सफलता का मार्ग - कुंडली से जानें

09 मई 2019   |  ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव   (5 बार पढ़ा जा चुका है)

सफलता का मार्ग - कुंडली से जानें

सफलता का स्वाद कौन नहीं चखना चाहता? हर व्यक्ति सफल होने की कामना रखता है, इसके लिए प्रयास भी करता है परन्तु सभी यह नहीं जानते कि सफलता किस प्रकार हासिल की जा सकती। हम अपने आसपास प्रतिदिन ऐसे सैकड़ों उदाहरण देखते है कि कुछ लोगों को सफलता हासिल होती है और कुछ के हाथ केवल नाकामी लगती है। ऐसे में कैसे जाना जाए कि अमुक व्यक्ति सफल होगा या असफल। सफलता और असफलता को समझने के कुछ मापदंड होने चाहिए। इस विषय में कोई दोराय नहीं है कि जीवन किसी का भी हो, सभी का संघर्षमय है और सफलता हासिल होने पर सभी गौरवान्वित महसूस करते है। इसके साथ ही यह भी सर्वविदित है कि सफलता का नाम ही संघर्ष है, और निरंतर संघर्ष करने से ही अंतत: जीवन में सफलता अर्जित की जा सकती है।

जीवन में सफलता के मंत्र को ज्योतिष के माध्यम से सहजता से जाना जा सकता है। सफलता के मंत्र को जानकर निश्चित रुप से हम अपनी सफलता की मंजिल पर आसानी से पहुंच सकते है। सफलता की यात्रा सहज हो जाती है यदि प्रारम्भ में ही हमें यह मालूम हो कि यह यात्रा कौन से मार्ग से होकर जाएगी। आज हम आपको यह बताने जा रहे है कि आपको सफल बनाने में आपकी सफलता का मार्ग तय करने में ज्योतिष विद्या एक उल्लेखनीय भूमिका निभा सकती है। वह कैस आईये जानें-



वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जन्मकुंड्ली के योगों और दशाओं का फलादेश करने से पूर्व लग्न भाव, पंचम भाव और नवम भाव अर्थात इस जन्म के साथ साथ पूर्व जन्म का भी अवलोकन कर लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त स्वयं की योग्यता को पहचान कर, अपनी प्रतिभा पर विश्वास करते हुए, अपना सौ प्रतिशत देने वाले व्यक्ति पर सारी दुनिया गर्व करती है। यह भी देखा गया है कि प्रतिवान लोगों का जीवन अधिक संघर्षमय रहता है।

अनुभव में यह पाया गया है कि जो लोग कम प्रतिभावान होते है, परन्तु सफलता का मार्ग जानते है और जीवन में उच्चस्तरीय सफलता हासिल करते है। इसके विपरीत जो लोग बहुत अधिक प्रतिभावान होते है, कुशल और योग्य होते हैं, ऐसे व्यक्तियों को जीवनभर प्रयासरत रहना पडता है। इसका कारण उन्हें सफलता के मार्ग की जानकारी होना होता है। जिस प्रकार हम जीवन में जब किसी यात्रा पर निकलते है तो निकलने से पूर्व ही यात्रा का मार्ग, ठहराव की जगह, रुकने के स्टेशन और यात्रा के आने-जाने का एक निर्धारित कार्यक्रम बनाते है। कुछ इसी प्रकार से जब हम सफलता चाहते है तो हमें यह मालूम होना चाहिए कि यह किस प्रकार संभव है। जिस रास्ते की कोई मंजिल ना हो, उस रास्ते पर चलने से कोई लाभ नहीं, इसी प्रकार जिस विषय का कोई लक्ष्य ना हो तो उस विषय पर समय और मेहनत लगाना, समय व्यर्थ करना सही नहीं है। जीवन में सफलता कैसे प्राप्त करेंसफलता के लिए ज्योतिष कर सकता है आपकी मदद। बहुत से ज्योतिषीय कारण है जिनकी वजह से एक व्यक्ति लगातार संघर्षों के बाद भी असफल हो जाता है। ऐसा क्यों होता है? इस विषय के कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं की गणना नीचे की जा रही हैं-

अनुशासन शक्ति

जन्मपत्री में यदि लग्न कमजोर हो तो व्यक्ति चाहकर भी स्वयं को अनुशासित नहीं बना पाएगा। लग्न भाव कमजोर है या नहीं इसके लिए लग्न भाव में स्थित राशि, ग्रह स्थिति और लग्न भाव पर पड़ने वाले अन्य ग्रहों के प्रभाव से जाना जा सकता है। लग्न भाव में स्थित राशि स्थिर प्रकृति की हो, एक मजबूत ग्रह सूर्य या गुरु लग्न भाव में हों, या लग्नेश स्वयं लग्न भाव में हो और कोई भी अशुभ ग्रह लग्न को ना देखता हो, तथा शुभ ग्रहों की दॄष्टि लग्न भाव पर होना, लग्न भाव को मजबूत बनाती है। एक अनुशासनहीन व्यक्ति ही भविष्य को बेहतर बनाने के लिए आज के समय का मूल्य समझ सकता है। एक दुर्बल लग्न आलस्य को जन्म देता है, व्यक्ति की आंतरिक शक्ति-विवेक को कम करता है, व्यक्ति की सोच में नकारात्मकता आती है और यही सोच उसके हर कार्य को कठिन और मुश्किल बनाती है।


