मुक्तक



मुक्तकाव्य

मुंशी जी को सादर नमन"मुक्त काव्य"ऐसे थे मुंशी प्रेमचंद जीधनपत राय श्रीवास्तव श्रीकलम हथियार बनीशब्द बने तलवारआव भगत से तरवतरभावना के अवतार।।दो बैलों की जोड़ीनमक का दरोगाईदगाह का मेलाचिमटा हुआ हमसफरगबन गोदान और कफनप्रेम पंचमी प्रेम प्रसून प्रेम प्रतिमाकन्यादान प्रेम प्रतिज्ञा बहते अश्रुधार।।सरल शब्दों



मुक्तक

शीर्षक --- बिजली, सौदामनी, शया, घनप्रिया, ऐरावती, बीजुरी, चंचला, क्षणप्रभा, चपला, इन्द्र्वज्र, घनवल्ली, दामिनी, ताडित, विद्युत"मुक्तक"तुझे देख सौदामिनी, डर जाता मन नेक।तू चमके आकाश में, डरती डगर प्रत्येक।यहाँ गिरी कि वहाँ गिरी, सदमे में हैं लोग-सता रही इंसान को, चपला चिंता एक।।लहराती नागिन सरिस, कात



मुक्तकाव्य

"मुक्तकाव्य"कुछ कहना चाहता है गगनबिजली की अदा में है मगनउमड़ता है घुमड़ता भी हैटपकता और तड़फता भी हैलगता है रो रहा है अपनी अस्मिता खो रहा हैसुनते सभी हैं पर कहाँ है मननकुछ कहना चाहता है गगन।।कौन कर रहा है दमनसभी की चाह है अमनकोई छुपकर रोता हैकोई हृदय में बीज बोता हैलगता है जमीन खिसक रहीबिना ईंधन आग धधक



मुक्तक

शीर्षक -दीवार,भीत,दीवाल"मुक्तक"किधर बनी दीवार है खोद रहे क्यूँ भीत।बहुत पुरानी नीव है, मिली जुली है रीत।छत छप्पर चित एक सा, एक सरीखा सोच-कलह सुलह सर्वत्र सम, घर साधक मनमीत।।नई नई दीवार है, दरक न जाए भीत।कौआ अपने ताव में, गाए कोयल गीत।दोनों की अपनी अदा, रूप रंग कुल एक-एक भुवन नभ एक है, इतर राग क्यों



मुक्तक

मुक्तकमेरे ख्याल की मखमली चादर पर आएं तो कभी सुकून प्रेम का गहना है रहबर आजमाएं तो कभी इंतजार पर मौन रहता है दिल आँखें झूठ न बोलेमौसम की हवा में मौसमी लाकर इतराएं तो कभी ।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



मुक्तक

"मुक्तक"बहुत मजे से हो रहे, घृणित कर्म दुष्कर्म।करने वाले पातकी, जान न पाते मर्म।दुनिया कहती है इसे, बहुत बड़ा अपराध-संत पुजारी कह गए, पापी का क्या धर्म।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



मुक्तक

सच अभी भी मरा नहीं है , झूठ भी पर डरा नहीं है | यह भी सच है आदमी अब ,पूर्व जैसा खरा नहीं है |



मुक्तक

"मुक्तक" चढ़ा धनुष पर बाण धनुर्धर, धरा धन्य हरियाली है।इंच इंच पर उगे धुरंधर, करती माँ रखवाली है।मुंड लिए माँ काली दौड़ी, शिव की महिमा है न्यारी नित्य प्रचंड विक्षिप्त समंदर, गुफा गुफा विकराली है।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



मुक्तक

आप व आप के पूरे परिवार को मुबारक हो फागुन की होली......."मुक्तकमुरली की बोली और राधा की झोली।गोपी का झुंड और ग्वाला की टोली।कान्हा की अदाएं व नंद जी का द्वार-पनघट का प्यार और लाला की ठिठोली।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



मुक्तक

महिला दिवस पर हार्दिक बधाई"मुक्तक"कण पराग सी कोमली, वनिता मन मुस्कान।खंजन जस आतुर नयन, माता मोह मिलान।सुख-दुख की सहभागिनी, रखती आँचल स्नेह-जगत सृष्टि परिचायिनी, देवी सकल विधान।।-1गौतम जो सम्मान से, करता महिला गान।लक्ष्मी उसके घर बसे, करे विश्व बहुमान।महिला है तो महल है, बिन महिला घर सून-घर-घर की यह



मुक्तक

स्वागतम अभिनंदन"मुक्तक"साहसी अभिनंदन है, अभिनंदन वर्तमान।वापस आया लाल जब, तबसे हुआ गुमान।युद्ध बिना बंदी हुआ, भारत माँ का वीर-स्वागत आगत शेर का, चौतरफा बहुमान।।-1एक बार तो दिल दुखा, सुनकर बात बिछोह।कैसे यह सब हो गया, अभिनंदन से मोह।डिगा नहीं विश्वास था, आशा थी बलवान-आया माँ की गोद में, लालन निर्भय ओ



