कविता

एक महान राष्ट्र

मध्यप्रदेशऔरछत्तीसगढ़मेंबाढसेतबाहीमुख्यमंत्री ने अफसरों के साथ समीक्षा की उत्तर प्रदेश में सभी नदियों का जलस्तर बढ़ा मुख्यमंत्री और उनके चाचा एक मंच पर दिखे प्रधानमंत्री पाक अधिकृत कश्मीर पर चिंतित उम्र ने अपना घर संभालने की नसीहत दीदिल्ली का मुख्यमंत्री जनमत संग्रह कराएगाप्रधानमन्त्री को भी काम करना



इन्सान

@@@@@@ इन्सान @@@@@@*********************************************सृष्टि का सबसे विचित्र , प्राणी है इन्सान |जीता है वो जिन्दगी,दिखा कर झूठी शान ||नहीं जी पाता वो कभी,सीधी सहज जिन्दगी |झूठ और कपट की ,करता उम्र भर बन्दगी ||बड़ा होना चाहता बचपन में, पचपन में चाहता फिर बचपन |अजीब है इन्सान की फितरत,जिन्द



कुछ आस नही लाते

हर मोड़ पर मिलते है यहाँ चाँद से चेहरेपहले की तरह क्यो दिल को नही भाते ||बड़ी मुद्दतो बाद लौटे हो वतन तुम आजपर अपनो के लिए कुछ आस नही लाते ||काटो मे खेल कर जिनका जीवन गुज़राफूलो के बिस्तर उन्हे अब रास नही आते||किसान, चातक, प्यासो आसमा देखना छोड़ोबादल भी आजकल कुछ खास नही आते ||



रत-मिलन (एस कमलवंशी )

सितारे सिमट आए थे, दमके वफा के दामन में, शब्ब-ए-शमा अल्फ़ाज़ थे, बरसे वफा के आँगन में । इक झिलमिलाती रात में,



सखी री मोरे पिया कौन विरमाये?- एस. कमलवंशी

सखी री मोरे पिया कौन विरमाये? कर कर सबहिं जतन मैं हारी, अँखियन दीप जलाये, सखी री मोरे पिया कौन विरमाये... अब की कह कें बीतीं अरसें, केहिं कों जे लागी बरसें, मो सों कहते संग न छुरियो, आप ही भये पराये, सखी री मोरे पिया कौन विरमाये... गाँव की



बो विश्वगुरु भारत देश कठे

@@@@@ बो विश्वगुरु भारत देश कठे @@@@@ ******************************************************* मानवता है धर्म जकारो ,बे मिनख भलेरा आज कठे | भ्रष्टाचार ने रोक सके , इसो भलेरो राज कठे || पति रो दुखड़ो बाँट सके ,बा सती सुहागण नार कठे| घर ने सरग बणा सके ,बा लुगाई पाणीदार क



कथित आधी घरवाली

@@@@ कथित आधी घरवाली @@@@ ****************************************** उससे है रिश्ता ऐसा जो बोलचाल में गाली है | नाम है गुड्डन उसका,वो मेरी प्यारी साली है || शालीनता की प्रतिमूर्ति,वो नजर मुझको आती है | शर्म के मारे वो साली मेरी,छुईमुई बन जाती है || जब कभी किसी बात पर,वो म



दृष्टि का भेद

@@@@@@@ दृष्टि का भेद @@@@@@@ ******************************************************** नहीं समझ पाया कोई मुझ को,मेरे व्यवहार-विचारों से | गहराई नदी की कैसे नपती , भला उसके दो किनारों से || किसी ने तुलना की हिटलर से,किसी ने महात्मा गान्धी से| ज्वालामुखी लगता हूँ उनको ,जो ड



तुम कहने के पहले सोचती क्‍यूँ नहीं :)

ना शिकायत मुझे तुमसे है, ना ही समय से, ना किसी और सेबस है तो अपने आप से हर बार हार जाती हूँ तुम से तो झगड़ती हूँ मन से रूठकर मौन के एक कोने में डालकर आराम कुर्सीझूलती रहती अपनी ही मैं के साथ !... कभी खल़ल डालने के वास्‍ते आती हैं हिचकियाँ लम्‍बी-लम्‍बी गटगट् कर पी लेत



क्या सचमुच शहर छोड़ दिया?

अपने शहर से दूर हूँ,  पर कभी-२ जब घर वापस जाता हूँ  तो बहाना बनाकर तेरी गली से गुज़रता हूँ  मै रुक जाता हूँ  उसी पुराने जर्जर खंबे के पास  जहाँ कभी घंटो खड़े हो कर उपर देखा करता था  गली तो वैसी ही है  सड़क भी सकरी सी उबड़ खाबड़ है  दूर से लगता नही कि यहाँ कुछ भी बदला है  पर पहले जैसी खुशी नही  वो



दोहे

पढ़-लिख कर वे हो गए,  देशप्रेम से दूर।ऐसी शिक्षा व्यर्थ है, जो कर देती क्रूर।आज़ादी का अर्थ है, निर्भययुक्त उड़ान।जीने का हक भी मिले, सबको एक समान।।शब्द नहीं है स्वतंत्रता, है यह एक विचार।लोकतंत्र की आत्मा, जीवन का आधार।आज़ादी हमको मिली, हो गए सत्तर साल इसको बेहतर नित करें, देश बने खुशहाल।आज़ादी मतलब यही



बनैली बौराई तुम ?

