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दर्पण

बोले टूटकर बिखरा दर्पण , कितना किया कितनों को अर्पण,बेरंगों में रंग बिखेरा, गुनहगारों को किया समर्पण।देखा जैसा, उसको वैसा, उसका रूप दिखाया,रूप-कुरूप बने छैल-छवीले, सबको मैंने सिखाया,घर आया, दीवार सजाया, पर विधना की माया,पड़ूँ फर्श पर टुकड़े होकर, किस्मत में ये लिखाया।च





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