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हिंदुस्तान के हीरो थे सैम मानेकशा जिन्होंने गिड़गिड़ाने पर मजबूर कर दिया था पाकिस्तान को (जन्मतिथि ३ अप्रैल पर विशेष)

4 अप्रैल 2016

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3 अप्रैल का दिन भारत और भारतीय सेना के इतिहास में बेहद खास है। क्योंकि इसी दिन 1914 को महान योद्धा सैम मानेकशा का जन्म हुआ था। मूल गुजराती और पारसी साम होरमूसजी फराजी जमशेदजी मानेकशा ने ही सन् 1971 में पाकिस्तान को धूल चटाकर बांग्लादेश को आजाद मुल्क बनाने में अहम भूमिका निभाई थी और 91000 पाक सैनिकों को कर लिया था कैद| सन् 1971 के युद्ध में जनरल मानेकशा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी से वादा किया था कि वे एक हफ्ते के अंदर ही पूर्वी पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर देंगे। 3 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तान ने ही भारत पर हमला बोल दिया था और मानेकशा की बहादुरी के सामने पाक सेना टिक नहीं सकी। 13 दिन चले इस युद्ध में एक बार फिर पाक को मुंह की खानी पड़ी और 16 दिसंबर को बांग्लादेश को पाक से आजाद करा दिया गया। इस जंग में 91000 पाक सैनिकों को बंदी बना लिया गया था, लेकिन पाक सरकार के निवेदन पर सभी सैनिक रिहा कर दिए गए थे। युद्ध के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जनरल मानेकशा से बहुत खुश हुईं और उन्हें फील्ड मार्शल बना दिया था। मानेकशा की एक सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे अपने दिल की हरेक बात खुलकर कहा करते थे। यहां तक कि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी को भी मैडमकहने से स्पष्ट मना कर दिया था। इस बारे में उनका कहना था कि यह संबोधन एक खास वर्ग के लिए उपयोग होता है। इसलिए वे उन्हें प्रधानमंत्रीही कहेंगे। इतना ही नहीं, उन्होंने युद्ध के बाद 26 फरवरी 1977 को पुणे में वीर सावरकर की प्रतिमा के अनावरण करते समय यह तक दिया था कि अगर इंदिरा गांधी की जगह वीर सावरकर भारत के प्रधानमंत्री होते तो 1965 के युद्ध में हमारी सेना पाकिस्तान के लाहौर शहर पर भारतीय तिरंगा फहरा देती। क्योंकि सावरकर हमें पीछे हटने के लिए कभी नहीं कहते।

मानेकशा का जन्म 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर के एक पारसी परिवार में हुआ था। लेकिन उनका परिवार गुजरात के वलसाड शहर से है। मानेकशा के जन्म से कुछ साल पहले ही परिवार वलसाड से अमृतसर शिफ्ट हो गया था। मानेकशा की प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में ही हुई। इसके बाद उनका दाखिला नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में हुआ। वे देहरादून स्थित इंडियन मिल्रिटी ऐकेडमी के पहले बैच के लिए 40 छात्रों में से चुने गए थे। इसके बाद उनकी नियुक्ति भारतीय सेना में हुई। मानेकशा 1937 में एक सार्वजनिक समारोह में हिस्सा लेने लाहौर गए थे। जहां उनकी मुलाकात सिल्लो बोडे से हुई। दो साल तक चली यही दोस्ती 22 अप्रैल 1939 को वैवाहिक रिश्ते में बदल गई। सन् 1969 में वे सेनाध्यक्ष बने और 1973 में उन्हें फील्ड मार्शल का सम्मान मिला। 1973 में सेना प्रमुख के पद से सेवानिवृत्त के बाद वे वेलिंगटन में बस गए। वृद्धावस्था में वे फेफड़ों की घातक बीमारी से ग्रस्त हो गए और इसकी वजह से कोमा में चले गए। आखिरकार 27 जून 2008 को वेलिंगटन के सैन्य हॉस्पिटल में उनका निधन हो गया।

