“कुंडलिया” आती पेन्सल हाथ जब, बनते चित्र अनेक।

06 सितम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (41 बार पढ़ा जा चुका है)

“कुंडलिया”


आती पेन्सल हाथ जब, बनते चित्र अनेक।

रंग-विरंगी छवि लिए, बच्चे दिल के नेक॥

बच्चे दिल के नेक, प्रत्येक रेखा कुछ कहती।

हर रंगों से प्यार, जताकर गंगा बहती॥

कह गौतम हरसाय, सत्य कवि रचना गाती।

गुरु शिक्षक अनमोल, भाव शिक्षा ले आती॥


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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महातम मिश्रा
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दिल से आभारी हूँ सम्मानित शब्दनगरी मंच का इस गज़ल को विशिष्ट रचना का सम्मान प्रदान करने के लिए, ॐ जय माँ शारदा!

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