“कुंडलिया” आती पेन्सल हाथ जब, बनते चित्र अनेक।

06 सितम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (73 बार पढ़ा जा चुका है)

“कुंडलिया”


आती पेन्सल हाथ जब, बनते चित्र अनेक।

रंग-विरंगी छवि लिए, बच्चे दिल के नेक॥

बच्चे दिल के नेक, प्रत्येक रेखा कुछ कहती।

हर रंगों से प्यार, जताकर गंगा बहती॥

कह गौतम हरसाय, सत्य कवि रचना गाती।

गुरु शिक्षक अनमोल, भाव शिक्षा ले आती॥


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "हाइकु"मेरे आँगन



महातम मिश्रा
19 सितम्बर 2018

दिल से आभारी हूँ सम्मानित शब्दनगरी मंच का इस गज़ल को विशिष्ट रचना का सम्मान प्रदान करने के लिए, ॐ जय माँ शारदा!

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
17 सितम्बर 2018
"
"कुंडलिया"खेती हरियाली भली, भली सुसज्जित नार।दोनों से जीवन हरा, भरा सकल संसार।।भरा सकल संसार, वक्त की है बलिहारी।गुण कारी विज्ञान, नारि है सबपर भारी।।कह गौतम कविराय, जगत को वारिस देती।चुल्हा चौकी जाँत, आज ट्रैक्टर की खेती।।-1होकर के स्वछंद उड़े, विहग खुले आकाश।एक साथ का है सफर, सुंदर पथिक प्रकाश।।सुं
17 सितम्बर 2018
04 सितम्बर 2018
"
वज़्न- 1222 12222122 2, काफ़िया-आ, रदीफ़ - " करते हैं इशारोमें""गज़ल"चलो जी कुछ ख़ताकरते हैं इशारों मेंबवंडर ही खड़ा करतेहै इशारों मेंकहाँ तक चल सकेंगेदिनमान चुप होकरजलाते है अगन दीयाहै इशारों में।।नयी जब रोशनी होगीतम फ़ना होगाउड़ाते हैं वोफतिंगा हैं इशारों में।।भरा पानी शहर मेंले आग मत जानाबुझे मन का ठिकान
04 सितम्बर 2018
07 सितम्बर 2018
शीर्षक ---भाषा/बोली/वाणी/इत्यादि समानार्थक“मुक्तक”तुझे छोड़ न जाऊँ रीसैयां न कर लफड़ा डोली में। क्या रखा है इसझोली में जो नहीं तेरी ठिठोली में। आज के दिन तूँ रोकले आँसू नैन छुपा ले नैनों से-दिल ही दिल की भाषाजाने क्या रखा है बोली में॥-1 हंस भी मोती खाएगा, फिर एक दिन ऐसा आयेगा। कागा अपने रंग मेंआकर,
07 सितम्बर 2018
27 अगस्त 2018
छन्द- वाचिकप्रमाणिका (मापनीयुक्त मात्रिक) वर्णिक मापनी - 12 12 12 12 अथवा - लगा लगा लगालगा, पारंपरिक सूत्र - जभान राजभा लगा (अर्थात जर ल गा) विशेष : प्रमाणिका 'मापनीयुक्त वर्णिक छंद' है,जिसमें वर्णों की संख्यानिश्चित होती है अर्थात किसी गुरु 2 के स्थान पर दो लघु 11 प्रयोग करने की छूटनहीं होती है। ऐस
27 अगस्त 2018
28 अगस्त 2018
पदांत- नहीं, समांत-अहरी,मापनी-2122 2122 2122 12“गीतिका” आप के दरबार में आशांति ठहरी नहीं दिख रहा है ढंग कापल प्रखर प्रहरी नहींझूलती हैं देख कैसेद्वार तेरे मकड़ियाँ रोशनी आने न देतीझिल्लियाँ गहरी नहीं॥ वो रहा फ़ानूष लटकाझूलता बे-बंद का लग रहा शृंगार सेभी रेशमा लहरी नहीं॥गुंबजों का रंगउतरा जा रहा बरसात
28 अगस्त 2018
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x