कविता



अप्रैल -फूल

भारत सरकार ने8 नवम्बर 2016 को रात 8 बजे हज़ार पांच सौ के नोटों को अमान्य किये जाने की घोषणा कीअगले चार घंटों में देश एटीएम के आगे कतारों में खड़ा हो गयासयाने लोग सोना खरीदते



ऐसी कतारें...

करेंसी बैन ने जीवन परिवर्तन कर दिया। 10-12 दिन से जहाँ देखो वहाँ बस कतारें ही नज़र आ रही है। यह स्थिति किसी के लिए बड़ी दर्द दायीं है तो कोई इस हाल का लुत्फ़ उठा रहा है। मैंने अपनी समझ के हिसाब से इसे शब्द देने की कोशीश की... लगी है ऐसी कतारें



भस्मासुर गा रहा है

एक देश में कई देश देखालाइन में खड़ा दरवेश देखाजड़ खोदकर फल इतरा रहा हैकिसकी ज़मीन खा रहा हैभस्मासुर गा रहा हैगंगाजल बेचकरनमामि गंगे गा रहा हैलक्ष्मी के दरबार मेंश्रीहीनता का दौर हैदिवंगत धन के बोझ सेनिजात पा कर पेट खाली हैदुरभिसंधि की जुगा



इंदिरा गांधी जी के 100 वें जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

अदा रखती थी मुख्तलिफ ,इरादे नेक रखती थी , वतन की खातिर मिटने को सदा तैयार रहती थी . .............................................................................. मोम की गुड़िया की जैसी ,वे नेता वानर दल की थी ,,



आंसू

आंसूआपने रोहित वेमुला की माँ की आँखों में आंसू देखे थे ?आपने नजीब की माँ की आँखों में भी आंसू देखे थे ?पर आपको वह नजर नहीं आये ...वह नेता नहीं थेवह नेताओं के पुत्र-पौत्र नहीं थे...आपने उस उना काण्ड में मार खाने वालों के भी आंसू देखे थेआपको उस वक्त क्या लगा था ?आपने जब वह फैसला आया जब देश में आप जो र



एक मुक्त काव्य.........

एक मुक्त काव्य......... सुबह से शाम हुई कतारें बदनाम हुई धक्का मुक्की बोला चाली काका हजारी की राम राम हुई।। दिन भर चले अढ़ाई कोस घर से निकले हो मदहोश नए नोट का सपना अपना बैंक भर गए पुराने कोष।। दो हजारी बाहर आई सेल्फ़ी ने माला पहनाई चेहरे चढ़ी है लाली लाल शादी मंडप अरु शहनाई।। नए कदम की



देश के लिये....

जब एक फैसला हुआउस दिन एक बुजुर्ग की नजर में चमक दिखी थीदुसरे दिन बेंको में अपने नोट जो कुछ ही दिन पहले निकले थेबदलने गएउनका बीपी बस बढ़ने लगा था...वह तो देश को अपने सीने में बसा के आया थापर जब अपने आस-पास देखा बूढ़े-गरीब अपना काम छोड़कर अपने लिए खड़े थेदेश के नाम परमैं सोचते हुए आगे बढा ही थाबैंक में पै



शब्‍द

शब्‍द कुछ अपने कुछ पराये,शब्‍द कुछ छोटेकुछ बड़े,शब्‍द कुछ साथ कुछ अकेले,शब्‍दकुछ थुलथुलेकुछ बुलबुले,शब्‍द ही तोमात्र शब्‍दनि:शब्‍द ।।



कोई कभी नहीं जगा सकता

ये जो प्रदूषण की बात करके हम चिंतित होते हैं तो क्या वाकई हम बढ़ते प्रदूषण के कारण चिंतित होते हैं ये जो महँगाई की बात करके हम चिंतित होते हैं तो क्या वाकई हम कीमतों की मार से चिंतित होते हैं और ऐसी चिंताएं हम तभी क्यों करते हैं जब सबके साथ होते हैं तब ऐसी ही च



