कविता



कैसा खेल यह तूने खेला है

कैसा खेल यह तूने खेला है?लगा दिया यहाँ रेला है।छायी हर तरफ उदासी है,और लगा दिया तूने मेला है।हम आँखों में उम्मीद लगाये,ढूँढे ऐसा स्वच्छ बसेरा है।हम सहम रहे मन में हो पाये या न हो पाये,न जाने वह कैसा अगला सवेरा है?कैसा खेल यह तूने खेला है?लगा दिया यहाँ रेला है।जख़्म दिया ऐसा हमको,न जाने छिपा हुआ कौन स



रिश्तों की पौध – शिशिर मधुकर

साफ दिल के साथी से जब नज़रें मिलाओगेवो हँसती हुई खुद की छवि तुम देख पाओगेप्रेम और विश्वास संग जो तुम घर बनाओगेसुख दुःख के हर मौसम में बस मुस्कुराओगेतुम और मैं हम ना हुए तो



जैन शिक्षा समृद्धि

जे.एस.एस में मिलता , बच्चों की मुश्किल का हलपढ़ो समझो, समझो पढ़ो की नीति बनाती सफलये मंदिर है शिक्षा का यहाँ बनते हैं स्वर्णिम पलयहाँ पलता है नन्हा मन जो होगा देश का कलकभी प्रोजेक्टर से पढ़ाया यहाँ जातालैपटाॅप चलाना भी सिखाया यहाँ जातागुरु शिष्य का देखो यहाँ है मित्रवत नाताजो आया एक बार यहाँ यहीं क



बातें कुछ अनकही सी...........: युवा और गाँधी

मैं खोया था बैठा उदास निज आ बैठे गाँधी सुभाष इस मन कौतुहल और आँधी को कैसे समझाऊं गाँधी कोशायद समझे वो महापुरुषचेहरे पर थी मुस्कान दुरुस्तसुभाष समझाओ युवा साथी को हमने देखा भांति भांति को याद है प्यारा खुदीराम और अमर माँ को उसका प्रणाम जो जल



शहंशाही मर्दों की ,कुबूल की है कुदरत ने,

तखल्लुस कह नहीं सकते ,तखैयुल कर नहीं सकते , तकब्बुर में घिरे ऐसे ,तकल्लुफ कर नहीं सकते . ………………………………………………………………. मुसन्निफ़ बनने की सुनकर ,बेगम मुस्कुराती हैं , मुसद्दस लिखने में मुश्किल हमें भी खूब आती है , महफ़िलें सुन मेरी ग़ज़लें ,मुसाफिरी पर जाती हैं , मसर



फूल और काँटे

विषय - काँटे फूल हो जब राह में काँटे भी जरूरी होते हैं ।फूल फुला देते मन, काँटे लगें तो हम रोते हैं ।।काँटे हमें शायद अहंकार से बचाते हैं ।काँटों के कारण ही हम राह का असली मजा पाते हैं ।।गर फूल , फूल ही हों राह में तो हम फूल की कीमत भूल जाते हैं ।फूल फूल ही हों राह में तो अच्छे अच्छे अहं से फूल जात



चुनावी चकल्लस .... "गधे" मोदी अखिलेश उवाच

कृश्न चन्दर होते तो देखते कि एक गधे की वापसी फिर से हो गयी है। गोपाल प्रसाद व्यास जी एक बार फिर से गधों पर नई कविता लिख सकते थे।इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं। जिधर देखता हूँ गधे ही गधे हैं॥ गधे हँस रहे, आदमी रो रहा है। हिन्दोस्ता



कोशिश बहुत की

कोशिश बहुत की हैं तुम्हें भुलाने की मगर जब भी तुम रूबरू होते हो बीते पल, सुहानी यादें ताज़ा हो जाती हैं कुछ ज़ख़्म हरे हो जाते हैंकुछ नए मिल जाते हैं मुस्कुरा कर इन्हें छुपा तो लेता हूँमगर, दर्द पानी बन छलक जाता है ख़ुशी के आँसु हैं कह कर दुनिया को बहकाता हूँदोस्त मगर समझ जाते हैं जब भी तुम रूबरू हो



रहती है तू मेरे पास

रात के अंधेरे में दिन के उजाले में तू हो ना हो पास, ख़्याल तेरे रहते हैं मेरे पास हर लम्हा कटता है, देखते हुए तेरे ख़्वाब बातों में तेरा ही ज़िक्र होता है तेरी तस्वीर होती है आँखों में क़लम डूब जाती है, तेरे प्यार की स्याही में काग़ज़ पे उमड़ आते हैं ज़स्बादबन कर तेरी याद तू हो ना हो पासरहती है तू म



होगी मुलाकात उनसे

भटकते हुए पहुँचा जब उसके दर हो गयी थकन सब दूर सिर्फ़ इसी ख़याल से कि होगी मुलाक़ात उनसेना थी भूख प्यासबस यही थी आस कि होगी उनसे मुलाक़ात आँखें बोझिल थी दिल व्याकुल पर था फिर भी सुकून कि होगी मुलाक़ात उनसे दूर से ही होंगे दीदार उनके पर थी तसल्ली, की होगी मुलाक़ात उनसे २० फ़रबरी २०१७जिनेवा



