नहीं

प्यार

प्यार एक ऐसा शब्द है जो सुनते ही मन खिल उठता है.......प्यार से प्यारा इस दुनिया में कुछ भी नहीं है. .....प्यार दो दिलो की दास्ताँ है .....प्यार दो दिलो का संगम है .........प्यार के बिना ज़िन्दगी अधूरी है .........प्यार के बिना जीवन अधूरा है .........लेकिन प्यार में



संकळप

आज हम ऐसे समाज में रह रहे है , जहां हम ये नही कह सकते की ये काम मुझे से नहीं हो पायेगा | सिर्फ हम लोगो लोगों को एक संकल्प लेके चलना पङेगा की कुछ भी हो जाये हम रुकेंगे नहीं | कोई भी काम बिना संकळप के पूरा नही हो सकता चाहे काम



डाॅक्टर बनने की राह आसान बनाने हेतु एक सार्वजनिक अपील

माउंटेन मैन के नाम से विख्यात दशरथ मांझी को आज दुनिया भर के लोग जानते हैं। वे बिहार जिले के गहलौर गांव के एक गरीब मजदूर थे, जिन्होंने अकेले अपनी दृ़ढ़ इच्छा शक्ति के बूते अत्री व वजीरगंज की 55 किलोमीटर की लम्बी दूरी को 22 वर्ष के कठोर परिश्



अंक नहीं जीवन का आधार

12वीं कक्षा के समस्त विद्यार्थियों को परीक्षा मैं उत्तीर्ण होने की हृदय तल से बधाई । लेख **अंक नहीं जीवन का आधार** अक्सर देखा गया है कि 10वीं और 12वीं के विद्यार्थियों में परीक्षा परिणाम को लेकर बहुत भय रहता है । परीक्षा का परिणाम



“गीतिका”

“गीतिका”रात की यह कालिमा प्रहरी नहीं दिन उजाले में डगर ठहरी नहींआज वो भी छुप गए सुबहा हुई जो जगाते समय को पहरी नहीं॥ रोशनी है ले उड़ी इस रात को तब जगाती पकड़ दोपहरी नहीं॥चाहतें उठ कर बुलाती शाम कोगीत स्वर को समझना तहरी नहीं॥ताल जाती बहक बस इक भूल परज़ोर ठुमका कदम कद महरी नही



“गज़ल” नज़ाकत गरज पर सुहाती नहीं है॥

“गज़ल”गज़ल की पजल मुझको आती नहीं है मगर चाह लिखने की जाती नहीं है करूँ क्या मनन शेर जगकर खड़ा जब बहर स्वर काफ़िया अपनी थाती नहीं हैं॥ लिखने की चाहत जगी भावना में कभी वह भी मुखड़ा छुपाती नहीं है॥सुनते कहाँ हैं शब्द अर्था अनेका बचपने की यादें भुलाती नहीं हैं॥ लगा हूँ तेरी आस



“मुक्तक” सुर्ख गाल नहीं तकता

“मुक्तक”मचल रहा है चीन, गिन रहा अपना पौवा। ले पंख दूरबीन, चढ़ाई करता कौवा। काँव काँव कर नोंच, चोंच मारे है पगला- अंगुल भर की जीभ, हिलाये कचरा हौवा। धावा बोले मुर्ख, सुर्ख गाल नहीं तकता। कबसे लहूलुहान, हुआ है घायल वक्ता। झूठा उसका दं



जिंदगी के १० ऐसे सच जिसका साइंस के पास नहीं कोई जवाब

जिंदगी के १० ऐसे सच जिसका साइंस के पास नहीं कोई जवाब



"गीतिका" आज कहाँ गुम हुई री गुंजा झलक दिखलाती नहीं गलियारों में।।

"गीतिका"काश कोई मेरे साथ होता तो घूम आता बागों बहारों मेंबैठ कैसे गुजरे वक्त स्तब्ध हूँ झूम आता यादों इशारों में पसर जाता कंधे टेक देता बिछी है कुर्सी कहता हमारी हैराह कोई भी चलता नजर घूमती रहती खुशियाँ नजारों में॥प्यार करता उन दरख्तों को जो खुद ही अपनी पतझड़ी बुलाते हैं आ



“गीतिका” खेल खिलौना सुखद बिछौना नींद नहीं अधिकार की॥

“गीतिका”जाने कब धन भूख मरेगी, दौलत के संसार की शिक्षा भिक्षा दोनों पलते, अंतरमन व्यवहार कीइच्छा किसके बस में होती, क्यों बचपन बीमार है उम्र एक सी फर्क अनेका, क्या मरजी करतार की॥ भाग सरीखा नहीं सभी का, पर शैशव अंजान है खेल खिलौना सुखद बिछौना, नींद नहीं अधिकार की॥ उछल कूदना



"पराली- कोई चारा भी तो नहीं?"

