कविता

सफ़र आसान हो जाए

गुमनाम राहो पर एक नयी पहचान हो जाए चलो कुछ दूर साथ तो, सफ़र आसान हो जाए|| होड़ मची है मिटाने को इंसानियत के निशान रुक जाओ इससे पहले, ज़हां शमशान हो जाए|| वक़्त है, थाम लो, रिश्तो की बागडोर आज ऐसा ना हो कि कल, भाई मेहमान हो जाए|| इंसान हो इंसानियत के हक अदा कर दो



Sketches from Life: होली वग़ैरा

बताया नहीं अपना हाल चाल वग़ैरा,ख़फ़ा हो क्यूँ , ऑफ हो क्यूँ वग़ैरा,हम तो समझते थे कि समझते हैं तुमको,हो गए जाने कैसे हम नासमझ वग़ैरा !ज़रा मानो तो करा दें शॉपिंग वग़ैराडिज़ाइनर साड़ी या फिर मूवी वग़ैरा,टेंशन छोड़ो क्रेडिट कार्ड जेब में है,म



हरा पेड़ कोयला बन जायेगा....

तुं ही है अभी मंजर में आ देख बहुजनो के बंजर मेंअभी तो सोया हुआ है,कुम्भकर्ण सी नींद में, तुझे जो करना है कर ले अभी हीजागेगा जब बंजर सारा, तेरा मंजर बदल देगा....वक्त की नजाकत का फायदा लिया है तूनेअपने लोगो को सत्ता में देखलाडला बनवाया है तुझेमोहरा जब उतरेगा,वह कफ़न किसी और का पुकारेगा,वह हाल बस होगा,



;कुंडलिया

. "कुंडलिया" पापी के दरबार में, वर्जित पूण्य प्रवेश काम क्रोध फूले फले, दगा दाग परिवेष दगा दाग परिवेष, नारकी इच्छाचारी भोग विलास कलेश, घात करे व्यविचारी कह गौतम चितलाय, दुष्ट है सर्वव्यापी कली छली मिल जांय, प्रतिष्ठा पाए पापी।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



;मुक्तक

प्रदत शीर्षक- जीभ - रसना, रसज्ञा, जिह्वा, रसिका, वाणी, वाचा, जबान। दोहा मुक्तक......हिंदी दिवस की हार्दिक बधाई..... रसना मीठी रसमयी, वाणी बचन जबान रसिका हिंदी माँ मयी, जिह्वा कंठ महान जस लिक्खे तस गाइयाँ, भाषा यह अनमोल देवनागरी लिपि सरल, वाचा मधुर सुजान।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



मनहर घनाक्षरी

"मनहर घनाक्षरी" भावना श्रृंगार लिए, रस छंद भाव पिए, हिंदी छेड़े मीठी तान, गान मान गाइए प्रकृति से प्यार करें, गाँव से दुलार करें, शहरी सिनेमा संग, देखिए दिखाइए साहित्य पुकारे मान, मनहरे कवि गान, घनाक्षरी कवित्त की, महिमा सुनाइए हिल-मिल गौतम जी, देश राग उत्तम जी, मौसी-म



गीतिका/ग़ज़ल

मापनी- २,२,२,२,२,२,२,२, पदांत- किया जाता है , समान्त- आन “गीतिका” प्रति दिन दान किया जाता है मान गुमान किया जाता है जिंदगी चलती नेक राहों पर चल अभिमान किया जाता है॥ तिल-तिल बढ़ती है बारिकियाँ जिस पर शान किया जाता है॥ पपिहा पी पी कर पछताए कलरव गान किया जाता है॥ परिंदे दूर तलक उड़ जात



यह जो जुगाड़ू हिन्दीवालों की थाती है

आज तो सब कुछ हिन्दीमय लग रहा हैयह कातिलाना अंदाज़ किसको ठग रहा हैलगता है कोई अधूरा स्वप्न जग रहा हैक्या सूखे फूल पर तितली मँड़राती है ?किस अँधेरे में यह कोयल गाती हैअब तो दिया अलग है अलग बाती हैयह जो जुगाड़ू हिंदीवालों की थाती हैअंग्रेजी पीती है और अंग्रेजी खाती हैदेशी



मुँह मत मोड़ना

अगर दोबारा कहीं मिले चौराहे परमुबारक मुँह मत मोड़ना, आरक्षण से है, रहेगे, आगे भी बढ़ेगे, हमें मिटाने से हम नहीं मिटेगेजहाँ भी दफ़न होगे, आपके रास्ते पे वटवृक्ष बन ऊग आयेगे ....-हरेश परमार



खोखले रिश्ते

खोखले रिश्ते काया जरा सी क्या मेरी थकी, अपने बच्चों को ही हम अखरने लगे,जिनकी खुशियों पे जीवन निछावर मेरा, मेरे मरने की घडियाँ वो गिनने लगे // मेरे मरने से पहले वो भूले मुझे,किन्तु, मेरी कमाई पे लडने लगे, जनाजा मेरा उठा ही नही, जिन्दा घ



