कविता



पास और दूर

वो जब मेरे पास थी थी मेरी ज़िंदगी रुकी हुई अब वो मुझसे दूर है ज़िंदगी फिर से चल पड़ी जब था उसके पास मैं मैं नहीं था कहीं भी मुझमें अब केवल मैं ही मैं हूँ वो कहीं नहीं है मुझमें जब थी मेरे पास वो था उसे खोने का डर खोकर उसको हो गया अब हर डर से बेख़बर ✍️आलोक कौशिक



करियर

करियर चौराहे पर बैठामैं रास्तों को गिन रहा कभी रास्ते को नापता ,तो कभी चुपके से रास्तों में झांकता जाना तो मुझे करियर बनाने को है लेकिन यह रास्तेयह संकट मुसीबतें मुझे रोकने के लिए लगातार ताक रहे हैहर रास्ते में एक घोड़ा लिए बुद्धिमान खड़े हैसबके पास दिखाने को प्रमाण है यह देखिए जनाब हमारे घोड़े पर



करियर

करियर चौराहे पर बैठामैं रास्तों को गिन रहा कभी रास्ते को नापता ,तो कभी चुपके से रास्तों में झांकता जाना तो मुझे करियर बनाने को है लेकिन यह रास्तेयह संकट मुसीबतें मुझे रोकने के लिए लगातार ताक रहे हैहर रास्ते में एक घोड़ा लिए बुद्धिमान खड़े हैसबके पास दिखाने को प्रमाण है यह देखिए जनाब हमारे घोड़े पर



है मनुष्य इतना घमंड ना कर प्रकृति का तू दमन ना कर यह जग सबका है पशु पक्षियो को खत्म ना कर यह जीव जंतु दुश्मन नहीं तेरे साथी है इनके बिना तू कुछ

है मनुष्य इतना घमंड ना कर प्रकृति का तू दमन ना कर यह जग सबका है पशु पक्षियो को खत्म ना कर यह जीव जंतु दुश्मन नहीं तेरे साथी है इनके बिना तू कुछ नहीं यह तेरे जीवन के बाराती है पंछी चाहे कितना ही ऊंचा उड़ जाए खाने के लिए धरती पर झोली फैलाए



अभिनव मिश्र



जिंदगी



महाप्राण निराला के प्रति

छायावाद के चार प्रमुख स्तम्भोंमें से एक महानकवि निराला... नवगीत केउद्भावक और प्रवर्तक... कल महाप्राण निराला जी की पुण्य तिथि के अवसर पर कुछ पंक्तियाँ श्रद्धांजलिस्वरूप प्रस्तुत की थीं... जो आज आप सबों के साथ साँझा कर रहे हैं... निराला जीजैसा भावुक और उदारमना कवि वास्तव में समस्त जगती के प्राणों में



सुबह से शाम हो रही है न्याय के लिए आँखें रो रही है कभी निर्भया तो कभी हाथरस जैसी घटनाए हर रोज हो रही है लगता है आज कल धरती पर मानव तो है लेकिन म

सुबह से शाम हो रही है न्याय के लिए आँखें रो रही है कभी निर्भया तो कभी हाथरस जैसी घटनाए हर रोज हो रही है लगता है आज कल धरती पर मानव तो है लेकिन मानवता धीरे धीरे जग से खो रही है किसको फर्क पड़ता है यहां न्यायपालिका में लाखों मुकदमे विचाराधीन है निर्दोष भी कारा गृह में मौन है अब यह गाँधी का देश नहीं है



तू कभी न दुर्बल हो सकती

काव्य मैराथन में आज सप्तम दिवस कीरचना प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसका शीर्षक है “तूकभी न दुर्बल हो सकती”... अपनी आज की रचना प्रस्तुत करें उससे पहले दो बातें...हमारी प्रकृति वास्तव में नारी रूपा है... जाने कितने रहस्य इसके गर्भ में समाएहुए हैं… शक्ति के न जाने कितने स्रोत प्रकृति ने अपने भीतर धारण किये हु



उठो बहना शमशीर उठा लो....