वैचारिक दृढ़ता

एक जन्मजात प्रतिभावान और बुद्धिमान व्यक्ति भी जीवन में असफल हो सकता है यदि उसके विचारों में स्थिरता की कमी है, यदि उसके जीवन लक्ष्य स्थिर नहीं है। जीवन में उसे क्या करना है, यदि वह यह सुनिश्चित करने के बाद अपने लक्ष्यों को बदलता रहता है तो ऐसे में उस व्यक्ति का सफल होना नामुमकिन हो सकता है। वैचारिक दॄढ़ता के लिए भी एक मजबूत लग्न के साथ साथ तीसरा भाव जिसे पराक्रम भाव भी कहा जाता है। दृढ़ता से ही सफलता के नए मार्गों को खोज सकते है।


नियोजन

एक आधी-अधूरी योजना सकारात्मक परिणाम दे सकती है, परन्तु बिना योजना के सफलता के लिए आगे बढ़ना, ठिक वैसे ही है जैसे अंधकार में सूई में धागा डालना अर्थात व्यर्थ है। कुंडली का छठा भाव आपकी जीवन योजनाओं की जानकारी देता है। इसलिए छ्ठे भाव से इसका निर्णय किया जाता है। छठे भाव में बुध या राहु योजना निर्माण का गुण देता है।


आत्मविश्वास की कमी या असफलता का डर

असफलता का डर हमें अपंग कर देता है। कुण्डलीय दृष्टिकोण के अनुसार यह कमी व्यक्ति को सफलता प्राप्ति में असमर्थ तो बनाती ही है साथ ही व्यक्ति सफलता हेतु कदम ही नहीं उठा पाता है। लग्न भाव और सूर्य कमजोर हो, और छ्ठा भाव मजबूत हो तो व्यक्ति में यह दुर्गुण देखा जा सकता है।


शीघ्र सफलता की चाह

शीघ्र सफल होने की चाह में गलतियां करते चले जाने की संभावनाएं बढ़ जाती है। चर लग्न इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, और यदि लग्न भाव भी कमजोर हो तो स्थिति अधिक गंभीर हो जाती है। चंद्र का दुस्थानों में स्थित होना भी इसका एक कारण होता है। एकादश भाव में चंद्र व्यक्ति को उच्चाभिलाषी बनाता है। एकादश भाव इच्छापूर्ति का भाव है और यहां चंद्र शीघ्र इच्छाओं की पूर्ति चाहता है।


दूसरों को दोष देने की प्रवृत्ति

संघर्ष के बिना सफलता हासिल करना संभव नहीं है। जहां संघर्ष है, वहां गलतियां और समस्याएं भी है। गलतियों और समस्याओं का दोष दूसरों को देने से बचना चाहिए। इसकी जगह अपनी गलतियों दोषों का विश्लेषण करना चाहिए। एकादश भाव भावेश का कमजोर होना दूसरों को दोष देने का स्वभाव देखता है। एकादश भाव असंतुलित स्वभाव भी देता है।


सलाह ना मानने का स्वभाव

यदि लग्न भाव और लग्नेश दोनों कमजोर हो, राहु या पीडित बुध के प्रभाव में हो तो व्यक्ति बहुत अधिक बहस करने का स्वभाव रखता है। अपने को ही अधिक समझदार मामने की सोच में वह सही सुझावों पर ध्यान देने की जगह, अनदेखा करता है।


एकाग्रता की कमी

कुछ लोग कार्य शुरु करते है परन्तु उसमें अपना ध्यान लम्बे समय तक बनाए नहीं रख पाते है। इसे एकाग्रत की कमी कहा जाता है। मेष लग्न के जातकों में यह कमी बहुधा पाई जाती है। इस लग्न के व्यक्ति कठिन कार्य हाथ में लेते है, प्रारम्भ में जोश और उत्साह अधिक होने से अच्छी सफलता भी हासिल होती है परन्तु एकाग्रता की कमी होने से शीघ्र ही जोश और उत्साह खो देते है ऐसे में असफलता हासिल करना कठिन हो जाता है और कई बार कार्य मध्य में ही छोड़ देते है। इसके अतिरिक्त शुक्र या कमजोर चंद्र का लग्न पर प्रभाव व्यक्ति को दिन में स्वप्न देखने अर्थात सामर्थ्य से बड़े उद्देश्य निर्धारित करने का गुण देता है।


सबसे अलग रहकर कार्य करने का स्वभाव

दूसरों के साथ मिलकर कार्य ना करना, लोगों से मिलने जुलने का गुण ना होना या सहायता करने का गुण व्यक्ति को अलग-थलग डाल देता है। किसी के साथ भी ना जुड़ने की आदत का विचार एकादश भाव और इसके स्वामी से किया जाता है। एकादश भाव कमजोर हो, इसका स्वामी अशुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तो व्यक्ति अलग-थलग रहना पसंद करता है, यह स्वभाव सफलता में देरी का कारण बनता है।


विनम्रता

अपने सामर्थ्य से बड़े कार्यों में यदि असफलता हासिल हो भी जाए तो उसे विनम्र होकर स्वीकार करना चाहिए। कुछ व्यक्ति ऐसा नहीं कर पाते हैं। जीवन में असफलता भी बहुत कुछ सीखाती है। कई बार अपनी योग्यता, शक्ति और सामार्थ्य का आंकलन हम स्वयं नहीं कर पाते हैं, प्राप्त परिणाम हमें इसका आंकलन कराते है। लग्न भाव कमजोर हो तो व्यक्ति में विनम्रता की कमी रहती है।



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