सदाचरण :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में व्रत , पूजन आदि करते रहने के विधान बताए गए हैं | उन सब का फल प्राप्त करने के लिए लोग तरह - तरह के अनुष्ठान करते हैं | इन अनुष्ठानों का एक ही उद्देश्य होता है -- परमात्मा की उपासना या परमात्मा को प्राप्त करने का उपाय कहा जा सकता है | यह सारे व्रत , सारे अनुष्ठान करने पर भी उसका फल मा



दस्तक

दस्तकफिर वही शोर .....बाहर भी और अंदर भी ....!अंतः करण में गूँजते शब्द दस्तक देने लगे ।विद्यालय में नए सत्र के कार्यों के लिए सबके नाम घोषित किए जा रहे थे ।अध्यापकों की भीड़ में बैठी …..कान अपने नाम को सुनने को आतुर थे ,मगर..... नाम, कहीं नहीं.....!क्यों...? बहुत से सवाल मन में आ रहे थे । आस -पास बह



समाज सुधारक राजा राममोहन राय

समाज सुधारक राजा राम मोहन रायडॉ० शोभा भारद्वाजचिता से अर्श तकवैदिक काल के प्रारम्भ से अनेक महान स्त्रियाँ पुरुषों के समान विद्वान रही हैं | कन्या को विवाह के लिए वर चुनने की पूरी स्वतन्त्रता थी यहाँ तक परिवार एवं पति की सहमती से नियोग द्वारा उत्पन्न सन्तान को कुल का नाम मिलता था युवक युवती की सहमती



बेबात की जलन

🔥🔥 बेबात जलन 🔥🔥ब्याह किये मुझसे,माँ-बाप के संग बैठ समय-जाया करते हो!माना आँचल पाया माँ का,मुझको अवहेलित तुम करते हो!!पिता ने पढ़ा-लिखा जॉब दिलाया,माँ को सैलरी भी देते हो!मेरी भी कुछ हैं जरुरते,मायके भी जाने नहीं मुझे देते हो!!माँ ने खीर जली बना लाई,चाट कर- कटोरी साफ करते हो!मैंने रोटी चुपड़ दाल सं



नारी प्रतारणा- एक प्रश्न चिन्ह

❓❓नारी प्रतारण❓❓दूध का कर्ज चुकाने वालों कोइतिहास के पन्नों में लिखा देखा हैपित्रिभक्त दैत्यगुरु परशुराम को- 'मातृहंता' होते भी देखा हैभुमिगत् होती सीता कोमर्यादा पुरुषोत्तम तक ने देखा हैभयाक्रांत बहन सुभद्रा पाषाण बनी, सहोदरा-मेला भी देखा हैभारत माँ की बेटियों को देश हेतु विधवा बनते युगों से देखा ह



सफाई कामगार समुदाय को उनके पुशतैनी कार्यो को छोड़ने की अपील करती हुई नरेन्द्र वाल्मीकि की कविता "छोड़ दो"

छोड़ दोआधुनिकता केदौर मेंनित नई-नईखोज हो रही है।कभी मंगल तोकभी चाँदपर बसने की टोह हो रही है।ये सबदेखते हुए भीतुम -नही सीख रहे हो,अभी भीजीवन ज



युवा कवि नरेन्द्र वाल्मीकि की समाज को प्रेरित करने वाली कविता "उजाले की ओर"

उजाले की ओर हमारे पूर्वजहमारा अभिमान है,हमारे पूर्वज इसदेश की मूल संतान हैं,हमारे पूर्वज कभीशासक हुआ करते थेइस देश के।हमारे पूर्वजों कोगुलाम बनाकरकराये गये घृणित कार्यअब समय आ गया हैइन कार्यों को छोड़ने काअपने पूर्वजों के गौरव कोआगे बढ़ान



अर्जुन के तीर

🔥⚜🔥⚜🔥⚜🔥⚜🌸⚜🔥 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🏹 *अर्जुन के तीर* 🏹🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹 *मनुष्य की पहचान उसके संस्कार से होती हैं ! मनुष्य को जैसे संस्कार मिले होते हैं उसकी वैसी ही मानसिकता भी हो जाती है | जहाँ सकारात्म मानसिकता मनुष्य को सच्चरित्रवान बनाती है वह



अर्जुन के तीर

🔥⚜🔥⚜🔥⚜🔥⚜🌸⚜🔥 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🏹 *अर्जुन के तीर* 🏹🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹 *इस संसार में वैसे तो एक से बढ़कर एक बलधारी हैं परंतु सबसे बलवान यदि कोई है तो वह है समय ! समय इतना बलवान है कि जब वह अपने पर आता है तो अच्छे - अच्छे बलधारी धूल चाटने लगते हैं



अर्जुन के तीर

🔥⚜🔥⚜🔥⚜🔥⚜🌸⚜🔥 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🏹 *अर्जुन के तीर* 🏹🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹 *विद्वता मनुष्य को विनयशील बनाती है , क्योंकि जिस डाली पर जितने फल होते हैं वह डाली उतनी ही ज्यादा झुकी रहती है | परंतु आज विद्वता का अर्थ ही बदलकर रह गया है आज विद्वानों में अ



