शब्दों का चरित्र

शब्द बड़े चंचल,बड़े विचित्र,बड़े बेशर्म और होशियार;शब्दों को एक जगह बैठाओ,बैठने को नहीं तैयार;उन्हें बोला मिलकर बनाओ वाक्य श्रृंखला साकार;सोशल डिस्टेंसिंग का बहाना कर मिलने को नहीं तैयार।चुन चुन कर पास लाया उन्हें, लेकिन दूर हो जाते बार



मुक्त काव्य

"मुक्त काव्य"पेड़ आम का शाहीन बाग में खड़ा हूँफलूँगा इसी उम्मीद में तो बढ़ा हूँजहाँ बौर आना चाहिएफल लटकना चाहिएवहाँ गिर रही हैं पत्तियाँबढ़ रही है विपत्तियांशायद पतझड़ आ गयाअचानक बसंत कुम्हिला गयाफिर से जलना होगा गर्मियों मेंऔर भीगना होगा बरसातियों मेंफलदार होकर भी जीवन से कुढ़ा हूँपेड़ आम का शाहीन बाग में



इलाहाबाद

इलाहाबाद अपना घर, गाँव,और शहरया यूँ कहियेअपनी छोटी सी इक दुनिया।इसके बारे में कुछ कहना-लिखना, जैसे आसमान में तारे गिननाया जलते हुए तवे परउंगलियों से अपनी ही कहानी लिखना है।सैकड़ों ख्वाब, हज़ारों किताब और अनगिनत रिश्तों में बीतती जिंदगी का नाम है इलाहाबाद। एक ऐसी जगहजहाँ हर पल, हर लम्हाबनती-बिगड़ती ह



परशुराम

।।🙏परशुराम🙏।।कन्नौज-सम्राट गाधि की थीअत्यंत रूपवती सुकन्या!सत्यवती भृगुनन्दन ऋषीकके जीवन से बंध रमना!!भृगु ऋषि से पुत्रवधू नेपुत्र प्राप्ति का किया प्रणय निवेदनतथास्तु! कह भृगु मार्ग बताएगूलर-वृक्ष का आलिंगन करचरु-पान से गर्भ वह पाएपात्र माँ ने लोभवशछल से पात्र बदलाब्राह्मण पुत्र 'जमदग्नि'क्षत्रिय



आप दोनों मेरे...

दो साल पहले [19 April 2018] जीवन में एक बदलाव आया। कुछ आदतें बदली और कुछ आदतें बदलवाई। थोड़ी बातें और ढेर सारी यादें बनाई। एक रचनात्मक व्यक्ति की प्राथमिकताएं अलग होती हैं...उसे दुनिया में रहना भी है और दुनियादारी में पड़ने से भी परहेज़ है। ऐसे में डर होता है कि क्या शादी के बाद भी यह सोच बनी रहेगी या



बेटा या बेटी!!!

🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩बेटा बचाओ- बेटी बहु बन कहीं जा घर बसाएगी!जो बहु बन आए वह क्या (?) ''बेटी'' बन पाएगी!!सुसंस्कार वरण कर पिया का घर-संसार बसाएगी!उच्च घर में जा कर वह निखरेगी वा सकुचाएगी!!विदा करते तो शुभ कहते पुरोहित् अभिवावक हैं!माँ-बाप का हुनर समेटे, वही बनती बड़भागिन है!!बेटा पास बैठ



पांचाली, स्वयंवर से चीर हरण तक

‘पांचाली’ स्वयंवर से चीरहरण तक डॉ शोभा भारद्वाज प्रोफेसर डॉ लल्लन प्रसाद जी एक अर्थशास्त्रीहैं , साथ ही मन के भावों को सरल भाषा मेंकविता का रूप देने की कला माहिर हैं उन्होंने महाभारत के पात्रों में पांचाली कीकथा ‘स्वयंबर से चीर –हरण तक’ का वर्णन बड़ेसुंदर ,मार्मिक ढ



श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2

💥श्रीमद्भगवद्गीता💥 """""""""""""""""""" * अध्याय 2 * """"""""""""""""""संजय बोल -------- --------------दयायुक्त अश्रुओं से पूर्ण,नयन में भर अर्जुन हैं खड़े ।बताने को बातें सम्पूर्ण, श्री भगवन अब तो बोल पड़े ।।1।। 💥ऐसे पल म



श्रीमद्भगवद्गीता- 2

आनंद*: 🕉 श्रीमद्भगद्गीता 🕉 ************ * अध्याय 1* """"""""मेरा भला नहीं है संभव , संबंधियों को यहाँ मारकर ।चाहूँ नहीं मैं राज्य वैभव , मौत के घाट सब उतारकर।।31।। 💥हे कृष्ण अब ऐसे राज्य की , सुख की मुझे चाहत नहीं है ।न राजभोगी कामना बची दुख ही म



भगवत् गीता

युग संधि का शंखनाद् गुँजायमान् गुँजायमान्अष्ट पाश पर आरुड़ शक्तिमान्🔯 श्रीमद्भागवद्गीता 🔯 🌹🌹🌹🌹🌹 *प्रथम अध्याय * ************* देख अचंभित धृतराष्ट्र हुआ , कहे दिव्यद्रष्टा संजय



