चाटुकारिता

03 दिसम्बर 2019   |  शिल्पा रोंघे   (3999 बार पढ़ा जा चुका है)


ना कोई फ़ीस लगती है ना कोई
सिफारिश लगती है.
चाटुकारिता की शिक्षा बिल्कुल मुफ़्त में मिलती है.

शिल्पा रोंघे

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नशा "नाश" का दूसरा नाम है.ये नाश करता है बुद्धि का.ये नाश करता है धन का.ये नाश करता है संबंधों का.ये नाश करता है नैतिक मूल्यों का.नाश नहीं निर्माण की तरफ बढ़ोयुवाओं तुम नशामुक्त समाज बनानेका संकल्प लो.शिल्पा रोंघे
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वो भी बचपन के क्या दिन थेजब हम घूमते थे और खुस होते थेतब हम रोते थे फिर भी चुप होते थेना वादे होते थे ना शिकवे होते थेबस थोड़ा लड़ते थे फिर मिलते थेवो भी क्या बचपन के दिन थेतब सब कुछ अच्छा लगता थाचाहे जो हो सब सच्चा लगता थागांव की गालिया नानी के यहाँ अच्छा लगता थाना झूठ था ना फरेब था एक दूसरे की रोटिय
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02 दिसम्बर 2019
सो
खुश है कुछ लोगइंस्टाग्राम, फ़ेसबुक, और ट्विटरपर अपनी फ़ैन फॉलोइंग को गिनकर.अपनी निज़ी जिंदगी को सार्वजनिककर.मगर भूल जाते है इस वर्चुअल दुनियामें खोकर उस पड़ोस को जो सबसेपहले पूछते है उनका हाल चाल.वो स्कूल कॉलेज और दफ़्तर केदोस्त जो बिना बताएं ही जान लेते हैदिल की बात.उंगल
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मंटूबड़ा खुश था । प्राइमरी में टीचर लगे उसेअभी साल भर भी नहीं हुआ था कि सरकार द्वारा प्रायोजित डी-एड पाठ्यक्रम के लिए उसकानामांकन हो गया । प्राइमरी स्तर के बालकों कोपढ़ाने के लिए डी-एडकी पढाई काफी महत्वपूर्ण है । समय परसमस्त शिक्षक सेंटर पहुँच गए । पाठ्यक्रमप
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हुई सभा एक दिन गुड्डे गुड़ियों की.गुड़िया बोली,मैं सुंदरता की पुड़ियामुझसे ना कोई बढ़िया.इतने में आया गुड्डापहन के लाल चोला,कितनों का घमंड है मैंने तोड़ा.बीच में उचका काठी का घोड़ाअरे चुप हो जाओ तुम थोड़ा.मैंने ही हवा का रुख़ है मोड़ा.लट्टू घूमा, कुछ झूमा.बोला लड़ों
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हुई सभा एक दिन गुड्डे गुड़ियों की.गुड़िया बोली,मैं सुंदरता की पुड़ियामुझसे ना कोई बढ़िया.इतने में आया गुड्डापहन के लाल चोला,कितनों का घमंड है मैंने तोड़ा.बीच में उचका काठी का घोड़ाअरे चुप हो जाओ तुम थोड़ा.मैंने ही हवा का रुख़ है मोड़ा.लट्टू घूमा, कुछ झूमा.बोला लड़ों
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भ्रुण और नवजात शिशु कोहँसना किसने सिखलाया।चोट, पीड़ा नहीं पर स्वत:रोना उसको सिखलाया।।हाथ पकड़ कर पशु कोकिसी ने नहीं चलना सिखलाया।अन्न नहीं था जब धरा पर,वनस्पतियों से काम चलाया।।पापाचार गह, सदाचार सेमुँह मोड़ हे मानव अधोगति पाया!हृदयांचल में बैठा प्रभु,उनकी सुन नहीं पाया!!डॉ. कवि कुमार निर्मल
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हुई सभा एक दिन गुड्डे गुड़ियों की.गुड़िया बोली,मैं सुंदरता की पुड़ियामुझसे ना कोई बढ़िया.इतने में आया गुड्डापहन के लाल चोला,कितनों का घमंड है मैंने तोड़ा.बीच में उचका काठी का घोड़ाअरे चुप हो जाओ तुम थोड़ा.मैंने ही हवा का रुख़ है मोड़ा.लट्टू घूमा, कुछ झूमा.बोला लड़ों
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का
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