  तुम कितनी शांत हो गयी हो अब ,बीरान सी भी .वो बावली बौराई सरफिरीलड़की कहाँ छुपी है रे ? जानती हो , कितनी गहरी अँधेरी खाइयों मेंधकेल दी जाती सी महसूसती हूँ खुद कोजब तुम्हारे उस रूप को करती हूँ याद . क्यों बिगड़ती हो यूँ ?जानती हो न ,तु



दो पत्ती का श्रमनाद !

 पसीने से अमोल मोती देखे हैं कहीं ?कल देखा उन मोतियों को मैंनेबेज़ार ढुलकते लुढ़कतेमुन्नार की चाय की चुस्कियों का स्वादऔर इन नमकीन जज़्बातों का स्वादक्या कहा ....बकवास करती हूँ मैं !कोई तुलना है इनकी ! सड़कों पर अपने इन मोतियों की कीमतमेहनतकशी की इज़्ज़त ही तो मांगी है इन्होंनेसखियों की गोद में एक झपकी ले



शहर पुराना सा .

 अंग्रेज़ीदा लोगों का मौफुसिल टाउन ,और यादों का शहर पुराना सा .कुछ अधूरी नींद का जागा,कुछ ऊंघता कुनमुनाता साशहर मेरा अपना कुछ पुराना सा .हथेलियों के बीच से गुज़रतेफिसलते रेत के झरने सा . कुछ लोग पुराने से ,कुछ छींटे ताज़ी बूंदों केकुछ मंज़र अजूबे सेऔर एक ठिठकती ताकती उत्सुक सी सुबह . सरसरी सवालिया निगाह



व्यथा ,'सूरज' होने की .

बिजली की लुका छुपी के खेल और ..चिलचिल गर्मी से हैरान परेशां हम ..ताकते पीले लाल गोले को और झुंझला जाते , छतरी तानते, आगे बढ़ जाते !पर सर्वव्यापी सूर्यदेव के आगे और कुछ न कर पाते ..!पर शाम आज ,सूरज के सिन्दूरी लाल गोले को देख एक दफे तो दिल 'पिघल' सा गया , सूरज दा के लिए , मन हो गया विकल रोज़ दोपहरी आग



ताकता बचपन .

अब वो नमी नहीं रही इन आँखों में शायद दिल की कराह अब,रिसती नही इनके ज़रिये या कि सूख गए छोड़पीछे अपने  नमक और खूनक्यूँ कि अब कलियों बेतहाशा रौंदी जा रही हैं क्यूंकि फूल हमारे जो कल दे इसी बगिया को खुशबू अपनी करते गुलज़ार ,वो हो रहे हैं तार तार क्यूंकि हम सिर्फ गन्दी? और बेहद नीच एक सोच के तले दफ़न हुए जा



इशारों ही इशारों

अपने गिरेबां में झांकऐ मेरे रहगुजरसाथ चलना है तो चलऐ मेरे हमसफरचाल चलता ही जा तूरात-ओ-दिन दोपहरजीत इंसां की होगीयाद रख ले मगरइल्म तुझको भी हैहै तुझे यह खबरएक झटके में होगाजहां से बदरशांति दूत हैं तोहैं हम जहरबचके रहना जरान रह बेखबर



दीवारें

धुप काफी थी तो मैंनेे दीवारें बना लिए उससे बचने के लिएपहले छत पक्की नहीं थी लेकिन पेड़ था छाँव देने के लिएपेड़ से गिरी टहनियाँ कभी गिर कर घायल भी कर देतीलेकिन मिलने वाली छाँव के बदले वो कुछ नहीं थाबारिश भी बहोत होती थी मगर उसका कुछ एहसास नही होतालेकिन कुछ तूफ़ान आते और उस पेड़ को कमजोर बना देतेपेड़ को कम



चलो कुछ ऐसा कमाया जाये

चलो कुछ ऐसा कमाया जायेरिश्तों का बोझ ढहाया जायेआईने पर जम गई है धूल जोमिलकर कुछ यूं हटाया जाये#विशाल शुक्ल अक्खड़



लाजबाब हो गयी

चाहने वालो के लिए एक ख्वाब हो गयी  सब कहते है क़ि तू माहताब हो गयी  जबाब तो तेरा पहले भी नही था  पर सुना है क़ि अब और लाजबाब हो गयी||  कवि:- शिवदत्त श्रोत्रिय



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