शायरी



मोहब्बत

रात जितनी बढ रही थी ,खामोशी उतनी ही फैल रही थी । रूठ कर तेरा ,यूं बैठना कहा मेरे दिल की पुकार सुन पा रही थी ।।😍😍😍😍😍😍😍



सुकून

सुकूनमशगूल थे बियाबानों में,कभी धुँध,कभी दोस्तों केआशियानों में!झंझावात् तोकभी तूफ़ानों में!!सकून मिला है तोसिर्फ तेरीहंसी ओ' मुस्कानों में!!!डॉ. कवि कुमार निर्मल



मोती मेरे हाथ का .. .. .. ..

टूटना ही था अगर .. .. .. .. .. .. .. .. .. . मोती ने माला से .. .. .. ..अच्छा होता कि वो मोती .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. मेरे हाथ में ही न आता !. ..



मुझे मार दीजिये

आप सभी के लिये पाकिस्तान के मशहूर शायर अहमद फ़राज़ की एक नज़्म जो पाकिस्तान के कट्टरवादी संगठनो पर चोट करती है का हिन्दी अनुवाद पेश है. काफ़िर हूँ, सिर फिरा हूँ मुझे मार दीजियेमैं सोचने लगा हूँ मुझे मार दीजिये है एहतराम हज़रते-इंसान मेरा दिलबेदीन हो गया हूँ मुझे मार दीजिये मैं पूछने लगा हूँ सबब



शायरी

शायरीशायरी लिखूं क्या?शरहदें जब मजबूर हैं!फासला एक आता है मुझे-सबका मालिक एक है!!डॉ. कवि कुमार निर्मलके. के.



वख़्त बचता नहीं

वख़्त बचता नहींवख़्त बचता हीं नहीं उफ! खुद के लिये,हदों के पार जा- ख़ुद को कुछ सँवार लूँ!गुलशन में तुम्हारे मशगूल हुए इस कदर,कैसे (?) कुछ लम्हें तेरी तवज़्जो में,'गुफ़्तगू' कर ताजिंदगी गुजार दूँ!!डॉ. कवि कुमार निर्मल



दिल की डायरी

💐💐💐💐💐💐 एक ख्याल आया जो मन में, डाल दिया तुमने उलझन में मिले जो तुम ऐसे डगर में, भूल गया सब पल भर में 💛💛💛💛💛💛 आसमान छूने की ललक थी



सब्बा खैर से शाम की सफर

सब्बा खैर से शाम तक की सफरआज निंदिया आवे ना आवे,सब्बा खैर का तो बनता है।सुबह के सपने सच हों,मालिक से यह बंदा,इल्तिज़ा किया करता है।।भोर का सपना टुटते के संगचाय का प्याला सजता है।हो, न हो फर्माइश उनकी,शाम को तोहफा बनता है।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



सब्बा खैर

आज निंदिया आवे ना आवे,सब्बा खैर का तो बनता है।सुबह के सपने सच हों,मालिक से यह बंदा,इल्तिज़ाकरता है।।के. के.



"जिंदगी"

जिन्दगी की हर घड़ी है वारन्टी मय।कभी जय होती तो कभी होती छय।।आगे ससरती हीं यह जाती है।सुर-ताल सब बदल जाते हैं।।ठोकरो की पुरजोर ताक़त से,तजुर्बा बढ़ता, निखर जाते हैं।खिलखिलाहट से कहकशे की,राह पे सब बढ़ते चले जाते हैं।।मयपन है कि झुर्रियाँ गि



मर्ज़

मर्ज़ कोई ले गया चुराकर ऐसा मैं बीमार हुआ। शुमार नहीं था किस्मत में जोक्यों उसका दीदार हुआ।। 💔



रॉक गार्डन पर कविता

रॉक गार्डन पर कविता- फ़र्क बस नज़रिये का था.टूटी हुई चीज़ समझकर बेज़ान मान लिया गया.इक शख़्स ने जोड़ जोड़कर मुझे खूबसूरत बागीचा बना लिया.शिल्पा रोंघे



मौन के रुप अनेक

एक ही मौन के देखो कितने रूप.कभी ध्यान है,कभी निद्रा है मौन,कभी उपासना है मौन,कभी भोरतो कभी रात का काला सन्नाटा है मौन,ना पूरा "हां" ना पूरा "ना"है मौन.ना पूरा है ना अधूरा हैसचमुच एक रहस्य ही है मौन.शिल्पा रोंघे



ग़ज़ल

फना करके कई सपने मेरा किरदार ज़िंदा है।।कहानी में महज अब तो मेरा यह प्यार ज़िंदा है।। गिरेबाँ तक किसी के हाथ को आने नहीं दूंगा। तुझे किस बात का डर है तेरा ये यार ज़िंदा है।।किसी को दोष क्या दूं मै मुकद्दर है यही मेरा। कि अपना घर जला करके मेरा फनकार ज़िंदा है।।



ग़ज़ल

आज लौटकर मिलने मुझसे मेरा यार आया हैशायद फिर से जीवन में उसके अंध्यार आया हैबचकर रहना अबकी बार चुनाव के मौसम मेंमीठी बातों से लुभाने तुम्हें रंगासियार आया हैबहुत प्यार करता है मुझसे मेरा पड़ोसीमुझे यह समझाने लेकर वो हथियार आया हैगले मिलकर गले पड़ना चाहता है दुश्मनलगता है अबकी बार बनके होशियार आया हैमे



मोहोब्बत

उसकी मोहोब्बत ने मुझे इस तरह जकड़ा हुआ था। में सुबह ये भूल जाता था कि रात में किस बात पर झगड़ा हुआ था।।



साथी

साथी उसे बनाओं जो सुख दुख में साथ दे.ना कि उसे जो सिर्फ तस्वीरों में आपकी शोभा बढ़ाएं.शिल्पा रोंघे



वक्त वक्त की बात

कहते है जो ये कि वक्त के पंजों से बचालेंगे तुम्हेंवहीं सबसे बड़ेशिकारी होते हैं.शिल्पा रोंघे



जीने की कला

हां दर्द सहना भी एक कला है। गम बर्दाश्त कर लेना भी एक कला है। खुद नाखुशी के दौर में रहकरदूसरों से ना जलना भी एक कला है। छिपकर रोना भी एक कला है । अंधेरे में भी जुगनू बनकर जीनाएक कला है। कहती है अगर खुदगर्ज़ दुनिया तोकहने तो कहने दो। क



सिड्रेंला और लैला जब मिली

सिड्रेंला और लैलामें बहस एक दिनजमकर हुई। लैला सिड्रेंलाकी किस्मत कोबेहतर बता गईसिड्रेंला को लैलाने कहा देखोफर्श से तू अर्शपर पहुंचगई। मैं महलों की रानीहोकर अकेली ही रह गई। कुछ इस तरह वो फ़कीरीको वो अमीरी से बेहतरबता गईऔर कह गई प्यार मेंउंच और नीचकी बात गलती से भी ना कर



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