंने ग़म,



राख...

राख... कैसे रिश्ते ये... कैसे ये नाते है... अपना ही खून हमे कहा अपनाते है... प्यार कहो या कहो वफ़ा... सबकुछ तो सिर्फ बातें है... रिशतें कहो या कहो अपने... सबकुछ तो सिर्फ नाते है... बातें लोग भूल जाते है... नाते है टूट जाते है... कोनसी कसमें कोनसे वादें... यहां अपने पीछे छूट जाते है... कितना भी कहलो



नेह की धारा (बिना रदीफ जी ग़ज़ल )

मुहब्बत हो गई तुमसे, करे क्या, दिल ये बेचारातन्हा बैठा है यादों में, मगर हिम्मत, नहीं हाराआस तो अब भी, जिंदा है, इस जीवन के, मेले मेंमिलन होगा यहाँ, अपना भी देखो, फिर से दोबारानहीं है भूख, इस तन की, तड़प है, मेरे सीने मेंमैं तो असली, पुजारी हूँ, नहीं हूँ , कोई आवारानिक



बेहिसाब

तुझको ख़बर, ए गुल नहीं, तुझ पर शबाब हैऐसा लगे, ज्यों इस पेड़ पर , लटकी शराब है नज़रों से मेरी, देख ले तू, खुद को, एक बार तुझको लगेगा, तुझ पे ये रूप , बेहिसाब हैमुझको थी तेरी जुस्तजू, पर, तू, गैर को मिलादोष दें, किसको यहाँ, मेरी किस्मत



प्यार के बहुतेरे रंग

कविताप्यार के बहुतेरे रंगविजय कुमार तिवारीयाद करो मैंने पूछा था-तुम्हारी कुड़माई हो गयी?यह एक स्वाभाविक प्रश्न था,तुमने बुरा मान लिया, मिटा डाली जुड़ने की सारी सम्भावनायेंऔर तोड़ डाले सारे सम्बन्ध। प्यार की पनपती भावनायें वासना की ओर ही नहीं जाती,वे जाती हैं-भाईयों की सुरक्षा में,पिता के दुलार में,व



धुप

दौड़ भागकर सारा दिन थकी उचक्की धुपआँगन में आ पसर गई कच्ची पक्की धुप सारा दिन ना काम किया रही बजती झांझ लेने दिन भर का हिसाब आती होगी साँझ याद दिलाया तो रह गई हक्की-बक्की धुपआँगन में आ, पसर गई कच्ची पक्की धुप अम्मा ले के आ गई पापड़, बड़ी, अचार ले ना आये खिचड़ी, समझ के



करार

सुन ले मैं, थक चुका हूँ, तेरे इंतज़ार मेंदूरी ये अच्छी नहीं, इतनी भी, प्यार मेंदुश्वारियां कबूल थी, जब साथ में, चलेखामोशी मगर, थी नहीं, अपने करार मेंमुझको, ख़बर हुई नहीं, तेरे मिजाज कीलेकिन, कमी ना है कोई, मेरे खुमार मेंजब से गए हो, तुम वहाँ, देता रहा सदाक्या तुमको, दर्द ना दिखा, मेरी पुकार मेंसहरा म



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