"उठो बहना शमशीर उठा लो..."उठो बहना शमशीर उठा लोसोयी सरकार न जागेगीहर घर में है दुःशासन बैठाऔर कब तक तू भागेगी...?समय आ गया फिर बन जाओतुम झाँसी की रानीशमशीर उठाकर लिख डालोएकदम नई कहानीमरते दम तक याद रहेसबको एकदम जुबानी....।उठो बहना शमशीर उठा लोबन जाओ तुम मरदानीकोई नज़र



माँ है हिंदी

तेरी सुंदरता और भी बढ़ जाती है जब माथे पर लगी होती है बिंदी निकालने वाले तो चाँदनी की भी निकालते है चिंदी कलम भी गर्व महसूस करती है जब कागज पर लिखते है हिंदी हिंदी के शब्द सुनकर तोप्राचीन काल में मोहिनी हुई थी जिंदी संस्कृत की पुत्री है सिंधी की बहन मेरी मात्र भाषा और मेरी माँ है हिंद



माँ

चरणों में पुष्प अर्पण करूँहे माँ तेरा ही तेरा दर्शन करूँ मेरा पहला शब्द है माँ मुझे जीवन देने वाली माँ हर संकट में याद आये वो माँ चोट लगने पर मुंह से निकलता माँ तेरी भी माँ मेरी भी माँ जग तुझसे बना माँ जहाँ जाऊँ जिधर जाऊँप्रेम की मूर्त माँ को पाऊँ इस दुनिया में कितना भी अच्छा ख



लोट आओ है गाँधी

लोट आओ है गाँधी तेरा भारत तुझे पुकारे स्वराज का सपना अधूरा स्वराज के दुलारे।



सोने से पहले कुछ गा दो

स्नेह बिना जीवन वास्तव में सूना है...स्नेह चाहे मित्र का हो... जीवन साथी का हो... ईश्वर के प्रति हो... स्नेहदान सेही जीवन ज्योति प्रज्वलित रहती है... तथा जीवन का पथ प्रकाशमान बना रहता है... कुछइसी प्रकार के उलझे सुलझे से भावों के साथ प्रस्तुत है हमारी आज की रचना,,, सोने से पहले कुछ गा दो...कात्यायनी



सर्वदा नमन है माँ तुमको

जीवन मेंअनगिनती पल ऐसे आते हैं जब माता पिता की याद अनायास ही मुस्कुराने को विवश कर देतीहै | ऐसा ही कुछ कभी कभी हमारे साथ भी होता है | माँ क्या होती है – इसके लिए तोवास्तव में शब्द ही नहीं मिल पाते | माँ की जब याद आती है तो बस इतना ही मन करताहै: माँ तेरी गोदीमें सर रख सो जाऊँ मैं पल भर को, तो लोरी तू



चले आना प्रभुजी चले आना....

"चले आना प्रभुजी चले आना..."कभी परशुराम बन केकभी बलराम बन केअहंकार मिटाने चले आनाचले आना प्रभुजी चले आना...कभी घनश्याम बन केकभी श्यामघन बन केधरती को भिगाने चले आनाचले आना प्रभुजी चले आना....कभी राम बन केकभी श्याम बन केपाप मिटाने चले आनाचले आना प्रभुजी चले आना....कभी किसान बन केकभी नौजवान बन केअमन चै



फौजी

नशा है हमें तिरंगे में लिपटकर घर आने का अपने खून से तिरंगा सजाने का अपने देश के लिए अपनी जान गवाने का भारत माँ कि आन बान शान के लिए किसी से भी लड़ जाने का नशा है हमें तिरंगे में लिपटकर घर आने का।



षड़्जान्तर

सप्तक के स्वरों की स्थापना सर्वप्रथम महर्षि भरत के द्वारा मानीजाती है | वे अपने सप्त स्वरों को षड़्ज ग्रामिक स्वर कहते थे | षड़्ज ग्राम सेमध्यम ग्राम और मध्यम ग्राम से पुनः षड़्ज ग्राम में आने के लिये उन्हें दो स्वरस्थानों को और मान्यता देनी पड़ी, जिन्हें ‘अंतर गांधार’ और ‘काकली निषाद’ कहा गया| महर्



अभिनव मिश्र



प्रश्न नहीं ,अब परिभाषा बदलनी होगी !

चाहतीहूँ ,उकेरना ,औरत के समग्र रूपको, इस असीमित आकाश में !जिसके विशालहृदय में जज़्बातों का अथाह सागर,जैसे संपूर्ण सृष्टि कीभावनाओं का प्रतिबिंब !उसकेव्यक्तित्व कीगहराई में कुछ रंग बिखर गए हैं । कहींव्यथा है ,कहीं मानसिक यंत्रणा तो कहींआत्म हीनता की टीस लिए!सदियोंसे आज



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