हम धरती पुत्र है।

हम धरती पुत्र है।सरकार ने मुँह फेर लिया, किसानों ने बॉर्डर पर डेरा डाल लिया।डेरा डाल, किसानों ने ललकारा है। अब धरती पुत्र ने जवानों का कर विरोध, सरकार से कानून वापस लेने का पैगाम भेजा है। मान लो किसानों का कहना मान लो। फसल को बड़ा कर किसान काटना जानता है।ये तो सरकार है, इसको भी जड़ से गाजर मूली की तरह



दिल्ली कूच न करो, दिल्ली के सारे बॉर्डर सील करो।

दिल्ली कूच न करो, दिल्ली के सारे बॉर्डर सील करोजय जवान, जय किसान एक दूसरे के आमने सामने।पहले किसान बाप, बेटा जवान, हक में आमने सामने।बदल गई नज़ीरे, जो कभी मन में उमंग भरती रही।पहले के आंदोलनों से नेता निकले, आज आंदोलन नेता के लिए।देश जहाँ था वही है, और टुकड़ों में बट गया। इंसान की सोच पहले भी ज़हर उगला



दुःखित कृषक है बेचारा

विधा-लावड़ी महंगाई की इस दुनिया में, दुःखित कृषक है बेचाराबदल गयी ये दुनियां देखो, बदला है जीवन सारा उठे अंधेरे प्रात सवेरे डोर हाँथ ले बैलों कीफसल उगाने की चाहत मेंचाल लगा दी खेतों कीन धूप से वो विचलित होतेन छांव की चाहत भरतेकरे परिश्रम कठिन हमेशासदा सभी ऋतुएँ सहतेकठिन परस्थिति में किसान तो, कर लेता



किसान मुद्दा क्या केवल विपक्ष जिम्मेदार है?

किसानमुद्दा क्या केवल विपक्ष जिम्मेदार है?ऐसापहली बार नहीं है कि सरकार द्वारा लाए गए किसी कानून का विरोध कांग्रेस देश कीसड़कों पर कर रही है। विपक्ष का ताजा विरोध वर्तमान सरकार द्वारा किसानों से संबंधित दशकों पुराने कानूनों में संशोधन करके बनाए गए तीन नए कानूनोंको लेकर है। देखाजाए तो ब्रिटिश शासन काल



बाढ ग्रस्त क्षेत्रों के किसान अपनाएं यह तरीका , होगा फायदा

बाढ ग्रस्त क्षेत्रों के किसान अपनाएं यह तरीका , होगा फायदाबाढ ग्रस्त क्षेत्र – जैसा कि हम सभी जानते हैं कि प्राकृतिक आपदाओं और कृषि का हमेशा से ही छत्तीस का आंकड़ा रहा है । कभी तेज आंधी तो कभी तेज बरसात कभी ओलावृष्टि तो कभी सूखा ये तमाम प्राकृतिक आपदाएं फसल को नष्ट कर देती हैं लेकिन बाढ़ एक ऐसी आपदा



Pure Saffron Farming – शुद्ध केसर की खेती के बारे में पुरी जानकारी

शुद्ध केसर दुनिया में पाया जाने वाला सबसे महंगा पौधा है | इतना महंगा होने के कारण इसे लाल सोना भी कहा जाता है | केसर की खेती करना बहुत ही आसान और सरल है | केसर की फसल में ज्यादा मेहनत की आवश्कयकता नहीं होती | और साथ ही इसकी फसल अवधि भी 3 – 4 महीने का होता है | केसर की कीमत भी दिन – बदिन बढ़ते जा रहे



अन्नदाताओं पर प्रकृति का कहर!

अन्नदाताओं पर प्रकृति का कहर!पहले लोन से परेशान अब कृषक प्रकृति की मार से बेबस हैं.इस बार हमारे लिये अनाज पैदा करने वालों दो तरफा या कहे तितरफा मार पड़ी है. लाकडाउन, टिड्डी दल फिर बाढ़.किसान कुदरत की इस मार को झेल ही रहे हैं कोई ठोस समाधान भी इस बारे में नहीं निकल रहा. आगे चलकर हर आम आदमी को किसानों



गरीब

हालातो ने उसे हर जगह घसीटा हैं | जिंदगी मेे जश्न नही फिर भी वो जीता हैं |हमदर्दी का हाथ मिलाने मे वो अब डरता हैं दुध का जला हैं साहब, छाछ भी फूंक - फुंक कर पीता हैं |



मुंग की खेती से प्रति एकड 25 हजार का शुद्ध घाटा । कौन करेगा इसकी भरपाई ?

