चाटुकारिता

03 दिसम्बर 2019   |  शिल्पा रोंघे   (4036 बार पढ़ा जा चुका है)


ना कोई फ़ीस लगती है ना कोई
सिफारिश लगती है.
चाटुकारिता की शिक्षा बिल्कुल मुफ़्त में मिलती है.

शिल्पा रोंघे

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हुई सभा एक दिन गुड्डे गुड़ियों की.गुड़िया बोली,मैं सुंदरता की पुड़ियामुझसे ना कोई बढ़िया.इतने में आया गुड्डापहन के लाल चोला,कितनों का घमंड है मैंने तोड़ा.बीच में उचका काठी का घोड़ाअरे चुप हो जाओ तुम थोड़ा.मैंने ही हवा का रुख़ है मोड़ा.लट्टू घूमा, कुछ झूमा.बोला लड़ों
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28 नवम्बर 2019
मुझे पता है तुमने मुझे देख लिया था पर फोन कीस्क्रीन पर आंख जमाये शो ऐसे किया जैसे मै कमरे में हूँ ही नही । फिर खिड़की की तरफदेखते हुए फोन कान पर लगा कर तुमने बात करनी शुरू कर दी ऐसा दिखा कर जैसे कोई बहुतज़रूरी काल है । दरअसल दूसरी तरफ लाइन पर कोई था ही नही बावजूद इसके कि तुमने हैलोहैलो बोलकर बातचीत ऐस
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इतिहास भले ही गुजरा हुआ वक्त होता है इसका मतलब नहीं हैकि इसके बारे में जानकारी होना हमारे लिए उपयोगी नहीं होता है, ये हमारे देश की धरोहर होता है, मानवसभ्यता के विकास और इतिहास से मिले सबक ही सुनहरे भविष्य को गढ़ने में मदद करतेहै। आज अपने इस
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वो भी बचपन के क्या दिन थेजब हम घूमते थे और खुस होते थेतब हम रोते थे फिर भी चुप होते थेना वादे होते थे ना शिकवे होते थेबस थोड़ा लड़ते थे फिर मिलते थेवो भी क्या बचपन के दिन थेतब सब कुछ अच्छा लगता थाचाहे जो हो सब सच्चा लगता थागांव की गालिया नानी के यहाँ अच्छा लगता थाना झूठ था ना फरेब था एक दूसरे की रोटिय
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वर्तमान में राजनीतिक उठा पटक पर डॉ दिनेश शर्माका खरा व्यंग्य...भेडें और भेड़िये *डॉ दिनेश शर्माफाइव स्टार होटल की लाबी में भेड़ों के बड़े झुंडमें , दो भेडें जो एक दूसरे को अच्छी तरह पहचानती थी,अचानक आमने सामने पड़ गयी ।पहली भेड़ ; तुम यहां क्या कर रही हो ?दूसरी भेड़ ; जो तुम कर रही हो । पहली भेड़ ; मुझे तो
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नशा "नाश" का दूसरा नाम है.ये नाश करता है बुद्धि का.ये नाश करता है धन का.ये नाश करता है संबंधों का.ये नाश करता है नैतिक मूल्यों का.नाश नहीं निर्माण की तरफ बढ़ोयुवाओं तुम नशामुक्त समाज बनानेका संकल्प लो.शिल्पा रोंघे
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आसान नहीं है ज़िंदगीजीने का तरीका सीखलाना.आसान नहीं किसी कोसही राह दिखाना.आसान नहीं है खुद को भी बदलना, कुछ ख़्वाहिशोंको छोड़ना, कुछ सुविधाओं को त्यागना.त्याग की अग्नी में तपना औरउम्मीद के दीपक जलाना.धूप, बारिश, और ठंडको सहना.होंठो पर शिकायत कम और समाधाननिकालना.हां सचम
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सिड्रेंला और लैलामें बहस एक दिनजमकर हुई। लैला सिड्रेंलाकी किस्मत कोबेहतर बता गईसिड्रेंला को लैलाने कहा देखोफर्श से तू अर्शपर पहुंचगई। मैं महलों की रानीहोकर अकेली ही रह गई। कुछ इस तरह वो फ़कीरीको वो अमीरी से बेहतरबता गईऔर कह गई प्यार मेंउंच और नीचकी बात गलती से भी ना कर
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16 दिसम्बर 2019
बढ़ती जनसंख्या परस्वास्थ्य सुविधाएं पड़ रही कम.महंगी हुई शिक्षा और अच्छे स्कूल हुए कम.ट्रेनों में बैठने को हुई जगह कम.महानगरों में रहने को मकान पड़ रहे कम.पेड़ और पौधे हुए कम.पीने का पानी हुआ कम.सिकुड़ रहे खेत खलिहान, अनाज हुआ कम.बढ़ रही गरीबी और महंगाई.किसी ने धर्म को तो किसी ने जातिको देश की बदहाल
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हर बार सच्चाई की सफाई देना जरुरी नहीं.कभी कभी सही वक्त सब कुछसाफ कर देता हैअपने आप ही.सूरज को ढकनेकी कोशिश करता हैबादल हर कभी, लेकिन उसे रोशनी देनेसे रोक सका हैक्या वो कभी.शिल्पा रोंघे
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कहीं कांप रही धरती. कहीं बेमौसम बारिश से बह रही धरती. कहीं ठंड के मौसम में बुखार से तप रही धरती. कभी जल से, तो कभी वायु प्रदूषण से ज़हरीली हो रही प्रकृति. विकास के नाम पर विनाश का दर्द झेलती प्रकृति अपनी ही संतति से अवहेलना प्
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झोपड़ी हो या फिर महल चौबारा,अपना घर प्यारा लगता है।तीर्थ करो या जाओ माया नगरी,अपने घर में हीं सुख मिलता है।।डॉ. कवि कूमार निर्मल
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हुई सभा एक दिन गुड्डे गुड़ियों की.गुड़िया बोली,मैं सुंदरता की पुड़ियामुझसे ना कोई बढ़िया.इतने में आया गुड्डापहन के लाल चोला,कितनों का घमंड है मैंने तोड़ा.बीच में उचका काठी का घोड़ाअरे चुप हो जाओ तुम थोड़ा.मैंने ही हवा का रुख़ है मोड़ा.लट्टू घूमा, कुछ झूमा.बोला लड़ों
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भ्रुण और नवजात शिशु कोहँसना किसने सिखलाया।चोट, पीड़ा नहीं पर स्वत:रोना उसको सिखलाया।।हाथ पकड़ कर पशु कोकिसी ने नहीं चलना सिखलाया।अन्न नहीं था जब धरा पर,वनस्पतियों से काम चलाया।।पापाचार गह, सदाचार सेमुँह मोड़ हे मानव अधोगति पाया!हृदयांचल में बैठा प्रभु,उनकी सुन नहीं पाया!!डॉ. कवि कुमार निर्मल
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