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कवि आलोक पाण्डेय की डायरी

कवि आलोक पाण्डेय

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kavi alok pandey ki dir

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पुस्तक के भाग

1

आ जा चित्तवन के चकोर

13 अप्रैल 2017
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स्वर्णिम यौवन का सागर-अपार टकरा रहा तन से बारंबार विपुल स्नेह से सींचित् ज्वार रसमय अह्लादित करता पुकार अन्तःस्थल में उठता हिलोर आ जा ! चित्तवन के चकोर ! सुरभित- सावन मधुमास बिता फाल्गुन का हर उत्पात फीका अंतरत्तम में हिय रिस चुका अवचेतन, मन रिक्त सब अभिलेखा है पतझड़ कब का मचाता शोर आ जा चित्तवन के

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आर्त्त गैया की पुकार

6 जून 2017
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कंपित! कत्ल की धार खडी ,आर्त्त गायें कह रही –यह देश कैसा है जहाँ हर क्षण गैया कट रही !आर्त्त में प्रतिपल धरा, वीरों की छाती फट रहीयह धरा कैसी है जहाँ हर क्षण 'अवध्या' कट रही |अाज सांप्रदायिकता के जहर में मार मुझको घोल रहा,सम्मान को तु भूल ,मुझे कसाई को तू तोल रहाहे भारत! याद कर पूर्व किससे था समृद्ध

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