ज्ञातव्य हो कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 17वीं इफेंट्री डिवीजन में 4-12 फ्रंटियर फोर्स रेजीमेंट के कैप्टन के पद पर आसीन मानेकशा बर्मा अभियान के दरमियान सेतांग नदी के तट पर जापानी सैनिकों से लड़ते हुए गंभीर रूप से घायल हो गए थे। लेकिन वे हार मानने वालों में से नहीं थे। स्वस्थ होते ही जनरल स्लिम्स की 14वीं सेना के 12 फ्रंटियर रायफल फोर्स में लेफ्टिनेंट बनकर बर्मा के जंगलों में फिर से एक बार जापानी सैनिकों से दो-दो हाथ करने जा पहुंचे। घने जंगल में हुई इस भीषण लड़ाई में वे फिर से घायल हो गए। द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म होने के बाद सैन स्टॉफ ऑफिसर बनाकर जापानियों को आत्मसमर्पण के लिए इंडो-चाइना भेजा गया। यहां उन्होंने लगभग 10 हजार युद्धबंदियों के पुनर्वास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सन् 1945 में वे फर्स्ट ग्रेड स्टाफ ऑफिसर बनकर मिल्रिटी ऑपरेशंस डायरेक्ट्रेट में सेवारत रहे। देश के विभाजन के बाद 1947-48 की काश्मीर के लिए पाकिस्तान से जंग में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत की आजादी के बाद गोरखा रेजीमेंट की कमान संभालने वाले वे पहले भारतीय अधिकारी थे। गोरखा रेजीमेंट उन्हें “सैम बहादुर” के नाम से पुकारा करती थी। सफलताओं का लगातार इतिहास लिखते रहे सैम को नागालैंड समस्या सुलझाने में अविस्मरणीय योगदान के लिए 1968 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।


मानेकशा के जीवन की हाईलाइट्स...

- सख्त ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्हें फ्रंटीयर फोर्स में लेफ्टिनेंट का पद मिला।

- दूसरे विश्वयुद्ध में बर्मा की जंग में आठ गोलियां खाने के बाद भी आगे बढ़े और दुश्मन के मुख्य अड्डे पर कब्जा कर लिया था।

- भारत की आजादी तक वे कर्नल के पद पर पहुंच चुके थे।

- 1948 में काश्मीर युद्ध के दौरान उन्होंने ऐसी चक्रव्यूह रचा था कि पाकिस्तानी कबाइली लड़ाकों को जान बचाकर वापस पाकिस्तान भागना पड़ गया था।

- सन् 1962 में चीन से करारी शिकस्त के बाद उन्हें पूर्वी क्षेत्र की सेना का सेनापति बनाया गया था। उनके आते ही पूरी में सेना में जान सी आ गई थी।

- सन् 1971 में पाकिस्तान से हुई जंग में उन्होंने पूरी पाकिस्तानी सेना को भारतीय सेना के सामने गिड़गिड़ाने पर मजबूर कर दिया था। युद्ध से पहले उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी को वचन दिया था कि जीत उनके कदमों में होगी। उन्होंने ऐसा करके भी दिखाया। इसी के चलते उन्हें भारत के एकमात्र फील्ड मार्शल का खिताब मिला। (साभार:भास्कर.कॉम)

 
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रचनाएँ
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विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्ट शख्सियतों को भावभीनी आदरांजलि जो अब हमारी यादों में ज़िंदा हैं...
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सदा रहेंगे सादगी के सदाबहार संगीतकार, गीतकार एवं गायक रविन्द्र जैन “दादू”

10 अक्टूबर 2015
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मिसाइल मैन “कलाम” को देश का सादर नमन

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देश को करप्शन-फ्री होनाहै तो समाज में 3 ही ऐसे लोग हैं, जो ये कर सकते हैं। माता-पिता और टीचर। ........कलाम मिसाइल मैन के नाम सेमशहूर “अब्दुल कलाम” अब भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं लेकिन हमारेमन-मस्तिष्क में वो सदा पूजनीय रहेंगे | उनका “सादा जीवन-उच्च विचार” और सतत संघर्षसे कभी हार न मानने वाल

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नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती पर उन्हें देश का शत शत नमन !!!

