श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2

💥श्रीमद्भगवद्गीता💥 """""""""""""""""""" * अध्याय 2 * """"""""""""""""""संजय बोल -------- --------------दयायुक्त अश्रुओं से पूर्ण,नयन में भर अर्जुन हैं खड़े ।बताने को बातें सम्पूर्ण, श्री भगवन अब तो बोल पड़े ।।1।। 💥ऐसे पल म



श्रीमद्भगवद्गीता- 2

आनंद*: 🕉 श्रीमद्भगद्गीता 🕉 ************ * अध्याय 1* """"""""मेरा भला नहीं है संभव , संबंधियों को यहाँ मारकर ।चाहूँ नहीं मैं राज्य वैभव , मौत के घाट सब उतारकर।।31।। 💥हे कृष्ण अब ऐसे राज्य की , सुख की मुझे चाहत नहीं है ।न राजभोगी कामना बची दुख ही म



भगवत् गीता

युग संधि का शंखनाद् गुँजायमान् गुँजायमान्अष्ट पाश पर आरुड़ शक्तिमान्🔯 श्रीमद्भागवद्गीता 🔯 🌹🌹🌹🌹🌹 *प्रथम अध्याय * ************* देख अचंभित धृतराष्ट्र हुआ , कहे दिव्यद्रष्टा संजय



आर्यावर्त

👁️👁️👁️👁️👁️👁️👁️👁️शरहद की ओर तकने वालों केसंग 'खून की होली' वीर खेलते।शरहद की ओर तकते वालों केसंग खून की होली बाँकुणे खेलते।।कौन धृष्ट कहता "एल. ओ. सी."की तरफ न भारतीयों तुम देखो!शरहद पार कर हमने खदेड़ापुलवामा को जा जरा देखो!!'सोने की चिड़िया' को अरेबहुतो ने सदियों था नोचा।संभल गये अब हम- ब



मुक्तकाव्य, वो जाग रहा है

"मुक्तकाव्य"वो जाग रहा हैहमारी सुखनिद्रा के लिएअमन चैन के लिएसीमा की चौहद्दी के लिएऔर आप! अपनी ही जुगलबंदी अलाप रहें हैंनिकलिए बाहर और देखिए सूरज अपनी जगह पर हैचाँद! अपनी रोशनी से नहला रहा हैबर्फ की चादरों पर वीर सैनिक गुनगुना रहा हैकश्मीर से कन्याकुमारी तक आवाज जा रही हैजय हिंद की हुंकार से पड़ोसी ब



इंतजार है हमें

यूं तो आपके इंतज़ार में हमने कुछ इस तरह आँसू बहाया है रातों की नींद तो छोड़िये हमने दिन का चैन भी गवाया है देखा जो हमने आपको आप हमें पहली नज़र में ही भा गए नज़रों में कुछ इस तरह उतरे की सीधे दिल में समा गए देखा है हमने ज़माने को इश्क़ में धोखा खाते



मुक्तकाव्य

मुंशी जी को सादर नमन"मुक्त काव्य"ऐसे थे मुंशी प्रेमचंद जीधनपत राय श्रीवास्तव श्रीकलम हथियार बनीशब्द बने तलवारआव भगत से तरवतरभावना के अवतार।।दो बैलों की जोड़ीनमक का दरोगाईदगाह का मेलाचिमटा हुआ हमसफरगबन गोदान और कफनप्रेम पंचमी प्रेम प्रसून प्रेम प्रतिमाकन्यादान प्रेम प्रतिज्ञा बहते अश्रुधार।।सरल शब्दों



शहर के पेड़ से उदास लगते हो...

दबी जुबां में सही अपनी बात कहो,सहते तो सब हैं......इसमें क्या नई बात भला!जो दिन निकला है...हमेशा है ढला!बड़ा बोझ सीने के पास रखते हो,शहर के पेड़ से उदास लगते हो...पलों को उड़ने दो उन्हें न रखना तोलकर,लौट आयें जो परिंदों को यूँ ही रखना खोलक



मुक्तकाव्य

"मुक्तकाव्य"कुछ कहना चाहता है गगनबिजली की अदा में है मगनउमड़ता है घुमड़ता भी हैटपकता और तड़फता भी हैलगता है रो रहा है अपनी अस्मिता खो रहा हैसुनते सभी हैं पर कहाँ है मननकुछ कहना चाहता है गगन।।कौन कर रहा है दमनसभी की चाह है अमनकोई छुपकर रोता हैकोई हृदय में बीज बोता हैलगता है जमीन खिसक रहीबिना ईंधन आग धधक



रूठ लो...

कुछ रास्तों की अपनी जुबां होती है,कोई मोड़ चीखता है,किसी कदम पर आह होती है…पूछे ज़माना कि इतने ज़माने क्या करते रहे?ज़हरीले कुओं को राख से भरते रहे,फर्ज़ी फकीरों के पैरों में पड़ते रहे,गुजारिशों का ब्याज जमा करते रहे,हारे वज़ीरों से लड़ते रहे…और …खुद की ईजाद बीमारियों में खुद ही मरते रहे!रास्तों से अब बैर ह



