‘‘आंकड़ों’’ के ‘‘खेल’’ की ‘‘बाजीगरी’’ द्वारा ‘‘कोरोना’’ पर ‘‘राजनीति’’क्यों?

06 जून 2020   |  राजीव खण्डेलवाल   (305 बार पढ़ा जा चुका है)

‘‘आंकड़ों’’ के ‘‘खेल’’ की ‘‘बाजीगरी’’ द्वारा ‘‘कोरोना’’ पर ‘‘राजनीति’’क्यों?

कोरोना वायरस को भारत में आए 4 महीने पूर्ण हो चुके हैं। हमारे देश में प्रथम मरीज 30 जनवरी को केरल के ‘‘त्रिशूर’’ में आया था। ‘‘कोरोना’’ (कोविड़-19) राष्ट्रीय महामारी और आपदा के रूप में, हमारे देश के लिये एक अत्यंत चिंता का विषय था। इसलिए सत्ता और विपक्ष के साथ देश की संपूर्ण जनता 30 जनवरी को एक साथ खड़ी हुई थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 24 मार्च को राष्ट्रीय लॉक डाउन घोषित करने के समय तक देश ने लगभग पूरी ऐकमतता व एकजुटता दिखाई थी। लेकिन इसके बाद शनैः शनैः ‘‘कोरोना नीति‘ पर ‘‘राजनीति‘‘ हावी होती गई। यथा, कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने पर ध्यान कम, कोरोना संक्रमित बीमारों व मृतकों के आंकड़ों के खेल की बाजीगरी द्वारा स्वयं को सफल व अपने विपक्षी को असफल सिद्ध करने के लिये ज्यादा चल पड़ी!

सत्ता पक्ष लॉक डाउन लगाने के द्वारा हासिल आंकड़ों से यह सिद्ध करने पर तुला हुआ है कि, विश्व के अधिकांश देशों की तुलना में हमारे देश में संक्रमित बीमारांे की संख्या व मृतकों की अनुपातिक दर बहुत कम (5.90 प्रतिशत की तुलना में 2.82) रही है। ‘‘यदि’’ राष्ट्रीय लॉक डाउन घोषित किया नहीं जाता तो हमारे देश में भी (औसत) 20 लाख से ज्यादा मरीजों की संख्या और लगभग 54000 मौतें (दिनांक 23.05.2020 की स्थिति तक केन्द्रीय स्वास्थ्य विभाग के अनुसार) हो जाती। मतलब सरकार सफल? इसके विपरीत विपक्षी दल बेशर्मी के साथ अपने सुविधाजनक आंकड़ों के माध्यम से यह सिद्ध करने में पूरी ताकत लगाते रहे कि, एक तरफ जहां विश्व में, खासकर ज्यादा संक्रमित रोगी संख्या वाले देशों (जैसे इटली) में भी मरीज अब कम होते जा रहे है, वहीं हमारे देश में इसके विपरीत लाॅकडाउन की तथाकथित सफलता के बावजूद संक्रमितों की संख्या दिन प्रतिदिन क्यों बढ़ते जा रही है? मतलब सरकार असफल?

आकड़ों के बाबत एक बात पहले जान लीजिए। संक्रमितों की संख्या के ये आंकड़े पूरी तरह से प्रमाणित नहीं है। इसलिये, कि विश्व स्वास्थ्य संस्था द्वारा कोरोना पाजिटिव न आने के बावजूद, लक्षणों के आधार पर रोगी को कोरोना संक्रमित व्यक्ति की श्रेणी में रखने के निर्देश दिये गये हैंा आइये, पूरे लॉकडाउन के इन 70 दिनों का ‘आंकड़ों’ के माध्यम से संक्रमित रोगियों की संख्या की बढ़ोतरी का (सही ? या गलत?) विश्लेषण कर देखें। यह स्पष्ट होता है कि इन 70 दिनों में मात्र 20 दिन ही ऐसे रहे, जब, संक्रमित मरीजों की संख्या नहीं बढ़ी, को छोड़ दिया जाए तो, शेष अवधि में, समय बीतने के साथ संक्रमितों की संख्या भी तेजी से बढ़ती चली जा रही है। गिलास आधा खाली है या आधा भरा है, तो हमने देखा है कि तर्कों के माध्यम से दोनों पक्ष अपनी बात सिद्ध कर देते हैं। लेकिन गिलास आधा भरा है या खाली की यह व्याख्या कि गिलास पूरा खाली या पूरा भरा है, को कोरोना काल में आंकड़ों के इस जादुई खेल द्वारा सिद्ध किया जा रहा है? इसे भी कोरोना कालचक्र की एक नई ईजाद ही मानना पड़ेगा।

