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सरिता

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लहरों जैसे बह जाना✒️मुझको भी सिखला दो सरिता, लहरों जैसे बह जानाबहते - बहते अनुरागरहित, रत्नाकर में रह जाना।बड़े पराये लगते हैंस्पर्श अँधेरी रातों मेंघुटनयुक्त आभासित होलहराती सी बातों मेंजब तरंग की बलखातीशोभित, शील उमंगों कोक्रूर किनारे छूते हैंकोमल, श्वेत तमंगों कोबंद करो अब और दिखावे, तटबंधों का ढह

कहते सब  सरिता मुझे, बढती हूँ निष्काम जीवन के पथ हैं कठिन, चलते रहना काम चलते रहना काम, नहीं रोके रुक पाती  शत्रु सामने देख, सहज  दुर्गा बन जाती मेरा शील स्वभाव, भाव  हैं  मुझमें बहते   मैं जीवन  का स्रोत, मुझे  सब  सरिता कहते ||

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