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बोझ

लघुकथाबोझक्या पुरूष, क्या स्त्री, क्या बच्चे , सब के सब आधुनिकता के घोड़े पर सवार फैशन की दौड़ में भाग रहे थे और वह किसी उजबक की तरह ताक रहा था । गाँव से आया वह पढा लिखा आदमी, भूल से , एक भव्य माल में घुस आया था और अब ठगा-सा खड़ा था।उसकी नजर एक आदमी पर पड़ी जो एक स्टील के बेंच पर बैठा था। उसके पास



जल सम , जीवन का आधार

जीवन पानी का बुलबुला, पानी के मोल मत समझो, जीवन का हैं दूसरा नाम , प्रकृति का अमूल्य उपहार, जीवनदायिनी तरल, पानी की तरह मत बहाओ, पूज्यनीय हमारे हुए अनुभवी, घाट- घाट का पानी पीकर, जिन्हें हम, पिन्डा पानी देते, तलवे धो- धोकर हम पीते, ×---×----×-----×---×--× सामाजिक प्राणी है, जल में रहकर, मगर





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