आंकड़ों की जादूगरी का एक छोटा सा उदाहरण देखिये! 30 जनवरी को भारत में 1 व चीन में 9254 संक्रमित रोगी थे व भारत का स्थान विश्व में 6 वां था। भारत के संबंध में संक्रमित दुगने कैसे हुये, इसका विश्लेषण आगे किया जा रहा है। 2 फरवरी को दुगने अर्थात 2 व चीन में 17512 हुये व भारत का स्थान चैथा हो गया। लगभग 28 दिन बाद 1 मार्च को भारत में दुगने अर्थात 4 व चीन में 80022 तथा भारत का स्थान 9 वां हो गया। भारत में लाॅकडाउन घोषित होने के दिन 24 मार्च को 619 व चीन में 81693 संख्या हुई व भारत का स्थान 10 वां था। 3 अप्रैल के लगभग 4000 रोगी थे, जो दुगने 6 अप्रैल को हुये, 8000 10 अप्रैल को, 16 हजार, 18 अप्रैल को 36 हजार, 30 अप्रैल को 60 हजार, 8 मई को हुये। लेकिन अब तो दुगने (ड़बलिग) होने की दर की अवधि भी तुलनात्मक रूप से तेजी से कम होती जाकर प्रांरभिक अवस्था की दुगनी दर पर आ रही है। संक्रमित मरीजों की संख्या हर दिन प्रतिदिन ऊंचाई प्राप्त करने से आज हमारा देश विश्व के 200 देशों में सातवें स्थान पर पंहुच गया है। प्रारम्भ में हम मात्र कितने देशों में कौन से....? स्थान पर थे, संबंधित पक्ष यह भी समझाएं। 1 अप्रैल को भारत का विश्व में कोरोना संक्रमितों की संख्या के मामले में 20वां स्थान था व 27 मई को चढ़कर 10वें स्थान पर पंहुच़ गया।

कोरोना वायरस बेहद संक्रामक तो है, लेकिन बेहद घातक नहीं है। कोरोना वायरस के संबंध में हमारे देश के नागरिकों की निरोधक क्षमता तुलनात्मक रूप से मजबूत होने के कारण सापेक्ष रूप से हमारे देश की मृत्यु दर तुलनात्मक रूप से बहुत कम है। अब इसी को आनुपातिक आंकड़ो के द्वारा दर्शाया जाये, तो निश्चित रूप से यह आंकड़े बाजी आपको फंसा देगी और अपने उद्देश्यों में सफल भी हो जायेगी। आंकड़ों की यही बानगी आपको समझाने का प्रयास इस लेख के माध्यम से कर रहा हूँं।

आज भी केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग ने संक्रमितों की संख्या में बढ़ोत्री के साथ यह भी दावा किया कि हमारे देश की मृत्यु दर मात्र 2.82 है जो विश्व के अन्य देशों की तुलना में काफी कम है। आज संक्रमित रोगियों की संख्या में वृद्धि लगभग 890़9 हुई है। तर्क के लिए मान लीजिए कि सरकार व नागरिकों के प्रयासों से यही वृद्धि 8909 की बजाएं सिर्फ 4000 पर ही सिमट जाती तो, मृतकों की संख्या बढ़े बिना ही मृत्यु दर अपने आप बढ़ जाती। मतलब एक तरफ तो सरकार संक्रमित मरीजों की संख्या में कमी का दावा करती है, परन्तु ठीक उसी समय उसे मृत्यु दर की बढ़़ी हुई संख्या की आलोचना भी झेलनी पड़ती, जबकि मृतकों की संख्या में कोई वृद्धि नहीं हुई है। अब बढ़ते रोगियों की तेजी से बढ़ती हुई संख्या के औचित्य के लिये केन्द्रीय स्वास्थ्य उपसचिव लव अग्रवाल देश की जनसंख्या का सहारा ले रहे है। आंकड़ों की बाजीगरी का यही खेल है।

इसी तरह का विश्लेषण अन्य मामलों में भी अनुपातिक आंकड़ों के द्वारा किया जा सकता है। ‘‘आधार संख्या’’ ‘दिन’, ‘समयावधि’ व समय को अपनी सुविधानुसार चुनकर सामान्य रूप से अपने मन माफिक अनुपात के आंकड़े इस कोरोना काल में आप बता सकते है। उदाहरणार्थ यदि हम संक्रमित रोगियों की संख्या का आधार संख्या 50000 ले, तो प्रथम 50000 मरीज 95 दिनों में, फिर पचास हजार 13 दिनों में, फिर 9 दिनों व अंतिम 50000 मात्र 6 दिनों में संख्या बढ़ी। यह वृद्धि इस बात को सिद्ध करती है कि, लाॅकडाउन की अवधि बढ़ने के साथ-साथ संक्रमित मरीजों की संख्या में वृद्धि ही नहीं हुई बल्कि वृद्धि की दर भी बेतहाशा बढ़ रही हैं। इसी को कहते है, आंकड़ों की बाजीगरी, चालाकी व मायाजाल।

‘‘आंकड़ों’’ के साथ-साथ हमारे देश के राजनैतिक पटल पर शब्दों की बाजीगरी व ’‘व्यंग बाण’’ फ्री स्टाइल कुश्ती के समान चल रहे हंै। इस खेल में समस्त राजनैतिक पार्टियां अपनी-अपनी सुविधानुसार जुड़कर सुविधा की राजनीति की रोटी सेकनें में कोई परहेज नहीं कर रही हंै। आंकड़े के ऐसे खेल के साथ समस्त पक्ष खेल-खेल में राजनीतिक कुश्ती के दाव-पेच (धोबी-पछाड़) भी चलते रहेगें। फ्री स्टाइल राजनैतिक दंगल में देशहित का कोई नियम होता है क्या? हमारे देश की वर्तमान राजनीति की छाप को राजनीतिज्ञ लोग संकटकाल में भी बदलने को क्यों तैयार नहीं है?

अगला लेख: क्या परिपक्व होते लोकतंत्र में ‘‘सरकारे’’ ‘‘गिराई’’ जाती है? अथवा ‘‘बनाई’’ जाती है?



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