“मुक्तक” (छंद - हरिगीतिका)

04 सितम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (44 बार पढ़ा जा चुका है)

छंद - हरिगीतिका (मात्रिक) मुक्तक, मापनी - 2212 2212 2212 2212


“मुक्तक” (छंद - हरिगीतिका)


फैले हुए आकाश में छाई हुई है बादरी।

कुछ भी नजर आता नहीं गाती अनारी साँवरी।

क्यों छुप गई है ओट लेकर आज तू अपने महल-

अब क्या हुआ का-जल बिना किसकी चली है नाव री॥-1


क्यों उठ रही है रूप लेकर आज मन में भाँवरी।

क्यों डूबने को हरघड़ी तैयार रहती गागरी।

अब क्या हुआ कुछ तो कहो आकर उलझती डोर में।

कुछ तो नहीं है पास मेरे मनन कर ले बाँवरी॥


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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