हमारी हिन्दी, हमारा गर्व

@@@@@@ हमारी हिन्दी, हमारा गर्व @@@@@@*************************************************************कितनी सुन्दर ,कितनी प्यारी ,हमारी हिन्दी भाषा है |सभ्यता और संस्कृति की , मानो यह परिभाषा है ||देवनागरी जो लिपि है इसकी , इसका सुन्दर वेश है |हिन्दी हमारी अपनी भाषा ,देती एकता का सन्देश है ||कानों को ल



विश्व हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं

विश्व हिन्दी दिवस पर शब्दनगरी के सभी मित्रों एवं सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएंहमारी मातृभाषा हिन्दी के लिए चार पंक्तियांभाव सुमन बिखराती जातीसबके मन को खूब लुभाती हमारी प्यारी सबकी हिन्दी भाल पर बने गर्वीली बिन्दी



आज बहुत रोई पिया जी! - एस. कमलवंशी

आज बहुत ही रोई पिया जी, आज बहुत ही रोई,जिस्म-फ़रोसी की दुनियाँ में, दूर तलक मैं खोयी।कोई भी हाल न मेरा पूँछे, कोई न पूँछे ठिकाना,जिधर भी जावे मोरी नजरिया, चाहवे सब अज़माना।घूँट घूँट कर ज़हर मैं निगली, देह पथरीली होई,आज बहुत ही रोई पिया मैं, आज बहुत ही रोई।लाख मुसाफ़िर, लाख प्यासे, लाख ठिखाने लाये,लाख त



रातभर तुम्हारे बारे मे लिखा

रातभर तुम्हारे बारे मे लिखा मैने उस रात नीद नही आ रही थी, कोशिश थी भुला के तेरी यादे बिस्तर को गले लगा सो जाऊ पर कम्बख़्त तू थी जो कहीं नही जा रही थी|| नीद की खातिर २ जाम लगाए, सोचा कि सोने के बाद हमारी बातो को मै कागज पर उतारूँगा एक कागज उठा सिरहाने रख कर मे सो गया



तन की वसीयत

@@@@@@@ तन की वसीयत @@@@@@@जीवन का है नहीं भरोसा , पर मौत कभी भी आ सकती |जीने की इच्छा मर चुकी ,अब जान कभी भी जा सकती ||जीया मैं अपनों के खातिर, पर आया नहीं अपनों को रास |अपनी बेकद्री के चलते , रहने लगा हूँ मैं उदास ||जीते जी नहीं कर सका मैं, बेगानों के लिए कुछ भी खास |पर मर कर देना चाहता हूँ मैं, उ



कविता

सत्य समर्थन करता हूँमैं आत्ममंथन करता हूँजड़ता में विश्वास नहींनित परिवर्तन करता हूँअहंकार की दे आहुति मैं आत्मचिंतन करता हूँहर नए आगंतुक का मैं अभिनन्दन करता हूँमन के चिकने तल परवैचारिक घर्षण करता हूँ



“मुक्तक”

प्रदत शीर्षक- अमृत/सुधा/पियूष/अमीय/सोम/मधु/सुरभोग समानार्थी एक दोहा मुक्तक चाहत अमृत धार मधु, देव दनुज सुरभोग प्याला विष पियूष जस, नीलकंठ संयोग त्राहि त्राहि छकि पी गए, सत्य अमीय महेश गरल सुधा मीठे बचन, शीतल करि आवेग॥ महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



“कुण्डलिया छंद”

“कुण्डलिया छंद” गुरुवर साधें साधना, शिष्य सृजन रखवार बिना ज्ञान गुरुता नहीं, बिना नाव पतवार बिना नाव पतवार, तरे नहि डूबे दरिया बिन शिक्षा अँधियार, जीवनी यम की घरिया कह गौतम चितलाय, इकसूत्री शिक्षा रघुवर गाँव शहर तक जाय, ज्ञान भल फैले गुरुवर॥ महातम मिश्र, गौतम



“कर्म ही फल बाग है”

एक मुक्त काव्य............ भाग्य तो भाग्य है कर्म ही तो फल बाग है बारिश के जल जैसा थैली में भर पैसा ओढ़ ले पैसा ओढ़ा दे पैसा पानी के जैसा बहा दे पैसा किसका अनुभाग है कर्म ही तो फल बाग है॥ कुंए का जल है परिश्रम बारिश का नहाना बिना श्रम भाग्य में यदा-



मनहर घनाक्षरी

"मनहर घनाक्षरी" सुबह की लाली लिए, अपनी सवारी लिए, सूरज निकलता है, जश्न तो मनाइए नित्य प्रति क्रिया कर्म, साथ लिए मर्म धर्म, सुबह शाम रात की, चाँदनी नहाइए कहत कवित्त कवि, दिल में उछाह भरि, स्वस्थ स्नेह करुणा को, हिल मिल गाइए रखिए अनेको चाह, सुख दुःख साथ साथ, महिमा मानव



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