श्राद्ध पक्ष में पाँच ग्रास निकालने का महत्त्व

श्राद्ध पक्ष में पाँच ग्रास निकालने का महत्त्वश्रद्धया इदं श्राद्धम्‌ - जोश्रद्धापूर्वक किया जाए वह श्राद्ध है | यद्यपि इस वाक्य की व्याख्या बहुत विशद हो सकतीहै – क्योंकि श्रद्धा तो किसी भी के प्रति हो सकती है | किन्तु यहाँ हम श्राद्धपक्ष के सन्दर्भ में बात कर रहे हैं कि अपने दिवंगत पूर्वजों के निमि



अनन्त चतुर्दशी

अनन्त चतुर्दशीअनंन्तसागरमहासमुद्रेमग्नान्समभ्युद्धरवासुदेव । अनंतरूपेविनियोजितात्माह्यनन्तरूपायनमोनमस्ते || भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को अनन्त चतुर्दशी कहा जाता है । इस वर्ष सोमवार 31 अगस्त को प्रातः 8:49 के लगभग चतुर्दशी तिथि का आगमनहोगा जो पहली सितम्बर को प्रातः 9:38 तक विद्यमान रहेगी और



श्राद्ध पर्व

श्रद्धाऔर भक्ति का पर्व श्राद्ध पर्वभाद्रपदशुक्ल चतुर्दशी यानी पहली सितम्बर को क्षमावाणी – अपने द्वारा जाने अनजाने किये गएछोटे से अपराध के लिए भी हृदय से क्षमायाचना तथा दूसरे के पहाड़ से अपराध को भी हृदयसे क्षमा कर देना – के साथ जैन मतावलम्बियों के दशलाक्षण पर्व का समापन होगा |वास्तव में कितनी उदात्त



Sketches from life: प्राचीन विदेशी यात्री 1/3

भारतीय इतिहास को क्रोनोलॉजी याने कालक्रम के अनुसार मोटे तौर पर चार भागों में बांटा गया है - प्राचीन काल, मध्य काल, आधुनिक काल और 1947 के बाद स्वतंत्र भारत का इतिहास. प्राचीन इतिहास लगभग सात हज़ार ईसापूर्व से सात सौ ईसवी तक माना जाता है. इतने पुराने समय के हालात जानने के लि



पर्यूषण पर्व

पर्यूषण पर्वभाद्रपद कृष्ण एकादशी – जिसे अजा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है – यानी15 अगस्त से आरम्भ हुएश्वेताम्बर जैन मतावलम्बियों के अष्ट दिवसीय पर्यूषण पर्व का कल सम्वत्सरी के साथसमापन हो चुका है और आज भाद्रपदशुक्ल पञ्चमी से दिगम्बर जैन समुदाय के दश दिवसीय पर्यूषण पर्व का आरम्भ हो रहा है| जैन पर्



विश्व पटलपर हिंदी साहित्य

सुखमंगल सिंहविश्व पटलपर हिंदी साहित्य-सुखमंगल सिंह हिंदी साहित्य के व्यापक इतिहासों में विशेष कर हिंदी साहित्य का इतिहास आचार्य रामचंद्र शुक्ल,हिंदी साहित्य का बृहद इतिहाससोलह भाग,मिश्रबंधु विनोद,हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास जैसे ग्रंथों में मान्यता प्राप्त कर स



कालिदास सदा सम सामयिक

कालिदास सदा सम सामयिकआषाढ़शुक्ल प्रतिपदा – जो की इस वर्ष 21 जून को थी – को महाकवि कालिदास के जन्मदिवस के रूप में कुछ लोग मानते हैं| अभी पिछले दिनों एक मित्र इसी विषय पर चर्चा कर रहे थे कि कोरोना संकट के कारणमहाकवि की जयन्ती नहीं मनाई जा सकी | मैं कालिदासकी अध्येता हूँ और वे हमारे प्रिय कवि हैं, सो उन



पैसा बहुत कुछ तो है पर सबकुछ नहीं है....

पैसा बहुत कुछ तो है पर सबकुछ नहीं है…..मनुष्य स्वभाव से ही बहुत लालची और महत्त्वाकांक्षी होता है। अर्थ, काम, क्रोध, लोभ और माया के बीच इस तरह फँसता है कि बचकर निकलना मुश्किल हो जाता है। यह उस दलदल के समान है जिसमें से जितना ही बाहर निकलने का प्रयास किया जाता इंसान उस दलदल में और फँसता जाता है। इस सं



"रामजन्म भूमि पूजन हितकारी "

"रामजन्म भूमि पूजन हितकारी " राम जी भवन होत गारी सुमंगल गावत नर - नारी।देव ऋषि सब देखन घायेअयोध्या लागे बड़ी प्यारी।संतों का स्वागत है होतारावण अपने घर पर रोताखग मृग झूमें नगरी सारीअयोध्या लागे बड़ी प्यारी।देव ऋषि मानव रूप धर आए दरशन को अयोध्याश्रीराम जी का दर्शन पाकेला



ऐसा भी दिन आएगा कभी सोचा न था....