मुक्तकाव्य

"मुक्त काव्य"हाथी सीधे चल रहाघोड़ा तिरछी चालऊँट अढाई घर बढ़ेगरजा हिन्द महानशह-मात के खेल मेंपाक वजीर बेभान।।लड़े सिपाही जान लगाकरपीछे-पीछे प्यादा चाकरचेस वेष अरु केश कामत कर अब गुणगानगिरते पड़ते जी रहेकर्म करो नादान।।इक दूजे को मात-शहजीत- हार विद्यमानपाक आज चिंतित हुआपुलवामा बलवानकौरव देख गांडीव पार्थ क



मुक्तक

"मुक्तक"गया समय अब युद्ध का, लड़ा रहे सब छद्म।नहीं किसी के पास अब, सत्य बोलती नज्म।सूखे सब कंकाल हैं, दौड़ रहे हैं तेज-दौलत के संसार में, कहाँ पुरानी बज्म।।-1नाम समर का ले रहे, कायर अरु कमजोर।चुपके से चलते डगर, मानो कोई चोर।घात लगा कर वार कर, छुप जाते हैं खोह-पीछे से हमला करें, और मचाएं शोर।।-2महातम म



"चौपाई मुक्तक" वन-वन घूमे थे रघुराई, जब रावण ने सिया चुराई। रावण वधकर कोशल राई, जहँ मंदिर तहँ मस्जिद पाई।

"चौपाई मुक्तक"वन-वन घूमे थे रघुराई, जब रावण ने सिया चुराई।रावण वधकर कोशल राई, जहँ मंदिर तहँ मस्जिद पाई।आज न्याय माँगत रघुवीरा, सुनो लखन वन वृक्ष अधिरा-कैकेई ममता विसराई, अवध नगर हति कागा जाई।।-1अग्नि परीक्षा सिया हजारों, मड़ई वन श्रीराम सहारो।सुनो सपूतों राम सहारो, जस



"मुक्तक"

"मुक्तक"मंदिर रहा सारथी, अर्थ लगाते लोग।क्या लिख्खा है बात में, होगा कोई ढोंग।कौन पढ़े किताब को, सबके अपने रूप-कोई कहता सार है, कोई कहता रोग।।-1मंदिर परम राम का, सब करते सम्मान।पढ़ना लिखना बाँचना, रखना सुंदर ज्ञान।मत पढ़ना मेरे सनम, पहरा स्वारथ गीत-चहरों पर आती नहीं, बे-मौसम मुस्कान।।-2महातम मिश्र, गौत



"मुक्तक"

"मुक्तक" नहीं सहन होता अब दिग को दूषित प्यारे वानी। हनुमान को किस आधार पर बाँट रहा रे प्रानी।जना अंजनी से पूछो ममता कोई जाति नहीं-नहीं किसी के बस होता जन्म मरण तीरे पानी।।-1मानव कहते हो अपने को करते दिग नादानी।भक्त और भगवान विधाता हरि नाता वरदानी।गज ऐरावत कामधेनु जहँ पीपल पूजे जाते-लिए जन्म भारत मे



"मुक्तक" देखिए तो कैसे वो हालात बने हैं। क्या पटरियों पै सिर रख आघात बने हैं।

"मुक्तक" देखिए तो कैसे वो हालात बने हैं।क्या पटरियों पै सिर रख आघात बने हैं।रावण का जलाना भी नासूर बन गया-दृश्य आँखों में जख़्म जल प्रपात बने हैं।।-1देखन आए जो रावण सन्निपात बने हैं।कुलदीपक थे घर के अब रात बने हैं।त्योहारों में ये मातम सा क्यूँ हो गया-क्या रावण के मन के सौगात बने हैं।।-2महातम मिश्र,



"मुक्तक" हार-जीत के द्वंद में, लड़ते रहे अनेक। किसे मिली जयमाल यह, सबने खोया नेक।

"मुक्तक" हार-जीत के द्वंद में, लड़ते रहे अनेक।किसे मिली जयमाल यह, सबने खोया नेक।बर्छी भाला फेंक दो, विषधर हुई उड़ान-महँगे खर्च सता रहे, छोड़ो युद्ध विवेक।।-1हार-जीत किसको फली, ऊसर हुई जमीन।युग बीता विश्वास का, साथी हुआ मशीन।बटन सटन है साथ में, लगा न देना हाथ-यंत्र- यंत्र में तार है, जुड़ मत जान नगीन।।-2



"मुक्तक,"

"मुक्तक" हार-जीत के द्वंद में, लड़ते मनुज अनेक।किसे मिली जयमाल यह, सबने खोया नेक।बर्छी भाला फेंक दो, विषधर हुई उड़ान-पीड़ा सतत सता रहीं, छोड़ो युद्ध विवेक।।-1हार-जीत किसको फली, ऊसर हुई जमीन।युग बीता विश्वास का, साथी हुआ मशीन।बटन सटन दुख दर्द को, लगा न देना हाथ-यंत्र- यंत्र में तार है, जुड़ते जान नगीन।।-2



"मुक्तक"

"मुक्तक"युग बीता बीता पहर, लेकर अपना मान।हाथी घोड़ा पालकी, थे सुंदर पहचान।अश्व नश्ल विश्वास की, नाल चाक-चौबंद-राणा सा मालिक कहाँ, कहाँ चेतकी शान।।-1घोड़ा सरपट भागता, हाथी झूमे द्वार।राजमहल के शान थे, धनुष बाण तलवार।चाँवर काँवर पागड़ी, राज चाक- चौबंद-स्मृतियों में अब शेष हैं, प्रिय सुंदर उपहार।।-2महातम



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