टेस्ट ट्यूब बेबी और नॉर्मल शिशु में क्या फ़र्क है ?

04 मार्च 2020   |  बबीता राणा   (276 बार पढ़ा जा चुका है)


बच्चे न होना (बांझपन) एक ऐसी समस्या है जो एक महिला को मानसिक रूप से परेशान कर देती है। बच्चे की चाहत और असफलताओं के दौर से गुज़रने पर एक महिला अंदर से कमजोर हो जाती है। ऐसे में निसंतान दंपत्ति के लिए ज़िंदगी में आशा की किरण है आईवीएफ तकनीक, जिसका आविष्कार लगभग चालीस वर्ष पहले हुआ था।

जबकि कुछ लोग अभी भी इस आईवीएफ तकनीक की ओर रूख करने से पहले हिचकते हैं क्योंकि जागरूकता के अभाव में भी लोग पूरी तरह से इसपर विश्वास नहीं कर पाते हैं।

आज भी लोगों के मन में ये धारणा बनी हुई है कि आईवीएफ के माध्यम से जन्मे टेस्ट ट्यूब बेबी प्राकृतिक रूप से जन्मे बच्चों की तुलना में कमज़ोर होते हैं या फिर उनमें कोई कमी होती है। आइये इस लेख के माध्यम से जानते हैं कि टेस्ट ट्यूब बेबी और सामान्य रूप से जन्म लेने वाले बच्चे में क्या फर्क है।


टेस्ट ट्यूब बेबी और सामान्य रूप से जन्म लेने वाले बच्चे में फर्क !


आईवीएफ की मदद से एक टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म होता है, जो कई तरह के मेडिकल और सर्जिकल प्रोसीजर से गुज़रता है। जिसके सफल फर्टिलाइजेशन के लिए महिला के अंडे और पुरुष के स्पर्म में सुधार किया जाता है। जब एक दंपत्ति प्राकृतिक या सामान्य रूप से बच्चे जन्म देने में सफल नहीं हो पाते हैं तब गर्भाधान के लिए चिकित्सा हस्तक्षेप की आवश्यकता तब होती है।

ऐसे मामलों में, बच्चे आईवीएफ प्रक्रियाओं के माध्यम से पैदा होते हैं, जहां एक महिला के शरीर के बाहर अंडे निषेचित होते हैं। वहीं एक नार्मल बेबी उसे कहते हैं, जो प्राकृतिक गर्भावस्था और निषेचन के जरिये से पैदा होता है।

नेचुरल फर्टिलाइज़ेशन की प्रक्रिया उस समय काम करती है, जब महिला के गर्भाशय में शुक्राणु द्वारा ओवम को फर्टीलाइज़ किया जाता है। एक प्राकृतिक गर्भावस्था को इन-विवो फर्टिलाइज़ेशन भी कहा जा सकता है जो मानव शरीर के अंदर महिला के अंडे और पुरुष के स्पर्म के बीच फर्टिलाइज़ेशन की सामान्य विधि का वर्णन करता है।


आईवीएफ के बाद समय से पहले जन्म और मानसिक विकार के जोखिम क्या हैं?


1. आईवीएफ के बाद समय से पहले बच्चे के जन्म के जोखिम

अध्ययनों की मानें तो आईवीएफ से प्रीमैच्योर यानि समय से पहले बच्चे के जन्म होने की संभावना थोड़ी बढ़ जाती है। हालांकि, वक़्त से पहले बच्चे के जन्म के लिए सिर्फ आईवीएफ नहीं, बल्कि गर्भवती महिला की जीवनशैली, उसकी उम्र और उसके खान-पान की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इतना ही नहीं अगर इन कारकों को छोड़ भी दें तब भी नार्मल जन्म की तुलना में आईवीएफ की मदद से कंसीव हुए बच्चों का जन्म समय से पहले होता ही है। यह कई कारणों से होता है। आईवीएफ के बाद समय से पहले बच्चे के जन्म के जोखिम को निम्न कारक प्रभावित करते हैं :

एक से अधिक भ्रूण स्थानांतरण , हार्मोनल कारण , मातृ कारक, चिकित्सा प्रबंधन में वृद्धि


2. मानसिक विकारों का खतरा

चाहे एक बच्चा प्राकृतिक रूप से कन्सीव किया गया हो या फिर आईवीएफ के माध्यम से इसका असर बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर बिलकुल नहीं पड़ता है। हालांकि, कई शोधों ने ये दिखाया है कि जो महिलाएं आर्टिफिशियल तरीके से बच्चे को कन्सीव करती है, उनके बच्चों में थोड़ा लेकिन बढ़ता हुआ मानसिक विकार जैसे आटिज्म होने का रिस्क रहता है। अध्ययन का सामान्य निष्कर्ष यह है कि टेस्ट-ट्यूब बेबी आमतौर पर मानसिक रूप से और शारीरिक रूप से स्वस्थ बच्चों की तरह ही स्वस्थ होते हैं।

अगला लेख: आईयूआई उपचार क्या है और किन परिस्थितयों में इसका उपयोग किया जाता है !



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