सत्य की पीड़ा (कोरोना)

हर तपका सत्यता से मुँह चुराए है।सत्यता पीड़ा जो देती है कहने में।सत्य की पीड़ा कभी बयां नही होती।आखिरकार सत्य तो सत्य है फिर मुखौटा क्यो?कोरोना का संसार मे सारांश है जो सत्य है।को- कोई रो- रोज़गारना- नही।<!--/data/user/0/com.samsung.android.app.notes/files/clipdata/clipdata_200514_121216_102.sdoc-->



"दो जून की रोटी"

"दो जून की रोटी"न पेट होता, न रोटी का झगड़ा होता।रोटी के स्वाद अनेक, पर पेट एक है।हाथ मे रोटी, सब के कर्म की है रोटी ।अमीरी गरीबी की पहचान है यह रोटी।फ़िल्म में रोटियां की दास्तां निराली है।जग संसार मे रोटी की कहानी निराली।यह रोटी मौत की सौदागर बन गई है कही।घर द्वार जग



कोरोना को पत्र

कोरोना फैला है सारे संसार मा। गले मिलने की बात छोड़ो हाथ का धप्पा भी न दे किसी भी बात मा। न बस चले न रेल चले, न चले कलकारखाने लोग निकल पड़े है अपने गांव को। सब खो गई उम्मीदे मानव के अंदर की।गली चौक चौबारे खत्म हो गए पब बियर-बार लकड़ी ताश के घेरे। पड़े हुए कोरोना के डर से परदेशी प्रदेश मा। कोरोना फैला



मकर संक्रान्ति का रहस्य :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस सृष्टि में समस्त चराचर जगत को जीवन प्रदान करने भगवान सूर्य निरंतर चलायमान हैं | अपनी दैनिक यात्रा में वे कभी उत्तरायण तो कभी दक्षिणायन हुआ करते हैं | जिस प्रकार मनुष्यों के लिए दिन एवं रात्रि का विधान ब्रह्मा जी ने बनाया है उसी प्रकार देवताओं के लिए दिन - रात्रि क



सत्यनारायण व्रत कथा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि के आदिकाल से ही इस धरा धाम पर मनुष्य विचरण कर रहा है | मनुष्य ने अपने जीवन को सुचारू ढंग से चलाने के लिए जहां अनेकों प्रकार के संसाधन बनाएं वही समय-समय पर वह ईश्वर का भी आश्रय लेता रहा है इसके लिए मनुष्य ने वैदिक कर्मकांड एवम पूजा पाठ का सहारा लिया | सतयुग से लेकर के त्रेता , द्वापर तक ईश्वर



गोपाष्टमी :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

!! भगवत्कृपा हि केवलम् !!आदिकाल से भारतीय परंपरा में सनातन के अनुयायियों के द्वारा अपने धर्म ग्रंथों का दिशा निर्देश प्राप्त करके भांति भांति के पर्व त्यौहार एवं व्रत का विधान करके मानव जीवन को सफल बनाने का प्रयास किया गया है | सनातन धर्म का मानना है ईश्वर कण - कण में व्याप्त है इसी मान्यता को आधार



चातुर्मास्य :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में समय-समय पर विभिन्न व्रत उपवास एवं त्योहारों का पर्व मनाने की परंपरा रही है | प्रत्येक व्रत / पर्व के पीछे एक वैज्ञानिक मान्यता सनातन धर्म में देखने को मिलती है | आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी जिसे पद्मा एकादशी के नाम से जाना जाता है | इसका बहुत ही



कुसंगति का प्रभाव :-- आचार्य श्री अर्जुन तिवारी जी

*मनुष्य अपने जीवनकाल में सदैव उन्नति ही करना चाहता है परंतु सभी इसमें सफल नहीं हो पाते हैं | मनुष्य के किसी भी क्षेत्र में सफल या असफल होने में उसकी संगति महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है | इस संसार में भिन्न - भिन्न प्रकार के लोग रहते हैं इसमें से कुछ सद्प्रवृत्ति के होते हैं तो कुछ दुष्प्रवृत्ति के | जह



सनातन धर्म की विशालता :--- आचार्य श्री अर्जुन तिवारी जी

*सनातन धर्म में चौरासी लाख योनियों का वर्णन मिलता है | देव , दानव , मानव , प्रेत , पितर , गन्धर्व , यक्ष , किन्नर , नाग आदि के अतिरिक्त भी जलचर , थलचर , नभचर आदि का वर्णन मिलता है | हमारे इतिहास - पुराणों में स्थान - स्थान पर इनका विस्तृत वर्णन भी है | आदिकाल से ही सनातन के अनुयायिओं के साथ ही सनातन



अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्मं शुभा शुभम् ;- आचार्य श्री अर्जुन तिवारी जी के बोल