एकड़ में मूँग फसल की लागत का पूरा हिसाब किताब -जमीन तैयार करने और बोने में ट्रेक्टर का डीजल 16 लीटर - 1120 रु.बीज का खर्चा (15 से 20 किलोग्राम) - 2000 रु.बीज उपचारित दवाई - 50 रुउर्वरक खाद (DAP)का खर्चा - 600 रु.कीटनाशक दवाई 4 स्प्रे का खर्चा - 3500 से 4000 रु.दवाई छिड़कने, पानी देने की मजदूरी - 15



असम की आग से किसानों और प्राक्रतिक जनजीवन पर क्या असर डाला

असम में इस आग से 1.5 किलोमीटर क्षेत्र को राख बना दिया है ।यह आग अब बुझने का नाम नही ले रही है ।इस आग की वजह से 7000 लोग बेघर हो चुके है । 35 घर पुरी तरह राख हो चुके हैं।असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने गुरुवार को गुवाहाटी से करीब 550 किलोमीटर पूर्व तिनसुकिया जिले में ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL) क



किसानो को परेशान करने आया तिरंगा वायरस, बीज कंपनियों पर वायरस फैलाने का आरोप ,बंद हो सकता है उत्पादन

टमाटर में अब एक नए वायरस ने प्रवेश किया है. इससे टमाटर की खेती में पैदा होने वाले टमाटर के रंग और आकार में अंतर आ रहा है. इसे किसान तिरंगा वायरस कह रहे हैं. इस वायरस की वजह से टमाटर में खड्ढे हो रहे हैं और अंदर से काला होकर सड़ने लगता है. टमाटर पर पीले चिट्टे होने की वजह से अब उसकी खेती पर संकट मंडरा



जय जवान जय किसान

लाल बहादुर शास्त्री, जिनका प्रधानमंत्री काल बहुत कम रहा, पर जनता के दिलो-दिमाग पर बहुत गहरा असर छोड़ गया. कल तक उनके विरोधी भी आज उनकी बात करते है, उनको महान बताते है. उनके दिए नारे " जय जवान, जय किसान " की बात करते है. आज की राजनीति ने उस नारे में से जय किसान निकाल दिया अ



तने दरख्तों के

तने दरख्तों के शाखों से ही झुकने लगेपानी नहीं बचा कुँए सूखने लगे।मौलवी के सताए हुए इंसान यहाँहै ग़ौर कि अल्लाह पे ही थूकने लगे।ये मुमक़िन न था कि आम आएंगे कभीबोए गए थे कांटें सो उगने लगे।वो गा रहा था बदहालियाँ किसानों कीअचानक ही मंत्रियों सर दुखने लगे।बढ़ते हुए काफ़िलें मजहबों



गरीबी के आलम में,

गरीबी के आलम में,सेवा में,सौ बीगा जमीन के बाद हम गरीब थे| आज सौ गज जमीनमें बनी कोठी, अमीर होने का न्यौता देती हैं|जब पैसो की तंगी थी तब गहनों मालाओ से औरत सजी थी, आज रोल गोल्ड कोअमीरी कहते हैं| जब पीतल की थाली में खाना खाते थे तो गरीब कहे जाते थे| आजप्लास्टिक के बर्तन में खाकर अपने आप को धनी समझ रह



मेरे देश का किसान

किसी ने उसे हिंदु बताया,किसी ने कहा वो मुसलमान था,खुद को मौत की सजा सुनाई जिसने,वो मेरे देश का किसान था।जिसकी उम्मीदाें से कहीं नीचा आसमान था,मुरझाकर भी उसका हौंसला बलवान था,जब वक्त ने भी हिम्मत और आस छोड़ दी,उस वक्त भी वो अपने हालातों का सुल्तान था।किस्मत उसकी हारी हुई बाजी का फरमान था,बिना मांस की



ओला बौछार

ओला बौछार काले घने बादल जब अपनी जवानी मे आते हैं आसमान मे।जमीन मे मोर पपीहा खूब इतराते हैं, नृत्य करते हैं आसमान को निहार कर, कल वह भी बौरा गए ओला वृष्टि को देख कर। कल शहरी लोग पहले खूब इतराए ओलो को देख कर फिर पछते सड़क मे जब निकले ऑफिस से कार पर। किसान खुश था पानी की धार को देखकर वह भी पछताया गेंहू



सच रो रहा

सच रो रहाशिक्षित प्रशिक्षितधरना और जेल मे।नेता अभिनेतासंसद और बुलट ट्रेन मे।एमेड बीएडतले पकोड़ा खेतवा की मेड़ मे।योगी संत महत्मासेलफ़ी लेवे गंगा की धार मे।बोले जो हककी बात वह भी जिला कारागार मे।बोले जो झूठमूठ वह बैठे सरकारी जैगुआर मे।कर ज़ोर जबरदसतीन्याय को खा जाएंगे।की अगर हककी बात तो लाठी डंडा खा जाएं



चुनाव चिन्ह जूता।

चुनाव चिन्हजूता।लोकलाज सबत्याग, जूता निशानबनाया।झाड़ू से सफाईकर, बाद मे जूतादीना।पढ़ लिख करमति बौराई, कौन इन्हेसमझाए?लोक सभा चुनावसे पहले जूता निशान बनाए।हरि बैल,खेत-किसान, खत का निशान मिटाया।वीर सपूतोकी फाँसी वाली रस्सी को ठुकराया।उन वीरांगनाओको भूल गए जिसने खट्टे दाँत किये।दिल्ली कोबना के चमचम, पूरे



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