"पराली- कोई चारा भी तो नहीं?" लगता है समय आ गया है पीछे मुड़कर देखने का। उन्हें याद करने का जिन्होंने मानव और मानवता को जीने का वैज्ञानिक तरीका तब निजाद किया था, जब न मानव मानव को जानता था न मानवता परिभाषित थी। लोग स्वतः विचरण करते थे और रहन- सहन, भूख-भरम, आमोद- प्रमोद, स



ऋतु बदली नहीं आप की साथियाँ॥ गजल

“गज़ल”आप के पास है आप की साखियाँ मत समझना इन्हें आप की दासियाँगैर होना इन्हें खूब आता सनम माप लीजे हुई आप की वादियाँ॥कुछ बुँदें पिघलती हैं बरफ की जमी पर दगा दे गई आप की खामियाँ॥दो कदम तुम बढ़ो दो कदम मैं बढूँइस कदम पर झुलाओ न तुम चाभियाँ॥मान लो मेरे मन को न बहमी बुझो देख



कुछ फायदा नहीं

कुछ फायदा नहींमैं सोचता हूँ, खुद को समझाऊँ बैठ कर एकदिनमगर, कुछ फायदा नहीं ||तुम क्या हो, हकीकत हो या ख़्वाब होकिसी दिन फुर्सत से सोचेंगे, अभी कुछ फायदा नहीं ||कभी छिपते है कभी निकल आते है, कितने मासूम है ये मेरे आँशुमैंने कभी पूछा नहीं किसके लिए गिर रहे हो तुमक्योकि कुछ फायदा नहींतुम पूछती मुझसे तो



देश मेरा बढ़ रहा है ( कुलदीप पाण्डेय आजाद )

देश मेरा बढ़ रहा | प्रगति सीढ़ी चढ़ रहा |देश के उत्थान में सब,साथ मिल अब चल रहे हैं |खून से सींचा जिसे था , हर सुमन अब खिल रहे हैं |कंटकों को आज देखो स्वम ही वह जल रहा है | देश मेरा बढ़ रहा |गोद में बैठे अभी तक ,



कोई मजहब नहीं होता

कवि: शिवदत्त श्रोत्रियतुम्हारे वास्ते मैंने भी बनाया था एक मंदिरजो तुम आती तो कोई गज़ब नहीं होता ||मन्दिर मस्ज़िद गुरद्वारे हर जगह झलकते हैबेचारे आंशुओं का कोई मजहब नहीं होता ||तुम्हारे शहर का मिज़ाज़ कितना अज़ीज़ थाहम दोनों बहकते कुछ अजब नहीं होता ||जिनके ज़िक्र में कभी गुजर जाते थे मौसमउनका चर्चा भी अब ह



छात्र वृत्ति वर्ष 2017-18 का फार्म सर्वर फेल होने के कारण न भर पाने से सम्बंधित ....................

ऊ० प्र ० छात्र वृत्ति फार्म भरने में सर्वर के कारन एक भी छात्र अगर छात्र वृत्ति फार्म नहीं भर पाता है तो उसका जिम्मेदार कौन होगाकई दिनों से सर्वर फेल है



सबकुछ को बदलने की ज़िद में गैंती से खोदकर मनुष्यता की खदान से निकाली गई कविताएँ

-----------------शहंशाह आलम मैं बेहतर ढंग से रच सकता था प्रेम-प्रसंग तुम्हारे लिए ज़्यादा फ़ायदा था इसमें और ज़्यादा मज़ा भी लेकिन मैंने तैयार किया अपने-आपको अपने ही गान का गला घोंट देने के लिए… # मायकोव्स्की मायकोव्स्की को ऐसा अतिशय भावुकता में अथवा अपने विचारों को अतिशयीक



“गज़ल” अभी सावन वहाँ आया नहीं था

“गज़ल” खड़ा गुलमुहर की छाया नहीं था अभी सावन वहाँ आया नहीं था हवा पूर्बी सरसराने लगी थी मगर ऋतु बर्खा ने गाया नहीं था॥ गली में शोर था झूला पड़ा हैं किसी ने मगर झुलवाया नहीं था॥ घिरी वो बदरिया लागे सुहानी झुके थे नैन भर्भराया नहीं था॥ सखी की टोलकी बहुते सयानी नचाय



काश वो भी जान पाते जो निभा सकते नहीं "ग़ज़ल"

"ग़ज़ल" आप मेहरबान को मैं भुला सकता नही दर्द है मेरे बदन का जो दिखा सकता नही घाव भीतर से लगा है दाग मरहम दूर है ढूढता हूँ नैन लेकर पर रुला सकता नही।। आप ने इसको जगाया फिर सवाया कर दिया चाह कर इस शूल को फिर से दबा सकता नही।। क्या कहूँ जी आप से यह आप की दरिया दिली धार



कत्तई नहीं ! :)

(आस पास कई लोग ऐसे भी मिल जाते हैं - )न तुम तबतब के थेन तुम आजआज के होतुम वह राजा भी नहीं होजिसके सिर पर सिंग थातुम तो बिना सिंग केसिंग होने की बात करते होऔर सोचते हो -कोई तुम्हारे सिंग की चर्चा कर रहा है ...:)दरअसल तुम एक पागल होजो कभी कपड़े में होता हैतो कभी नंगा ...ऐसे



आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x