मानवता की हार

22 अगस्त 2018   |  अमित   (118 बार पढ़ा जा चुका है)

मानवता की हार

विपदा में जीवों से विमोह

✒️

विवश मनुज को तीर लगाने

भोजन, वस्त्र, नीर पहुँचाने,

भगवन रूप बदलकर आख़िर

देवदूत बन आए हैं;

और निकम्मे से दिखते जो

वीर, बंधु-बांधव सारे वो

नाना प्रकार सहयोग बढ़ाने

मुद्रा-द्रव्य भी लाये हैं।


व्यथा बढ़ी है धरती पर

इक नहीं मनुज के जाति की,

वक्त ज़रा सा भी हो साहिब

कुछ बात कहो इक बात की;

जीव-जंतु जो जंगल में थे

रमे बसे थे मंगल में थे,

उन्हें उबारने को भी कोई

नेह-नीर के पार गए हैं?

या मानव अपनी मानवता

में ही ख़ुद से हार गये हैं?

...“निश्छल”

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