संसार में कर्म ही प्रधान कर्मानुसार ही मनुष्य को सुख - दुख , मृत्यु - मोक्ष आदि प्राप्त होते हैं | कर्म की प्रधानता यहाँ तक है कि जीव को अगला जन्म किस योनि में लेना है यह भी उसके कर्म ही निर्धारित करते हैं | यद्यपि सभी जीवों को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है परंतु इन सबसे ऊपर एक परमसत्ता है द



कुलदेवता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म बहुत ही वृहद होते हुए असंख्य मान्यताओं को स्वयं को समेटे हुए है | सनातन धर्म में समय - समय पर अनेक देवी - देवताओं के साथ ग्रामदेवता , स्थानदेवता , ईष्टदेवता एवं कुलदेवता की पूजा आदिकाल से की जाती रही है | प्रत्येक कुल के एक विशेष आराध्य होते हैं जिन्हें कुलदेवी या कुलदेवता के नाम से जाना



विद्या ददाति विनयम् :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर परमात्मा ने चौरासी लाख योनियों की रचना की , इनमें सर्वश्रेष्ठ मनुष्य हुआ | मनुष्य सर्वश्रेष्ठ यदि हुआ है तो उसका कारण उसकी बुद्धि , विवेक एवं ज्ञान ही कहा जा सकता है | अपने ज्ञान के बल पर मनुष्य आदिकाल से ही संपूर्ण धरा धाम पर शासन करता चला रहा है | संसार में मनुष्य को बलवान बनाने के



त्रिकाल संध्या :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से ऋषि महर्षियों ने अपने शरीर को तपा करके एक तेज प्राप्त किया था | उस तेज के बल पर उन्होंने अनेकानेक कार्य किये जो कि मानव कल्याण के लिए उपयोगी सिद्ध हुए | सदैव से ब्राम्हण तेजस्वी माना जाता रहा है | ब्राम्हण वही तेजस्वी होता था जो शास्त्रों में बताए गए नियमानुसार नित्य त्रिकाल संध्या का अनु



निर्जला एकादशी :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म के आधारस्तम्भ एवं इसके प्रचारक हमारे ऋषि महर्षि मात्र तपस्वी एवं त्यागी ही न हो करके महान विचारक , मनस्वी एवं मवोवैज्ञानिक भी थे | सनातन धर्म में समय समय पर बताया गया समयानुकूल व्रत विधान यही सिद्ध करता है | विचार कीजिए कि जब ज्येष्ठ माह में सूर्य की तपन एवं उमस से आम जनमानस तप रहा होता



गंगा का महत्त्व :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर मनुष्य को जीवन जीने के लिए वैसे तो अनेक आवश्यक आवश्यकतायें होती हैं परंतु इन सभी आवश्यकताओं में सर्वोपरि है अन्न एवं जल | बिना अन्न के मनुष्य के जीवन की कल्पना करना व्यर्थ है और अन्न का स्रोत है जल | बिना जल के अन्न के उत्पादन के विषय में कल्पना करना वैसा ही है जैसे अर्द्धरात्रि में सू



गंगा दशहरा :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*विशाल देश भारत में सनातन धर्म का उद्भव हुआ | सनातन धर्म भिन्न-भिन्न रूपों में समस्त पृथ्वीमंडल पर फैला हुआ है , इसका मुख्य कारण यह है कि सनातन धर्म के पहले कोई धर्म था ही नहीं | आज इस पृथ्वी मंडल पर जितने भी धर्म विद्यमान हैं वह सभी कहीं न कहीं से सनातन धर्म की शाखाएं हैं | सनातन धर्म इतना व्यापक



“कुंडलिया”इनका यह संसार सुख भीग रहा फल-फूल।

“कुंडलिया”इनका यह संसार सुख भीग रहा फल-फूल। क्या खरीद सकता कभी पैसा इनकी धूल॥ पैसा इनकी धूल फूल खिल रिमझिम पानी। हँसता हुआ गरीब हुआ है कितना दानी॥ कह गौतम कविराय प्याज औ लहसुन भिनका। ऐ परवर सम्मान करो मुँह तड़का इनका॥महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



अर्थोपार्जन कैसो करें --- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरती पर मनुष्यों के लिए चार पुरुषार्थ बताये गये है | धर्म , अर्थ , काम , मोक्ष | इन चारों पुरुषार्थों को पुरुषार्थचतुष्टय भी कहा जाता है | धर्म के बाद दूसरा स्थान अर्थ का है | अर्थ के बिना, धन के बिना संसार का कार्य चल ही नहीं सकता | जीवन की प्रगति का आधार ही धन है | उद्योग-धंधे, व्यापार, कृषि आ



क्यों डूबना चाहते हो मेरे शहर मेरे गाँव को

क्यों डूबना चाहते हो मेरे शहर मेरे गाँव कोक्यों मिटना चाहते हो सर से पेड़ की छावं को।क्यों अँधेरे में धकेलते हो शहर के उजाले के लिएक्यों माटी से खदेड़ते हो शहर के निवाले के लिए।मेरी पीढ़ियों ने इस पिथौरागढ़ को बनते देखा हैदो देशो की संस्कृति के



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