गंवई बात हकीकत कि

गँवई बात हकीकत कै । बँटवारे का लइके अबकी बहुत बडा होइगा बवाल । अम्मा केकरे मा रहिहैं के झेले बाबू कै सवाल ॥ गाँव देश कै पर पँचाइत किहिन यक्कठी बगिया मा । बइठ के दूनौ रहे चौधरी बात बनावै सझिया मा ॥ अम्मा बाबू सोच के रोवैं ई कवन मुसीबत आन पडी । दूनौ दुल्हिन जबसे लडि अप



बेटी बचाओ कल बचाओ



"चौपई"

"चौपई" पहला पहला मिलन बिभोर, चाहत बढ़ जाती है जोर अच्छा लगता कैसे शोर, चोरी चुपके आ चित चोर।। मिलन आतुरी आँखें चुराय, कुछ घबराती औ शरमाय चले चकोरी आस लगाय गलागली तनमन बहलाय।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



शाबाश मोदी जी



लाल बुझक्कड़ की सरकार में

लाल बुझक्कड़ की सरकार मेंसनसनी ही सनसनी हो रही हैजनता में जनता का ही हिस्सा हैऔर उस हिस्से का कोई किस्सा हैबासी अख़बारों की तरह योजनाएँरोज काले चश्मों से पढ़ी जाती हैंसमाधान भी विचित्र गढ़ी जाती हैपेट की आग पर पूंजी पक रही हैबटलोई में कोई राज ढक रही हैजो तिजोरी में बंद है वह सफ़ेद हैजेब से जो बच गया वह



विश्वास

दिल्ली में छायी प्रदूषित धुंध नेजीना मुहाल कर दिया जागरूक लोगों ने पर्यावरण -संरक्षण का ख्याल कर लिया नेताओं के बयान आये फ़ौरी सरकारी समाधान आये राजनीति की बिसात बिछी दोषारोपण का दौर आरम्भ हुआ ज़हरीली हवा में श्वांस लेने वालों की तकलीफ़ों का अ



मदारी

मदारी फिर घूम रहा हैपिटारा लेकर बातें दोहराएगा चटखारा लेकर मज़मा लगाकर चुरा लेगा आँखों का सुरमा बताएगा पते की बात कह उठेंगे हाय अम्मा बनाएगा अपने और अपनों के काम मन रंजित कर चकमा देकर



जानना

जाननाएक ने कहा- वह विद्वान है । दूसरे ने कहा - वह सरल है। तीसरे ने कहा- वह पागल है ।मैं उससे मिला-मैंने उसे हर दृष्टि से देखा परखा।मैंने पाया- वह ‘ईमानदार’ है। उसको तो मैं जाना हीसाथ ही बाकी तीनों को भी जान गया।



प्रत्याशा

प्रत्याशा नई सदी, नई पवन,नव जीवन, नव मानव मन,नव उमंग, नव अभिलाषा करते ये ज्यों स्वागत-सा।नव शीर्षक नव परिभाषा,नव दृष्टि नव जिज्ञासा,शून्य से अनंत तक,नई आशा, नई प्रत्याशा।मंजरी यह एक तुलसी की?या फल एक साधना का?है अरुणिमा रूपी आशा,या जननी की अमृताशा?फैली आज ब्रह्मांड में, न



उम्मीद तो बस उन लोगों से है....!

मुझे उम्मीद नही है, कि वे अपनी सोच बदलेंगे.. जिन्हें पीढ़ियों की सोच सँवारने का काम सौपा है..! वे यूँ ही बकबक करेंगे विषयांतर.. सिलेबस आप उलट लेना..! उम्मीद नही करता उनसे, कि वे अपने काम को धंधा नही समझेंगे.. जो प्राइवेट नर्सिंग होम खोलना चाहते हैं..! लिख देंगे फिर



"शक्ति छंद"

मापनी- 122 122 122 12, 10- 8 पर यति, पदांत- लघु गुरु "शक्ति छंद" मना लो गले से लगालो मुझे तमन्ना तुम्हारी मनालो मुझे।। भटकने न दो आस मेरी वफ़ा न होती जुदा खास मेरी वफ़ा।। निगाहें रहम की पियासी नहीं न रखती वहम मैं शियासी नहीं।। अरज आरती दीप आहें भली चली मनचली आप अपनी गली।। महातम मिश्र, गौतम ग



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