23 जनवरी 2016
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पंजाब केसरी को उनकी जयंती पर भावभीनी श्रधांजलि !!!

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भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में से एक लाला लाजपत राय जिन्हें ‘पंजाबकेसरी’ भी कहते हैं की आज जयंती है| पंजाब के मोगा जिले में एक अग्रवाल बनियापरिवार में जन्मे लाला लाजपत राय ने कुछ समय तक हरियाणा के रोहतक और हिसार शहरोंमें वकालत भी की। ये भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के प्रमुख नेता

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भारतीयता के जीवंत चित्र उकेरे अमृता शेरगिल ने (103 वीं जयंती पर विशेष)

30 जनवरी 2016
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आज गूगल को अगर आपने खोला होगा तोइसके डूडल पर आपने जरुर गौर किया होगा| असल में गूगल ने आज अपना डूडल भारत की अमरमहिला चित्रकार अमृता शेरगिल को समर्पित किया है क्योंकि आज उनकी १०३ वीं जयंतीहै| भारत के प्रसिद्ध चित्रकारों में से एक अमृता शेरगिल जी का जन्म ३० जनवरी १९१३को बुडापेस्ट (हंगरी) में हुआ था। कल

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पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रधांजलि!!!

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भारतीयमूल की प्रथम महिला अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला की पुण्यतिथि पर देश की भावभीनीश्रधांजलि!!!

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हमारी यादों में हमेशा जिंदा रहेंगे निदा फाजली (८ फरवरी २०१६ को निधन पर भावभीनी श्रधांजलि)

9 फरवरी 2016
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घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो, यूँ कर लेंकिसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये|हमसफ़र तो कोई वक़्त के वीराने में,सूनी आँखों में कोई ख्वाब सजाया जाये|रोशनी की भी हिफ़ाज़त है इबादत की तरह,बुझते सूरज से चराग़ों को जलाया जाये|ग़म अकेला है तो साँसों को सताता है बहुत,दर्द को दर्द का हमदर्द बनाया जाये|घर से मस्जिद ह

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एकात्म मानववाद जैसी प्रगतिशील विचारधारा के सूत्रधार पंडित दीनदयाल उपाध्याय (पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रधांजलि!!!)

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भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष तथा भारतकी सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को ‘एकात्ममानववाद जैसी प्रगतिशील विचारधारा’ देने वाले पण्डित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म २५सितम्बर १९१६ को उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के छोटे से गाँव नगला चन्द्रभान मेंहुआ था। इनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपा

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लांसनायक हनुमंतप्पा नहीं रहे, देश में शोक की लहर

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महान चिन्तक, समाज-सुधारक व देशभक्त स्वामी दयानन्द सरस्वती (जयंती पर विशेष)

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महर्षि दयानन्द सरस्वती आधुनिक भारत के महान चिन्तक, समाज-सुधारक व देशभक्त थे। स्वामीदयानन्द सरस्वती जी का जन्म १२ फ़रवरी सन् १८२४ में मोरबी (मुम्बई की मोरवीरियासत) के पास काठियावाड़ क्षेत्र (जिला राजकोट), गुजरात में हुआ था। उनके पिता कानाम करशनजी लालजी तिवारी और माँ का नाम यशोदाबाई था। उनके पिता एक क

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“खूब लड़ी मरदानी वो तो झांसी वाली रानी थी” की उम्दा कवयित्री और कथाकार सुभद्रा कुमारी चौहान

