मुक्तक



मुक्तक

"मुक्तक"व्यंग ढंग का हो अगर, तो करता बहुमान।कहने को यह बात है, पर करता पहचान।भागे भागे क्यों फिरे, अपने घर से आप-और दुहाई दे रहे, मान मुझे मेहमान।।बनी बनाई रोटियाँ, खाता आया पाक।अब क्या तोड़ेगा सखे, लकड़ी जल भइ खाक।जाति-पाति के नाम पर, चला रहा है राज-कहाँ अन्य को दे दिया, अपने जैसी धाक।।महातम मिश्र, ग



मुक्तक

"मुक्तक"व्यंग ढंग का हो अगर, तो करता बहुमान।कहने को यह बात है, पर करता पहचान।भागे भागे क्यों फिरे, अपने घर से आप-और दुहाई दे रहे, मान मुझे मेहमान।।बनी बनाई रोटियाँ, खाता आया पाक।अब क्या तोड़ेगा सखे, लकड़ी जल भइ खाक।जाति-पाति के नाम पर, चला रहा है राज-कहाँ अन्य को दे दिया, अपने जैसी धाक।।महातम मिश्र, ग



मुक्तक

"मुक्तक" नया सवेरा हो रहा, फिर क्यों मूर्छित फूल।कुछ रहस्य इसमें छुपा, मत करना फिर भूल।बासी खाना देखकर, क्यों ललचायें जीव-बुझ जाएगी चाँदनी, शूल समाहित मूल।।नित नव राह दिखा रहे, कुंठा में हैं लोग।बिना कर्म के चाहते, मिल जाए मन भोग।सही बात पर चीखते, झूठों के सरदार-समझ न आए नियम तो, कर लें थोड़ा योग।।मह



साहिल

"साहिल"साहिल बहुत है दूरकिश्ती डगमगा रही हैबालू का आशियाना,हवा धमका रही हैडॉ. कवि कुमार निर्मल



मुक्तक

"मुक्तक"नहीं किनारे नाव है, नहीं हाथ पतवार।सूख रहा जल का सतह, नहीं उदधि में धार।नयन हुए निर्लज्ज जब, मन के भाव कुभाव-स्वारथ की नव प्रीति है, नहीं हृदय में प्यार।।1जल प्रवाह में कट रहे, वर्षों खड़े कगार।आर-पार नौका चली, तट पर भीड़ अपार।कैसा खेवनहार यह, नई नवेली नाव-डर लगता है री सखी, है साजन उस पार।।-2



मुक्तक

"मुक्तक" भाग्य बिना होते नहीं, साजन कोई कर्म।कर्म कीजिये लगन से, यही भाग्य का मर्म।क्या छोटा क्या है बड़ा, दें रोजी को मान-लग जाओ प्रिय जान से, इसमें कैसी शर्म।।सब नसीब का खेल है, चढ़ता पंगु पहाड़।पत्थर जैसा फल लिए, खड़े डगर पर ताड़।न छाया नहीं रस मधुर, न लकड़ी नहीं दाम-नशा लिए बहका रहा, पीते हैं सब माड़।।



मुक्तक

"मुक्तक"बहुत अरमान था दिल में कि इक दिलदार मिल जाए।मेरे इस बाग में भी फूल इक गुच्छदार खिल जाए।समय की डोर पकड़े चल रहा था ढूढ़ता मंजिल-मिला दो दिल सनम ऐसे कि पथ पतवार हिल जाए।।बहुत अहसान होगा आप का मान मिल जाए।तरस नयनों की मिट जाए परत पहचान मिल जाए।गिरी बूँदें जमी पर आँसुओं को पी नहीं सकते-अगर गुरबत न



मुक्तक विधान

'मुक्तक चार पंक्तियाँ भार सम,मुक्तक का सिद्धांत lपंक्ति तृतीयं मुक्तता , तजि सामंत पदांत llव्यंग्य और वक्रोक्ति में , साधें शेर सदृश्य lपंक्ति तृतीयं सार है , निष्कर्षं परिदृश्य llराजकिशोर मिश्र राज प्रतापगढ़ी



दौलत

दौलतजो दिया है गैरों को वोही काम आ साथ जाएगा।राजा का बेटा ताज पहन याद नहीं कर पायेगा।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



दौलत

दौलतजो दिया है गैरों को वोही काम आ साथ जाएगा।राजा का बेटा ताज पहन याद नहीं कर पायेगा।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



चाँद और सूरज

'चाँद' को लख- मन को बहुत हीं सुकून मिलता है।'सूरज' को लख कर पत्थर भी पिधल बह जाता है।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



वक़्त पड़ने पे बिछाने के काम आता हूँ

मैं जमाने को हंसाने के काम आता हूँ .किसी का दर्द मिटाने के काम आता हूँ .मुझको अखबार पुराना समझ के फेंको न यूँ .वक़्त पड़ने पे बिछाने के काम आता हूँ .



