सत्य यही है

मैंने तुमसे कहा -आकाश पाने के ख्वाब देखो सूरज तो मिल ही जायेगा ...'जब कभी किरणें विभक्त हुईंमैंने उनको हथेली में भरकर सूरज बना दिया ... मिलने की अपनी सार्थकता होती है पर क्या नहीं मिला क्यूँ नहीं मिला के हिसाब का फार्मूला बहुत जटिल होता है तुम उसे सुलझाने में न उसे सुलझा सकते हो न पाने की ख़ुशी जी स



कहानी कुछ और होगी सत्य कुछ और

मैं भीष्मवाणों की शय्या परअपने इच्छित मृत्यु वरदान के साथकुरुक्षेत्र का परिणाम देख रहा हूँया ....... !अपनी प्रतिज्ञा से बने कुरुक्षेत्र कीविवेचना कर रहा हूँ ?!?एक तरफ पिता शांतनु के दैहिक प्रेम की आकुलताऔर दूसरी तरफ मैं.... क्या सत्यवती के पिता के आगे मेरी प्रतिज्ञामात्र



प्रभावी सत्य

यूँ तो आदर्श रूप में सत्य सिर्फ सत्य होता है इसके आगे किसी विशेषण की आवश्यकता नहीं।  फिर भी इस बात से फर्क पड़ता है सत्य कहाँ बोला जा रहा है ,किस उद्देश्य से बोला जा रहा है और किसके द्वारा बोला जा रहा है । कानून की प्रक्रिया में सत्य का अलग महत्व है और समाज और देश काल में अलग। समाज और परिवार में यदि



आओ सदा सच बोलें

काम कठिन है ना !जरूर होगा क्योंकि हमें झूठ बोलने की आदत है और मैं कह रहा हूँ सच बोलें |परन्तु सच बोलने से ईश्वर हम पर सदा प्रसन्न होते हैं |लेकिन सच कैसा बोलें ;-"सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयात ना ब्रूयात सत्यमप्रियम "अर्थात ;-सच बोले प्रिय बोले [अच्छा बोले ] परन्तु अप्रिय सत्य कभी ना बोलें |सच मे





1
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x