जब क्रिकेट से मिलने बाकी खेल आए…

एक दिन सब खेल क्रिकेट से मिलने आए,मानो जैसे दशकों का गुस्सा समेट कर लाए।क्रिकेट ने मुस्कुराकर सबको बिठाया,भूखे खेलों को पाँच सितारा खाना खिलाया।बड़ी दुविधा में खेल खुस-पुस कर बोले… हम अदनों से इतनी बड़ी हस्ती का मान कैसे डोले?आँखों की शिकायत मुँह से कैसे बोलें?कैसे डालें क्रिकेट पर इल्ज़ामों के घेरे?अप



मुक्त काव्य

"मुक्त काव्य"न बैठ के लिखा, न सोच के लिखातुझे देखा तो रहा न गया और खत लिखाजब लिखने लगा तो पढ़ना मुश्किल हो गयाअब पढ़ने लगा हूँ तो लिखना मुश्किल हैअजीब है री तू भी पलपल सरकती जिंदगीतुझे पाने के लिए अर्थहीन शब्दों में क्या क्या न लिखा।।कभी रार लिखा तो कभी प्यार लिख बैठाकभी मन ही मन में तेरा श्रृंगार लिख



मुक्त काव्य

"मुक्त काव्य"दिन से दिन की बात हैकिसकी अपनी रात हैबिना मांगे यह कैसी सौगात हैइक दिन वह भी था जब धूप में नहा लिएआज घने छाए में भी बिन चाहत भीगती रात हैउमसते हैं कसकते हैं और बिदकते हैंकाश, वह दिन होता और वैसे ही जज्बातफिर न होता यह धधकता दिनऔर न होती यह सिसकती रातपेड़ पौधे भी करते हैं आपस में बात।।महु



छंदमुक्त काव्य

"छंदमुक्त काव्य"गुबार मन का ढ़हने लगा हैनदी में द्वंद मल बहने लगा हैमाँझी की पतवारया पतवार का माँझीघर-घर जलने लगा चूल्हा साँझीदिखने लगी सड़कें बल्ब की रोशनी मेंपारा चढ़ने लगा है लू की धौकनी मेंनहीं रहा जाति-पाति का कोई बंधनजबसे अस्तित्व के लिए बना महा गठबंधनचोर ने लूट लिया मधुरी वाहवाहीचौकीदार की गेट प



छंदमुक्त काव्य

"विधा-छंदमुक्त" रूठकर चाँदनी कुछ स्याह सी लगीबादल श्वेत से श्याम हो चला हैक्या पता बरसेगा या सुखा देगाहै सिकुड़े हुए धान के पत्तों सी जिंदगीउम्मीद और आशा से हो रही है वन्दगीआज की मुलाकात फलाहार सी लगीरूठकर चाँदनी कुछ स्याह सी लगी।।वादे पर वादे सफेद झूठ की फलीक्वार के धूप में श्याम हुई सुंदरीअरमानों क



छंदमुक्त काव्य

"छंद मुक्त काव्य" अनवरत जलती है समय बेसमय जलती हैआँधी व तूफान से लड़ती घनघोर अंधेरों से भिड़ती हैदिन दोपहर आते जाते हैप्रतिदिन शाम घिर आती हैझिलमिलाती है टिमटिमाती हैबैठ जाती है दरवाजे पर एक दीया लेकरप्रकाश को जगाने के लिएपरंपरा को निभाने के लिए।।जलते जलते काली हो गई हैमानो झुर्रियाँ लटक गई हैबाती और



आँसुओं की माप क्या है?

आँसुओं की माप क्या है?✒️रोक लेता चीखकरतुमको, मगर अहसास ऐसा,ज़िंदगी की वादियों मेंशोक का अधिवास कैसा?नासमझ, अहसास मेरेक्रंदनों के गीत गाते,लालची इन चक्षुओं कोचाँद से मनमीत भाते।ढूँढ़ता हूँ जाग करगहरी निशा की



छंदमुक्त काव्य

रंगोत्सव पर प्रस्तुत छंदमुक्त काव्य...... ॐ जय माँ शारदा......!"छंदमुक्त काव्य"मेरे आँगन की चहकती बुलबुलमेरे बैठक की महकती खुश्बूमेरे ड्योढ़ी की खनकती झूमरआ तनिक नजदीक तो बैठदेख! तेरे गजरे के फूल पर चाँदनी छायी हैपुनः इस द्वार के मलीन झालर पर खुशियाँ आयी है।।उठा अब घूँघट, दिखा दे कजरारे नैनआजाद करा



फागुनी बहार, छंद मुक्त काव्य

फागुनी बहार"छंदमुक्त काव्य"मटर की फली सीचने की लदी डली सीकोमल मुलायम पंखुड़ी लिएतू रंग लगाती हुई चुलबुली हैफागुन के अबीर सी भली है।।होली की धूल सीगुलाब के फूल सीनयनों में कजरौटा लिएक्या तू ही गाँव की गली हैफागुन के अबीर सी भली है।।चौताल के राग सीजवानी के फाग सीहाथों में रंग पिचकारी लिएहोठों पर मुस्का



छंद मुक्त काव्य

महिला दिवस को समर्पित"छंद मुक्त काव्य"महिला का मनसुंदर मधुवनतिरछी चितवननख-सिख कोमलता फूलों सीसर्वस्व त्याग करने वालीकाँटों के बिच रह मुसुकाएमानो मधुमास फाग गाए।।महिला सप्तरंगी वर्णी हैप्रति रंग खिलाती तरुणी हैगृहस्त नाव वैतरणी हैकल-कल बहती है नदियों सीहर बूँद जतन करने वालीनैनों से सागर छलकाएबिनु पान



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