परामार्थ

विषय - परमार्थवृक्ष देता है हमें आॅक्सीजन,फूल और फल ।नदियाँ देती हैं हमें खाद्य पदार्थ और निर्मल जल ।।प्रकृति हमको देती सब कुछ, निःस्वार्थ भाव से, है सरल ।परहित करती न स्वार्थ वश,सुंदर, सरस, है निर्मल ।।प्रकृति परोपकार,परहित कोसर्वस्व समर्पित करती ।अपनी ममता की छाँव तलेप्राणियों का मन हरती ।



मैं पानी की बूँद हूँ छोटी

मैं पानी की बूँद हूँ छोटी,मैं तेरी प्यास बुझाऊँ।पी लेगा यदि तू मुझको ,मैं तुझको तृप्त कराऊँ।मैं छोटी सी बूँद हूँ,फ़िर क्यों न पहचाने?तू जाने न सही मग़र,किस्मत मेरी ऊपर वाला जाने।मैं पानी की बूँद हूँ छोटी,फ़िर क्यों खोटी मुझको माने?भटकता फ़िर रहा है तू,और क्यों अनजान है तू?तेरी महिमा मैं तो समझूँ न,जाने



अब आदाब करके

मेरे गुनाहों को अब नजर अंदाज करके बनाओ तुम मुझे, खुद को खराब करके ||किस कदर टूट चुका है अब वो देखरात गुजारता है, जिस्म को शराब करके ||अपने हिस्से की चाहत चाहता हर कोईचैन कहाँ है ,मोहब्बत बे- हिसाब करके ||उजड़ा हुआ है यहाँ हर साख का मंजरसोचा चमन से गुजरेगा सब पराग करके ||ये शहर बड़ी जल्दी इतना बड़ा हो ग



तस्वीर

विषय - तस्वीर एक तस्वीर । हर लेती पीर ।। एक है नन्हा बच्चा । भोला भाला सच्चा ।। पहने है कपड़े फटे । बाल न कबसे कटे ।। बीन रहा वो कबाड़ । अंबर की लिए आड़ ।। चेहरे पर है मुस्कान । चल रहा हो छाती तान ।। आँखों में सपने हजार । चाहता अपने लिए प्यार ।। - नवीन कुमार जैन



सँभलिए

सँभलिए --------------- कभी कभी डर लगता है, वो प्यार न मुझसे कर बैठे, साथ मेरा ले भावुक होकर, घरवालों से ना लड़ बैठे। जो थोड़ा परिवार बचा है वह भी टूटा जाएगा, मैं हूँ अकेला, सदा अकेला, कोई मुझसे क्या कुछ पाएगा।। दोष न दे वो भले मुझे पर, खुद को माफ करूँ कैसे?



टाइम का कुछ यूज हो जाये‬

तुम्हारे साथ बैठे टाइम का कुछ यूज हो जाए। तुम्हें चाहे या देखे दिल कन्फियूज होजाए।। तुम्हारे साथ ............| तुम्हें चाहे या देखे............|| हमारी हर कहानी हर जगह सुरखी पर हो दिलवर। कभी हम तुम मिले ऐसे की ब्रेकिंग न्यूज हो जाए।। उसे देने चले एक रोज ग्रीटिंग कार



प्रेम का अहसास

यदि मैं तुम्हे प्रेम करता हूँ,तो सिर्फ प्रेम करता हूँ,मैं प्रेम करता हूँ उस सच्चाई सेजिसे कभी महसूस किया थातुम्हारी आवाज़ में,मैं प्रेम करता हूँ तो उस झूठ से भीजो कभी लज्जित नहीं होता,जो ठहाके लगाता है मेरी न



पत्थरबाज़

वे मासूम हैं और उनके पत्थर अहिंसक । भले दहशतगर्दों की आड़ बन जायें । वे पत्थर मारें और हम फूल बरसायेँ ये भी देखें कि उनमें खार न हों । ऐसे मशवरे जो लोग देते हैं । उन्हें वे पत्थर क्यों न खिलाये जायें ? र र



यह कम है क्या

तुम मेरे साथ हो, यह कम है क्या चाहती हो मुझे, यह कम है क्या भर आती हैं आँखें, मेरे दर्द, मेरी ख़ुशी में, यह कम है क्या बाँट नहीं सकती मेरा समय किसी और के साथ, यह कम है क्याजान छिड़कती हो मुझ पर, यह कम है क्या कर देती हो हँस कर मेरी हर ख़ता को माफ़, यह कम है क्या स्वीकारा है मुझे सब कमज़ोरियों के साथ



हज़ारों की दौड़ में !

हज़ारों की भीड़ में एक दीवाना वो भी था.... उसके नफरत से वाकिफ एक अनजान वो भी था... सच्चाई से परे अपनी ही दुनिया में... अनकही लफ़्ज़ों का एक फ़साना वो भी था... तो सुनते है आपको उस अधूरे प्यार की बात... रोज़ तनहाइयों में कट रही थी उसकी अकेली रात... बताने से कतराता था...छुपाने स



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