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“खूब लड़ी मरदानी वो तो झांसी वालीरानी थी” जैसी अमर कविता की रचयिता सुभद्राकुमारी चौहान जितनी बड़ी कवयित्री थीं, उतनी ही बड़ी कथाकार भी थीं। सुभद्राकुमारी चौहान का जन्मनागपंचमी के दिन 16 अगस्त 1904 को इलाहाबाद (उत्तरप्रदेश) के निकट निहालपुर गाँव में एकसम्पन्न परिवार में हुआ था। सुभद्राकुमारी को बचपन

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भारतीय फिल्म उद्योग के 'पितामह' दादासाहब फालके (पुण्यतिथि पर विशेष)

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दादासाहबफालके का पूरा नाम धुंडीराज गोविन्द फालके है और इनका जन्म महाराष्ट्र के नाशिकशहर (प्रसिद्ध तीर्थ) से लगभग २०-२५ किमी की दूरी पर स्थित बाबा भोलेनाथ की नगरीत्र्यंबकेश्वर (यहाँ प्रसिद्ध शिवलिंगों में से एक स्थित भी है) में ३० अप्रैल१८७० ई. को हुआ था। इनके पिता संस्कृत के प्रकांड पंडित थे और मुम्

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महान संत एवं विचारक रामकृष्ण परमहंस (जयंती पर विशेष)

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भारत के एक महान संत एवं विचारक रामकृष्ण परमहंस ने सभी धर्मों की एकता पर जोरदिया। उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं अतः ईश्वर कीप्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधना और भक्ति का जीवन बिताया। वास्तव में स्वामीरामकृष्ण मानवता के पुजारी थे। साधना के फलस्वरूप वह इस निष्कर्ष पर पहुँ

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26/11 मुंबई आतंकी घटना में शहीद हुए अमर सेनानी संदीप उन्नीकृष्णन को देश का शत शत नमन (जयंती पर विशेष)

15 मार्च 2016
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अमर सेनानी संदीप उन्नीकृष्णन भारतीय सेना में एक मेजरथे, जिन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षागार्ड्स (एनएसजी) के कुलीन विशेष कार्य समूह में काम किया। 26/11 -2008  मुंबई आतंकी हमले मेंआतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हुए अमर सेनानी  संदीपउन्नीकृष्णन का जन्म 15 मार्च 1977 को हुआ था। संदीपउन्नीकृष्णन बैंगलोर स्थित

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धारावाहिक महाभारत के संवाद लेखक डॉ० राही मासूम रज़ा की पुण्यतिथि पर आदरांजलि

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डॉ० राही मासूम रज़ा का जन्म १ सितंबर, १९२५ को गाजीपुर जिले के गंगौलीगांव में हुआ था और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर के एकमुहल्ले में हुई थी। बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछसालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडिएट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं सेएमए करने

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दलितों के मसीहा थे मान्यवर कांशीराम जी (15 मार्च-जयंती पर विशेष)

16 मार्च 2016
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दलितों केमसीहा एवं बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक स्वर्गीय कांशीराम जी का जन्म 15 मार्चसन 1934 को पंजाब के रोपड़ ज़िले में हुआ था। कांशीराम जी के पिता का नाम एस. हरिसिंह था। स्वभाव से सरल और इरादे के पक्के कांशीराम जी की कर्मयात्रा 60 के दशक सेप्रारंभ हुई और 70 के दशक के शुरूआती दिनों में उन्होंने पु

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23 मार्च यानि शहीद दिवस

23 मार्च 2016
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मातृभूमि के वास्ते बलिवेदी पर हँसते-हँसते कुर्बान वीरों भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु कोपूरे देश का शत-शत नमन!!!