मुक्तक

"मुक्तक"बादल कहता सुन सखे, मैं भी हूँ मजबूर।दिया है तुमने जानकर, मुझे रोग नासूर।अपनी सुविधा के लिए, करते क्यों उत्पात-कुछ भी सड़ा गला रहें, करो प्लास्टिक दूर।।मैं अंबुद विख्यात हूँ, बरसाने को नीर।बोया जो वह काट लो, वापस करता पीर।पर्यावरण सुधार अब, हरे पेड़ मत छेद-व्यथित चाँद तारे व्यथित, व्यथितम गगन स



शरद ऋतु

🌹सिंहावलोकनी दोहा मुक्तक🌹"""""""""""""""""""""""शरद ऋतु करे आगमन, मन होए उल्लास ।जूही की खुशबू उड़े, पिया मिलन की आस।।आस किसी की मैं करूँ , जो ना आएं पास ।नित देखू राह उसकी, जाता अब विश्वास ।।🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹व्यंजना आनंद ✍



मुक्तक

मात्रिक- - 16 मात्रा भार🌷मुक्तक🌷 """"""""""""हम रुठे है वो भी रुठी। किस्मत देखों कैसे छूटी । जाने कहाँ गये प्यारे दिन, करते थे हम बातें मीठी।।ऐसे नहीं प्रेम होता है। समर्पण से क्रोध खोता है। ऐसे नहीं टीकती दोस्ती, वो दोस्त हमेशा रोता है।।🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹व्यंजना आनंद ✍



मुक्तक

"मुक्तक"नौनिहाल का गजब रूप चंहका मन मोरा।बहुत सलोने गात अघात देखि निज छोरा।सुंदर-सुंदर हाथ साथ गूँजें किलकारी-माँ की ममता के आँचल में उछरे पोरा।।पोरी भी है साथ निहारे वीरन अपना।बापू की आँखों ने देखा सच्चा सपना।कुदरत के खलिहान का खुला पिटारा-ठुमुक चाल बलराम कृष्ण है जग से न्यारा।।महातम मिश्र, गौतम गो



मुक्तकाव्य, वो जाग रहा है

"मुक्तकाव्य"वो जाग रहा हैहमारी सुखनिद्रा के लिएअमन चैन के लिएसीमा की चौहद्दी के लिएऔर आप! अपनी ही जुगलबंदी अलाप रहें हैंनिकलिए बाहर और देखिए सूरज अपनी जगह पर हैचाँद! अपनी रोशनी से नहला रहा हैबर्फ की चादरों पर वीर सैनिक गुनगुना रहा हैकश्मीर से कन्याकुमारी तक आवाज जा रही हैजय हिंद की हुंकार से पड़ोसी ब



सोचा न था

सोचा न था !एक रोज़ इस मोड़ से गुजरना पड़ेगा, जिंदगी को मौत से यूँ लड़ना पड़ेगा,चलते चलते लड़खड़ायेंगे पग राहो में गिरते गिरते खुद ही सम्भलना पड़ेगा !!!डी के निवातिया



मुक्तक

"मुक्तक"सूक्ष्म निरीक्षण से हुए, कोटि कोटि सत्काम।जल के भीतर जीव प्रिय, नभचर थलचर आम।मित्र जीव रक्षा करें, बैरी लेते प्राण-रुधिर सभी का एक सा, अलग अलग है नाम।।लघु के लक्ष्य अभेद हैं, लिए साहसी तीर।चावल पय जब भी मिले, पके माधुरी खीर।कटहल पक मीठा हुआ, लिए नुकीले छाल-काले तिल के शक्ति को, कब समझे बेपीर



मुक्तक

"मुक्तक"गैरों ने भी रख लिया, जबसे मुँह में राम।शुद्ध आत्मा हो गई, मिला उचित अभिराम।जिह्वा रसमय हो गई, वाणी हुई सुशील-देह गेह दोनों सुखी, राघव चित आराम।।दर्शन कर अवधेश के, तरे बहुत से लोग।राम जानकी मार्ग पर, काया रहे निरोग।निर्भय होकर चल पड़ो, अंधेरी हो रात-मंजिल मिल जाती सुबह, भागे तम का रोग।।महातम म



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