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सामाजिकता

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*इस सृष्टि में सामंजस्य बैठाने के लिए ईश्वर ने एक साथ नर नारी की सृष्टि की और इस सृष्टि को चलायमान किया | नारी के बिना पुरुष का कोई भी अस्तित्व नहीं है , नारी के सम्मान एवं उनके गुणगान से हमारे शास्त्रों के पन्ने भरे पड़े हैं | "यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता" की घोषणा हमारे शास्त्रों में

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*परमपिता परमात्मा ने सुंदर सृष्टि की रचना करके मनुष्य को धरती पर भेजा , सुंदर शरीर के साथ सुंदर एवं तर्कशील बुद्धि प्रदान कर दी परंतु मनुष्य इस संसार में आकर के तरह-तरह के आडंबर (छद्मवेष) करता है | अपने वास्तविक स्वरूप का त्याग करके आडंबर बनाकर समाज के साथ छल करता है | वह शायद नहीं जानता कि आडंबर

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*मानव जीवन बड़ा विचित्र है , संपूर्ण जीवन काल में मनुष्य सफलता एवं असफलता के बीच झूलता रहता है | इस जीवन में सफलता उसे ही प्राप्त होती है जो अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ होता है | अनेक बाधाएं आने पर भी जो अपने लक्ष्य को नहीं भूलता एवं उसके प्रति अपनी दृढ़ता बनाए रहता है वह एक दिन अवश्य सफल होता है |

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*आदिकाल से ही मनुष्य एवं प्रकृति का अटूट सम्बन्ध रहा है | सृष्टि के प्रारम्भ से ही मनुष्य प्रकृति की गोद में फलता - फूलती रहा है | प्रकृति ईश्वर की शक्ति का क्षेत्र है | इस धरती का आभूषण कही जाने वाली प्रकृति की महत्ता समझते हुए हमारे महापुरुषों ने इसके संरक्षण के लिए सनातन धर्म के लगभग सभी ग्रंथों

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*भारतीय संस्कृति में समय-समय पर त्यौहार एवं पर्वों का आगमन होता रहता है | यह त्यौहार भारतीय संस्कृति की दिव्यता तो दर्शाते ही हैं साथ ही सामाजिकता एवं वैज्ञानिकता को भी अपने आप में समेटे हुए हैं | विभिन्न त्यौहारों में होली का अपना एक अलग एवं महत्त्वपूर्ण स्थान है | होली मनाने के एक दिन पूर्व "होलि

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*सृष्टि के आदिकाल से इस धरा धाम पर मानव जाति दो खंडों में विभाजित मिलती है | पहला खंड है आस्तिक जो ईश्वर को मानता है और दूसरे खंड को नास्तिक कहा जाता है जो परमसत्ता को मानने से इंकार कर देता है | नास्तिक कौन है ? किसे नास्तिक कहा जा सकता है ? यह प्रश्न बहुत ही जटिल है | क्योंकि आज तक वास्तविक नास्त

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!! भगवत्कृपा हि केवलम् !! *नारी को सृष्टि का मूल स्रोत मानते हुए सनातन धर्म के आदि ग्रंथ वेदों में नारी का महिमामंडन किया गया है | हमारे वेदों में नारी को अत्यंत महत्वपूर्ण गरिमामय एवं उच्च स्थान प्रदान किया गया है | स्त्रियों की शिक्षा- दीक्षा, शील, गुण, कर्तव्य, अधिकार और सामाजिक भूमिका का ज

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