आर्यावर्त

👁️👁️👁️👁️👁️👁️👁️👁️शरहद की ओर तकने वालों केसंग 'खून की होली' वीर खेलते।शरहद की ओर तकते वालों केसंग खून की होली बाँकुणे खेलते।।कौन धृष्ट कहता "एल. ओ. सी."की तरफ न भारतीयों तुम देखो!शरहद पार कर हमने खदेड़ापुलवामा को जा जरा देखो!!'सोने की चिड़िया' को अरेबहुतो ने सदियों था नोचा।संभल गये अब हम- ब



मुक्तकाव्य, वो जाग रहा है

"मुक्तकाव्य"वो जाग रहा हैहमारी सुखनिद्रा के लिएअमन चैन के लिएसीमा की चौहद्दी के लिएऔर आप! अपनी ही जुगलबंदी अलाप रहें हैंनिकलिए बाहर और देखिए सूरज अपनी जगह पर हैचाँद! अपनी रोशनी से नहला रहा हैबर्फ की चादरों पर वीर सैनिक गुनगुना रहा हैकश्मीर से कन्याकुमारी तक आवाज जा रही हैजय हिंद की हुंकार से पड़ोसी ब



इंतजार है हमें

यूं तो आपके इंतज़ार में हमने कुछ इस तरह आँसू बहाया है रातों की नींद तो छोड़िये हमने दिन का चैन भी गवाया है देखा जो हमने आपको आप हमें पहली नज़र में ही भा गए नज़रों में कुछ इस तरह उतरे की सीधे दिल में समा गए देखा है हमने ज़माने को इश्क़ में धोखा खाते



मुक्तकाव्य

मुंशी जी को सादर नमन"मुक्त काव्य"ऐसे थे मुंशी प्रेमचंद जीधनपत राय श्रीवास्तव श्रीकलम हथियार बनीशब्द बने तलवारआव भगत से तरवतरभावना के अवतार।।दो बैलों की जोड़ीनमक का दरोगाईदगाह का मेलाचिमटा हुआ हमसफरगबन गोदान और कफनप्रेम पंचमी प्रेम प्रसून प्रेम प्रतिमाकन्यादान प्रेम प्रतिज्ञा बहते अश्रुधार।।सरल शब्दों



शहर के पेड़ से उदास लगते हो...

दबी जुबां में सही अपनी बात कहो,सहते तो सब हैं......इसमें क्या नई बात भला!जो दिन निकला है...हमेशा है ढला!बड़ा बोझ सीने के पास रखते हो,शहर के पेड़ से उदास लगते हो...पलों को उड़ने दो उन्हें न रखना तोलकर,लौट आयें जो परिंदों को यूँ ही रखना खोलक



मुक्तकाव्य

"मुक्तकाव्य"कुछ कहना चाहता है गगनबिजली की अदा में है मगनउमड़ता है घुमड़ता भी हैटपकता और तड़फता भी हैलगता है रो रहा है अपनी अस्मिता खो रहा हैसुनते सभी हैं पर कहाँ है मननकुछ कहना चाहता है गगन।।कौन कर रहा है दमनसभी की चाह है अमनकोई छुपकर रोता हैकोई हृदय में बीज बोता हैलगता है जमीन खिसक रहीबिना ईंधन आग धधक



रूठ लो...

कुछ रास्तों की अपनी जुबां होती है,कोई मोड़ चीखता है,किसी कदम पर आह होती है…पूछे ज़माना कि इतने ज़माने क्या करते रहे?ज़हरीले कुओं को राख से भरते रहे,फर्ज़ी फकीरों के पैरों में पड़ते रहे,गुजारिशों का ब्याज जमा करते रहे,हारे वज़ीरों से लड़ते रहे…और …खुद की ईजाद बीमारियों में खुद ही मरते रहे!रास्तों से अब बैर ह



जब क्रिकेट से मिलने बाकी खेल आए…

एक दिन सब खेल क्रिकेट से मिलने आए,मानो जैसे दशकों का गुस्सा समेट कर लाए।क्रिकेट ने मुस्कुराकर सबको बिठाया,भूखे खेलों को पाँच सितारा खाना खिलाया।बड़ी दुविधा में खेल खुस-पुस कर बोले… हम अदनों से इतनी बड़ी हस्ती का मान कैसे डोले?आँखों की शिकायत मुँह से कैसे बोलें?कैसे डालें क्रिकेट पर इल्ज़ामों के घेरे?अप



मुक्त काव्य

"मुक्त काव्य"न बैठ के लिखा, न सोच के लिखातुझे देखा तो रहा न गया और खत लिखाजब लिखने लगा तो पढ़ना मुश्किल हो गयाअब पढ़ने लगा हूँ तो लिखना मुश्किल हैअजीब है री तू भी पलपल सरकती जिंदगीतुझे पाने के लिए अर्थहीन शब्दों में क्या क्या न लिखा।।कभी रार लिखा तो कभी प्यार लिख बैठाकभी मन ही मन में तेरा श्रृंगार लिख



मुक्त काव्य

"मुक्त काव्य"दिन से दिन की बात हैकिसकी अपनी रात हैबिना मांगे यह कैसी सौगात हैइक दिन वह भी था जब धूप में नहा लिएआज घने छाए में भी बिन चाहत भीगती रात हैउमसते हैं कसकते हैं और बिदकते हैंकाश, वह दिन होता और वैसे ही जज्बातफिर न होता यह धधकता दिनऔर न होती यह सिसकती रातपेड़ पौधे भी करते हैं आपस में बात।।महु



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