नौकरी को बहुत ज्यादा अहमियत देने की जरुरत नहीं

16 दिसम्बर 2019   |  महेंद्र यादव   (7281 बार पढ़ा जा चुका है)

समय इतना बदल चुका है पर हममें से बहुतायत उसी पुराने ख्यालात के साथ जी रहे हैं | मेरा यह वक्तब्य थोड़ा अमर्यादित किस्म का लग सकता है लेकिन मै यह बात पूरी जिम्मेवारी के साथ कह रहा हूँ | इस वक्तब्य के मायने और सन्दर्भ कई हो सकते हैं लेकिन इस क्षण मेरा सन्दर्भ केवल सरकारी नौकरी को पाने की जद्दोजहद को लेकर है |


वस्तुतः नौकरी चाहे सरकारी हो या निजी कम्पनी की हो , नौकरी हमेशा नौकरी होती है | जब मै ऐसा बोलता हूँ तो मेरा तात्पर्य आपके व्यक्तित्व को संकुचित आयाम देने से है जहाँ नौकरी करने वाला एक नौकर होता है और उसके आलावा कुछ और नहीं |


जिसने नौकरी कर ली उसने अपने दिल दिमाग पर अपने नियोक्ता या बॉस का आधिपत्य स्वीकार कर लिया | मानो उसने नियोक्ता के विरुद्ध कभी मुँह न खोलने की कसम खा ली| और कसम खा भी क्यों न ले, उसे नौकरी जो बचानी है और तरक्की भी लेनी है |


नमक का दारोगा जैसा आज न कोई दारोगा बन सकता है न जुर्रत करेगा | यह बात प्राइवेट सेक्टर की नौकरी के लिए जितनी सच है , उससे ज्यादा कही सरकारी नौकरी के लिए है |


कवि घाघ की दो पंक्तियाँ काफी प्रासंगिक हैं इस मौके पर :


"उत्तम खेती माध्यम बाण, नीच चाकरी भीख नादान "


मै अपने दस साल के अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि जब आप एक बार नौकरी के जाल में आ जाते जाते हैं तो कुछ साल बीतने के बाद आपके अंदर का विद्रोही, ज्ञान , लेखनी, वैज्ञानिकता , मौलिकता और तार्किकता कहीं गुम से हो जाते हैं | बिलकुल इस तरह जैसे कभी ये गुण आपके व्यक्तित्व के हिस्से थे ही नहीं |


जब भी आप कुछ मौलिक लिखने का दुस्साहस करते हैं तो आपके वरिष्ठ अधिकारी बोलते हैं कि उनके वरिष्ठ अधिकारी उस लेखन को पसंद नहीं करेंगे और डाँट भी पड़ सकती है | हमने इस मुद्दे पर अपने वरिष्ठ के वरिष्ठ के वरिष्ठ से पन्गा ले लिया , एक बार नहीं बल्कि कई बार | नतीजा यह हुआ कि मुझे सामने तो दबाया नहीं जा सका लेकिन मेरे वार्षिक आकलन रिपोर्ट पर औसत सहकर्मियों से भी कम अंक देकर यह जता दिया गया कि मुझमे कोई मौलिक सोच आना मेरे लिए खतरा है |


ईमानदारी से कहूं, तो अँगरेज़ यहां से गए नहीं बल्कि कुछ उच्च वर्गीय अधिकारियो की आत्मा में सदा के लिए बस गए |


मै एक बात पूरी जानकारी के आधार पर कह रहा हूँ कि कोई देश ज्यादा से ज्यादा क्लर्क पैदा करके सम्पन्न नहीं हो सका है बल्कि जयादा से ज्यादा उद्यमी बनाकर हुआ है | देश वह सम्पन्न हुवा है जहाँ काम का सम्मान होता है जहाँ स्किल एवं हुनर की पूजा होती है नौकरी की नहीं | वर्त्तमान विश्व में चाइना से ज्यादा अच्छा उदहारण आपको कहाँ मिलेगा ?


हमारे यहां स्थिति उलट है | हम बच्चो को मालिक बनने की शिक्षा नहीं देते हम उन्हें अधिक से अधिक अंक लेकर किसी उद्यमी के यहां नौकरी करने के लिए तैयार करते हैं | ज्यादा से ज्यादा अंक लेकर कोई छोटी नौकरी से लेकर एक आईएस बनने की कहानी एक क्लर्क बनना ही तो है "लार्ड मैकाले " का क्लर्क |


उद्यमी स्कूल के अंक से नहीं बनते , मालिक बनने की योग्यता केवल अधिक अंक लाने से नहीं विकसित होती | इसके लिए तो मानसिकता परिवर्तन की जरुरत पड़ती है और हाँ, यह एक्जाम्स के टॉपर बनने से कहीं आसान है | बस उसके लिए बच्चे के बैग्स में जिन पुस्तको का बोझ डाल दिया गया है उन पुस्तकों को ही बदल देने की जरुरत है


आतंरिक कार्य संस्कृति के अतिरिक्त कई ऐसे पहलू हैं सरकारी नौकरी के, जिसके चलते आज के दौर में रोजगार का यह कोई अच्छा विकल्प तो नहीं है | 2004 में सरकारी नौकरियों से पेंशन ख़त्म कर दिया गया | 56J के सख्ती से कर्यान्वयन में दुरुपयोग की संभावना जैसे कई परिवर्तन हैं जिसके ध्यान में आते ही सरकारी नौकरियों के प्रति हमारी ललक काम होनी चाहिए और हमें एक हुनरमंद नागरिक बनने का रास्ता अख्तियार करना चाहिए !


आपको शायद यह जानकार हैरानी नहीं होनी चाहिए की जिस उम्र में हमारे युवा सरकारी नौकरी प्राप्त करते हैं उस उम्र में अमेरिका, चीन जैसे देशों में युवा दो चार स्टार्टअप में जोखिम ले चुके होते हैं |


मैकॉले की शिक्षा पद्धति से हम जितना जल्दी बाहर निकलें उतना अच्छा है.

अगला लेख: Sketches from Life: बुद्ध का मार्ग - 7



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