“मुक्तक” जिंदगी को बिन बताए कैसे मचल जाऊँगा।

24 अगस्त 2018   |  महातम मिश्रा   (88 बार पढ़ा जा चुका है)

“मुक्तक”


मापनी- २१२२ २१२२ २२१२ २१२


जिंदगी को बिन बताए कैसे मचल जाऊँगा।

बंद हैं कमरे खुले बिन कैसे निकल जाऊँगा।

द्वार के बाहर तेरे कोई हाथ भी दिखता नहीं-

खोल दे आकर किवाड़ी कैसे फिसल जाऊँगा॥-१


मापनी- २२१२ २२१२ २२१२ २२१२


जाना कहाँ रहना कहाँ कोई किता चलता नहीं।

यह बाढ़ कैसी आ गई पानी भरा हिलता नहीं।

डूबा हुआ घर गिर रहा औ बह रहा है आदमी-

जीवन हुआ बदतर बहुत खोया पता मिलता नहीं॥-२


महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी

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