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बच्चों को कैसे सिखाएं रिश्तों की अहमियत

दादा-दादी, चाचा-चाची, भुआ, ताऊजी और मामा-मामी, मौसी ऐसे कई रिश्ते हैं जिनसे एक बड़ा परिवार बनता है. ये रिश्ते ही हमें अच्छे संस्कार सिखाते हैं. हमें परिवार के साथ जीना सिखाते हैं. पहले एक ज़माने में एक ही घर में कम से कम 12 से 15 लोग रहते थे मगर आज 2 से 4 ही लोग रह पाते



आज का सुविचार

अज्ञान अज्ञान जैसाशत्रु दूसरा नहीं - चाणक्य अपने शत्रु सेप्रेम करो, जो तुम्हे सताए उसके लिए प्रार्थना करो - ईसा अज्ञानी होनामनुष्य का असाधारण अधिकार नहीं है बल्कि स्वयं को अज्ञानी जानना ही उसकाविशेषाधिकार है - राधाकृष्णन अशिक्षित रहनेसे पैदा ना होना अच्छा है क्योंकि अज्ञान ही सब विपत्ति का मूल है अज



“ अंतर्राष्ट्रीय दिवस ‘आक्रमक दुर्व्यवहार के शिकार, मासूम बच्चे ” (International Day of Innocent Children Victims of Aggression) 4 जून

....खिलने से पहले ही मुरझाता बचपन,येशोषित ये कुंठित ये अभिशप्त बचपन....आजके समाज मे बच्चों की स्थिति का अनुमान लगाने के लिए उपरोक्त दो लाइनें ही काफी है। हो सकता है कि बड़े या मध्यम वर्गीय परिवार में रहने वाले बच्चों की स्थिति आपकोसही लग



.... कितने ईमानदार.…

ऑफिस में होने वालीधांधली, घूँस एवं दूसरे अनैतिक व्यवहार की स्थिति जानने के लिए नवम्बर 2016 से फरवरी2017 के बीच किए गए । एक शोधकर्ता संस्था- वैश्विक बाजार अनुसंधान एजेंसी (इपसॉस) द्वारा ‘एसिया-पेसेफिक फ़्रौड सर्वे-2017किया गया । इस सर्वे के दौरान विभिन्न बड़ी कम्पनियों में कार्यरत 1,698 कर्मचारियोंके



संस्कृत किसी भाषा की मां नहीं है - दिलीप मंडल

संस्कृत किसी भाषा की मां नहीं है. किसानों ने कभी भी संस्कृत में अपनी फसल नहीं बेची. मछुआरों ने संस्कृत में मछली का रेट नही बताया. ग्वालों ने संस्कृत में दूध नहीं बेचा, सैनिक ने कमांडर से इतिहास में कभी भी संस्कृत में बात नहीं की, किसी मां ने बच्चे को संस्कृत में लोरी नहीं सुनाई, खेल के मैदान में कभी



व्यवहार की कुशलता के गुप्त रहस्य

गुप्त रहस्य छिपाये रखिएन दूसरों से इतने खुल जाइये कि दूसरों को आपमें कुछ आकर्षण ही नहीं रहे, न इतने दूर ही रहिये कि लोग आपको मिथ्या अभिमानी या घमंडी समझें। मध्य मार्ग उचित है। दूसरों के यहाँ जाइये, मिलिए किन्तु अपनी गुप्त बातें अपने तक ही सीमित रखिए। “आपके पास बहुत सी उपयोगी मंत्रणायें, गुप्त भेद, ज



मानवाधिकार अध्ययन की प्रमाणिकता

पिछले दिनों मानवाधिकार सम्बन्धी एक सेमिनार में हिस्सा लिया. कुछ अच्छे वक्तत्ता भी सुनने को मिले किन्तु कुछ शोध पत्रों में व्यवहारिकता की कमी लगी. उसी के बारे लिख रहा हूँ. मैंने कई लोगों को उन विचारकों के बारे में शोधपत्र पढ़ते देखा जिनका सीधा सम्बन्ध परम्परागत जीवन शैली से रहा है और मानवतावाद या मा





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