प्रत्यक्ष देवी देवता हैं माता पिता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर जन्म लेने के बाद मनुष्य जीवन भर अनेक प्रकार के क्रियाकलाप सम्पादित करता रहता है ! समय - समय पर नाना प्रकार की कामनायें हृदय में प्रकट होती रहती हैं इन कामनाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य अनेक प्रकार के उपाय किया करता है | कुछ लोग कर्मवीर होते हैं जो अपनी प्रत्येक कामना अपनी कर्म कुशलता से



प्रायश्चित करना सीखें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में मनुष्य को गलतियों का पुतला कहा जाता है , मानव जीवन में स्थान - स्थान पर मनुष्य जाने - अनजाने कोई न कोई भूल करता रहता है जिसके कारण उसके जीवन की दिशा एवं दशा भी परिवर्तित हो जाती है | यदि मनुष्य को गलतियों का पुतला कहा गया है तो उसे अपनी गलतियों का सुधार करने का अवसर प्रदान किया गया है



08 अप्रैल 2020

दूर ही रहना

प्यारे देशवासियों,आप सभी जानते हैं इन दिनों हमारा देश कोरोना वायरस जैसी महामारी से जूझ रहा है। यह एक ऐसी भयानक बीमारी है जो एक इंसान से दूसरे में और धीरे-धीरे समाज में फैलती है। आपस में ज़्यादा मिलने जुलने और संपर्क बढ़ने से इसका वायरस बहुत तेजी से फैलता है। सिर्फ एहतियात बरतकर ही इस बीमारी से बचा जा



ये लोग, खुद भी मरेंगे, हमको भी मारेंगे

आज 22 मार्च 2020 को, 'जनता कर्फ्यू' का आवाहन हुआ है, और देश ने तय किया की हम अपनी बालकनी या दरवाजों पे ख



माता का दायित्व :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मनुष्य अपने जीवनकाल में अनेक प्रकार के मार्गदर्शक एवं गुरुओं की शरण में जाता है परंतु इन सबसे पहले जब मनुष्य इस संसार में आता है तो जिस प्रथम गुरु से उसका सामना होता है उसे इस सृष्टि में माँ कहा जाता है | बालक का प्रथम क्रीड़ास्थल माता की गोद की होती है , शास्त्रों में माता को बालक का प्रथम गुरु कह



चरित्र निर्माण :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारा देश भारत आदिकाल से संस्कृति एवं शिक्षा के विषय में उच्च शिखर पर रहा है | विश्व के लगभग समस्त देशों ने हमारे देश भारत से शिक्षा एवं संस्कृति का ज्ञान अर्जित किया है | इतिहास के पन्नों को देखा जाय तो जितना दिव्य इतिहास हमारे देश भारत का है वह अन्यत्र कहीं भी नहीं देखने को मिलता है | आदि काल से



बेटी

बेटीबेटे से बाप का बटवारायुगों से होता चला आया है!माँ को बाप से विलगा- शपीड़ा तक भी बटवाया है!!उसर कोख का ताना लेकोर्ट का चक्कर मर्द लगता है!कपाल क्रिया कर वहआधे का हक सहज पा जाता है!!बेटी सिंदूर लगवाएक साड़ी में लिपट साथ हो लेती है!माँ-बाप का दु:ख सुनते हींवह दौड़ी चली आती है!!मरने पर वह साथ न हो



सहिष्णुता :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में प्राय: एक शब्द सुनने को मिलता है सहिष्णुता एवं असहिष्णुता | आज यह शब्द अधिकतर प्रयोग किया जा रहा है , तो इसके विषय में जान लेना परम आवश्यक है कि सहिष्णुता कहा किसे कहा जाता है | सहिष्णुता का तात्पर्य है सहनशीलता ! किसी दूसरे के विचारों से सहमत ना होने के बाद भी उसे समझना एवं उसका सम्



नस नस में फैल रहा नशा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर मनुष्य के लिए वैसे तो अनेक प्रकार के सुख ऐश्वर्य एवं संपत्ति विद्यमान है परंतु किसी भी मनुष्य के लिए सबसे बड़ा धन उसका स्वास्थ्य होता है | अनेकों प्रकार के ऐश्वर्य होने के बाद भी यदि स्वास्थ्य नहीं ठीक है तो वह समस्त ऐश्वर्य मनुष्य के लिए व्यर्थ ही हो जाता है इसलिए मनुष्य को सबसे पहल



अपनी पहचान बनाकर रखें :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से समस्त विश्व में हमारी पहचान हमारी सभ्यता और संस्कृति के माध्यम से होती रही है | समस्त विश्व नें हमारी पहचान का लोहा भी माना है | विदेशों में हमें "भरतवंशी" कहा जाता है | हमारे पूर्वजों ने अपनी पहचान की कीर्ति पताका समस्त विश्व में फहराई है | मनुष्य की पहचान उसके देश समाज एवं परिवार से होत



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