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हरदिलअज़ीज़ गीतकार आनंद बक्शी की पुण्यतिथि पर खास

30 मार्च 2016
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हिंदी फिल्मों के जाने-माने हरदिलअज़ीज़ गीतकार आनंद बक्शी का जन्म 21 जुलाई 1930 को पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर (तत्कालीनअविभाजित भारत देश) में हुआ था| 10 वर्ष की आयु में ही इनकी माँसुमित्रा के देहावसान के बाद इनका परिवार जब यह 17 वर्ष के थे लखनऊ आ गया और यहाँ से दिल्ली जाकर वहीं बस गया| उल्लेखनीय है कि

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बेमिसाल अभिनय की प्रतिमूर्ति थीं हिंदी फिल्मों की ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी (पुण्यतिथि पर श्रधांजलि)

31 मार्च 2016
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हिंदी फिल्मों कीप्रख्यात अभिनेत्री एवं दुखांत फिल्मों में भावुक एवं बेजोड़ अभिनय हेतु ट्रेजेडीक्वीन के खिताब से पुकारी जाने वाली उम्दा हीरोइन मीना कुमारी का असली नाम माहजबींबानो था और 1 अगस्त 1932 को ये बंबई (वर्तमान में मुंबई) में पैदा हुई थीं। उनकेपिता अली बक्श भी फिल्मों में और पारसी रंगमंच के एक

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हिंदुस्तान के हीरो थे सैम मानेकशा जिन्होंने गिड़गिड़ाने पर मजबूर कर दिया था पाकिस्तान को (जन्मतिथि ३ अप्रैल पर विशेष)

4 अप्रैल 2016
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हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के प्रख्यात निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत की पुण्यतिथि पर भावभीनी आदरांजलि!

9 अप्रैल 2016
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13 जनवरी 1926 को पश्चिम बंगाल के वर्धमान में जन्में थे हिंदी सिनेमा जगत के प्रख्यात निर्माताऔर निर्देशक शक्ति सामंत| उनका शैक्षणिक जीवन देहरादून और कोलकाता में बीता| ज्ञातव्यहै कि आराधना (1969), अनुराग (1972) और अमानुष (1975) जैसी फिल्मों के लिए 3 फिल्मफेयर बेस्ट फिल्म का अवार्ड हासिल करने वाले शक्त

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हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के मशहूर गायक एवं पहले सुपरस्टार थे के.एल. सहगल साहब (जन्मतिथि पर खास)

11 अप्रैल 2016
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प्रख्यात अभिनेता और गायक कुंदन लाल सहगल (के.एल.सहगल) का जन्म ११ अप्रैल १९०४को जम्मू में हुआ था| प्रेसिडेंट फिल्म का गीत एक बंगला बने न्यारा और शाहजहाँफिल्म का गीत जब दिल ही टूट गया जैसे सदाबहार सुपरहिट गानों को गाने वाले सहगल साहब का रूझान बचपन से ही गीत-संगीत की ओर था। उनकी मां केसरीबाई कौर की धार्

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दलितों और निर्बलों के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले महात्मा थे ज्योतिराव गोविंदराव फुले यानि ज्योतिबा फुले (जयंती पर विशेष)

11 अप्रैल 2016
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19वीं सदी के महान भारतीय विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रान्तिकारी कार्यकर्ता महात्मा ‘ज्योतिराव गोविंदराव फुले' यानि ‘ज्योतिबा फुले’ जी का  जन्म ११ अप्रैल १८२७ को पुणे में हुआ था। उनका परिवार कई पीढ़ी पहले सतारा से पुणे आकर फूलों के गजरे आदि बनाने का कामकरने लगा था। इसलिए माली के काम में लग

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हिंदी फ़िल्मों के स्टाइल आइकन थे फ़िरोज़ खान ( पुण्यतिथि पर विशेष )

27 अप्रैल 2016
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25 सितम्बर 1939 को बंगलुरु में जन्मे हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेताओं में शुमार है नाम बेहद स्टाइलिश फ़िरोज़ खान का | अफ़गानी मूल के फ़िरोज ने 1960 की फिल्म दीदी में सेकंड लीड एक्टर के तौर पर बॉलीवुड में पदार्पण किया| हालाँकि 1965 की फिल्म ऊँचे लोग की कामयाबी ने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित किया

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