ऐसा भी दिन आएगा कभी सोचा न था….सृष्टि के आदि से लेकर आजतक न कभी ऐसा हुआ था और शायद न कभी होगा….। जो लोग हमारे आसपास 80 वर्ष से अधिक आयु वाले जीवित बुजुर्ग हैं, आप दस मिनिट का समय निकालकर उनके पास बैठ जाइए और कोरोना की बात छेड़ दीजिए। आप देखेंगे कि आपका दस मिनिट का समय कैसे दो से तीन घंटे में बदल गया



"मेरा बचपन"

"मेरा बचपन"सशक्त समाज बनाना उत्प्रेरित विचार लाना।शिक्षा समृद्धि अपनाना नव कौशल है दिखाना।समाज को भी जगानाबचपन बनाना बचाना । बचपन जीवन का आधार सिद्धांत पर आधारित एक शानदार अभिनय की शुरुआत करने की मुहिम का स्वागत स्तंभ में से एक है। बचपन ,जौ - गेहूं की भाँती दुःख - सुख निर्मित जीवन मूल्यों क



जिंदगी को जिओ पर संजीदगी से....

जिंदगी जिओ पर संजीदगी से…….आजकल हम सब देखते हैं कि ज्यादातर लोगों में उत्साह और जोश की कमी दिखाई देती है। जिंदगी को लेकर काफी चिंतित, हताश, निराश और नकारात्मकता से भरे हुए होते हैं। ऐसे लोंगों में जीवन इच्छा की कमी सिर्फ जीवन में एक दो बार मिली असफलता के कारण आ जाती है। फिर ये हाथ पर हाथ रखकर बैठ जा



माँ का रुदन

माँ का रुदन************** अरे ! ये कैसा रुदन है..? स्वतंत्रता दिवस पर्व पर उल्लासपूर्ण वातावरण में देशभक्ति के गीत गुनगुनाते हुये चिरौरीलाल शहीद उद्यान से निकला ही था कि किसी स्त्री के सिसकने की आवाज़ से उसके कदम ठिठक गये थे। ऐसे खुशनुमा माहौल में रुदन का स्वर सुन च



भाषा संस्कृत और अशोक का शिलापट्ट

भाषाओं की विचित्र स्थिति समझाने समझाने वाली है। समय के अनुसार भाषा में अभिव्यक्ति की आजादी का स्वागत किया जाता रहा है। भारत में विभिन्न मतावलंबी हुए मत धर्म का प्रचार अभियान चलाया जाता रहा है। अशोक के शिलालेख जो ईसा के पूर्व तीसरी शताब्दी के मिले वे उत्तरी भारत के लिए आवश्यक और महत्व पूर्ण अमूल्य ध



स्वस्थ रहना है तो....

स्वस्थ रहना है तो….स्वस्थ रहना है तो नियम का पालन अर्थात अनुशासन को जीवन में अपनाना होगा। कहा जाता है कि स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी संपत्ति है। बिल्कुल सही है। यदि स्वास्थ्य अच्छा नहीं होगा तो खुशी व प्रसन्नता कहाँ से मिलेगी। कहने का तात्पर्य यह है कि खुशी व प्रसन्नता के लिए सुख सुविधाओं का व शारीरिक सुख



अलौकिक चरित्र के महामानव श्रीकृष्ण

अलौकिकचरित्र के महामानव श्रीकृष्णमित्रों, आज हम सब भगवान श्रीकृष्ण का जन्ममहोत्सव मना रहे हैं | तो सबसे पहले तो सभी को इस महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ | आज कहीं लोगव्रत उपवास आदि का पालन कर रहे होंगे, कहीं भगवान कृष्ण की लीलाओं को प्रदर्शित करती आकर्षक झाँकियाँ सजाईजाएँगी तो कहीं भगवान की लीलाओं का



जय श्री कृष्ण

श्री कृष्ण जन्माष्टमीआज और कल पूरा देश जन साधारण को कर्म, ज्ञान, भक्ति, आत्मा आदि की व्याख्या समझानेवाले युग प्रवर्तक परम पुरुष भगवान् श्री कृष्ण का 5247वाँ जन्मदिनमनाने जा रहा है | आज स्मार्तों (गृहस्थ लोग, जो श्रुति स्मृतियों में विश्वास रखते हैं तथापञ्चदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश और माँ पार्व



यादों की ज़ंजीर

यादों की ज़ंजीर रात्रि का दूसरा प्रहर बीत चुका था, किन्तु विभु आँखें बंद किये करवटें बदलता रहा। एकाकी जीवन में वर्षों के कठोर श्रम,असाध्य रोग और अपनों के तिरस्कार ने उसकी खुशियों पर वर्षों पूर्व वक्र-दृष्टि क्या डाली कि वह पुनः इस दर्द से उभर नहीं सका है। फ़िर भी इन बुझी हुई आशाओं,टूटे हुये हृद



जीवित हो अगर, तो जियो जीभरकर...

जीवित हो अगर, तो जियो जीभरकर...जीते तो सभी हैं पर सभी का जीवन जीना सार्थक नहीं है। कुछ लोग तो जिये जा रहे हैं बस यों ही… उन्हें खुद को नहीं पता है कि वे क्यों जी रहे हैं? क्या उनका जीवन जीना सही मायनें में जीवन है। आओ सबसे पहले हम जीवन को समझे और इसकी आवश्यकता को। जिससे कि हम कह सकें कि जीवित हो अगर



आत्माराम

आत्माराम उसके घर का रास्ता बनारस की जिस प्रमुख मंडी से होकर गुजरता था। वहाँ यदि जेब में पैसे हों तो गल्ला-दूध , घी-तेल, फल-सब्जी, मेवा-मिष्ठान सभी खाद्य सामग्रियाँ उपलब्ध थीं।लेकिन, इन्हीं बड़ी-बड़ी दुकानों के मध्य यदि उसकी निगाहें किसी ओर उठती,तो वह सड़क के नुक्कड़ पर स्थित विश्वनाथ साव की कचौड़



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